राजनीति का मिथक तोड़ते युवा : मुरली मनोहर तिवारी (सीपू)
मुरली मनोहर तिवारी (सीपू) हिमालिनी अंक जनवरी । मिथक का पड़ाव सच और झूठ के दो विपरीत छोरों के बीच आता है। मिथक सच नहीं कहते, लेकिन सच होने का आभास देते हैं। इसलिए मिथक ताक़तवर होते हैं और हम उन्हें खालिस झूठ का दर्जा नहीं दे सकते। मिथक राजनीति के भी हैं। मसलन ये कि चुनाव बस जाति और पैसे का खेल हैं या ये कि औरतें वहाँ वोट डालती हैं, जहाँ उनके घर के मर्द कहते हैं या युवा अनुभवहीन होते है इसलिए वे निर्माण के बजाए विध्वंस कर देते है। हर मिथक में सच का एक अंश होता है। एक छोटा सा हिस्सा जो पूरा सच होने का दावा करता है, जो सच के बाक़ी सब अंशों को दबोच लेता है। इसी कारण मिथक ख़तरनाक़ होते हैं। नज़र पर पर्दा डाल देते हैं। इसीलिए इन्हें ठीक से समझना ज़रूरी है।
हमारे देश में और सच कहें तो इस पूरे महाद्वीप में राजनीति बहुत गहरी समाई हुई है। पान की हर दुकान पर, हर ढ़ाबे और ठेले के इर्द-गिर्द, राजनीति हमारी रगों में दौड़ती है। अगर राजनीति के बारे में ढेरों मिथक प्रचलित हैं तो उसकी एक वजह ये भी है कि जो चीज़ हमें जितना गहरा प्रभावित करती है उसके बारे में हम अक्सर उतने ही ढीले-ढाले तरीक़े से सोचते हैं। बिना तर्क किए उसे सहज और सिद्ध मान लेते हैं।
सामाजिक और आर्थिक मायनों में दुनिया में आंकड़ों के सबसे बड़ा और सबसे विश्वस्नीय संग्रह का मालिक है, लेकिन राजनीति के बारे में विश्वसनीय तरीक़े से आंकड़े जुटाना और उनका तथ्य पर आधारित विश्लेषण करना कहीं हमारे मिजाज़ में नहीं है। शायद ये हमारे राजनीति शास्त्र के विधान में भी नहीं है, इसीलिए कई ऐसे विश्वास जो दशकों पहले ख़ारिज हो जाने चाहिए थे आज भी चल रहे हैं।
नेपाल में पिछले 32 सालों में 32 सरकारें रही हैं। नेपाल में लोकतंत्र रोमांचक ढंग से विकसित हो रहा है। 2008 के बाद से अब तक दस सरकारें आई-गई हैं। माओवादी के द्वारा एक दशक लंबे सशस्त्र विद्रोह और फिर राजनीतिक अस्थिरता के एक दशक के बाद नेपाल ने 2015 में नये संविधान को अपनाया। नये संविधान को भेदभाव और पक्षपात से भरा, विशेष रूप से मधेश क्षेत्र में रहने वाले लोगों के लिए बताए जाने के बावजूद नेपाल की चुनी हुई संसद ने अपना पांच वर्ष का कार्यकाल पूरा किया। हालांकि, इन पांच वर्षों के दौरान सरकार में बदलाव भी देखा गया। राजनीतिक इतिहास पर विचार करते हुए देखा जाए तो अस्थिरता में बिना किसी योगदान के सरकार में ये बदलाव नेपाल के द्वारा पिछले पांच वर्षों में हासिल महत्वपूर्ण उपलब्धि को कमज़ोर नहीं कर सकता है। वैसे भद्दा आंतरिक सत्ता संघर्ष और राजनीतिक पार्टियों के द्वारा पाला बदलना सिर्फ़ नेपाल तक सीमित नहीं है लेकिन पिछले दिनों हिमालय की गोद में बसे इस गणराज्य में हुआ चुनाव यहां के लोकतंत्र के लिए महत्वपूर्ण संकेत देता है। जिस समय दक्षिण एशिया के कुछ देश सरकारों और सरकारी तंत्र के ध्वस्त होने के साथ आगे बढ़ने के लिए संघर्ष कर रहे हैं, उस समय संघीय संसद और प्रांतीय संसद के लिए 20 नवंबर 2022 को नेपाल में हुए मतदान का गहरा विश्लेषण करना ज़रूरी है।
नेपाल की संसद में कुल 275 सीटें हैं, 165 सीटों पर ‘फ़र्स्ट पास्ट द पोस्ट’ के तहत चुनाव हुए, जिसमे 165 सीटों के लिए कुल 2412 उम्मीदवार मैदान में थे, इनमें 2187 पुरुष और 225 महिलाएं थीं। नव बालिग उम्मीदवार से लेकर 100 वर्षीय स्वतंत्रता सेनानी टीका दत्ता पोखरेल सबसे उम्रदराज उम्मीदवार बनकर चुनाव लड़ें।
110 सीटों पर समानुपतिक प्रतिनिधित्व व्यवस्था के तहत चुनाव हुए। प्रांतीय विधानसभा की 330 सीटों के लिए कुल 3224 उम्मीदवार मैदान में थे। चुनाव में 61 प्रतिशत वोट हुए, जो जनता की निराशा के संकेत है।
नेपाल में चुनावी मुक़ाबला दोतरफ़ा था। एक तरफ़ सत्ताधारी पांच पार्टियों का गठबंधन था जिसका नेतृत्व नेपाली कांग्रेस ने किया। इस गठबंधन को मुख्य विपक्षी नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी- एकीकृत मार्क्सवादी-लेनिनवादी के नेतृत्व वाले गठबंधन ने चुनौती दी। हालांकि, सत्ताधारी और विपक्षी पार्टियों का गठबंधन बनावटी लगता है क्योंकि साफ़ तौर पर देखा जा सकता है कि इस गठबंधन के पीछे हताशा से भरे राजनीतिक अवसरवाद की बड़ी भूमिका थी। लगता है कि सत्ताधारी गठबंधन में शामिल महत्वपूर्ण सदस्य और मधेश में सक्रिय दोनों पार्टियां- लोसपा और जसपा- इस क्षेत्र में लोगों का समर्थन काफ़ी हद तक गंवा चुकी हैं। सत्ताधारी गठबंधन के कम्युनिस्ट सदस्यों- नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (एकीकृत समाजवादी) जिसका नेतृत्व पूर्व प्रधानमंत्री माधव नेपाल कर रहे हैं और नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी केंद्र) जिसका नेतृत्व पुष्प कमल दहाल कर रहे हैं- ने खड़गा प्रसाद ओली के नेतृत्व वाले विपक्षी गठबंधन की चुनावी संभावना को मात देने में पूरी ताक़त लगा दी थी। वहीं 2017 के चुनाव में शानदार बहुमत के साथ सत्ता में आने वाली कम्युनिस्ट पार्टियों के नेता अब पूरी तरह बंटे हुए थे।
एमाले के नेतृत्व वाले विपक्षी गठबंधन में शायद ही कोई महत्वपूर्ण साझेदार था। हिंदू राष्ट्रवाद और राजतंत्र का समर्थन करने वाली राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी को 2017 के चुनाव में सिर्फ़ एक संसदीय सीट पर जीत मिली थी और महज़ 2.06 प्रतिशत वोट मिले थे। इसी तरह जनता समाजवादी पार्टी, जो सीटों के बंटवारे को लेकर असहमति के बाद सत्ताधारी गठबंधन से बाहर होकर विपक्ष के साथ मिल गई थी, भी एक बड़ी ताक़त के रूप में नहीं दिखी। 2017 के चुनाव में बहुमत हासिल करने वाली एमाले अब बंट चुकी थी। माधव कुमार नेपाल एमाले से अलग होकर एकीकृत समाजवादी पार्टी का गठन किया और उन्होंने एमाले को सत्ता से दूर रखने के लिए पूरी ताक़त लगा दी।
पांच बार के प्रधानमंत्री और सत्ताधारी पार्टी के अध्यक्ष के तौर पर शेर बहादुर देउबा के राजनीतिक क़द को देखते हुए नेपाली कांग्रेस ने इस चुनाव में पिछले चुनाव के मुक़ाबले काफ़ी अच्छा प्रदर्शन किया है। इसके बावजूद नेपाली कांग्रेस के भीतर आंतरिक संघर्ष से पूरी तरह इनकार नहीं किया जा सकता है। हालांकि इस चुनाव के नतीजों में नेपाली कांग्रेस के इस आंतरिक संघर्ष का ज़्यादा असर नहीं दिखाई दिया।
राजनीतिक दलों के चुनावी घोषणापत्र को क़रीब से देखने पर पता चलता है कि आंतरिक राजनीतिक और आर्थिक मुद्दों पर किए गए वादों के साथ चुनाव से पहले बड़े अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों पर भी काफ़ी चर्चा हुई। ये कोई हैरानी की बात नहीं है कि एमाले ने दक्षिणी पड़ोसी के साथ नेपाल की प्रादेशिक अखंडता के मुद्दे को उठाया। इसके उलट नेपाली कांग्रेस ने चीन के साथ नेपाल के ज़मीनी विवाद को अपने चुनावी घोषणापत्र में शामिल किया।
चुनाव में एक दूसरे के विरोधी गठबंधनों का विदेशी मदद और कर्ज़ के मामले में भी अलग-अलग रुख़ दिखा। नेपाली कांग्रेस अपने चुनावी घोषणापत्र में चीन के बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) के मुक़ाबले अमेरिका के द्वारा 500 मिलियन अमेरिकी डॉलर वाले मिलेनियम चैलेंज कॉरपोरेशन (MCC) के अनुदान का पक्ष लेती नज़र आई। नेपाल के पूर्व राजा बीरेंद्र के द्वारा नेपाल को शांति का एक क्षेत्र प्रस्तावित किया गया था। ये बात माओवादी, एमाले और राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी के चुनावी घोषणापत्र में दिखी। माओवादी इस मुद्दे को उठाकर चीन-भारत के साथ संतुलित रहना चाहती है। लोगों को जिन दिक़्क़तों और आर्थिक कठिनाइयों से गुज़रना पड़ा और उन चिंताओं का समाधान करने में सरकार की सीमित भूमिका को ज़्यादातर निर्दलीय उम्मीदवारों ने उठाया।
ओली की सरकार के ख़िलाफ़ भ्रष्टाचार के आरोपों के मुद्दे, पार्टी के भीतर आंतरिक बंटवारे और संसद को भंग करने की उनकी कोशिशों ने एमाले की लोकप्रियता को चोट पहुंचाई। दूसरी तरफ़, एमाले सरकार को बचाने की चीन की कई कोशिशों के बाद भी नाकामी मिलना इस बात की तरफ़ इशारा करता है कि नेपाल की राजनीति में चीन का असर कम हो रहा है। इसके विपरीत, नेपाल के द्वारा भारत को अरबों के बिजली निर्यात और महामारी के दौरान नेपाल को भारत के समर्थन ने भारत विरोधी भावना को थोड़ा कम कर दिया है। ये दलील दी जा सकती है कि नेपाल में चुनाव को प्रभावित करने में भारत और चीन की भूमिका से पूरी तरह इनकार नहीं किया जा सकता है लेकिन नतीजों को घरेलू शासन व्यवस्था और आर्थिक मुद्दों के साथ राजनीतिक समीकरण ही तय करते हैं।
आज इस देश में तरक्की के यथार्थ का आकलन करना निरंतर कठिन होता जा रहा है। आंकड़ों से विकास की उपलब्धियों की गणना करनी चाहो तो उसमें सफलता के आभास से अधिक राजनीतिक मिथक उभर कर आम आदमी को भी उसकी जिंदगी की विडंबनाओं और विसंगतियों से दो-चार करने लगते हैं। यहां यही सब चलता है या कुछ भी अप्रत्याशित घट जाये यहां कुछ अन्तर नहीं पड़ता।
क्यों नियम-कायदे फाइलों की शोभा बने रह जाते हैं और बिचौलिये दलाली, कमीशनखोरी, नौकरशाही का चक्रव्यूह तोड़ने की एक ऐसी कुंजी बन जाते हैं ?
जनता के मुद्दे वहां के वहां खड़े हैं। हां, उनके नाम पर चिन्तन और समाधान सत्र अवश्य जनप्रतिनिधि संस्थाओं में सत्तापक्ष और विपक्ष के लिए कोलाहल का अखाड़ा बन गये हैं। देश की आम जनता के समक्ष खड़ी समस्याएं उसी तरह विकट रूप धारण किये रहती हैं।
सत्ता बदलती है, तो कुछ सत्ताच्युत खेवनहार स्वयं भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे नज़र आते हैं। उन पर कार्रवाई होती है तो राजनीतिक बदलाखोरी की तरह। भ्रष्ट नेता सबूतों की बरामदगी के बावजूद अपना गुनाह कभी स्वीकार नहीं करते। जमानत पर रिहा हो जायें, तो फिर तप-त्याग का मुखौटा धारण कर ‘जन सेवा’ के लिए अपने आप को प्रस्तुत कर देते हैं। सामाजिक परिवेश कुछ ऐसा है तो इनके भाषणों का सिक्का फिर चलने लगता है और भीड़ फिर जुटने लगती है।
देश का चुनाव तंत्र भी कुछ ऐसा है कि जो यही कह देता है, कि आरोपी अभियुक्त नहीं होता, इसलिए जनता के दरबार में ये लोग पुन: प्रतिनिधि चुने जाने के काबिल हैं। जाहिर है ऐसे चुनाव जो धनबल, जनबल और बिना काम अधिकाधिक अनुकम्पा की घोषणाओं के बल पर लड़े जाते हैं, में ऐसे सबल व्यक्ति साधारण योग्यजनों को पीछे धकेल फिर चुने जाते हैं। बार-बार चुने जाने के बाद बढ़ती उम्र उन्हें निस्तेज कर दे तो उनके नाती-पोते हैं ही, उनकी विरासत संभालने के लिए। यह विरासत चाहे बरसों से आरोपों से दागदार रही हो, लेकिन अगर ये लोग अपने वोटरों के गलत-सही काम करवाने से सफल रहते हैं, तो उनकी या उनके वंश की लोकप्रियता में कोई अन्तर नहीं आता। चाहे मंचों से ये लोग परिवारवाद के विरुद्ध नारे लगाते ही क्यों दिखाई न दे जायें।
जनमानस ने तो मजबूरी में और भी बहुत कुछ स्वीकार कर लिया है। आर्थिक असमानता, वर्गभेद की विसंगति को नियति स्वीकार कर लिया है। बढ़ती महंगाई और गिरते जीवन आदर्शों को एक विडंबना के रूप में निम्न वर्ग ने भी स्वीकार कर लिया है। जरूरत है इस माहौल में सहज स्वीकार की जगह अस्वीकार के आक्रोश को एक नये सत्य की तरह उभरने की। कैसे उभरेगा यह सत्य ? इस युवा देश की नयी पीढ़ी की बदली हुई मानसिकता के साथ उभरेगा। लेकिन यह मानसिकता योग्य को यथोचित मिल सकने के नये संस्कार से पैदा होगी। देश छोड़कर पलायन के रास्ते से नहीं।
इन्ही मुद्दों का सामना करते हुए चुनाव के परिणाम आए जिसमें नेपाली कांग्रेस को प्रत्यक्ष 53 और समानुपतिक 32, कुल 89 सीटों पर जीत हासिल करके सबसे बडी पार्टी बनी। नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (यूएमएल) ने प्रत्यक्ष 44 और समानुपातिक 34, कुल 78 सीटों पर जीत हासिल किया। माओवादी ने प्रत्यक्ष 18 और समानुपातिक 14, कुल 32 सीटों पर जीत हासिल किया। रा.स्व.पार्टी ने प्रत्यक्ष 7 और समानुपातिक 14, कुल 21 सीटों पर जीत हासिल किया। रा.प्र.पा.ने प्रत्यक्ष 7 और समानुपातिक 7, कुल 14 सीटों पर जीत हासिल किया। ज.स.पा.ने प्रत्यक्ष 7 और समानुपातिक 5, कुल 12 सीटों पर जीत हासिल किया। ए.समाजवादी ने प्रत्यक्ष 10 और समानुपातिक 00, कुल 10 सीटों पर जीत हासिल किया। जनमत पार्टी ने प्रत्यक्ष 1 और समानुपातिक 4, कुल 5 सीटों पर जीत हासिल किया। लो.स.पा. ने प्रत्यक्ष 4 और समानुपातिक 0, कुल 4 सीटों पर जीत हासिल किया। ना.उ.पार्टी ने प्रत्यक्ष 3 और समानुपातिक 0, कुल 3 सीटों पर जीत हासिल किया। जनमोर्चा ने प्रत्यक्ष 1 और समानुपातिक 0, कुल 1 सीटों पर जीत हासिल किया। ने.म.कि.पा. ने प्रत्यक्ष 1 और समानुपातिक 0, कुल 1 सीटों पर जीत हासिल किया। स्वतंत्र ने प्रत्यक्ष 5 और समानुपातिक 0, कुल 5 सीटों पर जीत हासिल किया।
नेपाल के संसदीय चुनावों में मंत्रियों और 60 मौजूदा सांसदों सहित विभिन्न राजनीतिक दलों के कई वरिष्ठ नेताओं को शिकस्त का सामना करना पड़ा है, जबकि युवाओं ने जीत दर्ज की है। इस चुनाव मे सबसे अधिक नुकसान सत्तारुढ़ कांग्रेस, माओवादी और प्रतिपक्षी एमाले का हुआ। उनके बडे़-बडे़ नेता इसकी चपेट में आ गए और चुनाव हार गए। पुरानी पार्टीयों को काठमांडू की 4 महत्वपूर्ण सीट पर हार का सामना करना पड़ा है। माओवादी की दो दिग्गज महिला नेता पूर्व स्पीकर ओनसरी घर्ती और वर्तमान ऊर्जा मंत्री तथा माओवादी पार्टी की प्रवक्ता पम्फा भुषाल तक को हार का सामना करना पड़ रहा है। मधेश में दिग्गज नेता उपेंद्र यादव, राजेन्द्र महतो और मातृका यादव को हार का सामना करना पड़ा।
चुनाव के नतीजे माओवादी और मधेसी पार्टियों के लिए झटका साबित हुए हैं। इन पार्टियों ने गणतांत्रिक नेपाल को संघीय स्वरुप देने में अहम भूमिका निभाई थी। संविधान-निर्माण में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका के बावजूद, इन पार्टियों को फायदा नहीं हुआ क्योंकि मतदाता उनके गुटबाजी और राजनीतिक पैंतरों से थक गए हैं। हालांकि, नेपाल में गणतंत्रवाद या धर्मनिरपेक्षता के लिए प्रत्यक्ष रूप से कोई खतरा नहीं है, लेकिन ज्यादा व्यापक संघीय एजेंडा सुनिश्चित करना होगा, ताकि प्रांतों के पास पर्याप्त शक्ति रहे, वरना संघवाद के खिलाफ नाराजगी और बढ़ जाएगी।
इस चुनाव से पहले के चुनावों में उतरे निर्दलीय उम्मीदवार मोटे तौर पर राजनीतिक दलों से ही जुड़े होते थे। ये वो उम्मीदवार होते थे, जिन्हें पार्टियों से टिकट नहीं मिल पाता था। लेकिन इस चुनाव में खड़े हुए अनेक निर्दलीय उम्मीदवार वैसे युवा हैं, जो राजनीतिक दलों के प्रति असंतोष जताने के लिए मैदान में उतरे। इस बार बदले परिदृश्य में टिकट वितरण से नाराज पार्टी कार्यकर्ता अपने ही पार्टी के विरुद्ध दिखाई दे रहे हैं। निर्दलीय और नए पार्टी के उम्मीदवार दोनों ही गठबंधन पर भारी पडे। दोनों में भीतरघात और बागी तेवर जमकर हावी रही। टिकट कटने से नाराज कार्यकर्ता निर्दलीय प्रत्याशी बनकर अपनी पार्टी को नुकसान करने पर लगे । कुछ कार्यकर्ताओं की बगावत सामने सीधे तौर पर दिखती है और कुछ कार्यकर्ता अंदर खाने वोट काट कर अपना गुस्सा निकाला।
विजेता नेपाली कांग्रेस को भी इस चुनाव नतीजों का गहराई से विश्लेषण करना होगा जिसमें उसे युवा उम्मीदवारों के बेहतर प्रदर्शन का प्रसाद मिला है। बुजुर्गों की अगुवाई वाली इस पार्टी को अब युवा नेतृत्व गगन थापा के हाथों में कमान सौंपने की मांग हो रही है। दक्षिण एशिया के दूसरे लोकतंत्रों से अलग नेपाल के चुनाव में धार्मिक/सांप्रदायिक आधार पर मतदान नहीं हुआ और चुनाव नतीजों भी देश की राजनीतिक विविधता के मुताबिक आए हैं। बेहतर विकास की ललक में दशकों तक लोकतंत्र का इंतजार करने वाले नेपाली नागरिकों को बदलाव चाहिए। उन्हें यह बदलाव मुहैया कराने की जिम्मेदारी अब नई राजनीतिक पार्टियों के ऊपर है।
मतदाता स्थापित राजनीतिक दलों और नेताओं द्वारा लगातार नजरंदाज किए जाने से तंग आ चुके हैं। यह जनादेश बताता है कि युवा पीढ़ी अब चीजों को अपने हाथ में ले रही है। युवाओं के बेहतर प्रदर्शन ने मुख्यधारा की पार्टियों के नकारापन को उजागर किया है कि वे नेपाल के लोगों के जीवन स्तर को सुधारने और बड़ी तादाद में पलायन करने वाले युवाओं की जिंदगी बेहतर बनाने में नाकाम रही हैं। नई और कई अन्य छोटे दलों के उम्मीदवारों ने शहरी सीटों पर बेहतर प्रदर्शन किया है, जहां लोगों ने पिछले प्रतिनिधियों के खराब प्रदर्शन के खिलाफ अपना गुस्सा जाहिर किया है। मतदाताओं ने या तो नए दलों को वोट दिए हैं या फिर निर्दलीय उम्मीदवारों को।
6 महीने पहले जब नेपाल में स्थानीय चुनाव हुआ तो काठमांडू महानगरपालिका के मेयर के पद पर बड़े राजनीतिक दल के धुरंधर नेताओं को धूल चटाते हुए 34 वर्षीय युवा बालेन्द्र साह को भारी मत से विजयी बनाया था। किसी ने सोचा ही नहीं था कि तीन-चार राजनीतिक दलों के चंगुल में फंसे राजनीति को युवाओं का इतना प्यार मिलेगा। लेकिन नेपाल के चर्चित रैपर कलाकार बालेन्द्र साह जो कि पेशे से स्ट्रकचरल इंजीनियर हैं, उन्होंने मेयर बनकर सभी राजनीतिक पंडितों के होश गायब कर दिए। इससे उत्साहित होकर राजनीति में बदलाव चाहने वाले कुछ युवाओं ने जनता की नब्ज को टटोल लिया और परंपरागत और रूढ़िवादी राजनीतिक दलों से निजात पाने के उनकी भूख को जानकर उनके सामने ताजा युवा चेहरा को चुनाव में परोस दिया।
सिके राउत, ज्ञानेन्द्र शाही, रवि लामिछाने, रेशम चौधरी, प्रभु साह, अमरेश सिंह इसके ज्वलंत उदाहरण है। नेपाल के चर्चित पत्रकार रवि लामिछाने ने 6 महीने पहले तक नेपाल के एक निजी टीवी चैनल पर जनता के साथ सीधा संवाद नाम का सबसे लोकप्रिय कार्यक्रम चलाने वाले रवि हमेशा ही राजनीति में युवाओं की सहभागिता और वैकल्पिक राजनीतिक शक्ति की वकालत करते रहे, लेकिन स्थानीय चुनाव में जब बालेन्द्र साह को उम्मीदों से कहीं बढ़कर जनता का प्यार मिला तो कुछ ही दिन के बाद पत्रकारिता को अलविदा कह कर वो राजनीति के मैदान में कूद गए।
रवि लामिछाने के इस प्रयास में देशभर के होनहार युवाओं ने साथ दिया। कई स्थानों पर स्वतंत्र पार्टी के उम्मीदवार की वजह से बड़े दल के नेताओं की हार हुई। नेपाल में इस नए वैकल्पिक राजनीतिक शक्ति के कारण एक बात तो तय है कि यहां की राजनीति अब बहुत दिनों तक 70+ नेताओं के हाथ में नहीं रहने वाली है।
प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा (77) को 25,534 वोट मिले, जबकि उनके निकटम प्रतिद्वंद्वी एवं निर्दलीय उम्मीदवार सागर ढकाल (31) को 1,302 मत हासिल हुए। देउबा अपने पांच दशक के राजनीतिक करियर में कभी कोई संसदीय चुनाव नहीं हारे हैं। ढकाल एक युवा इंजीनियर हैं, जिनकी पांच साल पहले ‘बीबीसी’ के ‘साझा सवाल’ कार्यक्रम में एक सार्वजनिक परिचर्चा के दौरान देउबा से मौखिक बहस हुई थी। इसके बाद उन्होंने यह कहते हुए देउबा को चुनौती देने का फैसला किया था कि अब युवाओं को राजनीति में आना चाहिए और देउबा जैसे वरिष्ठ लोगों को आराम करना चाहिए। देउबा चुनाव तो जीत गए परंतु “बुजुर्ग बनाम युवा” का मुद्दा जीवित रह गया जो दिनानुदिन बढ़ते जाएगा।
नेपाल में युवा मतदाता जागृत हो चुके है। उन्हें यह पता है कि नेपाल के अंदर अंतरास्ट्रीय हस्तक्षेप ज्यादा है। पूरी दुनिया से जुड़ चुके नेपाली युवा अब अपने देश का भविष्य खुद तय करना चाहते है। इस समय नेपाली युवा ग्लोबल हो चुके है। वे पश्चिम एशिया से दक्षिण पूर्व एशिया तक में नौकरियां कर रहे है। यूरोप मे भी नेपाली युवा काम कर रहे है। इस कारण उन्हें वैश्विक राजनीति का ज्ञान हो चुका है। वे नही चाहते है कि नेपाल के आंतरिक मामले में हस्तक्षेप बढ़े। नेपाल की 70 प्रतिशत आबादी 40 साल से कम उम्र की है।
50 प्रतिशत आबादी 25 साल से कम उम्र की है। युवा आबादी दूरसंचार क्रांति के कारण दुनिया से जुडी हुई है। विदेशों में रहने वाले नेपाली युवा नेपाल के अंदर खासी दिलचस्पी ले रहे है। वैसे में नेपाल की पुराने राजनीतिक दलों की परेशानियां बढी है। क्योंकि पुराने राजनीतिक दलों ने नेपाल में लोकतंत्र को मजबूत करने के नाम पर नेपाल में लूट खसोट की। वामपंथी दलों को इस चुनाव में पहले से कम सीट मिलनी यही संकेत है कि नेपाली युवा वर्ग अब वामपंथियों की राजनीति से उब चुका है।
अक्सर ये कहा जाता है कि युवा शक्ति के पास जोश तो होता है, लेकिन होश नहीं। देश के कोने-कोने में युवाओं ने जोश के साथ जिस होश का परिचय दिया है, वो वाकया ही काबिले तारीफ है। युवाओ ने कई मिथकों को तोड़ा और झुठलाया है। देशभर के युवाओं ने अनुशासित और अहिंसक तरीके से अपना प्रदर्शन किया है, उसने देश के युवाओं की उस छुपे पक्ष को सारी दुनिया के सामने ला दिया है जिसके बारे में कई मिथक, पूर्वधारणाएं और पूर्वाग्रह थे। तोड़-फोड़, हिंसा, गुस्से, उतेजना, उपद्रव और न्यूसेंस फेक्टर माने जाने वाली युवा शक्ति ने संयमित और अनुशासित रहकर जिस तरह देश और जनहित से जुड़े मसले पर बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया है वो सुनहरे भविष्य की तस्वीर पेश करता है और इस उम्मीद का भी बल देता है कि देश की युवा शक्ति के पास जोश और होश दोनों की कमी नहीं है, बस जरूरत युवा शक्ति को पाॅजिटिव तरीके से प्रयोग करने की है। चुनाव में मिले यूथ समर्थन से जहां यह बात साबित होती है कि मुद्दा और माद्देवाला आदमी सामने हो तो इस देश का यूथ सड़कों पर उतर ही पड़ता है।
कटु सत्य यह है कि राजनीतिक दलों और तथाकथित नेताओं द्वारा छात्र शक्ति का सदुपयोग कम और दुरूपयोग अधिक हुआ है। गौरतलब है कि छात्र राजनीति से प्रदेश और देश की राजनीति में आए नेताओं की लंबी-चैड़ी फौज है। सभी राजनीतिक और सामाजिक संगठन देश और जनहित से जुड़े मुद्दों में युवा शक्ति की सहभागिता और सक्रियता की बात तो खूब करते हैं लेकिन उनका मकसद युवा शक्ति के कंधों पर सवार होकर अपने स्वार्थ सिद्व करने से अधिक दिखाई नहीं देता है।
देश के सभी छोटे-बड़ों दलों ने यूथ इकाईयों की स्थापना कर रखी है। काॅलेज, युनिवर्सिटी में पढ़ाई के साथ ही साथ युवा राजनीति की पैंतरेबाजी और अपनी पार्टी के साथ युवा वर्ग का वोट बैंक जोड़ने का काम बखूबी करते रहे हैैं। ये बात भी साफ हुई है कि खुद राजनीतिक दल युवाओं को अपने स्वार्थ सिद्वि के गलत कार्यों में फंसाते और उलझाते रहे हैं। ये आशंका थी कि सरकारी मशीनरी उन्हें बदनाम करने के लिए अप्रिय घटना या कोई ऐसा काम कर सकती है जिससे युवाओं के दामन पर हिंसा फैलाने और अशांत वातावरण बनाने का आरोप मढ़ा जा सके। एकाध कोशिश ऐसी हुयी भी लेकिन सुरक्षाकर्मियों की समझदारी और संयमित व्यवहार के कारण मामला टल गया। लेकिन पूरे चुनाव के दौरान ऐसी एक भी अप्रिय घटना दर्ज नहीं हुई जिससे ये कहा जा सके की देश के युवा उद्दण्ड, अनुशासनहीन और बिगड़ैल हैं।
देश के युवाओं में राजनीतिक चेतना, समझ और एक नयी सकारात्मक सोच का संचार किया है। देश की युवा शक्ति देश निर्माण और जनहित के मुद्दों पर कितनी संजीदा और सीरियस है, उसकी झलक दिख चुकी है। कमी सिस्टम की है, ये सच है कि युवाओं मे जोश कूट-कूट कर भरा होता है। जरूरत इस बात की है कि उनके जोश को सही दिशा और सोच के साथ जोड़ा जाय। देश के युवाओं को भ्रष्टाचार जैसी बीमारी और दूसरी सामाजिक समस्याओं को समझने और जानने का अवसर दिया जाए।
नई और युवा पार्टीयों ने जिन मुद्दों को अपने चुनाव प्रचार में शामिल किया उनमें महंगाई के साथ-साथ भ्रष्टाचार भी है। कोविड महामारी के बाद देश की अर्थव्यवस्था में उथल-पुथल मची हुई है। महामारी के दौरान पर्यटन उद्योग तो बर्बाद हुआ ही, विदेशों में काम करने वाले प्रवासियों से धन की आमद भी कम हुई। नई पार्टीयों को इन बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा।
बालेन साह और रबि लमिछाने संघीयता के खिलाफ है। बालेन साह ने संघीयता का विरोध करते हुए प्रादेशिक बैलेट में मतदान नही किया। रबि लमिछाने ने 20 नवंबर को अपना एक वीडियो जारी किया, जिसमें उन्होंने बताया कि प्रांतीय चुनावों में उनकी पार्टी ने उम्मीदवार क्यों खड़े नहीं किए। उन्होंने कहा कि उन्हें मौजूदा प्रांतीय व्यवस्था से हमेशा एतराज रहा है, इसलिए उन्होंने प्रांतीय असेंबलियों के लिए प्रत्याशी न उतारने का निर्णय लिया। बालेन साह और रबि लमिछाने संघीयता के खिलाफ तो बोले लेकिन नागरिकता समस्या के संबंध में इनकी चुप्पी संदेह ख़ड़े करते है।
विश्लेषकों का कहना है कि अगर लछिमाने की पार्टी को संसद में नुमाइंदगी मिली, तो नेपाल की संघीय व्यवस्था को लेकर वे वहां बहस खड़ी करने की कोशिश करेंगे। नेपाल में ऐसे और भी कई नेता और समूह हैं, जो देश में संघीय व्यवस्था नहीं चाहते। लेकिन राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी के पहले सिर्फ चित्र बहादुर केसी के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय जनमोर्चा ही ऐसी राजनीतिक पार्टी थी, जो खुल कर इस व्यवस्था का विरोध करती थी। मौजूदा व्यवस्था के तहत नेपाल का शासन तंत्र तीन स्तरों पर चलता है। संघ, प्रांत और स्थानीय सरकारों का प्रत्यक्ष रूप से जनता चुनाव करती है। एक तरफ बालेन साह, रवि लामिछाने, संघीयता विरोधी है तो ज्ञानेन्द्र शाही हिन्दू वादी वही सिके राउत, रेशम चौधरी मधेशवादी। आगामी समय मे नए पार्टीयों को जनता के उम्मीदों पर खड़ा उतरने की चुनौती है तो पुरानी पार्टीयों को अपनी साख बचाने की चुनौती है।


