मीडि़या में बाल केन्द्रीत सामाग्री बनाने पर जोर
काठमांडू, फरवरी २९ । बालश्रम तथा बाल यौन दुव्र्यहार संबंधी विषय को लेकर ‘समाज सेवा तथा मानव अधिकार में महिला और बालबालिका (सिविस)’ ने काठमांडू में एक विचार गोष्ठी की आयोजना की है । संचारकर्मियों के साथ आयोजित विचार विर्मश के दौरान वक्ताओं ने मीडि़या में बाल केन्द्रीत सामाग्री बनाने पर जोर दिया है । साथ में बाल श्रम, उनके ऊपर होनेवाला यौन दुव्र्यहार संबंधी तथ्यों को लेकर अपनी–अपनी विचार भी व्यक्त की गई ।
सञ्चार जगत में रह कर बालबालिका तथा महिला संबंधी विषयों को लेकर रिपोर्टिङ करनेवाले संचारकर्मियों के साथ आयोजित विचार–विमर्श में सञ्चारकर्मी सीता शर्मा और विनय गुरागाई ने संचार माध्यम, सूचना प्रविधि, सामाजिक संजाल आदि का प्रयोग और बालबालिकाओं में उसका प्रभाव, बाल श्रम तथा यौन दुव्र्यहार जैसे विषयों में अपना–अपना अध्ययन रिपोर्ट प्रस्तुत किया । अभिवक्ता मधुसुदन न्यौपाने ने प्रस्तुत विषय और उसकी कानूनी पक्ष को लेकर बहस किया ।
गोरखापत्र दैनिक में दो दशक से कार्यरत संचारकर्मी सीता शर्मा के अनुसार आज कूल जनसंख्या की ३३ प्रतिशत बालबालिकाओं जनसंख्या है, लेकिन बालिकाओं की जन्मदर में कमी आ रही है । शर्मा ने कहा कि गर्भपतन को कानून मान्यता मिलने के बाद जन्मदर संबंधी तथ्यांकों में गड़बढ़ी हुई है । उन्होंने कहा कि १०० बच्चों में से ५१ बच्ची होती थी, लेकिन आज सिर्फ ४७ बच्ची होती है । उनका मानना है कि यह शुभ संकेत नहीं ।
पत्रकार शर्मा के अनुसार सरकारी तथ्यांक में बाल मृत्युदर, शिशु मृत्युदर शैक्षिक वातावरण में काफी सुधार आया है । उन्होंने आगे कहा– ‘५ से १७ साल उम्र समूह के ३४.४ प्रतिशत बालबालिका बाल श्रमिक कें रुप में थे, लेकिन पिछले तथ्यांक अनुसार उसमें काफी सुधार आया है, तब भी आज के दिन १५.३ प्रतिशत बालबालिका बाल श्रमिकों के रुप में हैं । ऐसे बाल श्रमिक मधेश प्रदेश और कर्णाली प्रदेश में अधिक हैं । शर्मा ने कहा कि स्थानीय सरकार बाल श्रम के विरुद्ध काम तो कर रही है, लेकिन ज्यादा प्रभावकारी नहीं हो पाया है ।’
पत्रकार शर्मा ने यह भी कहा कि मोबाइल, ल्यापट‘प जैसै प्रविधिजन्य सामाग्रियों का प्रयोग गांव–गांव तक बढ़ती जा रही है, जिसके चलते कम उम्र में ही शादी करनेवाले बच्चे भी दिखाई दे रहे हैं । पुलिस रिपोर्ट के अनुसार १८ साल से कम उम्र में शादी करनेवालों में से अधिकांश प्रविधि और सामाजिक संजालो से प्रभावित हैं । तथ्यांक अनुसार कम उम्र में शादी करनेवाले कूल बच्चों में से ७५ प्रतिशत अभिभावकों की सहमति में ही शादी करते हैं ।
पत्रकार शर्मा का मानना है कि मूलधार के मीडिया और उनकी संचार सामाग्रियों के प्रति बालबालिका आकर्षित नहीं हैं । उन्होंने कहा कि दुर्घटनाजन्य घटना तथा अपराधजन्य घटना में ही बालबालिका मीडिया में आते हैं, लेकिन बालबालिकाओं की शिक्षा और आवश्यकता संबंधी विषयों को लेकर कोई भी अनुसंधानमूलक सामाग्री तैयार नहीं होती है । बालबालिका केन्द्रीत खोज पत्रकारिता पर जोर देते हुए उन्होंने कहा– ‘अधिकांश संचार माध्यमों में बालबालिकाओं को आकर्षित करनेवाला योजना और विषयवस्तु नहीं है ।’ उन्होंने कहा कि कोभिड के बाद तो बालबालिका को लक्षित कर प्रकाशित होनेवाला कई सामाग्री बंद हो चुका है । उन्होंने यह भी कहा कि पिछली बार बालबालिका डिजिटल मीडिया के प्रति ज्यादा आकर्षित होते जा रहे हैं, जहां वे अनजाने में अपराधजन्य गतिविधि में भी फंसते जा रहे हैं । उन्होंने कहा– ‘ऑनलाइन में होनेवाला बाल यौन दुव्र्यहार की घटना बढ़ती जा रही है । नग्न अडियो और भीडियो जैसे सामाग्रियों का प्रयोग भी दिखने को मिलता है ।’ उनका मानना है कि बालबालिकाओं को ऐसी अपराधजन्य कर्मों में फसानेवाला उनके ही अपनेजन होते हैं । ऑनलाइन गेम खेलनेवाले बच्चे ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं ।
संचारविज्ञ विनय गुरागाई का मानना है कि रेडियो और टेलिविजन के प्रयोगकर्ताओं में कमी आ रही है, ६३ प्रतिशत लोगों में इन्टरनेट का ज्यादा प्रभाव है और ८६ प्रतिशत बालबालिका मोबाइल की पहुँच में हैं । जिसके चलते अधिकांश बालबालिकाओं की पहुँच में फेशबुक, इस्टाग्राम, टिकटॉक जैसे आधुनिक मीडिया है और वे उसीसे प्रभावित होते जा रहे हैं । उन्होंने आगे कहा– ‘लेकिन बालबालिकाओं को केन्द्रीत कर पेज बनानेवाले कोई भी मीडिया नहीं है । उन्होंने यह भी कहा कि आधुनिक मीडिया के तुलना में पत्रपत्रिका, रेडियो, टेलिविजन जैसे परम्परागत मीडिया के प्रति विश्वसनीयता ज्यादा है, लेकिन बालबालिका आधुनिक मीडिया से ज्यादा प्रभावित हैं ।
गुरागाई ने यह भी कहा कि मोबाइल तथा ल्यापटप जैसे प्रविधि से बालबालिका प्रभावित होना गलत नहीं है, लेकिन उसका सही सदुपयोग होना चाहिए । उनका मानना है कि आधुनिक प्रविधि से बच्चे बहुत कुछ सिख सकते हैं । उन्होंने कहा– ‘कई लोगों का मानना है कि मोबाइल के कारण बच्चे बिगड़ गए हैं । लेकिन ऐसा नहीं है । कई घरों में उनके बच्चे ही अभिभावकों मोबाइल चलाने की तरिका सिखाते हैं, बैंकिङ एप चलाना सिखाते हैं ।’ गुरागाईका मानना है कि बच्चों को प्रविधि और इन्टरनेट का सही सदुपयोग और सुरक्षित प्रयोग सिखाना जरुरी है । उनका यह भी मानना है कि आज प्रविधिजन्य प्रदुषण अधिक है, उससे बच्चों को सुरक्षित रखने के लिए भी परम्परागत और आधुनिक मीडिया को बाल केन्द्रीय समाग्री बनाने की जरुरत है ।
अधिवक्ता मधुसुदन न्यौपाने का मानना है कि बालबालिका संबंधी मुद्दा को लेकर सभी तह के अदालत संवेदनशील है । उन्होंने यह भी कहा कि वर्तमान संविधान के अनुसार बालबालिका अधिकार से वंचित नहीं हैं । अधिवक्ता न्यौपाने ने कहा– ‘बालबालिका संबंधी ऐन–२०७५ बालबालिकाओं को अधिकार ही नहीं, उनकी जिम्मेवारी भी सिखाती है । इसीलिए कानून की दृष्टिकोण से बालबालिका पीडित नहीं है । बस ! कानुन को व्यवहारिक रुप देना होगा ।’ उन्होनेंने कहा कि इसके लिए संचार माध्यम और सिविस जैसे सामाजिक अभियान्ताओं की भूमिका महत्वपूर्ण होती है ।
रेडियो नेपाल की पत्रकार गीता चिमोरिया ने कहा कि नेपाल पुलिस की साइबर व्युरो से संचालित सामाजिक संजाल बालबालिकाओं के लिए उपयोगी है, जहां से बच्चे अधिक सिख सकते हैं । उनका यह भी कहना है कि कई जगह प्रविधि प्रयोग संबंधी ज्ञान ना होने के कारण भी प्रविधि संबंधी अपराध हुआ है, इसके विरुद्ध आवश्यक तालीम संचालन होना चाहिए । पत्रकार पुकार तिमिल्सिना कहते हैं कि बाल अपराध में पीड़क जो होते हैं, उनको सुधार ने के लिए भी तालीम की व्यवस्था होनी चाहिए, साथ में बाल श्रम तथा यौन दुव्र्यहार विरुद्ध जितने भी अभियान है, उसकी उपलब्धी संबंधी तथ्यांक भी तैयार करनी होगी । पत्रकार सागर बोहरा ने कहा– ‘समाचार आती है कि नौ साल के उम्रवाले बच्चे ने भी आत्महत्या की । लेकिन इसके पीछे का कारण क्या है ? इस विषय को लेकर न ता पुलिस प्रशासन अनुसन्धान करती है, ना ही मीडिया वाले ! इस तरह की सम्वेदनशील घटना को लेकर अनुन्धान की जरुर है ।’
कार्यक्रम के प्रमुख अतिथि तथा प्रेस काउन्सिल नेपाल के अध्यक्ष दीपक पाण्डे ने कहा कि बाल श्रम संबंधी मुद्दों के लेकर हमारे यहां गलत फहमी भी है । उन्होंने कहा– ‘अगर कोई व्यक्ति आर्थिक रुप में कमजोर बच्चों को लेकर कहता है कि वे उसे मास्टर डिग्री तक पढ़ा देता है, बदले में उनके घर में काम करना होगा । क्या यह गलत है ? गरब बच्चों की जिम्मेदारी राज्य नहीं लेती, उसके पास कोई रोजगारी भी नहीं है तो क्या बच्चे अपराध की ओर आकर्षित नहीं होंगे ? इस विषय को लेकर भी बहस होना जरुरी है ।’ उनका माना है कि बाल श्रम को लेकर आज हमारे यहां जो कानून है, वह व्यवहारिक रुप में कितना प्रभावकारी है, इसमें भी बहस होना जरुरी है ।
कार्यक्रम को सम्बोधन करते हुए सिविस के अध्यक्ष विमला ज्ञावली ने कहा कि एक समय ऐसा भी था, जहां घर में काम करनेवाले बाल श्रमिकों के संबंध में पूछताछ करनेवाले के ऊपर कुत्ता छोड़ा दिया जाता था । उन्होंने आगे कहा– ‘लेकिन आज ऐसी स्थिति नहीं है, परिस्थिति में काफी बदलाव आ चुका है और काठमांडू के घर में बालश्रमिक मिलना मुश्कील है ।’ उन्होंने कहा कि आज तो बाल श्रम संबंधी विषय को कई तरह से वर्गीकृत की गई है । उन्होंने कहा कि राज्य को सहयोग करने की उद्देश्य से ही सिविस ने बाल श्रम के विरुद्ध अभियान शुरु की थी । उन्होंने आगे कहा– ‘हमारी अभियान, मीडिया का प्रभाव, लोगों की जागरुकता से आज बाल श्रम को लेकर लोग संवेदनशील हैं, उनके पक्ष में कई कानून बन चुका है ।’ अध्यक्ष ज्ञावली ने यह भी कहा कि बाल श्रम और उनकी काम और जिम्मेदारी अलग विषय है । उनका मानना है कि कुछ लोग बाल श्रम और बच्चों की जिम्मेदारी को लेकर भ्रमित भी है । उन्होंने कहा– बाल श्रम और उनके कमों में में जो अन्तर है, उसको समझना होगा । बच्चों को सामाजीकरण करने के लिए भी उनके लिए कुछ जिम्मेदारी होनी चाहिए ।’
कार्यक्रम संचालक तथा सिविस के परियोजना संयोजक उमंग मैनाली ने कहा कि सिविस बाल श्रम विरुद्ध हरदम क्रियाशील है । उनके अनुसार रात्रिकालिन बाल श्रम संबंधी विषय को लेकरसंस्था की ओर से अध्ययन हो रहा है ।

