मेरी माँ : इन्दु तोदी
कहानी
किसी ने कहा वो सुन्दर नही है,
किसी ने कहा वो वेल एजुकेटेड नही है,
किसी ने कहा उसे स्टैन्डर्ड मेन्टेन करना नही आता,
किसी ने महसूस कराया वो उनके साथ उठने बैठने के काबिल नही है!
बहुत दर्द होता था इन सारी बातों से मुझे और मेरी माँ दोनों को। आशा ने कहा
अपने ही परिवार वाले भी नही चुकते अपमान करने से ।
वह मुझे मेरी माँ के सिखाए गए अच्छे संस्कार ही थे जिस से मुझ में पल रही थी लगातार बहुत सारी अच्छाईयां ।
मेरी माँ के अन्दर कुटकुट कर भरा था दूसरों के लिए आदरभाव, सेवाभाव,अतिथी सत्कार,अच्छे संस्कार,और उदारता का जज्बा।
खैर दूसरों की नजर में जैसी भी थी वो किन्तु हमारे लिए दुनिया की सब से अच्छी औरत आदर्शवान औरत थी हमारी माँ!
उस ने मुझे सुन्दर, स्वस्थ्य शरीर दिया , साथ ही दिया बहुत सुन्दर मन।
उस ने कभी किसी चिज के लिए किसी को बिना कोसे जैसे भक्त भगवान की आराधना तल्लीनता से करता हो वैसे ही हमेशा हमारी परवरिश की।
हम छह भाई बहन एक पेट में एक गोद में होता था माँ के कई सालों तक।
एक कमरे के घर में चापाकल से पानी निकालकर बाल्टी भर दूर ले जाना, मिट्टी के चुल्हे में गिली लकडियों को फूंक मारमारकर आँखे जलाजलाकर खाना पकाकर खिलाना,पिसना, चुगना,सिलना, बुनना,कपड़े, बर्तन, साफसफाई, बजार और भी न जाने कितने तरह के कितने सारे काम, सुबह पौ फटने से लेकर देर रात तक बिना माथे पे एक सिकन लाए बड़े प्यार से करना जैसे कोई साध्वी अपनी साधना बड़ी तल्लीनता से करती हो। न किसी से ज्यादा बातचित मिलना जुलना बस अपने काम में मग्न रहना।
सिमित संसाधनो में अकेले ही इतनें बच्चों की परवरिश करना बहुत बड़ी बात होती है।
आशा कहती है , मुझे याद है माँ बहुत कड़ी मेहनत करने के बाद थकी हारी सबको अच्छा अच्छा खिलाकर खुद सबके बाद रहा सहा, ठण्डा बासी जो भी रहता खाकर ,संतोष का पानी पिकर सबको सुलाकर फिर रात में हमारी निगरानी करती हुई अर्धनिद्रा में सो जाया करती। पता नही रातको भी माँ कितनी दफा उठती, जगी रहती हम भाई बहनो की देखभाल के लिए।
वह मेरी माँ चलती फिरती भगवान ही तो थी जिसको किसी चिज के लिये रिझाना नही पडता था , जो बिना बोले ही सबकुछ खुद ही समझकर करनेको हमेशा प्रकट ही रहती थी।

धरान, नेपाल

