उपेंद्र जीतें, शिवचंद्र स्थापित और सीके विजेता हुए : मुरलीमनोहर तिवारी
मुरली मनोहर तिवारी (सीपू), बीरगंज । अभी 3 उपचुनाव सम्पन्न हुए, न्यायालय के आदेश के बाद चितवन का चुनाव अनिवार्य था, तनहुँ क्षेत्र नम्बर १ से विजयी नेपाली कांग्रेस के रामचन्द्र पौडेल राष्ट्रपति बने । हालांकि रामचंद्र पौडेल चुनाव से पूर्व राष्ट्रपति या राजनीति से सन्यास संबंधी अपनी आकांक्षा व्यक्त कर चुके थे। उनके राष्ट्रपति बनने के बाद रिक्त सांसद पदपूर्ति के लिए उपनिर्वाचन किया गया था । स्वर्णिम वाग्ले नेपाली कांग्रेस को छोड़कर रास्वपा से निर्वाचन में खड़े हुए थे । उनकी जीत ने ये सिद्ध कर दिया कि कांग्रेस छोड़कर भी राजनीति हो सकती है और चुनाव जीता जा सकता है। चितवन से रवि लामीछाने जीत कर जनता में अपनी विश्वसनीयता और पकड़ सिद्ध करने में सफल हुए।
बारा से रामसहाय यादव निर्वाचित हुए थे उन्होंने उपराष्ट्रपति बनने की ना कोई ईच्छा जताई थी ना ही ऐसी कोई उम्मीद थी। बारा के चुनाव की कहानी सप्तरी से उपेन्द्र यादव के हार से शुरू होती है। सप्तरी से हारने के बाद अगर उच्च नैतिकता की बात होती तो उन्हें जनादेश को स्वीकार्य करते हुए अध्यक्ष पद से इस्तीफा देना चाहिए था, जैसा कभी माधव नेपाल ने किया था। अफ़सोस मधेश के नेतृत्व में ऐसी उच्च नैतिकता देखने को नही मिलती, चुनाव हारने के बाद महंत ठाकुर या राजेंद्र महतो ने भी तमलोपा या सद्भावना के अध्यक्ष से इस्तीफा नही दिया था, लेकिन उन्होंने जनादेश को स्वीकार जरूर किया था। उपेन्द्र यादव ने उच्च नैतिकता या सामान्य नैतिकता तो छोड़ दीजिए उन्होंने जनादेश का अपमान करते हुए हार का ठीकरा अंतरास्ट्रीय शक्तियों पर फेंक दिया।
उपेंद्र यादव चुनाव हारने के बाद सत्ता में पहुचने के लिए अत्यधिक ब्याकुल नज़र आए। एक तो पिछले सरकार में बाबूराम भट्टराई के कारण उन्हें खुद मंत्री बनने के बजाय अन्य को भेजना पड़ा था, उस समय के विपरीत परिस्थितियों के कारण उन्हें मन मारकर संतोष करना पड़ा था लेकिन अब उनका धैर्य जबाब दे गया था। उन्होंने अशोक राई को संसदीय दल का नेता न बनाने के लिए रामसहाय यादव को उस समय संसदीय दल का नेता बनाया, प्रदीप यादव को मंत्री बनने से रोकने के लिए अशोक राई को मंत्री बनाया और बारा जिले में चुनाव लड़ने के लिए रामसहाय यादव को उपराष्ट्रपति बनाया। अगर उपराष्ट्रपति बनाना ही था तो जसपा में ऐसे बहुत लोग है, जो निर्वाचित नही है, उन्ही में से किसी को बनाया जा सकता था या राजनीतिक रूप से हाशिए पर भेजे गए पूर्व मुख्यमंत्री लालबाबू राउत गद्दी को ही उपराष्ट्रपति बना कर उनका राजनीति पूर्ण किया जा सकता था।
उपेंद्र यादव ने इस चुनाव में चुनावी राजनीति में जीतने के लिए हर हथकंडा अपनाया, उन्होंने बारा में दो जातियों का समीकरण बनाया। निर्णायक शक्तियों को भी अपने अनुकूल बनाने का प्रयास किया। उन्होंने उससब पार्टीयों के सामने घुटने टेक दिए जिसके साथ उनका छतीस का आंकड़ा था। यहां तक सुनने में आया कि कांग्रेस का समर्थन हासिल करने के लिए उन्होंने यह भी स्वीकार किया है कि वे इस चुनाव के बाद मधेश प्रदेश की सरकार का नेतृत्व कांग्रेस को सौंप देंगे। लोसपा के नेता अपनी पार्टी के असफल होने और पतन होने का दोषारोपण उपेन्द्र यादव पर करते थे, वे भी केंद्र में मिले एक मंत्रालय को बचाने और प्रदेश में एक मंत्रालय मिलने की चाह में उपेन्द्र यादव के लिए ताँताथैया करते हुए मुजरा करने को तैयार हो गए। उपेन्द्र यादव ऐसे कई तिकड़म और पहल कर चुनाव मैदान में आए।
चुनाव के दौरान देवताल, पचरौता जैसे बिभिन्न जगह यादव बाहुल्य है, वहाँ बुथपर जनमत के बुथ प्रतिनिधी को धमकाकर भीतर बैठने नहीं देने की घटना उजागर हुई। जनमत के नेता कार्यकर्ता को गोली मारने और हाथ पैर काटने तक की धमकी सुनने को मिली। उपेन्द्र यादव के बेटा अमरेन्द्र यादव और जसपा के टीम द्वारा गांव-गांव में गरिब-दलित बस्ती में पैसा बाटकर गांव के लोगोको धमकाने का आरोप लगा कि अगर इस गाव से भोट नहीं मिलेगा तो अन्जाम बुरा होगा। पचरौता में डा. सीके राउत के गाडी को जसपा के कार्यकर्ता ने बुथ तक पहुंचने नहीं दिया वगैरह-वगैरह।
मधेश प्रदेश के जसपा मन्त्री सब उपेन्द्र यादव के प्रचार में खुलकर सरकारी साधनका दुरुपयोग किए इसीलिए निर्वाचन आयोग द्वारा मुख्यमन्त्री से स्पस्टीकरण पूछा गया। जसपा के सारे मंत्री, सांसद, प्रदेश सांसद, जिला अध्यक्ष, भातृ संगठन के अध्यक्ष एक-एक बूथ पर तैनात थे। इतना शक्ति प्रयोग या दुरुपयोग के बाद क्या नतीजा आया उसकी भी समीक्षा हो जाए।
पिछले चुनाव में रामसहाय यादव को 13822 मत मिले थे, इस मत को जसपा का आधार मत मान लिया जाए तो उसी चुनाव में स्वतंत्र उम्मीदवार रामकिशोर यादव को 11043, स्वतंत्र उम्मीदवार रवीन्द्र यादव को 10750 और स्वतंत्र उम्मीदवार विनोद यादव को 777 कुल 22570 मत को जसपा के आधार मत 13822 से जोड़े तो 36392 मत होते है। उस चुनाव में एमाले साथ था जिसका मत 10216 निकाल दे तो 26176 मत होते है, इस चुनाव में उपेन्द्र यादव को ठीक इसी के आसपास 28415 मत मिले है।
वही जनमत की बात करें तो पिछले चुनाव में जनमत को मात्र 2725 मत मिले थे, शिवचंद्र कुशवाहा को 11043 यानी कुल मत 13768 होते है जबकि जनमत को इस चुनाव में 23335 मत मिले है, अब सवाल ये खड़ा होता है कि जनमत को अतिरिक्त 9566 मत मिले वो कहाँ से आए। जमीनी स्तर पर छानबीन करने पर ये बात सिद्ध होती है कि इस चुनाव क्षेत्र में माओवादी और एकीकृत समाजवादी की भूमिका नगण्य थी लेकिन कांग्रेस और लोसपा के बड़े नेता साथ मे घूमते रहे लेकिन कांग्रेस और लोसपा का भोट जसपा को नही मिला।
इस उपचुनाव का सबसे बड़ा लाभ जनमत पार्टी को मिला। सप्तरी में उपेंद्र यादव को हराने के बाद पर्सा-बारा में बहुत लोग जनमत में प्रवेश किए, बारा में जनमत का मजबूत संगठन बन गया। सीके राउत उपेंद्र यादव की राजनीति से सीख रहे हैं। उपेंद्र यादव ने लोसपा का अंत किया। क्योंकि उपेंद्र यादव अच्छी तरह जानते थे कि लोसपा के इस रूप में रहने तक उनकी पार्टी मजबूत नहीं होगी। इसलिए वे एक ओर विभिन्न आंदोलनों में मोर्चा बनाते थे और दूसरी ओर नेताओं और कार्यकर्ताओं की चोरी करते थे। उपेंद्र यादव की रणनीति थी लोसपा को कमजोर करना। इससे उपेंद्र यादव और मजबूत हो गए। सीके राउत ने अब वही रणनीति अपनाई है। सीके राउत ने भी हिसाब लगा लिया है कि उपेंद्र यादव को कमजोर किए बिना मेरी पार्टी मजबूत नहीं होगी। लोसपा उपेंद्र यादव के साथ डंडे के दम पर भी कमजोर रही, लेकिन सीके राउत ने एक छोटा उग्र दल भी बनाया है। उपेंद्र यादव के लोगों में सीके राउत के लोगों पर हमला करने की हिम्मत नहीं है। सीके राउत उपेंद्र के घर गए और उन पर हमला किया। इसलिए सीके राउत उपेंद्र से सीख रहे हैं कि मधेश में किस तरह की राजनीति की जाती है। बारा के चुनाव से ज्यादा उथल-पुथल नहीं होगी लेकिन मधेश की राजनीति इसी तरह आगे बढ़ती रहेगी। इस चुनाव में हार के बावजूद शिवचंद्र कुशवाहा नेता के रूप में स्थापित हो गए। जे.पी. गुप्ता के शब्दों में कहें तो उपेन्द्र यादव जीत गए और सि.के. राउत विजेता हुए।




