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आया मौसम राष्ट्रीयता का, फिर ओली बरसे भारत पर : कंचना झा

 

कंचना झा, काठमांडू । एकबार फिर सामाजिक संजाल में राष्ट्रीयता से ओतप्रोत भावनाएं रखी जा रही है । ‘राष्ट्रीयता’ ये दिखाने या कहने की बात नहीं है । यह एक भाव है जो हर नागरिक के मन में होती है । इसे चिल्ला चिल्ला कर साबित करने की आवश्यकता नहीं है । लेकिन यहाँ सबकुछ जायज है । पिछले कुछ वर्षो की बात करें तो हमारे देश में राष्ट्रीयता को दिखाने का एक अलग ही तरीका अपनाया जा रहा है । यहाँ आप कितने बड़े राष्ट्रवादी है यह इस बात से साबित होता है कि आप भारत को कितने जोर से गाली दे सकते हैं । आप भारत को जितना गाली देंगे आप उतने बड़े राष्ट्रवादी । हाँ खासियत इस बात की कि ये राष्ट्रीयता तब उफान पर होती है जब कोई खास दल कमजोर पर जाते हैं या फिर सत्ता से बाहर होते हैं ।
नेकपा एमाले के अध्यक्ष ओली भी इसी समूह के सदस्य दिखते हैं । ओली का अपना अलग ही अंदाज है । वो तब–तब राष्ट्रीयता की बात को जोर शोर से उठाते हैं जब उन्हें लगता है कि अब एक बार फिर जनता अपनी रोजी रोटी में लगी है । सत्ता में उनकी नहीं चल रही है । लोग उन्हें नजर अंदाज कर रहे हैं बस वो शुरु हो जाते हैं नई बातों को लेकर । जैसे कभी चुच्चों नक्शा को लेकर तो कभी राम जन्मभूमि को लेकर । उनका अपना तुक्का चलता रहता है । वो इस तलाश में रहते हैं कि कब कौन सा निशाना ठीक लग जाए, उन्हें कुर्सी मिले और वो बैठ जाएं । तो आज एक बार फिर वो राष्ट्रीयता की आवाज को बुलंद कर रहे हैं । कुछ ही दिन पहले कान्तिपुर दैनिक ने भी यह मुद्दा उछाली थी उसको पुष्टीकरण के रूप में कल बहुत कुछ बोल गयें ओली साहब ।
२० गते फागुन शनिवार को आयोजित स्थानीय निकाय कर्मचारी संघ के कार्यक्रम को सम्बोधन करते हुए अध्यक्ष ओली ने एक बार फिर भारत को अपना निशाना बना लिया है । भारत हमारा सबसे निकटतम देश है । वह हमारा पड़ौसी है । बहुत बार हम दोनों एक दूसरे के साथ खड़े होते हैं । बहुत ही गहरा संंबंध है नेपाल और भारत के बीच । लेकिन आज एकबार फिर ओली को भारत की नियत पर संदेह हो रहा है । उनका कहना कि भारत की नियत ठीक नहीं लग रही है । अपने संबोधन में एमाले अध्यक्ष केपी शर्मा ओली ने कहा कि उपल्लो मुस्ताङ में बौद्ध विश्वविद्यालय खोलने की तैयारी विदेशियों के लिए खेल का मैदान बनाने की योजना के मुताबिक आगे बढ़ रही है । यह राष्ट्रीयता के उपर प्रहार है । मुस्ताङ में विश्वविद्यालय(मुस्ताङ बौद्ध कॉलेज) विदेश की दलाली है । राष्ट्रीयता पर प्रहार है । मित्रराष्ट्र चीन के विरुद्ध गद्दारी है । देश की सार्वभौमसत्ता को अस्वीकार कर दिया । स्वतंत्रता को अस्वीकार कर दिया । ओली ने कहा कि यूनिवर्सिटी के नाम कुछ और ही खेल खेला जा रहा है । ओली बार बार कह रहे थे कि जहाँ लोग ही नहीं है वहाँ विश्वविद्यालय ! विश्वविद्यालय हमें वहाँ चाहिए जहाँ लोगों की भीड़ है, जहाँ लोग पढ़ने वाले हैं । लोग रहेंगे तभी तो विश्वविद्यालय जाऐंगे । जहाँ लोग है ही नहीं वहाँ क्यों बनाना ?
हाँ यह भी सच है कि जहाँ विश्वविद्यालय के बनने की बात है वो जगह बहुत ही संवेदनशील है । पहली तो चीन के सीमा से जुड़ा हुआ है और दूसरा यूरेनियम की खान है । तो वहाँ ओली को लग रहा होगा कि भारत की नियत खराब है । लेकिन सवाल तो यहाँ भी उठाया जा सकता है कि क्या ओली को पहले यह नहीं मालुम था तो हंगामा और राष्ट्रीयता की बात आज क्यों कर रहे हेैं ?
वैसे काठमांडू स्थित भारतीय दूतावास का कहना है कि कॉलेज निर्माण के लिए बाह्रगाँव मुक्तिक्षेत्र गाँपालिका से प्रस्ताव आया और भारत के अनुदान में निर्माण करने की अनुमति के लिए नेपाल से आग्रह किया था ।
कोई ये नहीं कह सकता कि उनके द्वारा पुछे गए सवाल ठीक नहीं है । लेकिन ये सवाल आज ही क्यों उठाया गया । क्या भारत ने अभी ही इस बात का जिक्र किया है । नहीं न । (मुस्ताङ बौद्ध कॉलेज) एक दिन की बात तो नहीं । ना ही विश्वविद्यालय की बात अचानक से आई होगी । आज नई सरकार से तो इसकी डिलिंग नहीं हुई होगी । ये तो उनकी सरकार जब थी तभी से चर्चा हुई होगी तो सवाल आज क्यों ? तब क्यों नहीं चिल्लाकर बोल सके इसलिए न क्योंकि तब सत्ता में स्वयं थे । ऐसा प्रायः देखा गया कि जब भी वो कमजोर हुए हैं उन्होंने भारत को लेकर राष्ट्रीयता की बात को आगे लाया है ।

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आम जनता को कहाँ इतनी फूर्सत कि वो राजनीतिक दांवपेंच को समझ सके । वो तो इतने में ही लगी है कि कहाँ से कमाएं और दो वक्त का खाना जोड़ सकें । मंहगाई अपने चरम पर है ।इसे कैसे निपटा जाए ? क्या तरीका अपनाएं कि बच्चें अपने देश में रहने को माने ? रोजगार का सृजना कैसे करे ? शिक्षा के क्षेत्र में, स्वास्थ्य के क्षेत्र में क्या करने से होगा ? कि देश की अवस्था में सुधार हो तो कुछ बात बनें लेकिन नहीं हमें तो आम जनता को प्रयोग करना है झूठी राजनीति में । उनके मन में बस अब डाल दें कि हमारे पड़ौसी की नियत अच्छी नहीं है । अपनी रोटी सेकें । पहली ही इतना धन संचय कर चुके हैं न जाने कितना चाहिए इन्हें ?
सारे के सारे नेता सिर्फ और सिर्फ अपनी सोचते हैं । सच तो यही है कि इन्हें अपनी जनता को लेकर किसी तरह की कोई सोच नहीं है । इनका कुछ नहीं है होने वाला अंत में घाटा हमारे नेपाल को ही होगा । ये नेता आग लगाकर चुपचाप मिले कुर्सी तो बैठ जाऐंगे, चुप हो जाऐंगे और हम और आप एक दूसरे को शक की निगाहों से देखते रहेंगे ।

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(मुस्ताङ बौद्ध कॉलेज) के साथ ही ओली ने भारत से आए तरकारी विषादी परिक्षण बिना ही आयात करने के विषय का भी विरोध किया । साथ ही यह भी कहा है कि अभी जो सरकार देश में है उसमें लाज शरम नहीं है । हमारे घर घर में विषादीयुक्त चिज आने देना और नेपाली को खिला देना केवल इसलिए कि मालिक खुशी होते हैं या नहीं ? नेपाली मरते हैं तो क्या हुआ ?नेपाली के घर मेें विषादी आया तो क्या हुआ ? ओली बार बार प्रधानमंत्री प्रचंड पर आरोप लगा रहे थे कि वो पड़ौसी को खुश करने में लगे हैं
समझ में नहीं आ रहा है कि ये कैसी राजनीति है जो हम अपने देश के लिए कर रहे हैं । अभी तो ज्यादा समय भी नहीं हुआ है जब ओली और प्रचंड साथ थे । तबतक तो ये बातें नहीं थी । आज सत्ता से बाहर हैं तो सबकुछ नजर आ रहा है ।
दोनों ही बहुत संवेदनशील विषय है । दोनों ही विषयों को लेकर वार्ता होनी चाहिए । दोनों देश एक जगह बैठकर समस्या का हल निकालें । विषादी परिक्षण की जो व्यवस्था है उसके तहत ही काम हो ताकि इसका हर्जाना आम नागरिक को नहीं चुकाना पड़े ।
नेपाल भारत का रिश्ता केवल दो देशों की सीमा के बीच नहीं है बल्कि यहाँ रहने वाले लोगों से जुड़ा है । दोनों देश एक दूसरे से इसलिए इतने गहराई से जुड़े हैं क्योंकि हम धार्मिक, सांस्कृतिक, खानपान रहन सहन, पहनावा सबसे जुड़े हैं । राजनीति करनेवाले कहाँ अलग कर पाऐंगे नेपाल की बहु को भारत में बसी उनकी माँ से । क्या सीमाएं रोक पाऐंगी अपनी बहुओं को बेटियों को रक्षा बंधन के सूत्र बांधने से । क्यों इतनी घृणा, क्यों इतना विष उगलते हैं यह सोचने की बात है । कोई अपने स्वार्थ के लिए समय तक को नहीं देखते और शुरु हो जाते हैं ।
जहाँ कमी कमजोरी है वहाँ सलाह करें, उचित जगह पर अपनी बातों को रखें । भोली भाली जनता को उकसाने का काम हरगिज नहीं करें । पड़ौसी से हमेशा संबंध अच्छा रहे सोच इस तरह का बनाएं । तोड़ने की नहीं जोड़ने की बात करें । क्योंकि सच्चाई यही है कि सबकुछ बदला जा सकता है आपका पड़ौसी नहीं । तो आग्रह यही कि बेबजह राष्ट्रीयता का मौसम न लाएं ।

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kanchan jha
कंचना झा
कार्यकारी संपादक
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