Sun. May 19th, 2024

हिंदी के प्रति प्रशासको का रवैया सदैव ही भेदभावपूर्ण रहा है : शिवचंद्र चौधरी

प्रारम्भिक काल से “हिमालिनी” से नाता रहा है….पाठक के रूप में,लेखक के रूप में, टिप्पणीकार के रूप में,समीक्षक के रूप में और कभी कभी कम्प्युटर मैन के पास बैठकर अशुद्धि को शुद्ध करने जैसे कसरत को लेकर। कई अवसर ऐसे आए जब हिमालिनी के घर में रात्रि बास करने, बढिया भोजन,चाय नाश्ता करने का भी सुअवसर प्राप्त हुआ……….हिमालिनी प्रबंधन के कुछ पदधारको से नजदीकी के कारण ऐसे क्षण आए।
विगत २६ वर्षों के सफर का कभी दूर से तो कभी करीब से , कभी गाहे बगाहे हिमालिनी पर निगाहें टिकती रही है। बहरहाल के नेपाल में जहाँ के आधी आबादी को द्वितीय श्रेणी (2nd class citizen) का दर्जा प्राप्त है और विश्व की सर्वाधिक बोलेजाने वाली नम्बर एक भाषा हिंदी को जहाँ अपनत्व प्राप्त नहीं है, हालाँकि नेपाल में सर्वाधिक बोलीजानेवाली/  समझी जाने वाली भाषा भी हिन्दी ही है परंतु उसके प्रति शासको/प्रशासको का रवैया सदैव ही भेदभावपूर्ण रहा है। फलस्वरूप आजतक उसे भारत में नेपाली को संविधान की ८ विं अनुसूची में प्राप्त संवैधानिक मान्यता की तरह दर्जा भी प्राप्त नहीं है । ईन तमाम प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद हिमालिनी निरन्तर अपने पथ पर अनवरत अग्रसर है। योग्य सक्षम सम्पादकत्व में निर्बाध रूप से जनहित में इसकी यात्रा आगे बढ़ती रहे…. शुभकामना….!!

शिवचन्द्र चौधरी, मलंगवा ।

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