नेपाली कानूनः स्टेटलेस की पीड
रणधीर चौधरी:अपने हक अधिकार के उपयोग करने के साथ-साथ देश के प्रति समर्पित व्यक्ति को नागरिक कहते हैं । जब बात देश और नागरिक की हो, तो जरूरी यह भी होता है कि देश अपने नागरिक के प्रति कैसी जिम्मेवारी वहन करता है ।
नागरिकता कुछ ऐसे ही, व्यक्ति और देश के सम्बन्धों को बयाँ करता है । नेपाल में यह एक उलझी हर्ुइ समस्या के रूप में है । यह एक पहेली है, जिसको सुलझाने के प्रयास में कमी दिख रही है । नागरिकता प्रमाण पत्र के बिना कोई भी व्यक्ति राज्य द्वारा प्रदान अधिकारांे का लुत्फ नहीं उठा सकता है । नेपाल के सर्न्दर्भ में तो खाने पीने के सिवा अन्य सभी काम काजों के लिए नागरिकता का होना अति आवश्यक होता है । यहाँ तक कि, एक सीमकार्ड प्रयोग करना हो तो नागरिकता की आवश्यकता पडÞती है । सरकारी या प्राइवेट कोई भी नौकरी करना हो, चुनाव में अपना निर्ण्ाायक मत देना हो, ड्राइभिङ लाइसेन्स लेना हो या फिर उच्च शिक्षा हासिल करनी हो यूँ कहा जाय तो जीवन, के हरेक नुक्कड और चौराहे पर नागरिकता की आवश्यकता अति आवश्यक है ।
नेपाली कानून
नेपाल मंे नागरिकता की समस्या की जडÞ नेपाल का अस्पष्ट कानून है । वि सं २०६६ साल में उच्च स्तरीय कार्यदल के द्वारा ११ सूत्रीय समझौता किया गया । समझौता के मुताविक किसी भी व्यक्ति को वंशज के आधार पर नागरिकता तव मिलेगी जब तक उसके माँ और पिता दोनों वंशज के आधार पर नागरिक सिद्ध होंगे । अगर इस समझौते का कार्यान्वयन किया गया तो कितने नेपाली सन्तान ‘स्टेटलेस’ हो जाएंगे । उपरोक्त समझौते के मुताविक उनको नेपाली अंगीकृत नागरिकता लेने में १५ सालों तक नेपाल में निवास करने की जरूरत पडÞेगी, वहीं अगर कोई विदेशी महिला नेपाली पुरुष से शादी करती है तो उस महिला को जल्द ही नेपाली अंगीकृत नागरिकता मिल पाएगी । इस प्रावधान्ाों को अगर कानूनी मान्यता दे दी गई तो हजारों की तादाद में मधेशी ‘स्टेटलेस’ का जीवन बिताने पर मजबूर हो जाएँगे । वैसे भी जिला प्रशासन कार्यालय के हाथों में नागरिकता वितरण का जिम्मा सौंपने की वजह से मधेशियों को नागरिकता लेने में निर्रथक सवालों का सामना करना पडÞता है । प्रायः हरेक प्रशासन दफ्तरों मंे पहाडÞी मूल के सी.डी.ओ की उपस्थिति होती है । जो मधेशियों के प्रति पर्ूवाग्रही होते हैं उनकी परिभाषा के अनुसार मधेशी का मतलव भारतीय होता है । प्रेडरिक एच. गेजहारा लिखित ‘रिज्नलिज्म एण्ड युनिटी इन नेपाल’ नामक किताव के अनुसार, वि.सं २०१९ साल मंे निर्मित संविधान के अनुसार नेपाली मूल के व्यक्ति के लिए २ वर्षके निवास के बाद नागरिकता प्राप्त करने का हक बन जाता है वहीं गैर नेपाली मूल के लिए १२ वर्षों तक नेपाल में निवास की आवश्यकता पडेÞगी । परंतु उस संविधान की विडम्वना, उसमें नेपाली मूल को परिभाषित नहीं किया गय,ा इस र्टर्मिनोलोजी को परिभाषित करने का जिम्म्ाा पर्ूण्ातः नागरिकता वितरण अधिकारियों के ऊपर ही छोडÞ दिया गया । इन अधिकारियों ने नेपाली भाषा बोलना और लिखना इस चीज को नेपाली मुूल की परिभाषा में समाहित किया और मधेश में अधिकांश व्यtmि न नेपाली भाषा बोल सकते और नहीं लिख सकते हैं । इसी आधार पर नेपाली नागरिकता प्राप्त करने से वञ्चित रहे हैं ।
विभिन्न संगठनांे और खास कर मधेसी दलों द्वारा दबाब डालने पर सरकार ने वि.सं २०६३ और वि.सं २०७० में नागरिकता की समस्या समाप्ति की ओर नहीं बढÞ पाई । राष्ट्रीयता प्राप्त करना व्यक्ति का मौलिक अधिकार है, इस चीज को मानव अधिकार सम्बन्धी विश्वव्यापी घोषणापत्र के धारा १५ में भी लिपिवद्ध किया गया है । देश का कानून जैसा भी हो, वह र्सवमान्य होता है और होना भी चाहिए । लेकिन इस इक्कीसवीं सदी मंे अगर जेन्डर के आधार पर किसी से भेदभाव किया जाय तो उसका प्रतिकार भी होना चाहिए । नेपाली महिलाओं के साथ कुछ ऐसा ही है, २०६३ के धारा ३ के अनुसार कोई भी व्यक्ति अपनी माँ के नागरिकता के आधार पर वंशज नागरिकता प्राप्त कर सकता है । फिर भी सरकारी अधिकारियों द्वारा इस नियम कानून का दिनदहाडेÞ उल्लंघन किया जा रहा है । इसी उल्लंघन की चपेट में महोत्तरी जिला के, मटिहानी ग्राम निवासी अर्जुन साह स्टेटलेस के दर्द में छटपटा रहा है । अर्जुन के पिता एक भारतीय मूल के नागरिक हंै, परंतु शादी के पश्चात् पिछले ३७ वषार्ंर्ेेे नेपाल में ही बैठते आ रहे हैं । अर्जुन की माँ जो कि एक नेपाली नागरिक है, जिनके पास वंशज नागरिकता है, अर्जुन अपने माँ के नाम से नागरिकता लेने का हकदार है । लेकिन महोत्तरी के जिला प्रशासन दफ्तर ने उनको नागरिकता ना देने की कसम खा ली है । क्या अर्जुन को अपने माँ के नाम से नागरिकता ना मिलना सम्पर्ूण्ा महिलाओं का अपमान नहीं है – अर्जुन का केस देख रहे विद्वान अधिवक्ता दीपेन्द्र झा का मानना है कि संविधान के मसौदे में समेटा गया प्रावधान प्रतिगामी, प्रजातन्त्र और समाज विरोधी है । एफडब्लूएलए के अनुसार नेपाल मंे ४३ लाख व्यक्तिओं के पास नागरिकता नहीं है । व्यवहारिक रूप से सारे स्टेटलेस हंै और उनमंे से २३ लाख २० हजार मधेशी हैं ।
नागरिकता अप्राप्ति की चपेट में अर्जुन जैसे बहुत सारे युवा हंै । दुख तो तब होता है, जव कपिलवस्तु सिस्वा पञ्चायत की रहने बाली ७२ वषर्ीया विधवा मखना गडÞरिया को नागरिकता के हक प्राप्ति के लिए, नीचली अदालत में याचिका दायर करनी पडÞती है । नेपाल केे अन्तरिम संविधान के धारा ८ -६) के आधार में वैवाहिक नागरिकता लेने का हक बनता है मखना का, परंतु उसके साथ भी भेदभाव की नीति अपनायी गई है ।
अगर नागरिकता वितरण के प्रावधान में इसी तरह संविधान की पीडÞा और बढÞती ही जाएगी । वि.सं २०७०, बैशाख १० गते महिला, कानुन तथा विकास मञ्च द्वारा आयोजित एक प्रतिवेदन र्सार्वजनिक कार्यक्रम में नेपाल के उपप्रधान तथा गृहमन्त्री बामदेव गौतम का बयान ‘नेपालमे ०.०० प्रतिशत नागरिकता की समस्या है’ ने तो स्टेटलेस के घाव पर नमक ही छिडÞक दिया । यही वक्त है संविधान सभा मंे नागरिकता की समस्यायांे के ऊपर पुनः विचार किया जाना चाहिए । नेपाल के और खास कर तर्राई मधेश की इस समस्या को जडÞ से उखाडÞ फेकने की आवश्यकता और अस्पष्ट वाक्यांशो को सुलझी भाषा मंे लिखने की आवश्यकता आ पडÞी है । और, अगर वास्तव में देखा जाए तो नागरिकता वितरण के प्रावधानांे को गृह मन्त्रालय से हटाकर स्थानीय विकास मन्त्रालय के तहत रखनी चाहिए, क्योंकि नागरिकता का वितरण स्थानीय स्तर पर किया जाता है । गृहमन्त्रालय के हाथों में सारा पावर होता है जब कि उनको जिलांे के पञ्चायतों के बारे में स्पष्ट जानकारी नहीं होती

