संस्कृति का हृदय : डा. राशि सिन्हा
संस्कृति का हृदय
मानवानुभूति की कल्पना में
जीवन-दृष्टि से जनित
सरित-प्रवाह सी गतिशील
संस्कृति
संपूर्ण संकुचित सीमाओं को तोड़
सहज , स्वाभाविक स्वतंत्र चलायमान
संस्कृति
संपूर्ण समुदाय के मानसिक क्षितिज
मूल्य-व्यवस्था को विकसित कर
मानवीय एकात्मकता का अनुभव कराती
संस्कृति
तेरे व्यावहारिक पारिस्थितिक ढांचे
अस्तित्व के पारंपरिक मानदंड
में यह विलोपन कैसा !
संस्कृति, कुछ तो बोल
बोल न !
तेरे विस्तृत फलक जिस पर
देवत्व और मनुष्यत्व दोनों
सात्विक रूप से विचरते थे
तेरी पाठशाला में जहां सभी को
उल्लास में संयम, विपत्ति में धीरज
निर्धारण के पाठ मिलते थे
आज तेरी स्थिर -अस्तित्व- शाश्वतता
जीवंत तत्वों की संतुलित सृजन-क्षमता
तेरी समृद्ध- सशक्त दीवारों पर
यह दरकती लकीरें कैसी
संस्कृति कुछ तो बोल
बोल न !
कहीं तेरे अस्तित्व में सन्निहित
विचारधाराओं,आधारभूत मूल्यों दृष्टिकोणों को
तेरे बहुआयामी विकसित घटकों को
अस्तगमनों के साथ विकसित विरासतों को
व्यवस्थित आध्यात्मवादी-समन्वयवादी स्वरुपों को
अन्य सभ्यता के आयामों ने
उनमें सन्निहित भौतिकवादी -व्याख्यानों ने
अध्यारोपण की सेंध की चेष्टा तो नहीं की
कहीं तू
अस्तित्व -विलोपन के भय से
इतनी विचलित और व्यथित तो नहीं
कहीं तू
निज खंडन -विखंडन के भय से
इतनी उद्वेलित और क्लेशित तो नहीं
संस्कृति,कुछ तो बोल
बोल न !
कहीं इसीलिए तो तेरा हृदय
संत्रस्त ,वेदना ग्रस्त ,व्याकुल , पीड़ित
त्रस्त,शोक-संतप्त ,आकुल उत्पीड़ित
तो नहीं…

नवादा,


