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आत्मदाह अन्तिम विकल्प !

 

कञ्चना झा: सरला पन्थी ! ये कोई बहुत बडÞा नाम नहीं । क्योंकि यह महिला न तो प्रधानमन्त्री है, न मन्त्री है, न ही कोई राजनीतिक या बडेÞ व्यापारिक घराना से संबंध रखती है  । यह तो बस एक आम महिला है, जो कुछ दिन पहले पुलिस की लाठी और बूट की चोट से बीमार हो गयी । डाक्टर ने कहा- चोट अन्दर तक  है । गर्भाशय मंे लगी चोट असहनीय थी । शल्यक्रिया करके उसे निकालना पडÞा । हाथ, पैर और शरीर के अन्य अंगो में लगे चोट के कारण अभी भी वो ठीक से चलफिर नहीं पाती हैं ।aatma
सरला की गलती बस इतनी ही है कि वह मांग कर रही थी कि- नेपाल के अन्तरिम संविधान में ज्येष्ठ नागरिक को जो अधिकार दिया गया है, उसका व्यावहारिक कार्यान्वयन हो । कुछ महीने पहले की बात है, राजधानी के कोटेश्वर स्थित यातायात व्यवस्था कार्यालय के आगे आन्दोलन में उतरे दर्जनों वृद्ध-वृद्धा पर पुलिस ने अंधाधुंध लाठी चार्ज की थी । घर-परिवार, पोते-पोती के साथ आनंद लेने की उम्र में  वृद्ध-वृद्धा पर जो लाठी बरर्साई गई, उसकी जितनी भी भर्त्सना की जाय कम होगी । सरला पन्थी कहती हंै- संविधान प्रदत्त अधिकार देने को कहा तो सरकार ने बर्बरता दिखाई । पिर्टाई की, कई महिला साथियों के साथ दर्ुर्व्यवहार किया पुलिस ने ।
याद आती हैं अमेरिका के ३५ वें राष्ट्रपति जान अफ केनेडी की बातें । २० जनवरी १९६१ को जब उन्होंने  राष्ट्रपति पद की शपथ ली थी, उसके तुरन्त बाद राष्ट्र के नाम सम्बोधन किया था । उस सम्बोधन में केनेडी ने कहा था- “यह मत पूछो कि राष्ट्र तुम्हे क्या दे रहा है, अपने आप से यह पूछो कि तुम राष्ट्र को क्या दे रहे हो – अगर केनेडी को यह पता होता कि राज्य सञ्चालन के अधिकार ऐसे बर्ेशर्म और गैर जिम्मेवार लोगों के हाथ में आयेगा तो शायद वह  ऐसा कभी नहीं बोलते । नेपाल की बात करें तो यहाँ गणतंत्र स्थापना हुए सात साल हो चुके हैं, लेकिन लोगों को अभी भी छोटी-छोटी बातों के लिए प्राणों की आहुति देनी पडÞ रही है  ।
अपने अधिकारों की मांग करते हुए कुछ वृद्धवृद्धा संगठित होकर २०६९ साथ फागुन २४ गते से आन्दोलन में उतरे हुए हैं । करीब १४ महीने होने को है, लेकिन सरकार के कानों पर जूँ तक नहीं रेंगी । गौरतलब बात यह है कि  इन १४ महीनों के दौरान पाँच आन्दोलनकारी की मौत हो चुकी है । आन्दोलन की इस अवधि में रामु पोख्रेल, लालबहादुर खत्री, नर बहादुर खाँड, बासुदेव लम्साल और प्रेमहरि अमात्य का निधन हो चुका है । पता नहीं और कितने वृद्ध-वृद्धाओं के प्ा्राण लेकर रहेगी यह सरकार । सरकार, जिसका  नेतृत्व,  एक ऐसे आदमी कर रहे हंै जो खुद वृद्ध हंै । कहा जाता है – पीडिÞत का दर्द वही जान सकता है, जो खुद पीडÞा से गुजरा हो या पीडÞा भोग रहा हो । लेकिन नेपाल के सर्न्दर्भ में यह बात भी खरी नहीं उतरती । क्योंकि प्रधानमन्त्री सुशील कोइराला की उम्र भी ७५ साल हो चुकी है । वह भली-भाँति जानते होंगे वृद्धों की पीडÞा क्या होती है । लेकिन उनकी सरकार ने भी वही किया जो पर्ूववर्ती सरकार करती आ रही है ।
नेकपा एमाले और कुछ छोटे दल से बनी कोइराला नेतृत्व की सरकार ने भी कुछ ही दिनों पहले अपनी नीति तथा कार्यक्रम र्सार्वजनिक किया है । लेकिन उसमें भी वृद्धवृद्धा की मांगों को कोई खास स्थान नहीं दिया गया । सरकार की नीति तथा कार्यक्रम में केवल इतना ही कहा गया है कि ज्येष्ठ नागरिक को जो सामाजिक सुरक्षा भत्ता उपलब्ध होता आया है उसे और भी ज्यादा व्यवस्थित किया जायेगा ।  इसी तरह आगे कहा गया है कि उन लोगों को गुणस्तरीय स्वास्थ्य सेवा आधारभूत स्तर पर उपलब्ध कर्राई जायेगी और ज्येष्ठ नागरिक को अपने परिवार एवं समाज में सम्मान के साथ जीने के अधिकार को सुनिश्चित करने में सरकार उचित कार्यक्रम आगे लाएगी । सरकार की इस नीति कार्यक्रम की भाषा पर गौर करें तो यह इतनी अमर्ूत है कि स्वयं उन्हें नहीं पता कि वे क्या कह रहे हैं । लेकिन हाँ, भाषण में वे जरूर कह सकतें है कि हमने वृद्धवृद्धा की मांग को अपनी नीति एवं कार्यक्रम में समेटा है ।
वास्तव में देखा जाय तो, वृद्धावस्था कोई पाप नहीं । यह जीवन सन्ध्या, एक शाश्वत सत्य है, जिससे सभी को गुजरना पडÞता है र्।र् इश्वर का एक वरदान है मानव-जीवन जो कि पाँच अवस्था से होकर गुजरती है, शैशवावस्था, किशोरावस्था, युवावस्था, प्रौढÞावस्था और वृद्धावस्था । वृद्धावस्था की बात करें तो  इसके दो पहलू हैं- एक है आराम और दूसरा बोझ । आराम, इसलिए क्योंकि जब आधी जिन्दगी काम करने में, बच्च्ो के भविष्य बनाने में बीत जाती है, तो इसके बाद वह चाहता है कि अब जिम्मेदारी खत्म हो गई, आराम से चैन से अपनी जिन्दगी इन बच्चों के साथ गुजारूँगा  । लेकिन यहीं एक अलग रूप उभर कर आता है । जब बडेÞ बुजर्ुग को लोग एक दूर के कमरे में या ऊपर के कमरे में जहाँ न किसी का आना-जाना होता है, न कोई उन्हें देख सकता है, न ही वह अपनी बात किसी से कह सकता है वहाँ पर रहने को मजबूर कर देते हैं  । अगर कदाचित वह कुछ कहता भी है तो सभी का कहना एक ही होता है- अब आपको क्या करना है – आप चुपचाप खाईये और पडेÞ रहिये । दो वक्त का खाना और क्या चाहिए –
माता-पिता तोर् इश्वर के रूप हैं । अपने बच्चों के लिए सब कुछ त्याग देते हैं । लेकिन क्या इसी दिन के लिए कि जब उन्हें बच्चों की जरूरत हो तो उन्हे सडÞक पर या वृद्धाश्रम में छोडÞ आवें । कितना न्यायोचित है यह – माँ की ममता और पिता के पसीने का कोई मोल नहीं चुकाया जा सकता है । लेकिन दर्ुभाग्य २४ घंटा मंे से एक घन्टा बच्चे नहीं निकाल सकते उन्हीं के लिए जिन्होंने उन्हे जन्म दिया । क्या-क्या सपने बुनते हैं वो अपने बच्चों के भविष्य के लिए । किन्तु नियति देखिए कि आज वे ही वृद्धाश्रम में पडेÞ हंै – क्यों पलट कर कोई मिलने नहीं जाता उनसे – नयाँ बानेश्वर की ७९ वषर्ीया धनमाया कार्की का भी यही प्रश्न है । उनके बच्चों ने भी उनके साथ बहुत बदसलूकी की है । वह कहती हैं कि ऐसा कानून बनना चाहिए  कि जो बेटा और बहू अपने बडÞों के साथ दर्ुर्व्यवहार करता हो उसके ऊपर कडÞी से कडÞी कारवाही हो । लम्बे समय से ज्येष्ठ नागरिक संयुक्त संर्घष्ा समिति द्वारा चलाए आन्दोलन में सहभागी हो रही कार्की कहती हैं- हमें हमारा अधिकार चाहिए, भीख नहीं । वह प्रश्न करती हैं- पैत्रिक सम्पति कहकर अंश ले लेना और बाप-माँ को सडÞक पर फेंक देना कहाँ का इन्साफ है –
इसी अधिकार और इन्साफ की मांग को लेकर ज्येष्ठ नागरिक संयुक्त संर्घष्ा समिति पिछले १४ महीने से आन्दोलन कर रही है । समिति ने अपना आन्दोलन २०६९ साल फागुन  २४ गते से शुरू किया था और बैठ गये धरने पर कोटेश्वर स्थित यातायात कार्यालय के सामने । बुजुर्गों में से कई ऐसे हैं जिन्हेंें पता भी नहीं कि अपनी मांग को कैसे और किसके सामने रखनी है । इसी बीच आन्दोलन के दरम्यान एक दिन तत्कालीन यातायात मन्त्री छविराज पन्त पहुँचे । झन्डावाली गाडÞी देख कर आन्दोलन में उतरे  सभी बुजर्ुग खुश हो गये । सोचा कि मन्त्री आया है उनकी बात सुनने के लिए । लेकिन मन्त्री जी इन लागों से बात किये बगैर ही अन्दर चले गये । ये लोग भी क्या कम – अपनी मांग रखने के लिए जोर-जोर से नारे लगाने शुरु कर दिये ।  थोडÞी ही देर में स्थिति विगडÞ गयी । उस मन्त्री ने तो तीन ट्रक पुलिस मंगवा कर इन लागों की इतनी पिर्टाई करवाई कि कई तो घायल होकर अभी तक पडÞे हैं । फिर क्या था आन्दोलनकारी को वहाँ से खदेडÞ दिया गया । सरकार के इस रवैये की कडÞी आलोचना भी हर्ुइ लेकिन आदमी बर्ेशर्म हो जाय तो उसका कुछ किया नहीं जा सकता ।
समिति की मंाग है कि- वृद्ध भत्ता बढÞाकर तीन हजार रुपया किया जाय । सभी प्रकार के यातायात किराए में ५० प्रतिशत की छूट हो । स्वास्थ्य उपचार में पचास प्रतिशत छूट हो । अस्पतालों में तीन से लेकर पाँच बेड वृद्ध वृद्धा के लिए निःशुल्क हों और जो ६० के हो गए हैं, उन्हंे ज्येष्ठ नागरिक माना जाय । समिति की मांग संविधान में प्रदत्त अधिकार से ज्यादा है भी नहीं । वैसे भी नेपाल के अन्तरिम संविधान २०६३ के मौलिक अधिकार में स्पष्ट रुप से कहा गया है- वृद्धवृद्धा के सामाजिक सुरक्षा के लिए राज्य विशेष व्यवस्था करेगी । इसी तरह राज्य की नीति में कहा गया है कि कानून में व्यवस्था करके वृद्धवृद्धा को भत्ता दी जायेगी ।
यह कोई बहुत बडÞी मांग नहीं है लेकिन फिर भी सरकार क्यों अनसुनी कर रही है पता नहीं । समिती के अध्यक्ष महाप्रसाद पराजुली कहते हंै- नेता आकर कई बार बात कर चुके हैं । हिन्दू धार्मिक ग्रन्थ गीता पर हाथ रख कर कसम खाते हुए कहा कि आप की मांग पूरी होगी । ऐसे कसम खानेवालों की लम्बी सूची है, उनके पास । एमाले के माधव कुमार नेपाल, काँग्रेस के शेर बहादुर देउबा, रामचन्द्र पौडेल, राजपा के र्सर्ूयबहादुर थापा और कई माओवादी के नेता सभी ने कहा वोट दीजिए, आपकी मांग पूरी कर देंगे । लेकिन ऐसा नहीं हुआ ।
निर्वाचन भी हो गया और नई सरकार भी बन गई, लेकिन ज्येष्ठ नागरिक की मांग ज्यों की त्यों है । समिति के सह-उपाध्यक्ष नयेन्द्रबहादुर  खडका कहते हैं- अब तो विकल्प ही नहीं है । सरकार अगर अब भी नहीं सुनती तो हमारे पास कोई विकल्प नहीं है आत्मदाह के सिवा । आन्दोलन के एक वर्षपूरे हो जाने पर एक विशेष कार्यक्रम आयोजित किया गया था संर्घष्ा समिती की ओर से । और समाज के प्रबुद्ध, राजनेता, युवा, विद्यार्थी, डाक्टर, इन्जीनियर, मानव अधिकारकर्मी , पत्रकार और विभिन्न पेशाकर्मी के आगे अपनी दुख भरी दास्तान सुनाते हुए इन लोगों ने कहा कि अब हमारे सामने कोई विकल्प नहीं । सरकार में  अब भी उनकी नहीं सुनी गई तो संविधानसभा के आगे आत्मदाह करेंगे ।
नेपाल के परिपे्रक्ष्य में देखा जाय तो ६० वर्षसे ज्यादा उम्र वालों की संख्या तकरीबन ३२ लाख है । चेतना स्तर में वृद्धि, मृत्यु दर घटना, जीवन पद्धति में परिवर्तन और स्वास्थ उपचार में पहुँच बढÞने के  कारण वृद्धों की संख्या बढÞती जा रही है । यह नेपाल ही नहीं विश्वस्तर पर ही बढÞ रहा है जो कि सकारात्मक बात है । लेकिन नेपाल सरकार इसको भी शायद समस्या के रूप में ले रही है । उधर सरकार का कहना है कि तीन हजार बहुत होते है । आन्दोलनकारी वृद्ध-वृद्धा के साथ बात करते हुए तत्कालीन सरकार के सचिव कृष्णहरि बास्कोटा ने कहा था- इस राष्ट्र का अर्थतन्त्र इतनी बडÞी राशि दे ही नहीं सकती है । फिलहाल सरकार वृद्धवृृद्धा को समाजिक सुरक्षा भत्ता के नामपर प्रति माह पाँच सौ रुपया उपलब्ध कराते आ रही है । ये अलग बात है कि- इसका अधिकांश हिस्सा भ्रष्टाचार में चला जाता है । कई वृद्धवृद्धा को तो यह मालूम भी नहीं कि सरकार उसे पाँच सौ रुपया दे रही  है,  लेकिन उसका पैसा कोई और खा रहा है ।
समस्याएँ और भी हैं । कई वृद्धवृद्धा को घर से निकाल दिया गया है । वह कहाँ से लाए नागरिकता जिससे उसकी पहचान हो कि वह अमुक जिला का वासी है और उसकी उम्र इतनी है । वृद्धवृद्धा के आन्दोलन में शामिल नरेफाँट के हर्रि्रसाद श्रेष्ठ तो खुलकर आरोप लगाते हैं कि वृद्धवृद्धा के नाम पर जो पैसा आ रहा है, वह नेता लोग खा रहे हैं । लक्षित समूह तक पहँुच ही नहीं पा रहा है । परिणामस्वरूप वे लोग वृद्धाश्रम में आश्रय ले रहे हंै । लेकिन सभी तो इतने भाग्यशाली भी नहीं होते कितनों को तो मजबूरन भीख मांग कर गुजारा करना पडÞ रहा है । समस्या दिनोदिन विकराल रुप धारण करती जा रही है । लेकिन सरकार, समाज और परिवार  अन्धी और बहरी क्यों – यक्ष प्रश्न है- पौने तीन करोडÞ आबादी वाला यह राष्ट्र अगर ६०१ नेताओं को पाल सकती है,  तो वृद्धवृद्धा को क्यांे नहीं –

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ज्येष्ठ नागरिक की आवाज
हमें दया धर्म या किसी की निगाह नहीं चाहिए । जीवन जीना हमारा अधिकार है और यह अधिकार हमें हर हाल में चहिए ।                   – टीकामाया पोखरेल  

ज्येष्ठ नागरिक को परिवार के सदस्य बोझ समझते  हंै । ऐसे बोझ समझने वालों को श्राप लगेगा । वृद्धवृद्धा समस्या नहीं, वे तो समस्याओं का समाधान हैं ।
– पवित्रा खड्का

विडम्बना देखिये, इस राष्ट्र में ज्येष्ठ नागरिकों को अपना आधारभूत अधिकार और मानव अधिकार से वंचित किया गया है ।                     – शिव प्रसाद पौडेल

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कानून और नीति ठीक से कार्यन्वयन न होने कारण हम वृद्धवृद्धाओं को दुःख झेलना पडÞ रहा है ।                                              – माधवप्रसाद घिमिरे

बेटाबेटी अंश ले लेते हैं और माँ-बापको सडÞक पर छोडÞ देते है । ऐसे लोगों पर कडÞी कारवाही की व्यवस्था सरकार की ओर से होनी चाहिए ।      – धनमाया कार्की

जब तक शरीर ने साथ दिया, बहुत कुछ किया परिवार, समाज और राष्ट्र के लिए  । लेकिन अब जब शरीर ने साथ देना छोडÞ दिया तो सभी ने सडÞक पर ला कर फेंक दिया ।                                               – दर्ुगप्रसाद पोखरेल

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नेता, समाज और सरकार ने इतनी बार ठगा है कि हम लोग स्वयं अनिश्चितता में हैं । क्या करें, क्या नहीं – लेकिन अब यह आन्दोलन तब तक नहीं रुकेगा जब तक ज्येष्ठ नागरिकों को अधिकार नहीं मिलता ।                             – सरला पन्थी

सरकार ने अब भी बात नहीं सुनी तो  संविधान सभा के आगे अपनी इहलीला  समाप्त करने को तैयार हैं हम लोग । ऐसा जीवन ही जी कर क्या करें, जिसमें कोई सम्मान न हो ।                              – महाप्रसाद पराजुली

विभिन्न राजनीतिक दल के नेताओं ने गीता और दूब हाथ में लेकर कसम खाते हए कहा था कि ज्येष्ठ नागरिक की मांग पूरी करेंगे । वे लोग तो सभासद् और मन्त्री बन गये लेकिन हमारी दशा को देखने के लिए पलट कर भी नहीं आये । – नयेन्द्रबहादुर खड्का

सरकार पाँच सौ रुपये देती है वृद्ध भत्ता के नाम पर । आप ही बताइये कि आजकल पाँच सौ  रुपये में क्या होता है । और ये पाँच सौ रुपया भी सही आदमी को नहीं मिल रहा है । हमारे नाम से भेजा गया यह पाँच सौ रुपये भी धर्ूत लोग  खा जाते हैं ।
– गमबहादुर क्षेत्री

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