बसंत चौधरी : जीवन-उत्सव के कवि : डॉ. चंद्रकांत सिंह
काठमान्डू, 25 मार्च
बसंत चौधरी की कविताओं में प्रेम और सौन्दर्य की प्रधानता है | जीवन का चित्रण करते समय वे आकंठ उसमें डूबते-उतराते हुए दिखाई पड़ते हैं | अत्यंत भाव प्रवण कवि के रूप में अपनी पहचान बनाने वाले कवि बसंत सदैव बसंत ऋतु की भांति शीतल और प्रमुदित जान पड़ते हैं | उनकी कविताओं में उनके सजीले व्यक्तित्व और आलोचनात्मक विवेक का दर्शन होता है | हर एक घटना, दृश्य का सूक्ष्म चित्र खींचते हुए कवि ने पूर्ण तल्लीनता के साथ जीवन का स्वागत किया है | उनकी कविताओं में परिवार, संघर्ष, प्रेम एवं उत्तरदायित्व की छटाएँ हैं जो मानस को अपने एहसास से भिगोती हैं, उनकी कविताओं को पढ़ने के बाद पाठक सौन्दर्य के अपूर्व लोक में खो-सा जाता है | जीवन से विमुख सौन्दर्य की अभिव्यक्ति नितांत कलावादी एवं निष्प्राण जान पड़ती है | इस अर्थ में कवि बसन्त चौधरी की कविताओं में अभिव्यक्त सौन्दर्य कलावाद की व्याख्या एवं परिभाषा से इतर जीवन में पगा हुआ है जिसमें कामनाएँ भी हैं और कर्तव्य-बोध भी, जिनमें सौन्दर्य को चखने की अपूर्व पिपासा भी है और स्व को सिरजने-बचाए रहने का अर्थ भी | कुल मिलाकर उनकी काव्य-चेतना प्रेम के शीतल झरने की तलाश है जिसे खोजते हुए कवि की भाषा में झरने की स्निग्धता और लोक की मिठास का पुट दिखता है | ‘मंजिल’ नामक कविता में अपने जीवन का साध्य खोजते हुए कवि प्रेम की आराधना को अपना भवितव्य घोषित करते हैं | जीवन में यदि प्रेम की प्रधानता हो तो जीवन जीना आसान हो जाता है | कवि बसंत चौधरी प्रेम के मार्ग पर चलते हुए जीवन के प्रति पवित्र-बोध विकसित करते हैं-
मैं तो निकला हूँ
भटक रहा हूँ
ढूँढ़ रहा हूँ अमूल्य ख़जाना
जिसके मिल जाने के बाद
मन में क्या स्वप्न में भी
नहीं बचेगी शेष कोई अभिलाषा
क्योंकि
मैं तो एक पुजारी हूँ
प्रीत के पर्याय प्रेम रूप
अमूल्य निधि का
जिसकी कर सकूँ मैं आराधना
एकांत में समाधिस्थ हो कर
और न डगमगाऊँ न बहकूँ
अपने ध्येय से,
हाँ! यही तो है
मेरी इच्छित मंजिल |
कवि बसंत चौधरी हृदय के तल पर जीते हैं यही कारण है कि उनकी कविताओं में पारिवारिक उत्तरदायित्व, जीवन के विविध संघर्ष एवं रागात्मक-बोध को बचाकर रखने की चाह है | एक सामान्य व्यक्ति की भांति जीवन को उसकी दुश्वारियों एवं परेशानियों के साथ सहर्ष स्वीकारने का भाव उनकी कविताओं में परिलक्षित होता है | ‘हसरतें’ नामक कविता में वे लिखते हैं –
दिल के एक कोने में
जहाँ सभी सुरक्षित रहें
मेरे संघर्ष, मेरे रिश्ते,मेरी ख्वाहिशें
और तमाम हसरतें |
कवि बसंत चौधरी की कविताओं का बहुलांश रूप आधारित है | सौन्दर्य के रुपहले जगत में विचरण करने और रूप-माधुरी के रस में भीगने की उत्कट अभिलाषा प्रायः उनके यहाँ दिखती है | उनका कवि मन सौन्दर्य से भीतर की रिक्तता को भरना चाहता है, जीवन-जगत के जितने स्याह रूप हैं उन्हें सौन्दर्य की ललाई से धोकर चमका देना चाहता है | अपनी प्रेयसी के रूप को उद्घाटित करते हुए वे लिखते हैं –
तुम्हें देखकर उपजती है
मेरे भोले-भाले, निश्छल
या कहूँ चंचल मन के
किसी उदण्ड कोने में
कुछ अजीब-सी कामना
चाहता हूँ
अन्तस् पिपासा की शान्ति
अतृप्त अभिलाषा की पूर्ति
क्षणिक आत्म-सुख से
आनन्दित होने की आस में
फिर भटक जाता हूँ
अपने आप से
नारी-सौन्दर्य का चित्र खींचते हुए कवि विमोहित हो जाते हैं | प्रेयसी के सौन्दर्य को देखकर उन्हें अपूर्व आश्चर्य की अनुभूति होती है | उन्हें लगता है मानो धरती-आकाश भी इस अभूतपूर्व सौन्दर्य को देखकर चकित हों | रूप-तृषा में डूबे हुए कवि की तल्लीनता अपूर्व लोक की झलक दे जाती है –
कितना सुख पाया
उस भट्ठी ने तुम्हें तपाकर
और सौंप दिया कुशल हाथों में
उसकी कला का ही प्रतिफल है
तुम्हारा ये सौन्दर्य विहंगम
रूप लावण्य की चकाचौंध से
विचलित हुआ होगा अवनि नभ
देखकर स्वयं अपनी सृजना को
विस्मृत हो गया होगा प्रतिभव
देख तुम्हारा यह सौन्दर्य निरूपम |
नारी पर लिखते हुए कवि का मन विह्वल हो जाता है, वे उसे ममता की मूर्ति,शीतलता की छाया के तौर पर रूपायित करते हैं –
नारी नहीं होती केवल
ममता की एक नदी
उसका विस्तृत आँचल
समेटे हुए है
महासागर का अथाह जल
उफनती, ललकारती
उन्मत्त लहरें
जो समा जाती हैं उसी में
क्योंकि
उसका अंतरमन भरा है
शीतलता से
प्रेम पर लिखते हुए कवि आर्द्र हो जाते हैं | उतावलापन, प्रेम को पाने, सँजोने एवं सिरजने का बोध कवि की अधिकांश कविताओं में है | ‘प्रेम का सन्देश’ नामक कविता में उनका औत्सुक्य एवं अधैर्य देखते बनता है –
भेजता हूँ ऐ प्रेमी!
प्रेम का सन्देश तुमको
कर कृपा अपना ही लेना |
मिलन सुख का चाव कवि को गुदगुदाता है साथ ही अचरज में भी डालता है | संयोग में उन्मुक्तता और खुलेपन की आवृत्ति कवि की कविताओं में दिखती है | हर प्रकार के संकोच एवं बंधन को तोड़कर वे प्रेम-रस का पूर्ण अवगाहन करना चाहते हैं –
मिलने आना और लजाना
और फिर चुप-चुप रहना
कभी एकटक तकते रहना
और फिर नज़रों का झुकाना
होंठ सिले, शरमाई नज़रें
बहकी-सी साँसों की सरगम
निःशब्द हुआ है मन का आँगन
समझाओ ना !
ऐसा क्यों है ?
मिलन सुख की अपूर्व अनुभूति कवि के हृदय में सिहरन पैदा करती है | कहीं-कहीं प्रेम में देह की उपस्थिति है, कसमसाहट है जो भावनात्मक ज्वार पैदा करती है | किन्तु कविता में वासना की अंधी दौड़ नहीं है बल्कि प्रेम की अनुभूति को बचाकर रख लेने का बोध है –
असंभव है भूलना
मिलन की वो भावुक घड़ियाँ
दिल में उठते प्रेम-ज्वार को
मधुर मिलन के उस पल को
जब तुम सिमट गयी थीं
मेरे हृदय के प्रेम पाश में
उखड़ पड़ी थीं हमारी साँसें
बताओ कैसे संभव है
भूल जाऊँ ?
कवि बसंत चौधरी की प्रेमपरक कविताओं में मिलन सुख की अधिकता है | रूप-रस का चित्रण करते हुए कवि सौन्दर्य में डूबते हुए दिखते हैं | साहचर्य का रंग इतना प्रभावी है कि उसके बगैर उनका मन नहीं लगता | प्रिय का एक पल भी बिछोह उन्हें बहुत भारी लगता है तभी तो वे लिखते हैं –
तुम्हें पता है ?
जब तुम नहीं होतीं !
तुम्हारे बिना,
मैं
रेगिस्तान-सा हो जाता हूँ !
अन्दर बाहर
सुनसान
वीरान
बियाबान-सा हो जाता हूँ !!
‘पौष की सुबह’ नामक कविता में कवि ने जहाँ एक ओर घने कुहरे और धुंध को चित्रित किया है, वहीं सौन्दर्य का रुपहला बिम्ब भी प्रस्तुत किया है | ओस से ढकी प्रकृति की तंद्रा को मानवीय सौन्दर्य से बदलते हुए नया रूप कढ़ते हुए यहाँ दिखाया गया है | रूप की माधुरी ओस के कणों को कैसे नए पैकर में ढालती है वह यहाँ देखा जा सकता है –
पौष की सुबह
चारों ओर धुंध,
घना कोहरा
ओस से ढकी दूब
सिहराती शीत लहर
जमता हुआ तापमान
ठण्ड की गिरफ्त में
अकड़ा हुआ … तन-बदन
ऐसे में अगर एक झलक
जो तुम्हारी मिल जाती
तो नस-नस में जमा रक्त
पिघलकर फिर से दौड़ने लगता
घने कोहरे में पत्तों पर पड़े
ओस के कण भाप बन जाते
‘प्रकृति’ नामक कविता में कवि ने प्रकृति के सुन्दर बिम्बों को कविता में ढाला है, उनकी प्रकृतिपरक कविताओं में प्रकृति का मानवीकरण किया गया है | शरीरी-बोध और क्रिया-व्यापार की मनहर छवियों के साथ प्रकृति वहाँ उपस्थित जान पड़ती है-
धूप के न होते पाँव
फिर भी दबे पाँव आती है
बिन पायल के छमछम करती
पहले छत पर, फिर मुंडेर पर
धीरे-धीरे आँगन में भी
और बिखेर देती है
अपनी किरणों का जादू
रात होने तक
रात के न तन होता है
और न होती है उसकी ख़ुशबू
किन्तु फिर भी महक उठती हैं दिशाएँ
भीनी-भीनी गमकती रातरानी से
‘धड़कन’ नामक कविता में कवि अपनी प्रेयसी का स्मरण करते हैं | यादों के सहारे प्रेयसी का मांसल रूप-चित्र खींचते हुए कवि उस हर एक रेख को पहचानते हैं जिनसे उनकी प्रेयसी की छवि की निर्मिति होती है | यह कविता इस दृष्टि से विशेष है कि इसमें शरीरी-बोध के साथ प्रेम की गहन छुअन और अनुभूति का चरम सुख है जिसे कवि ने शब्दांकित किया है |
मेरी साँसें
मचल रही हैं
उलझ रही हैं
मैं उन उलझी साँसों में ही
तेरी ख़ुशबू पा रहा हूँ
और समेट रहा हूँ दिल में |
देखता हूँ यादों के आईने में
तुम आज भी नहीं बदली हो
तुम्हारी मुस्कान,
क़दमों की आहट,
साँसों की असहज रफ्तार
जो निरंतर
मुझे स्पर्श करती रहती हैं
जिन्हें मैं महसूस करता हूँ |
‘याद’ शीर्षक कविता के बहाने कवि पुरानी स्मृतियों को एक बार पुनः जी लेना चाहते हैं | इस कविता में बिछोह का भय कवि को सालता है, वे इस बात को लेकर चिंतित हैं कि कहीं उनके सुख को छीन न लिया जाए | इस कविता में प्रेम की गहरी कसक है कवि प्रेम के सुनहले पलों को विस्मृत नहीं करना चाहते | प्रेम में स्वयं की बाजी लगाकर वे प्रेम की गहन अनुभूति को बचाकर रखना चाहते हैं | आखिर ऐसा हो भी क्यों न ! प्रेम के कारण ही कवि का होना है | प्रेम की रुपहली याद में वे स्वयं को तल्लीन कर देना चाहते हैं |
परन्तु मैं हार
नहीं मानूँगा
और न ही
भिक्षुक की भांति
हाथ फैलाऊँगा
तेरे सामने
नम नहीं करूँगा
मैं अपनी आँखें
बल्कि देखूँगा
उन्हीं भीगे नयनों से
वो सपना
जहाँ भरा है
मेरे जीवन का आनन्द
सुन ले याद !
ओ सुनहली, रुपहली याद !!
कवि बसंत चौधरी के यहाँ मानवीय सौन्दर्य के अतिरिक्त प्राकृतिक सौन्दर्य का अभिराम दृश्य दिखाई पड़ता है | सुन्दरता को प्रतीकित करते हुए कवि कभी स्त्री सौन्दर्य का चित्र आँकते हैं तो कभी प्रकृति के पलछिन बदलते रूप को प्रकट करते हैं | उनकी कविताओं को पकृति-सौन्दर्य की वनस्थली कहा जा सकता है | ‘झरना’ नामक कविता में झरने की कलकल धारा का चित्रण करते हुए कवि ने उसे जीवन का उत्स माना है –
निर्झर, निर्मल
कलकल करता
पहाड़ की तीव्र ढलान पर
बिखेरता पूरी तन्मयता से
जल-निनाद
पेड़-पौधों का जीवन-आधार
सृजनकर्ता हरियाली का
वन्य जीवों की
प्यास बुझाता
अनथक पथ पर बढ़ता जाता
एक मसीहा निर्विवाद |
जिस तरह कवि ने पहाड़ी झरने का उल्लेख किया है ठीक उसी भांति पहाड़ों की ओट में डूबते हुए सूरज के सौन्दर्य को पकड़ा है | ‘जीवन-चक्र’ कविता में प्रकृति के नित्य-प्रति के व्यतिक्रम को कवि चिन्हित करते हैं और गहरे अन्धकार में अंतर्धान होते हुए सूरज को दर्शाते हैं –
पहाड़ों के आगोश में
खोता वो तपता सूरज
समा जाता है
अपनी तपिश को छोड़
उसकी ऊँचाइयों के पीछे
कहीं गहरे निशीथ में |
सौन्दर्य के अतिरिक्त कवि की अधिकांश कवितायें पारिवारिक पृष्ठभूमि की कवितायें हैं जिनमें वे घर-परिवार और संबंधों पर लिखते हैं | मनुष्य के जीवन की सार्थकता उसकी पारिवारिक कर्मठता है जहाँ से वह रस-रूप ग्रहण करता है | जो मनुष्य अपनी निजता में खोया हुआ केवल अपने लिए जीता है उसका जीवन अकारथ हो जाता है किन्तु जिसके होने से घर-परिवार एवं समाज को पूर्णता मिलती है वह सही अर्थों में अपने मनुष्य होने को चरितार्थ करते हैं | कवि बसंत चौधरी ने ‘बिटिया’, ‘माँ’, ‘बाबू जी के प्रति’ कवितायें लिखी हैं | सभी कविताओं में भाव एवं अनुभूति का प्राधान्य है | कवि अपने सभी पारिवारिक रिश्तों के प्रति रागात्मक जुड़ाव महसूस करते हैं | ‘बिटिया’ पर लिखते हुए उन्होंने उसे माता-पिता की हृदय-सुषमा के तौर पर रेखांकित किया है-
मात-पिता का जीवन बिटिया
वीणा की सरगम में बिटिया
मान पिता का माँ की धड़कन
घर की पुख्ता छाँवन बिटिया ||
तुलसी-सी ज्यों पूजित पावन है,
पूजन की सामग्री बिटिया
दो-दो कुल की लाज निभाये,
सात जन्म तक रानी बिटिया ||
आज का मनुष्य अत्यंत एकाकी हो गया है, घर-गृहस्थी एवं प्रगति की बेमानी दौड़ ने उसे इतना आत्मकेंद्रित कर दिया है कि वह खून के रिश्ते तक को भूल चुका है | कवि की ‘माँ’ कविता इसका बड़ा प्रमाण है जहाँ भौतिक चकाचौंध में आकंठ डूबा पुत्र माँ की गोद की शीतल छाया ढूँढ़ता है | ‘माँ’ कविता में व्यक्ति के मानस की रिक्तता को दर्शाते हुए कवि कहते हैं-
माँ!
आजकल हो गया हूँ मैं आत्मकेंद्रित
इसीलिए तो अब कभी सपने में भी,
नहीं देख पाता तेरी ममता की छाँव
नहीं पी पाता
तेरे जीवन रस की बहती अमृतधार
‘माँ’ कविता के उत्तरार्ध में कवि क्षणिक भौतिक सुख की बजाय माँ के आँचल की ओट चाहते हैं जिससे कि जीवन में थिरता और शान्ति मिल सके | माँ के होने से जीवन के संघर्ष कठिन नहीं जान पड़ते | ‘माँ’ कविता की प्रारंभिक पंक्तियाँ जहाँ भौतिक सुख में व्यस्त पुत्र की व्यथा को दर्शाती हैं वहीं अंतिम पंक्तियों में ऊर्जा का अजस्र प्रवाह झरता प्रतीत होता है क्योंकि विजयिनी शक्ति के तौर पर कवि को माँ का संबल मिल जाता है –
माँ!
थकना नहीं चाहता हूँ मैं
आज भी सतत जूझ रहा हूँ
जीवन चक्र से
किन्तु हर क्षण बस सोचता हूँ
पा सकूँ कुछ पल सुकून के
तेरे आँचल की छाया में
भूल जाऊँ जीवन के हर
तप्त सीखे अनुभवों को
माँ बस तेरा आँचल चाहता हूँ |
ठीक इसी तरह ‘बाबू जी’ नामक कविता में कवि ने अपनी श्रद्धा पिता के प्रति व्यक्त की है | आमतौर पर कविता में पिता की चर्चा नहीं होती | प्रायः पिता को निष्ठुर समझकर उनकी ओर ध्यान नहीं दिया जाता लेकिन कवि ने जितना माँ को याद किया है उतना ही पिता को भी | पिता केंद्रित ‘बाबू जी’ कविता में कवि ने पिता द्वारा दिए गये संबल को याद किया है और जीवन में कभी न पराभूत होने का संकल्प पिता से अर्जित करने का आग्रह किया है –
बाबू जी!
आज भी चाहता हूँ आपसे
वही हौसला, वही संबल
जिसने हर कदम पर
साथ दिया है मेरा
आप यहीं तो हैं कहीं
हर पल मेरे आसपास
क्योंकि मैं महसूसता हूँ
बस चेतना में सुन नहीं पाता
आपको, हाँ बाबू जी
आप हैं मुझमें क्योंकि
आपकी ही प्रतिच्छाया हूँ मैं |
कवि बसन्त की कविता में अपनापन है, हर चीज़ को अपना समझते हुए जीवन जीने की मधुरिम जीवटता यहाँ दिखती है | अपने हर रिश्ते को कवि पूरी ईमानदारी से निभाने का प्रयास करते हैं | आज के भौतिकवादी दौर में जिस तरह संबंधों में विलगाव एवं बिखराव की देखते बनता है वह चिंताजनक है | कवि ने ‘मेरा घर’ नामक कविता में निर्जीव एवं स्पंदनहीन समझे जाने वाले घर को जीवंत किया है और प्रतीकों के माध्यम से यह दिखाना चाहा है कि घर आज भी परिवार के सभी सदस्यों की रह देख रहा है | ‘मेरा घर’ कविता में भावनाओं का ज्वार एवं पुरखों के प्रति जुड़ाव दिखता है जिसे कवि ने दर्शाया है | एक तरह से कह सकते हैं कि संवेदनहीन समय में ‘मेरा घर’ उम्मीद की किरण हैं क्योंकि यहाँ रिश्तों की गरमाहट मौजूद है –
किन्तु नहीं सोता कभी मेरा घर
बाट देखता है आज भी
घर के हर सदस्य की
मेरी भी राह तक रहा है
और एक मैं, जो उसे भूल बैठा हूँ
शायद
नहीं! याद है कुछ धुंधली सी
क्योंकि मैं बहुत छोटा था
उससे बिछड़ते समय
अब जर्जर हो गया है मेरा घर
भूला-बिसरा या टूटता घर
मेरी ही नहीं सभी परिजनों की
यादों को सँजोए खड़ा
बाट जोहता
खँडहर बनता हमारा प्यारा घर
कवि बसंत चौधरी ने घर-परिवार एवं प्रेम के अतिरिक्त तत्कालीन समय पर भी कवितायें लिखी हैं | ‘भीतर सन्नाटा’ उनकी ऐसी ही कविता है जहाँ समय मानो थम गया है | कोरोनाकाल में जब देश विभीषिका से गुज़र रहा था और देश में लाकडाउन की स्थिति थी उस भयावह परिदृश्य को कवि ने शब्द रूप देना चाहा है | जो बाज़ार और चौराहे भीड़ से भरे होते थे उन सबके विकट रूप को देखकर कवि को चिंता होती है | हर तरफ पसरे मातमी सन्नाटे का उद्घाटन करते हुए वे लिखते हैं –
नगरों की वीथियों से
गाँव की पगडंडियों से
कुछ खो गया सा लगता है
कुछ नहीं बल्कि
बहुत कुछ खोया-सा है
पर क्या और क्यों
क्या कुछ सपने
जो सजे रहते थे
हर चौराहे पर, नुक्कड़ पर
जो आज चुप्पी की
चादर तले ढँके पड़े
कुलबुला रहे हैं
कोरोना के विध्वंसकारी रूप को देखकर कवि उसे रक्तबीज की संज्ञा देते हैं | नदी, प्रांतर, भूखण्ड हर जगह कोरोना की उन्मुक्त आवाजाही को देख कवि को भय लगता है और वे उसके प्रसार पर कैसे रोक लगे यह सोच चिंतित जान पड़ते हैं | ‘काल बना सूक्ष्म कोरोना’ ऐसी ही कविता है जिसमें भय, हताशा एवं पीड़ा के स्वर के साथ कोरोना पर अंकुश लगाने की चिंता है –
यह कैसा वायरस आया है
जो निशंक बढ़ता जा रहा है
लाँघ रहा है पर्वत, नदियाँ, सागर
कोई है सक्षम जो रोक सके
या कोई है सरहद
जो माँगे इससे वीज़ा
और मना कर दे प्रवेश
इस अदृश्य दानव का!
‘दर्द कागज़ पर’ अलग-सी कविता है | आज के सुविधाभोगी जीवन में हर कोई सुख की तलाश में है हर कोई सुख का खरीदार है किन्तु दर्द कोई नहीं खरीदना चाहता | कवि अपने स्वानुभूत सत्य के साथ जीना चाहते हैं,वे अपने दर्द के साथ जीवन जीना चाहते हैं | यह दर्द ही है जो कवि की शक्ति है, ‘अकेला’ नामक कविता में कवि ने अपने एकाकीपन को दर्शाया है और ‘ताप का गरल’ कविता में उस विश्वास को भी जो मनुष्य को पूर्णता प्रदान करती है |
मनुष्य को सौन्दर्य की भूख होती है, आमतौर पर घर को सजाकर वह रखता है | कवि बसंत चौधरी कहते हैं कि घर में एक ऐसा कोना होना चाहिए जहाँ जीवन की थकान एवं श्लथ शरीर को रखा जा सके | मनुष्य मृत्यु को भी उत्सव में तब्दील कर देना चाहता है, कवि जीर्ण-शीर्ण शरीर के लिए एक आरामगाह की तलाश करते हैं जहाँ जीवन के अनुभवों को, स्मृतियों को साझा किया जा सके –
हमेशा ज़रुरत महसूस होती है
हर एक मकान में
एक बेहतर कोने की
एक ही नहीं अनेक कोने की
x x x x x
जी हाँ! ज़िम्मेदार !
जो न सजावट हो
न ही बतियाता हो
एक निस्तब्ध कोना
जहां रखा जा सके पुराना
कबाड़ ही नहीं,
जीर्ण-शीर्ण होता बूढ़ा शरीर भी !
बसंत चौधरी की कविताओं का अधिकांश सौन्दर्य से भरा पड़ा है, कहीं नारी-सौन्दर्य की झलमल रूप वल्लरियाँ हैं तो कहीं प्रकृति का उद्दाम सौन्दर्य जो मन को सिक्त करता है | एक अर्थ में कहें तो बसंत चौधरी रूप के चितेरे हैं, उन्होंने रूप को जी भर जिया है | बहुविध फैले अनुभव-जगत की झाँकी उनकी कविताओं में देखते बनती है | रूप-अरूप की गंध से उनकी कवितायें विस्तार पाती हैं | कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि बसंत चौधरी जीवन-बसंत के कवि हैं उनकी कविताओं में इसी भाव-बोध का प्रसार है |
डॉ. चंद्रकांत सिंह
सहायक प्रोफेसर (हिंदी)
हिमाचल प्रदेश केन्द्रीय विश्वविद्यालय,धर्मशाला
धौलाधार परिसर-एक,धर्मशाला
जिला-काँगड़ा, हि.प्र.- 176215
दूरवाणी – 9805792455
ईमेल- chandrakants166@hpcu.ac.in
Chandrakants166@gmail.com

