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कामायनी की सौंदर्य चेतना हमारे भीतर जिज्ञासा पैदा करती है: डॉ श्वेता दीप्ति

 

वाराणसी । कामायनी पर काशी हिन्दू विश्वविद्यालय हिंदी विभाग द्वारा आयोजित त्रिदिवसीय संगोष्ठी के दूसरे दिन बोलते हुये  डॉ .श्वेता दीप्ति ( नेपाल ) ने कहा कि कामायनी आज कुछ सर्गों में सिमटकर रह गई है। कामायनी की सौंदर्य चेतना को तुलसीदास की पंक्ति जाकी रही भावना जैसी प्रभु मूरत देखी तिन तैसी से जोड़कर परिभाषित करने का प्रयत्न किया । कामायनी की सौंदर्य चेतना हमारे भीतर जिज्ञासा पैदा करती है।

कार्यक्रम की सम्पूर्ण प्रस्तुति इस प्रकार है । कामायनी,मालवीय मूल्य अनुशीलन केन्द्र
हिंदी विभाग बीएचयू, दिनांक 24/04/2023 को हिंदी विभाग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय एवं हिंदुस्तानी अकादमी,प्रयागराज के संयुक्त तत्वावधान में कामायनी महाकाव्य पर आयोजित अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का दूसरा दिन था।
संगोष्ठी के प्रथम सत्र में शोध छात्र -छात्राओं द्वारा शोध पत्र वाचन किया गया। इस सत्र के अध्यक्ष मंडल में डॉ. राजकुमार मीणा Rajkumar Raj Kumar Meena , डॉ.रविशंकर सोनकर Ravi Shankar , डॉ. बृजराज सिंह और डॉ. किंगसन पटेल शामिल थे । इस सत्र की मूल विशेषता यह रही है कि शोध छात्र छात्राओं द्वारा प्रस्तुत शोध आलेखों की सूक्ष्म पड़ताल करते हुए डॉ. किंग्सन पटेल ने इनकी मौलिकता को रेखांकित किया। बतौर संचालक हिंदी विभाग के सहायक आचार्य डॉ. रविशंकर सोनकर थे। इस सत्र के संयोजक डॉ. राजकुमार मीणा थे।
इसकी अध्यक्षता डॉ . बृजराज सिंह ने की।

द्वितीय सत्र का विषय था : कामायनी : मूल्यांकन की परंपरा।

इस संगोष्ठी के द्वितीय सत्र की अध्यक्षता कर रहे प्रो . अवधेश प्रधान ने कहा कि कामायनी की रचना का प्रारंभ नाटकीय भंगिमा के साथ होता है। कामायनी चीते की छलांग है। कामायनी में बहुत गहरी बात रूपक के माध्यम से कही गई है। प्रसाद का आत्मविश्वास बहुत जबरदस्त था।
उन्होंने भीषण से भीषण प्रतिरोध का जवाब नही दिया। प्रसाद की कविता के पीछे बहुत बड़ी दार्शनिक पृष्ठभूमि है। आज के विमर्शों के दायरे में देखने के कारण जो बहुत कुछ महत्वपूर्ण होता है वो सब छूट जाता है। परंपरा से काट कर कृति का मूल्यांकन करती है आधुनिक समीक्षा। प्रसाद की कामायनी दीर्घ मनन का पर्याय है। मुक्तिबोध ने श्रध्दा सर्ग को राष्ट्रीय स्वाधीनता का पर्याय बताया।

सिंगापुर यूनिवर्सिटी की प्रो . संध्या सिंह ने कहा कि अपने समय से आर पार देख लेने की क्षमता प्रसाद में थी। प्रसाद भविष्यद्रष्टा थे। कामायनी शब्द चित्रों का कलात्मक रूप प्रस्तुत करती है। मनुष्य की अस्मिता के सवाल से टकराती है कामायनी।

डॉ . मयंक भार्गव ने कहा कि कामायनी को फिर से पढ़ने के क्रम में हमें उसकी गीतात्मकता पर बल देना चाहिए।
कामायनी महाकाव्य गीतात्मक शैली में लिखा गया है।कामायनी का मनु काम से संघर्ष करते हुए समरसता को प्राप्त करता है।

डॉ. विवेक सिंह ने कहा कि भारतीय संस्कृति के साथ साथ चलने वाले रचनाकार थे प्रसाद। कामायनी पर आलोचकों ने अपने एकांगी विचार को थोप दिया है। उत्तर औपनिवेशिक दौर में कामायनी को फिर से पढ़े जाने की आवश्यकता है ।

प्रयागराज हिंदी अकादमी के डॉ . रवि नंदन ने कहा कि उत्तर आधुनिकता के दौर में कृति के महत्व के स्थान पर पाठ का महत्व बढ़ गया है। अब पाठक का कद आलोचक से बड़ा हो गया है।विद्यार्थियों को कामायनी का स्वयं पाठ करना चाहिए । कामायनी एक बहुत बड़ा मनोवैज्ञानिक ग्रंथ है ।
इस सत्र का संचालन हिंदी विभाग के सहायक आचार्य डॉ. विंध्याचल यादव Vindhyachal Yadav ने किया।

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संगोष्ठी के तृतीय सत्र का विषय था: कामायनी का कथा स्रोत और विन्यास।


इस सत्र का संचालन कर रही हिंदी विभाग की आचार्या डॉ.नीलम कुमारी Nilam K ने कहा कि जब एक बांग्ला भाषी हिंदी बोलता है तब ऐसा लगता है जैसे कोई कवि बोल रहा हो ।

इस सत्र की अध्यक्षता कर रहे प्रो.राधा वल्लभ त्रिपाठी ने कहा कि मनुष्य की विजययात्रा की विजयगाथा है कामायनी महाकाव्य। बहुत सारी परंपराओं में समन्वय करने की कूबत प्रसाद रखते हैं। प्रसाद की समन्वयकारी प्रतिभा ने व्यास एवं समास दोनों शैलियों का प्रयोग किया है। जब हमारे आचार्य इतिहास की बात करते हैं तब इस इतिहास की नहीं वो मेटा हिस्ट्री की बात करते हैं। रामायण , महाभारत ये सब हमारे आचार्यों के लिए इतिहास है। पटना के भगवानदत्त शास्त्री ने कामायनी का संस्कृत में अनुवाद किया। इसकी भूमिका राहुल सांकृत्यायन ने लिखी है जिसमें उन्होंने कामायनी की शैली को मणिप्रवाल की शैली कहा था।

प्रो. दिनेश कुशवाहा ने कहा कि जिस समय कामायनी आती है उसी समय उद्धवशतक भी आता है।लेकिन उद्धव शतक एक अनिवार्य रचना नहीं ठहरती लेकिन प्रसाद की कामायनी ठहरती है । पुरानी कथा को आधुनिक कथा बनाकर महाकाव्य में अनुबंधित कर प्रसाद ने कामायनी को हमारे लिए अनिवार्य काव्य बना दिया।
” एक पुरुष भींगे नयनों से देख रहा था प्रलय प्रवाह !”
भींगा नयन बहुत महत्वपूर्ण है। देवताओं के आत्मसुख के कारण पृथ्वी प्रलय की शिकार हुई। जिसे हम मन कहते हैं वो विचार प्रक्रिया का एक अंग है। ” कामायनी हमारे समय की तिल्लोतमा है।”

बांग्लादेश से आए वक्ता डॉ आंजेय रंजन ने कहा कि कामायनी में कवि प्रसाद ने सांस्कृतिक संक्रमण को बखूबी प्रस्तुत किया है । कामायनी के पूर्वार्द्ध में सौंदर्य चेतना प्रबल है और उत्तरार्द्ध में अध्यात्म चेतना प्रबल है। कामायनी के सर्गों का नाम मनुष्य के वृत्तियों के आधार पर है। इन्होंने काज़ी नजरूल इस्लाम की कविता ” प्रलयोल्लास ” ( १९२१) को कामायनी के प्रलय से जोड़कर प्रस्तुत किया । कामायनी में जो मानवता के विजयनी की बात होती है १६ वीं शताब्दी के बांग्ला के संत कवि चंडीदास कहते हैं; ” साबार ऊपर मानुष सत्य “।

छायावादी काव्यकोश के रचयिता प्रो. कमलेश वर्मा ने कामायनी की भाषा एवं व्याकरण पर पर अपनी बात रखी।छायावाद के किसी रचना के रचनाकारों में समन्वय शब्द नहीं आया है । यह कामायनी में केवल तीन स्थानों पर आता है । कामायनी में व्यस्त शब्द बिजी रहने का पर्याय बनकर नहीं आया है। । अस्त व्यस्त के अर्थ में आया है। लहर में केवल एक बार आया है । पंत की रचना में केवल १ बार आया है। पूरे छायावादी काव्य में विद्युत्कण केवल कामायनी में आया है। प्रेमचंद अपने कई सामाजिक संघर्षों में रोमानियत का सहारा लेते हैं जैसे छायावादी कवि। बिना रोमांटिक हुए आप क्रांति नहीं कर सकते और बिना रोमांटिक हुए आप मानवता का पक्ष नहीं ले सकते।

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महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो .अनुराग कुमार ने कहा कि नंदु दुलारे वाजपेई ने बताया था कि इतिहास क्या है और दर्शन क्या है ? इन दोनों को बिलगाया नहीं जा सकता है। कामायनी का मूल तथ्य प्रसाद ने प्राचीन भारतीय ग्रंथों से ग्रहण किया है। मुख्य रूप से जलप्लावन की परिघटना ! उस दौर के अधिनायकवाद के प्रतिरोध में प्रसाद की कामायनी उतरती है। जनता कामायनी की कथा स्रोत का मुख्य हिस्सा है। इस रूप में संघर्ष सर्ग में प्रसाद एक अलग कथा का विन्यास करके आधुनिकता का प्रतिनिधित्व करते हैं। कामायनी ऐतिहासिक तथ्यों को दर्शन की सरणी में पिरोते हुए आधुनिक मनुष्य को रचने का कार्य करती है।

संगोष्ठी के चतुर्थ सत्र का विषय था: कामायनी की सौंदर्य चेतना।

इस संगोष्ठी की अध्यक्षता कर रहे प्रो .दिनेश कुशवाहा ने कहा कि यह संसार सौंदर्य का बगीचा है ;
” यहां की फिक्र वहां ख्याल रक्खा है ;
अकेले दोनों जहां को संभाल रक्खा है।”
मानव सौंदर्य का उपासक है। सौंदर्य की आराधना ही सत्य है। सौंदर्य हमारे लिए अध्ययन , अध्यापन और अध्यवसाय है। सौंदर्य काम को उद्दीप्त करता है और उद्दीप्त काम ही सौंदर्य है। सौंदर्य जीवन को उत्प्रेरित करने वाला तत्व भी है।

डॉ . रामसुधार सिंह ने कहा कि प्रसाद के नाटकों में सौंदर्य की सूक्ष्म धारा दिखाई देती है। जयशंकर प्रसाद सूक्ष्म सौंदर्य चेतना के कवि हैं।कामायनी तक पहुंचते- पहुंचते प्रसाद की सौंदर्य चेतना प्रौढ़ हो जाती है। बाह्य सौंदर्य का एक सुंदर उदाहरण है जिसमें दुरारूढ़ कल्पना दिखाई देती है।
” नील परिधान बीच सुकुमार , खिल रहा मृदुल अधखुला अंग ,
खिला हो ज्यों बिजली का फूल , मेघ बन बीच गुलाबी रंग।

” उज्ज्वल वरदान चेतना का सौंदर्य जिसे सब कहते हैं !”

कामायनी सौंदर्य चेतना के बल पर आंनद सर्ग तक की यात्रा करती है। इनकी सौंदर्य दृष्टि मानवता से ऊपर उठकर समस्त प्रकृति और प्राणी में दिखाई देती है।

प्रो. राधावल्लभ त्रिपाठी ने कामायनी की सौंदर्य चेतना के विषय में बताया कि १६ वीं शताब्दी का ग्रंथ उज्ज्वलनीलमणि जिसके लेखक रूपगोस्वामी हैं ,सौंदर्य शास्त्र का ग्रंथ है। छायावाद का मुख्य घटक सौंदर्य चेतना है। अभिनवगुप्त ने भी सौंदर्य की परिभाषा दी है। चेतना के कई रूप होते हैं। बुद्धि, मति, प्रज्ञा , नवोन्मेषशालिनी प्रज्ञा प्रतिभा कहलाती है। मैक्समूलर ने कहा कि भारत में सौंदर्यशास्त्र नहीं था। ऐसी गलतफहमी संस्कृत की परिभाषित शब्दावली से परिचित नहीं होने के कारण हुई।सौंदर्यशास्त्र का सबसे अधिक वर्णन संस्कृत साहित्य में है।कवि प्रसाद ने अमूर्त उपमान से सौंदर्य की सूक्ष्मता को अभिव्यक्त किया है । यह अमूर्त उपमान भाव के रूप में आता है और यह भाव धीरे -धीरे और भी सूक्ष्म होता जाता है।
” तुमुल कोलाहल कलह में ,
मैं मलय की वात रे मन।।”

प्रो. गोपाल प्रधान ने कामायनी महाकाव्य को भारत की स्वाधीनता आंदोलन के परिप्रेक्ष्य में देखा।
कामायनी ने सामाजिक आलोड़न में अपनी उत्तरजीविता की खोज की। छायावाद का समूचा समय और उसके लेखकों का साहस अभी भी विद्यार्थियों का सहज अंग नहीं बन सका है।

डॉ .श्वेता दीप्ति ( नेपाल ) ने कहा कि कामायनी आज कुछ सर्गों में सिमटकर रह गई है। कामायनी की सौंदर्य चेतना को तुलसीदास की पंक्ति जाकी रही भावना जैसी प्रभु मूरत देखी तिन तैसी से जोड़कर परिभाषित करने का प्रयत्न किया । कामायनी की सौंदर्य चेतना हमारे भीतर जिज्ञासा पैदा करती है।

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डॉ .अशोक कुमार ज्योति Ashok Kumar Jyoti ने कहा कि हिंदी कविता में हिमालय पर शोध करने के दौरान जयशंकर प्रसाद की कामायनी में हिमालय को सौंदर्य चेतना के रूप में देखा।
हिमालय भारत की सांस्कृतिक चेतना का प्रतीक है। राष्ट्र की गौरव परंपरा , गौरव गाथा का प्रतीक है।
” हितं सहितं तत् साहित्यं “।
मानव की मनोवृत्तियों को रस सिक्त करना साहित्य का कार्य है । सत्यम् शिवम् सुंदरम उपनिषदों की पंक्ति प्रतीत होती है लेकिन हमारे यहां १९ वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में रवींद्रनाथ टैगोर के पिता देवेंद्रनाथ ठाकुर ने सत्यम् शिवम् सुंदरम महावाक्य ब्रह्म समाज के स्थापना के समय कही थी। अरस्तू The Truth , The Good ,The beautiful
की बात करते हैं। सत्य की पूजा ही सौंदर्य है। हमारे यहां जिस लालित्य की अवधारणा आचार्य द्विवेदी प्रस्तुत कर रहे थे वह लावण्य है। कांट ने ज्ञान ,संकल्प और भावना को आत्मा का सत्य माना है। लज्जा बुराई से बचाने वाली मनोविकार है। कामायनी का पूरा वृत्त हिमालय में परिघटित होता है।प्रसाद १९०९ से हिमालय पर लिखना शुरू कर देते हैं। ‘भारत’ कविता में प्रसाद कहते हैं ;
” हिमगिरि का उत्तुंग शिखर है खड़ा सामने ।” हिमालय पृथ्वी का मानदंड है। राष्ट्र का प्रहरी है। कामायनी में वर्णित सौंदर्य गतिशील सौंदर्य है।

इस सत्र का संचालन डॉ. हरीश कुमार Hareesh Kumar ने किया।

संगोष्ठी के अंत में एक विशेष सत्र का आयोजन किया गया।
” कविता में काशी! ” इस सत्र को संबोधित करते हुए हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो. सदानंद साही Sadanand Shahi ने कहा कि हिंदी कविता की परंपरा काशी से प्रारंभ होती है। इस सत्र में आमंत्रित भोजपुरी कविता विशेषज्ञ प्रकाश उदय ने ठेठ गंवई लहज़े में अपनी काशी पर लिखीं कविताओं को लयबद्ध स्वर में प्रस्तुत किया।
” देव दुःख से प्रारंभ ” कविता खासकर काशी विश्वनाथ और उनके पड़ोसी भगवान का दुःख है।
” भोला जाड़े में असाढ़े से पड़ल बाड़े,
दूनों जना के भेंटाइल माने दुःख दुहराइल,
इ नहाने अकुवाइल ऊ अजाने औंजाई,
इनके लागे ला सोमार उनके जुम्मा के बुखार ,
दुःख कहले सुनले से घटल बाड़े! ”
इस सत्र की अध्यक्षता कर रहे सहज व्यक्तित्व एवं रंगीले मिजाज़ से सराबोर प्रो. बलिराज पाण्डेय Baliraj Pandey के वक्तव्य ने सभा में कहकहों का समां बांध दिया। इन्होंने गंगा की धारा को लोकतांत्रिक दिशा की ओर मोड़ते हुए कहा कि हमें सभा में उपस्थित श्रोताओं में से भी मुख्य श्रोता , विशिष्ट श्रोता चुनकर उन्हें अंगवस्त्र प्रदान करते हुए सम्मानित करना चाहिए। हिंदी विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. सदानंद के रहते हुए सब ओर आनंद ही आनंद है। इनकी वाणी को सुनकर रसज्ञता का चरमोत्कर्ष क्या होता है आज हमें इसका एहसास हुआ। दरअसल इनकी वाणी आज सौंदर्य की आभा में प्रस्फुटित हो रही थी।
रोशनी उर्फ धीरा (साभार)

 

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