गीतकार डा.डी.आर उपाध्याय लिखित उपन्यास ‘मझधार’ का लोकार्पण
नेपालगञ्ज/(बाँके) पवन जायसवाल । विश्व कीर्तिमानी गीतकार डा.डी.आर उपाध्याय की उपन्यास ‘मझधार’ की लोकार्पण किया गया है ।
तनहुँ जिला के विमलनगर में अवस्थित शिद्ध गुफा में सोमवार को एक कार्यक्रम के बीच कीर्तिमानी लेखक तथा उपन्यसाकार डा.डी. आर.उपाध्याय, कीर्तिमानी गायक तथा संगीतकार सागर अधिकारी ‘शरद’, गायिका काव्य आचार्य उपन्यास के सम्पादक कृष्ण भुसाल, निर्देशक सुभाष प्रधान, युथ क्रियशन के अध्यक्ष रमेश थापा, यमबहादुर थापा लगायत लोगों की आतिथ्यता में वह कृति लोकार्पण किया गया ।
नेपाल की बडी कहा गया गुफा रहा है यह ४ सौ ३७ मीटर लम्बी और ५० मीटर उचाई में रही है । यह गुफा एसिया की दूसरी बडी गुफा रही है । वह कार्यक्रम में अतिथियों ने डा. डी. आर. उपाध्याय का नई उपन्यास के निकाल्ने के लिये बधाई तथा शुभकामना दिये थे । उपन्यास शिखा बुक्स ने बाजार में लायी है ।
वह अवसर पर कीर्तिमानी गीतकार तथा उपन्यासकार डा. डी आर उपाध्याय ने गुफा भीतर ‘जीवन जगत’, ‘तिलिचो ताल प्रणयनीरले लबालब’, ‘पवित्रा सिर्जना’ और ‘स्वच्छ हराभरा वातावरण’ जैसी चार कविता सुनाये थे । एक गजल ‘मनको चाह’ लेखकर तत्काल सुनाया था । इसी तरह डी आर उपाध्याय की गीतिएल्बम ‘आवृत’ भी विमोचन किया गया ।
गुफा के भीतर कीर्तिमानी डा. डीआर उपाध्याय की गीत ‘चादनी चादनी’ गायका सागर अधिकारी ‘शरद’ और गायिका काव्य आचार्य ने लाइभ प्रस्तुत किया था । इसी तरह डा.डी आर उपाध्याय की गीत ‘राखिरहु आखाँमा हरपल’ यह गुफा में छायांकन किया गया है । सुभाष प्रधान की निर्देशन रही भिडियो में रमेश थापा ‘टिकाध्वज’ और मञ्जु खडका की अभिनय रही है । भिडियो की छायांकन विनोद तामाङ ने किया है ।
डा. डी आर उपाध्याय की अनौठी कार्य को यहाँ आने वाले पर्यटकों ने रोचक ढंग से देख रहे थे । काठमाडौं की चावहिल स्कूल के विद्यार्थियों ने वह कार्य को देखे थे । यह गुफा में दैनिक सैकडौं पयर्टक आ रहे हैं ।
पृथ्वी राजमार्ग की बिमलनगर जगह से आधा घण्टा की पैदल यात्रा करने के बाद यह गुफा पहुँच सकते हैं । यह नेपाल की मात्र नहोकर एसिया की बडी गुफा माना जाता है । पृथ्वी राजमार्ग की तनहुँ जिला की डुम्रे से दो किलो मीटर पूर्व विमलनगर में अवस्थित है सिद्ध गुफा समुन्द्री सतह से ६ सौ मीटर उपर विमलनगर की ठीक दक्षिण भाग में पडती है ।
यह माना जाता है कि यह गुफा में एक सन्त ‘सिद्ध बाबा’ ने ज्ञान प्राप्त किया था । काला और डर लगने वाली है तो भी यहे गुफा की चर्चा देश विदेश में रही है । इस जगह पहँचने वाले जो कोई भी गुफा से चकित हो जाते हैं । गुफा की प्रवेशद्वार में पहँचते ही भीतर आ रही ठण्डी हावा ने पैदल यात्रा की सब दुःख भुला देती है । विशाल पहाड कीे बीच में हरियाली वन जंगल से घेरा हुआ प्राचीन तपोभूमि जैसी अनुभव करने वाली जगह है यह जगह में पहँचने के बाद वो लोगों की मन आर्कषित हो जाती है । वि.सं. २०४४ चैत १३ गते शनिवार अर्थात् सन् १९८८ मार्च २६ में स्थानीय चन्द्रबहादुर सम्लिङ थापामगर, दुर्गाबहादुर थापामगर, नरबहादुर थापामगर, नारायण बहादुर कुमाल और तत्कालिन नोट्रेडेम उच्च माध्यमिक विद्यालय बन्दीपुर के शिक्षक भारतीय नागरिक वारेन्ट क्वाड्रस समेत पाँच लोगों की समूहद्वारा पहली बार यह गुफा पत्ता लगाया था ।
जिदी खोला किनार की घन जंगल क्षेत्र में रही यह गुफा के अन्दर धान कूटनेवाली ओखली, चकिया, गाय की थन, हाथी की सूँड शिवलिंग और विभिन्न देवीदेवताओं की आकृति स्पष्ट दिखाई पडती है ।


