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कैसी हो हमारी भावी राजनीतिक व्यवस्था

 

प्रो. नवीन मिश्रा:राजनीतिक व्यवस्था शासन के विभाजन का एक प्रमुख आधार कार्यपालिका का स्वरूप है । इस आधार पर शासन दो रूपों में बाँटा जा सकता है ः -१) संसदीय सरकार और -२) अध्यक्षात्मक सरकार । यह विभाजन शासन के प्रधान अंगोें व्यावस्थापिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के आपसी सम्बन्धों के आधार पर किया जाता है । आधुनिक लोकतन्त्र के युग में सरकार का विभाजन इसी आधार पर किया जाता है । ब्रिटिश शासन व्यवस्था का स्वरूप-सिद्धान्त में निरंकुश राजतन्त्र, स्वnepal rastrabadरूप में सीमित राजतन्त्र और वास्तविक रूप में लोकतान्त्रिक गणतन्त्र है । भारतीय शासन का स्वरूप लोकतान्त्रिक एवं गणराज्यात्मक है । संविधान के प्रस्तावों में इसे लोकतान्त्रिक गणराज्य ही घोषित किया गया है । दूसरे शब्दों में हम यह कह सकते हैं कि भारत के प्रत्येक नागरिक को अधिकारयुक्त पद प्राप्त करने की पर्ूण्ा स्वतन्त्रता है । व्यक्तियों को केवल मतदान देने और प्रतिनिधि चुनने का ही अधिकार नहीं है बल्कि कोई भी व्यक्ति किसी भी उच्च पद के लिए चुना जा सकता है । इंग्लैण्डÞ की शासन पद्धति यदि संसदात्मक व्यवस्था का ज्ञान कराने में अग्रणी रही है तो अमेरिका की शासन व्यवस्था अध्यक्षात्मक शासन व्यवस्था का ज्ञान कराने में अग्रणी रही है । अमेरिका में अध्यक्षीय शासन व्यवस्था का प्रावधान किया गया है, राष्ट्रपति की प्रमुखता है, व्यवस्थापिका की नहीं । राष्ट्रपति का चुनाव जनता द्वारा होता है और इसके अधिकार अत्यन्त विस्तृत हैं । प|mान्स के पञ्चम गणतन्त्र की शासन व्यवस्था में संसदात्मक एवं अध्यक्षात्मक शासन व्यवस्था का अद्भुत समन्वय देखने को मिलता है । वास्तव में वहाँ न तो अमेरिका के तरह की अध्यक्षात्मक व्यवस्था है और न ब्रिटेन की तरह संसदात्मक बल्कि दोनों के सम्मिलित रूप के दर्शन होते हैं । प|mान्सीसी संविधान के अनुसार कोई व्यक्ति मन्त्री और व्यवस्थापिका का सदस्य दोनों नहीं रह सकता । यदि सीनेट अथवा राष्ट्रीय सभा का कोई सदस्य मन्त्री नियुक्त हो जाता है तो उसे राष्ट्रीय सभा अर्थात् सीनेट से अपना त्यागपत्र देना होता है । इससे स्पष्ट है कि प|mान्स में कार्यपालिका का सदस्य व्यवस्थापिका का सदस्य नहीं हो सकता है । आस्ट्रेलिया में ऊपर से देखने पर राजतन्त्रात्मक शासन दिखाई पडÞता है, परन्तु वास्तव में वहाँ लोकतन्त्र फलीभूत हो रहा है । वहाँ समानता के सिद्धान्त को मान्यता प्रदान की गई है । जनमत को विशेष महत्व दिया जाता है । संविधान के संशोधन में बहुत हद तक जनता का हाथ रहता है । वहाँ के संघीय शासन में लोकतन्त्रीय विचारों को पर्ूण्ा मान्यता प्रदान की गई है । मन्त्रिपरिषद् व्यवस्थापिका के प्रति उत्तरदायी है । वहाँ के मन्त्रिगण व्यवस्थापिका सभा के सदस्य होते हैं । मन्त्रियों की नियुक्ति प्रधानमन्त्री की सलाह से गवर्नर द्वारा की जाती है । सोवियत संघ में मार्क्स और लेनिन के सिद्धान्तों को व्यावहारिक रूप दिया गया है । यही कारण है कि विशिन्सकी ने सोवियत संघ को एक ऐसा राज्य कहा है जिसकी शासन व्यवस्था संसार के विभिन्न देशों की शासन व्यवस्था से अनुपम है । सोवियत शासन व्यवस्था में समाजवादी लोकतन्त्र की स्थापना की गई है और राज्य एवं समाज का वितरण के समस्त साधनों पर स्वामित्व है । समस्त उत्पादनों का प्रयोग समाज के हित के लिए ही होता है । और वहाँ वर्गहीन समानता पर आधारित एक वर्गहीन समाज की स्थापना की गई है, जिस में न कोई शोषक है और न कोई शोषित । न कोई पूँजीपति है और न कोई उसका दास । सभी को कार्य के समान अवसर प्रदान किए गए हैं और इस बात का प्रयास किया गया है कि सभी को समान सुविधाएं उपलब्ध हों ।
कोई भी राजनीतिक व्यवस्था न तो शत प्रतिशत सही होती है और न शत प्रतिशत गलत । यहाँ तक कि तानाशाही व्यवस्था के भी अपने कुछ गुण और कुछ अवगुण होते हैं । उदाहरण के लिए नेपाल को ही ले सकते हैं । पञ्चायती व्यवस्था भले ही जितनी क्रूर रही हो लेकिन शान्ति व्यवस्था की स्थिति आज से बेहतर थी । ऐसे में प्रश्न उठता है कि भावी संविधान में किस प्रकार की राजनीतिक व्यवस्था को अपनाया जाए – आज के युग में तानाशाही या राजतन्त्रीय व्यवस्था का अवसान हो चुका है । अब सिर्फदो ही तरह की विचारधाराएं कायम हैं । एक प्रजातान्त्रिक और दूसरा साम्यवादी । प्रजातान्त्रिक व्यवस्था इस विचारधारा पर आधारित है कि राजनीतिक व्यवस्था जनता का, जनता द्वारा तथा जनता के लिए होना चाहिए । सभी जनता का सत्ता सञ्चालन में भाग लेना सम्भव नहीं है, इसीलिए जनता के प्रतिनिधियों के द्वारा सत्ता सञ्चालन की व्यवस्था की गई है । साम्यवादी व्यवस्था इसके विपरीत यह मानती है कि वर्तमान राज्य पुँजीपतियों का राज्य है । इसके पीछे उनका तर्क है कि शुरु में जब व्यक्तिगत सम्पत्ति नहीं थी तो राज्य भी नहीं था । इसी कारण उनका लक्ष्य है, वर्ग संर्घष्ा के द्वारा पूँजीपति राज्य को समाप्त कर र्सवहारा राज्य की स्थापना । और एक दिन ऐसा आएगा, जब र्सवहारा राज्य स्वतः विलीन हो जाएगा, ऐसा मार्क्स का मानना था । प्रजातान्त्रिक विचारधारा के पक्षधर महात्मा गान्धी की रामराज्य स्थापना की अवधारणा भी कुछ हद तक इसी से मिलती-जुलती है । शीतयुद्ध काल में मार्क्सवादी सिद्धान्त को यूरोप के राष्ट्रों ने एक हिंसक सिद्धान्त के रूप में प्रचारित किया, जो बिल्कुल ही गलत था । मार्क्स ने हिंसा की परिभाषा ‘मिडÞवाईफ अफ ए न्यू बार्ँन सोसाइटी’ के रूप में की है और कहा है कि जिस तरह माँ के गर्भ से शिशु को जन्माने के लिए थोडÞी सी हिंसा, आवश्यक होती है, उसी तरह माँ रूपी पुरानी पूँजीवादी व्यवस्था से शिशु रूपी नई र्सवहारा व्यवस्था को जन्माने के लिए थोडÞी सी हिंसा आवश्यक है । स्मरणीय हो कि माओवादियों के द्वन्द्वकाल में जब तत्कालीन चीनी प्रधानमन्त्री नेपाल भ्रमण पर आए थे, तो उन्होंने भी इस बात पर दुःख व्यक्त किया था कि इन्होंने अपना नाम माओवादी क्यों रखा है – क्योंकि इससे माओ के नाम की बदनामी एक हिंसक पुरुष के रूप में हो रही है ।
प्रजातान्त्रिक विचारधारा अर्न्तर्गत मूल रूप से दो प्रकार की शासन पद्धतियाँ प्रचलित हैं । एक अध्यक्षात्मक और दूसरा संसदीय । अब प्रश्न है कि नेपाल के लिए कौन सी पद्धति उपयुक्त है – वर्तमान राजनीतिक परिस्थिति में संसदीय प्रणाली अपनाने की स्थिति में राजनीतिक अस्थिरता की सम्भावना को नकारा नहीं जा सकता है । संसदीय प्रणाली अपनाने की स्थिति में इसे स्थायित्व प्रदान करने के लिए कुछ सावधानियाँ बरतनी आवश्यक है । जैसे की राजनीतिक दलों की संख्या पर नियन्त्रण या फिर दल बदल पर रोक की व्यवस्था । अध्यक्षात्मक प्रणाली में राजनीतिक स्थिरता तो मिलेगी लेकिन इस में एकमना शासन की सम्भावना से इन्कार नहीं किया जा सकता है । एक बार निर्वाचित हो जाने के बाद राष्ट्राध्यक्ष पाँच वषार्ंर्ेेे लिए तानाशाह बन सकता है । अतः इस स्थिति से बचाव का रास्ता ढूँढÞना होगा ।
संघीय संरचना
संघवाद अंग्रेजी भाषा के शब्द ‘फेडरलिज्म’ का हिन्दी रूपान्तरण है, जो लैटिन भाषा के शब्द ‘फोइड्स’ से बना है, जिसका अर्थ है-   संघीय समझौता । इससे स्पष्ट है कि संघराज्य वह राज्य है, जिस में कुछ स्वतन्त्र राज्य अपने- आप को अलग रखते हुए भी समान उद्देश्य की पर्ूर्ति के हेतु अपने को एक संघ के रूप में संयुक्त कर लेते हैं । ये राज्य अपने कुछ सामान्य हित के विषयों को एक केन्द्रीय सत्ता को सुपर्ूद कर देते हैं और यह केन्द्र या सत्ता सरकारी संघ के शासन का भार उठाते हैं । इस केन्द्रीय सरकार को संघीय सरकार कहा जाता है । परन्तु संघीय सरकार की स्थापना से संघ में सम्मिलित राज्यों की सरकारों की शक्तियों का लोप नहीं हो जाता बल्कि ये राज्य सरकारें अपने राज्य के अर्न्तर्गत शासन का कार्य चलाती हंै । संघीय सरकार वही कार्य करती है, जिस का सम्बन्ध समस्त देश से होता है । संघीय सरकार की शक्तियों का स्पष्ट विभाजन होता है । इस शक्ति विभाजन के दो आधार हैं । प्रथम के अनुसार कुछ कार्य करने का अधिकार संघीय सरकार को दे दिया जाता है और शेष राज्य सरकारों के पास रह जाते हैं । द्वितीय के अनुसार राज्यों के अधिकार निश्चित कर दिए जाते हैं और शेष कार्यों की जिम्मेदारी संघीय सरकार की होती है । कहीं कहीं संविधान में संघीय सरकार और राज्य सरकारों की शक्तियां अलग-अलग लिख दी जाती है । अमेरिका में संघीय सरकार के अधिकार निश्चित हैं और शेष शक्ति विभिन्न राज्यों को दे दी गई है । भारत के संविधान में संघीय सरकार और राज्यों की शक्तियों का स्पष्ट विभाजन किया गया है । इस दृष्टि से समस्त कायोर्ं को तीन सूचियों में बाँट दिया गया है । संघीय सूची, राजकीय सूची और समवर्ती सूची । संघ सूची में आये हुए समस्त कायोर्ं को संघीय सरकार सम्पन्न करती है और राजकीय सूची में आए हुए कार्य राज्य सरकार के होते हैं । समवर्ती सूची में आए हुए विषयों पर संघीय और राज्य दोनों ही सरकारें कानून बना सकती है । परन्तु संघीय कानूनों को प्राथमिकता दी जाती है ।
जहाँ तक नेपाल का प्रश्न है, यहाँ संघीय संरचना के स्वरूप को बिल्कुल ही गलत ढंग से पेश किया गया है । संघीयता का अर्थ है स्वायत्तता, स्वराज्य और इससे भी बढÞ कर शक्ति पृथक्करण, विकेन्द्रीकरण । लेकिन नेपाल में संघीयता को जातीय पहचान के साथ जोडÞा गया और यहीं से शुरु हुआ गलतफहमी का सिलसिला कि सभी जातियों का अपना पृथक राज्य होगा । इसी के परिणाम स्वरूप अनेकों स्थानों पर कभी जातीय पहचान के आधार पर राज्य निर्माण के लिए आन्दोलन शुरु हो गए तो कभी क्षेत्रों को नहीं बाँटने के लिए । उदाहरण के लिए लिम्बुवान क्षेत्र में कभी क्षेत्रों के विभाजन की माँग को लेकर बन्द-हडÞताल होते रहे तो कभी क्षेत्रों को न बाँटने के लिए । केन्द्र और राज्य के बीच में शक्तियों का बँटवारा कैसे होगा, राज्यों का संचालन करने के लिए आर्थिक स्रोत कहाँ से जुटाए जाएँगे, इन सब बातों पर कभी भी कोई चर्चा नहीं हर्ुइ । राज्यों की स्थापना होने से राजनीतिक स्वतन्त्रता तो प्राप्त हो जाएगी, लेकिन आर्थिक परतन्त्रता के कारण व्यवहार में हमें इसका कोई विशेष लाभ प्राप्त नहीं हो सकेगा । ठीक उसी प्रकार जिस तरह विश्व में उपनिवेशवाद की समाप्ति के पश्चात् नव उपनिवेशवाद का जन्म हुआ था । राज्यों विशेष कर तर्राई के राज्यों के पास सत्ता सञ्चालन के लिए पर्याप्त आर्थिक स्रोत का अभाव है, जिससे राज्यों का सञ्चालन करने में भारी कठिनाइयों का सामना करना पडÞेगा । उदाहरण के लिए कोई भी राज्य शिक्षकों की चिकित्सको की नियुक्ति तो कर लेगा, लेकिन वेतन देने के लिए उसके पास पैसे नहीं होंगे । ऐसी स्थिति में राज्यों में शुरु होगा धरना, पर््रदर्शन, हडÞताल जो अराजक समाज की सृजना करेगा । केन्द्र में अगर गैर मधेशी शासक होंगे, जिसकी सम्भावना अधिक है तो मधेशी राज्यों को निर्धारित रकम मुहैया कराने में भी आनाकानी कर सकते हैं, जिससे हमे सावधान रहना होगा । किसी भी मधेशी राज्य के पास इतना पर्याप्त आर्थिक स्रोत साधान नहीं है, जिससे राज्य का सञ्चालन सुचारु रूप से किया जा सके । मधेश सिर्फकृषि प्रधान क्षेत्र है, लेकिन मजदूरों की कमी, सिंचाई की दुरावस्था तथा खाद, बीजों के अभाव से तर्राई की खेती मृतप्राय हो गई है । राज्यों की संख्या को निर्धारण करते समय हमें देश की जनसंख्या और भू राजनीतिक स्थिति का खयाल रखना होगा । आवश्यकता से अधिक राज्यों का निर्माण घातक साबित हो सकता है । क्योंकि शक्ति पृथकीकरण के दृष्टिकोण से संघीयता जितना लाभदायी राजनीतिक व्यवस्था है, उतना ही संवेदनशील भी । सोवियत संघ का विघटन इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है । लोककल्याणकारी राज्यः पुराने जमाने में राज्य का काम था सिर्फ शान्ति और सुरक्षा की स्थापना । लेकिन आधुनिक युग में राज्य सम्बन्धी अवधारणा परिवर्तन हो गई है । आज का राज्य लोककल्याणकारी राज्य हो गया है । अब इसका कार्य मात्र शान्ति और सुरक्षा कायम रहने तक सीमित नहीं है । आज के राज्य का काम न सिर्फअपने देश के जनता को अनिवार्य आवश्यकताओं जैसे कि, भोजन, वस्त्र और आवास की सुविधा उपलब्ध कराना है, बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य आदि की व्यवस्था करना भी इसकी जिम्मेदारी है । मानव अधिकारों का तथा महिलाओं के हक और हितों की रक्षा करना भी इसका कर्तव्य है । सामन्तवादी राजाओं के देश नेपाल में महिलाओं को एक भोग की वस्तु से अधिक कुछ भी नहीं समझा जाता था और इसी कारण उन्हें पैतृक सम्पत्ति में अधिकार भी नहीं दिया गया था । प्रजातान्त्रिक नेपाल में उन्हें पैतृक सम्पत्ति में अधिकार तो मिला, लेकिन इस शर्त के साथ कि शादी के बाद उन्हें यह सम्पत्ति लौटानी होगी । कुछ दिनों के पश्चात् इस प्रावधान को समाप्त कर दिया गया लेकिन महिला सशक्तिकरण की दिशा में अभी भी बहुत कुछ करना बाँकी है, जिसे भावी संविधान में ध्यान रखना होगा । उदाहरण के लिए अगर नेपाली महिला की शादी विदेश में होती है तो ऐसी स्थिति में उसका पैतृक सम्पत्ति पर अधिकार बना रहेगा या नहीं, इस विषय में स्पष्ट नहीं है । जबकि विश्व के कई देशों में जैसे कि माँरिशस, इटली में भले ही महिला की शादी विदेश में हो जाए, तब भी पैतृक सम्पत्ति पर उसका या उसके उत्तराधिकारी का अधिकार बना रहता है । नागरिकता के सम्बन्ध में भी इसी प्रावधान का होना जरूरी है कि माता या पिता में से कोई भी अगर नेपाली नागरिक है तो उसकी सन्तान को नेपाल की नागरिकता मिलनी चाहिए । इन प्रावधानों के अभाव में सबसे अधिक समस्या मधेशी महिलाओं को ही उठाना पडÞता है क्योंकि अधिकांश मधेशी महिलाओं की शादी भारत में होती है । आज के युग में समाज भी बदलने लगा है । पहले जैसी सोच नहीं है कि पुत्र की कामना में लोग दो तीन शादियाँ कर लेते थे । आज बहुत सारे ऐसे दम्पति मिल जाएँगे, जिन्हें सिर्फबेटी ही है । ऐसे में पैतृक सम्पत्ति से विदेश में शादी के बाद हक से वञ्चित करना कई समस्याओं को जन्म देगा ।
भावी संविधान में देश की अन्य भाषाओं को जो भी दर्जा दिया जाए, इससे परहेज नहीं लेकिन हिन्दी भाषा को उचित स्थान दिलाने की जरूरत है । कम से कम इसे सरकारी काम काज और विश्वविद्यालयों में पढर्Þाई तथा परीक्षा की भाषा के रूप में मान्यता दिलाना हम सबांे की जिम्मेदारी है ।

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