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हिंसा पोषित राजनीति और युवाओं की दस्तक : अजय कुमार झा

 

अजय कुमार झा, हिमलिनी अंक , फरवरी । राजनीति जीता है हिंसा पर । विवाद और भाषाई संघर्ष पर । सीमाओं के झगड़े और युद्ध पर । धार्मिक लड़ाई और सांस्कृतिक हुड़दंग पर । जातीय कलह और क्षेत्रीय तनाव पर । तथाकथित राजनीतिक सिद्धांत और पदीय उन्माद पर । सत्ता लिप्सा और अंधानुकरण पर । लोगो को सिर्फ लड़ना है और इसके लिए सबसे सुरक्षित, संस्कारित और सम्मानित तरीका है राजनीति । लोग जितने भयभीत रहेंगे । आतंकित रहेंगे । पीडि़त रहेंगे । अस्तव्यस्त और दीनहीन रहेंगे नेताओं को उतना मान सम्मान मिलेगा । इज्जत बढेगा वो मोटे तगड़े होते जाएंगे । जो छोटे नेता है वे गाँव के गली सड़क के लिए लड़वाएंगे की पहले यह सड़क बने । जो बड़े नेता है वो नदी के पानी, फैक्ट्री, संघ–राज्य का बटवारा के लिए लड़वाएंगे ताकि उन्हें पदासीन होने का मौका मिल सके । जो और बड़े नेता है वो दो देशों को लड़वाएंगे ताकि उनकी सत्ता बरकरार रहे । युवा को सीमा के नाम पर बलि चढ़ाएंगे । देशभक्ति का पाठ सिखाकर हंसते–हंसते फांसी पर चढ़ने के लिए उत्साहित और प्रेरित किया जाएगा । सत्ता में आने के बाद उन्हीं युवाओं को आपस में लड़ाकर गुट और उपगुट में बांटकर उनकी शक्ति को क्षीण करके उनके वजूद को ध्वस्त किया जाएगा । केंद्र में शहीद के नाम पर ब्रह्मलूट मचाया जाएगा । शहीद के गरिमा को कौड़ी के मोल में गौरव के साथ बेचा जाएगा । पैसों के बल पर कार्यकर्ताओं को पोसा जाएगा । और भारतीय कांग्रेस के तरह देश द्रोही को पद्मभूषण से नवाजा जाएगा । फिर दौड़ शुरु होगा बहुमत का । बहुसंख्यक जमात का । भोट बैंक का । और इस दौरान पूर्व के सारे बलिदान, नैतिकता, वादा और लक्ष्य को भुला दिया जाएगा । और हम ऐसे मूढ़ हैं की इन पागलों को ही पूजते जा रहे है । कैसी राष्ट्रीयता है हमारी !

आज पाक और बंगलादेश को भारत की बर्वादी से खÞुशी होती है और बर्वाद करने का हर एक उपाय खोज रहा है । जबकि १९४३ से पहले इसी भारत पर जान कुर्बान करते थे । आज क्या हो गया ? ठीक यही स्थिति आज नेपाल का है । खस शासक के क्षुद्रता, अदूरदर्शिता, पदलोलुपता और उदंडता के कारण मधेसी और जनजाति राष्ट्रीय मूल धार से खुद को अलग मानने को बाध्य है । ध्यान रहे ! कल पाकिस्तान की तरह भीषण विद्रोह नही करेंगे ऐसा कहा नहीं जा सकता । क्योकि राजनीति करनी है तो संघर्ष और षडयंत्र तो चाहिए ही । अभी भी समय है, प्रत्येक व्यक्ति के समुचित विकास के लिए ईमानदारी पूर्वक प्रयास हो । हरेक क्षेत्र में समान सहभागिता हो । संविधान सबके लिए समादर और सम्मानित हो । सबका भविष्य सुव्यवस्थित हो । सुनिश्चित हो । जीवन का पर्याय हो । अन्यथा जो मधेसी और जनजाति राणा और राजाशाही को हटाने के लिए अपना बलिदान दिया अब वही अपनी अधिकार और भविष्य के लिए बलि चढ़ रहा है । कल ये क्या करेंगे इसको समझने के लिए विशेष प्रज्ञा चाहिए । आगे आप पर छोड़ रहा हूँ ।
पृथ्वी नारायण शाह को हम राष्ट्र निर्माता और आदर्श पुरुष माने या नहीं माने या बहुत मूल्य नहीं रखता है, लेकिन अगर हम विदेशियों के इशारे पर देश को हांकने को मजबूर होते हैं अथवा हम विदेशियों को अपना आदर्श मानकर अपनी ही लोग और सांस्कृतिक मूल्य मान्यताओं को नजरंदाज करते हैं तो यह हमारे लिए शर्म की ही नहीं घातक बात भी है । इसका सीधा अर्थ है कि हमने अपनी राष्ट्रीयता को जाना ही नहीं या हम अपनी राष्ट्रीयता को जानना ही नहीं चाहते हैं । अतः हम बिकाऊ हैं, हमने अपनी आत्मा को बेच दिया है । हम पैसा और पद के लिए कुछ भी करने को तैयार हैं ।

वर्तमान की जनभावना को गौर से देखा जाए तो अब विदेशियों के इशारों पर लंबा राजनीतिक लाभ लेना संभव नहीं है, किसी भी हालत में अब औरों के दिशा निर्देश को सार्वभौम रूप से स्वीकार नहीं किया जाएगा । नेपाली नागरिक अब राष्ट्रीयता के सार्थकता और गंभीरता को समझने लगा है । लोग शिक्षित होने लगे हैं । हर एक व्यक्ति के पास सोशल मीडिया पहुंच चुका है । वह जानता है कि देश में क्या हो रहा है । देश के साथ क्या किया जा रहा है । हमारे भविष्य के साथ कैसा खिलवाड़ किया जा रहा है । नेपाली नागरिक अपनी और अपने देश की सुरक्षा, विकास और संवर्धन के लिए सामूहिक रूप से सक्रिय होने लगे हैं । उन्हें श्रीलंका के दयनीय अवस्था के कारणों और परिणामों का बोध होने लगा है । भारत के उदारता और उच्च मानवीय संस्कार भी समझ नेपाली आम नागरिकों को होने लगा है । भारत विरोधी उगरा नाराओं का जमाना जाता रहा । आम जनता वैदेशिक नीति और संबंधों के लिए नेताओं के वक्तव्यों का मोहताज नहीं रहे । उन्हें पड़ोसी देश तथा अन्य देशों के सोंच और उद्देश्य का भलीभाँति ज्ञान हो गया है । अतः भारत विरोधी भावनाओं भड़काकर मधेसियों को दबाने की सोची समझी साजिस को लोगों ने नंगा कार दिया है । इसलिए सार्वभौम समझदारी कायम हो अथवा राजनीतिक दुर्घटना के लिए तैयार हों ।

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आज के इस विश्वव्यापीकरण में जहां यूएनओ समग्र विश्व के रक्षा के लिए तैयार है; ऐसी हालत में एक छोटा सा देश को उसके पड़ोस के बड़ा देश हड़पने का हिम्मत भी नहीं दिखा सकता । रूस जैसा महाशक्तिशाली देश यूक्रेन जैसे छोटे से देश के साथ युद्ध करके खुद को मजबूर अनुभव कार रहा है ।परंतु देश को कब्जा करने का भाव यथावत ही है । बस, आक्रमण के तौर तरीके बदल गए है । वास्तव मे जो षड़यंत्र होने जा रहा है वह सांस्कृतिक है । वह सांस्कृतिक विस्तार है । वह सांस्कृतिक आक्रमण है जिसका शिकार हम धीरे–धीरे होते जा रहे हैं । यहीं पर हमें समझने और गंभीर होने की आवश्यकता है, कि हम अपनी संस्कृति को, अपनी सभ्यता को, अपनी गरिमा को, अपनी महानता को और अपने इतिहास को कैसे सुरक्षित रखेंगे ? आज के विश्व का प्रमुख विषय यही है । नेपाल के संदर्भ में यहां के सभी पार्टियों और सारे के सारे नेता लोग इतना तो साबित कर चुके हैं कि उनके पास न सभ्यता को पहचानने की क्षमता है नहीं देश को संभालने की सामर्थ्य । उनके पास समग्रता की सोच ही नहीं है । वे लोग सम्यकता किसे कहते हैं, किस तरह संतुलन बनाए रखा जा सकता है देश–देश और नागरिक तथा पड़ोसियों के साथ यह उनको पता ही नहीं है । ऐसी हालत में सरकार चाहे जितना भी बदला जाए, परिवर्तन हो जाए कोई फर्क नहीं पड़ेगा । जनता को किसी भी हालत में सुख सुविधा और समृद्धि मिलने वाला नहीं है, और नही देश को किसी भी हालत में कोई सद्गति होने वाला है । धीरे–धीरे हम कचरा होते जाएंगे, कमजोर होते जाएंगे, – आर्थिक रूप से बौद्धिक रूप से और भौतिक रूप से हम नष्ट होते जाएंगे । संभावित आर्थिक मंदी इसी का पूर्वाभास है ।

पृथ्वी पर मनुष्य का प्रादुर्भाव होने के साथ ही उसकी आवश्यकताओं का क्रम भी आगे बढ़ा और इन आवश्यकताओं की पूर्ति के प्रयासों के साथ ही मनुष्य और समाज का जुड़ाव, अस्तित्व के रक्षा हेतु संघर्ष, आर्थिक क्रियाकलाप और शक्ति संचय के अभिप्राय से हुआ जो आज न देशभक्ति को समझ पाता है न राष्ट्रीय अखंडता को । सत्ता सर्वोपरि होने की सोच से ग्रसित नेता, सामाजिक अभियंता, साहित्यकार, कलाकार, लेखक, विचारक, धर्मगुरु, शिक्षक, विश्वविद्यालय आदि के कारण आज हम अपनी सांस्कृतिक विरासतों और भौगोलिक अखंडता को नेस्तनाबूद करने पर तुले हैं । हम वैदेशिक आयातीत षड़यंत्रपूर्ण वामपंथी विचारधारा के वशीभूत हो चंद पैसों और क्षुद्र पदों के लिए अपनी ही हाथों से अपने संतानों की बर्वादी का कब्र खोदकर गौरवान्वित महसूस कर रहे हैं ।

ध्यातव्य हो, राष्ट्रवाद विशेष कालखंड में एक विशेष अवधारणा को लेकर आगे बढ़ता है । आज चीनी मोबाइल एप, रक्षावन्धन के राखी, दीपावली के दीप और होली के रंग पर प्रतिबंध गौरव पूर्ण राष्ट्रवाद का परिचायक साबित हुआ, जो कभी हमारे व्यापार तथा राष्ट्रीय उन्नति के लिए राष्ट्रवाद का आधार था । भारत को टुकड़ा कर पाकिस्तान बनाना कभी नेहरू और गाँधी के लिए राष्ट्रवाद के प्रतीक था, जिसका प्रमाण उन दोनों को मिल रहे राष्ट्रीय सम्मान से मिलता है, तो वहीं पर पटेल के द्वारा सैकड़ों रियासत और राज्यों को भारत मे विलय करा एक शक्तिशाली विशाल भारत का निर्माण भी राष्ट्रवाद का ही द्योतक था । आज काश्मीर को अलग राज्य का दर्जा हटाना राष्ट्रवाद है तो कभी यह दर्जा देना भी राष्ट्रवाद ही था । जनसंख्या नियंत्रण कानून आज का एक मजबूत राष्ट्रवाद है तो वही लोकल को वोकल और आत्मनिर्भरता एक मजबूत राष्ट्रवाद का आधारशिला साबित होनेवाला है । शिक्षा में क्रांति के तहत दक्ष जनशक्ति का निर्माण विश्व महाशक्ति भारत का एक मजबूत कदम इसी का पोषण करता है । हमें भी इन विषयों को गंभीरता से आत्मसात करना चाहिए । ‘पराधीन सपने सुख नाही’ जबकि हम नेपालियों को पराधीनता मे ही गौरव दिखाई देता है । चीन से तेल और अन्य आवश्यक सामग्री के आयात हेतु हमने अपनी आत्मा को उड़ेल दिया था । चीनी मालवाहक गाड़ी की प्रतीक्षा करना उस समय नेपाली राष्ट्रीयता का उच्चतम परिभाषा बनने लगा था । ध्यान रहे ! जिस देश को भीख मांगकर मौज करने मे बड़प्पन दिखाई पड़ता हो उस के भविष्य का तो भगवान ही संरक्षक हो सकते हैं ।

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हमें भीख मांगकर खाने का संस्कार है तो पड़ोसी देशों के पास धन की कमी नहीं है । चीन और भारत नेपाल के एक–एक अनु को चुटकी मे खरीदने की सामर्थ्य रखता है । हमने आज तक देश के भूगोल और गरिमा को बेचने के अलावा किया ही क्या है । जिस प्रकार के हमारी राजनीतिक संस्कार है उससे निकट भविष्य में हीं नेपालियों को नेपाल में ही शरणार्थी बनकर जीने को बाध्य होना पड़ेगा । जातीय, क्षेत्रीय, भाषाई, धार्मिक और सांस्कृतिक रूप से अब हममें कटुता बढ़ाया जा रहा है । धर्म परिवर्तन के नाम पर नेपालियों के बीच भयानक बिष घोला जा रहा है । राजनैतिक रूप से चरित्रहीन, भ्रष्ट तथा अदूरदर्शी नेता कार्यकताओं को संरक्षण, संवर्धन और पोषण किया जा रहा है, जो भविष्य में तीव्र रूप लेनेवाला है । नेपाल में राजनीतिक अस्थिरता लाने में जितना दोष हम नेपाली नेताओं को देते हैं, उससे अधिक दोषी वैदेशिक षड़यंत्रकारी है ।

एकबार पुनः नेपाल अस्थिरता के चक्रव्यूह में फस चुका है । इस भयानक चक्रव्यूह को तोड़कर निकलने के लिए फिलहाल नेपालियों के पास कोई हथियार नहीं है । न कोई पार्टी और नाही कोई राजनेता ऐसा है जिसपर देश भरोसा कर सके । आज सोशल मीडिया की सक्रियता के कारण हर कोई इस तथ्य और षड़यंत्र से वाकिफ है । हर किसी के दिल में इन सामंतियों के प्रति घृणा है, बदले की भावना पनप चुका है, हर कोई अवसर की तलाश में है, ऐसी परिस्थिति में समाज का कल्याण कदापि संभव नहीं । सिंह दरबार में मंत्री लूट रहे हैं तो स्याल दरबार जंत्री लूट रहा है । देश को मंत्री और गांव को अध्यक्ष खोखला करने पर तुला है । जनता हर हाल में दीनता को प्राप्त हो रहा है । सुफल उन्मुक्ति का कोई रास्ता नहीं दिख रहा । आकुलता और व्याकुलता से त्रस्त नागरिक बालेन, सांपानग, सीके राऊत और रवि लामिछाने जैसे दिव्य तारणहार की कल्पना तो कर ही रही है; लेकिन घने अंधकार में, जहां कदम–कदम पर ठोकरें ही ठोकरें मिल रहे हैं । विदेशी हस्तक्षेप सर से पांव तक जकड़े जा रहा है । भ्रष्टाचारी संस्कार के कारण वैदेशिक ऋण में जनता डूबती जा रही है । व्यक्तिगत लाभ के लिए देश के धर्म, संस्कृति और भूगोल को गिरवी रखा जा रहा है । समग्र आधिकारिक संयंत्र को क्षणिक लाभ के लिए दूषित किया जा रहा है । आखिर जनता करे तो क्या करे ? वह जाए तो जाए कहां ? क्या सड़क पर चिल्लाने से समस्या का समाधान हो जाएगा ! क्या सरकार बदलने से भ्रष्टाचार मिट जाएगा ? क्या सिद्धान्त के नाम बदलने से व्यक्ति के संस्कार मिट जाएंगे ? नहीं ! फिर से नया अतिवाद स्थापित हो जाएगा । नया राष्ट्रवाद स्थापित हो जाएगा । हो सकता है वह अति राष्ट्रवाद अपने ही देश वासियों के खिलाफ हो ! मधेसी और जनजाति तथा थारूओं के खिलाफ हो जाय ! यहां कुछ भी संभव है ।

नेपाल की ४०.६८ फीसदी आबादी युवा है । संयुक्त राष्ट्र और विश्व बैंक १५–२४ वर्ष के आयु वर्ग को युवा मानते हैं । नेपाल के मामले में, राष्ट्रीय युवा परिषद अधिनियम–२०७२ और राष्ट्रीय युवा नीति–२०७२, १६–४० आयु वर्ग को युवाओं के रूप में परिभाषित करते हैं । नेपाल सरकार की विभिन्न एजेंसियों में युवा वर्ग के बारे में अधिक एकरूपता न रख पाने के संदर्भ में यूथ विजन–२०२५ में युवाओं को दो आयु समूहों १६–२४ वर्ष एवं २५–४० वर्ष में बांटा गया है । इसके अनुसार देश की एक बड़ी आबादी युवा है । युवाओं से ही नेपाल में बड़े राजनीतिक परिवर्तन संभव हैं । यह समूह कठिन परिस्थितियों में उत्साहपूर्वक योगदान दे रहा है । युवाओं से नए अध्ययन और आविष्कार संभव हैं । इतने बड़े योगदान और महत्व के बावजूद, युवाओं को सीधे राजनीति के मुख्यधारा में लाने के लिए उचित प्रयास नहीं किए गए हैं ।देश के १४ प्रतिशत ऊर्जावान और बुद्धिमान युवा अध्ययन और रोजगार के लिए उन्नत देशों में पलायन कर चुके हैं ।

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यह स्थिति देश के भीतर अराजकता, राजनीतिक क्षुद्रता, रोजगार के अवसरों की कमी के कारण बनी है । इसमें कोई संदेह नहीं है कि प्रतिभा पलायन देश की समृद्धि के लिए अनुत्पादक है । यही वजह है कि युवाओं की राजनीति में भागीदारी कम है । सामंती शैली और सोच के अभ्यस्त नेपाल के राजनेता युवा पीढ़ी को राजनीति का नेतृत्व सौंपने को कतई तैयार नहीं हैं । देश पर ६० वर्ष से अधिक आयु के लोगों का शासन है । युवाओं के नेतृत्व को विकसित करने के पहलू को बुजुर्ग नेताओं की प्राथमिकता में नहीं होने के पीछे तर्क है कि पेशेवर ज्ञान और अनुभव की कमी के कारण उन्हें नेतृत्व नहीं दिया जाना चाहिए । उन्होंने युवाओं को चुनाव लड़ने के लिए सहज वातावरण का निर्माण नहीं होने दिया है । युवाओं के पास चुनाव मे खर्च करने के लिए करोड़ों रुपया कहाँ से आएगा ? यहीं से युवाओ के लिए राजनीति का रास्ता बंद कार दिया जाता है । और उन्हे बुड्ढे नेतागण पैसों के बलपर अपनी कार्यकर्ता टोली मे सामील करके अपना भविष्य सुनिश्चित करते हैं । अब हमें इस विषय पर भी छलफल करना होगा । नेपाल की संसद में केवल ५ प्रतिशत युवाओं का प्रतिनिधित्व है । यह प्रतिनिधित्व विश्व के देशों का १३ । ५ प्रतिशत है । यूथ विजन २०२५ (नेपाल की दस वर्षीय सामरिक योजना का एक हिस्सा) ने युवाओं को प्रोत्साहित करने के लिए कुछ प्रावधान किए हैं । हालांकि, इसकी प्रभावशीलता संदिग्ध है । २०१७ के संसदीय चुनाव में युवाओं की भागीदारी ३१ फीसदी थी । इस चुनाव में इन प्रतियोगियों का प्रतिशत ३२ तक पहुंच गया है । ५० प्रतिशत स्थानों पर युवाओं को प्रतियोगिता में भाग लेने की अनुमति देने की मांग को लेकर शासन को ज्ञापन भी सौंपा गया है । ४० वर्ष से कम आयु के ४१ प्रतिशत युवाओं ने स्थानीय चुनावों में भाग लिया । चुनाव में पुरानों को विस्थापित करने का नारा बुलंद किया, जो परम आवश्यक था ।

यदि हम विश्व इतिहास पर नजर डालते हुए नेपाल के गौरवशाली इतिहास के पन्ने पलटें तो पाएंगे की संवत १९९६ के राणा विरोधी आंदोलन में चार युवा शहीदों की भूमिका के बाद से, २००६, २०१५, २०३६, २०४६ का जन आंदोलन, सशस्त्र जनयुद्ध २०५२ से लेकर २०६२÷६३ के जनांदोलन और मधेस आंदोलन में ९९ प्रतिशत भूमिका युवाओं का ही था । लेकिन सत्ता पे आरूढ़ हो गए बुड्ढे । युवाओं का जोश उबल रहा है । नेपाली राजनीति में नए ही आने चाहिए और पुराने नेताओं को हराना चाहिए । जिसमें ’नो नॉट अगेन’ नाम के आंधी शुरू हो गया है । जिसका फायदा नई पार्टी ने उठाया और ज्यादातर युवा उम्मीदवारों की जीत हुई । युवाओं की जीत एक सकारात्मक सन्देस है ।

गौर तलब हैः ओबामा अमेरिका में ४६ वर्षों में राष्ट्रपति बने, डेविड कैमरन ब्रिटेन में ४३ वर्षों में प्रधान मंत्री बने, और कांगो गणराज्य में जोसेफ कबीला ३० वर्षों में राष्ट्रपति बने । साल १७८३ में विलियम पिट २४ साल के थे और १९०४ में जॉन वाटसन ३७ साल के लिए ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बने । आर्थिक और सामाजिक बदलाव लाने वाले लोकप्रिय अमेरिकी राष्ट्रपति रूजवेल्ट ४२ और रीगन ४३ सत्ता में आए । विकास माडल में एक अलग सिद्धांत की वकालत करने वाली थैचर १९५४ में ब्रिटेन की प्रधानमंत्री बनीं । १९४२ में टोनी ब्लेयर प्रधानमंत्री बने । सना मारिन (घट) फिÞनलैंड के प्रधान मंत्री, नैव बुकेले (४०) सल्वाडोर के राष्ट्रपति, जैसिंडा अर्डर्न (४१) न्यूजÞीलैंड के प्रधान मंत्री, इमैनुएल मैक्रोन (४३) फ्रांस के राष्ट्रपति, कार्लोस अल्वाराडो (४१) कोस्टा रिका के प्रधान मंत्री, लियो वराडकर (४१) आयरलैंड के प्रधान मंत्री, ग्रैबियल बोरिक (३५) चिली के राष्ट्रपति इस श्रृंखला का एक मौजूदा उदाहरण हैं । युवाओ में ऊर्जा प्रबल होता है, ऐसे में नेतृत्व कर्ता के भीतर ऊर्जा और क्षमताएं उत्कर्ष पर होता है । जो देश के लिए अत्यधिक रचनात्मक योगदान देने मे सक्षम होता है । युवाओं का वर्चस्व और नेतृत्व वाली राजनीति न केवल गतिशील है बल्कि सकारात्मक और उत्पादक भी होती है । जनसेवा, चिंतन, संकल्प और नागरिक सहयोग की अपूर्व क्षमता भी बनी रहती है ।

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