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जनकपुरधाम मे हुआ वेदान्त विमर्श !

 
  • शनिवार 2024-05-25 को जनकपुरधाम स्थित रौनियार सेवा समिति में “वेदांत विमर्श:” कार्यक्रम का सफलतापूर्वक आयोजन किया गया। सनातन हिंदू धर्म एवं संस्कृति के मौलिक विश्लेषण तथा वेदांत पर आध्यात्मिक संवाद के लिए काठमांडू से श्री रामकृष्ण आश्रम नेपाल के प्रमुख “स्वामी एकार्थानंद” जी,  विहार,  चोरौत,  अमनपुर से मानस मर्मज्ञ “आचार्य श्री भुवनेश्वर चौधरी जी” और भारत के उत्तर प्रदेश, बलिया से पधारे दार्शनिक “डॉ. विद्यासागर उपाध्याय जी” मुख्य वक्ता के रूप में मंचासीन थे।

    सामाजिक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक विकास हेतु सदैव तत्पर राजनारायण प्रतिष्ठान,  जनकपुरधाम, श्री रामकृष्ण विवेकानन्द आश्रम, बर्दीबास, श्री रौनियार सेवा समिति,  जनकपुरधाम की संयुक्त योजना से विद्वानों के बीच जनकपुरधाम की गरिमा एवं महिमा को वर्तमान युग में भी कायम रखते हुए; जैसे राजर्षि जनक और अष्टावक्र, गार्गी और याज्ञवल्क्य तथा बंदी और कहोर जैसों के बीच पौराणिक काल में शास्त्रार्थ हुआ करता था; को आज इस कार्यक्रम में उपस्थित विद्वानों ने दिव्य संवाद का प्रतिबिम्ब बताया।

    अजय कुमार झा जी की कुशल संचालन एवं प्रबंधन के कारण कार्यक्रम मे एक-एक सेकंड को ध्यान रखते हुए बहुत ही सुखद एवं सहज ढंग से  संचालन  किया गया। 100 से अधिक विशेषज्ञों की मौजूदगी में सुबह  8:30 बजे से शुरू हुए संवाद शैली के कार्यक्रम में सवाल-जवाब का दौर दोपहर 3 बजे तक अविराम प्रवाहित होता रहा। उपस्थिति की तीव्रता और उपस्थित विद्वानों के हर्षित और उत्साहित चेहरों ने कार्यक्रम की सर्वोच्च सफलता और उपलब्धि को प्रकाशित कर रहा था।

    तीनों विद्वानों की उपस्थिति में आयोजित इस कार्यक्रम की अध्यक्षता श्री चंद्रेश्वर रौनियार जी ने की, जबकि श्री तेजा प्रसाद अधिकारी जी एवं श्री रामप्रताप गुप्ता विशिष्ट अतिथि थे। उपस्थित गणमान्य व्यक्तियों में धनुषा, महोत्तरी, सरलाही और रौतहट के पुरुषों और महिलाओं सहित पत्रकारों,  लेखकों, कलाकारों और शिक्षकों का एक दिव्य जमावड़ा आसानी से देखा जा सकता था। रौतहट निवासी ख्याति प्राप्त साहित्यकार श्री संजय साह मित्र के द्वारा बज्जिका भाषा में ‘ बुद्ध ‘ नाम से बुद्ध के जीवनी पर रचित पहला महाकाव्य का लोकार्पण भी किया गया। हालाँकि विभिन्न भाषाएँ बोलने वाले लोगों की घनी उपस्थिति के कारण इसे आसान बनाने के लिए कार्यक्रम नेपाली, हिंदी, मैथिली, बज्जिका आदि में आयोजित किया गया था, लेकिन नेपाली भाषी आचार्य ने सहज तरीके से हिंदी में सवालों के जवाब देना शुरू कर दिया। सामूहिक सहजता के मनोविज्ञान और भावनाओं को व्यक्त करने की प्रभावशीलता को निरन्तरता देने के लिए ऐसा किया गया।

    जनकपुरधाम के महत्ता को बरकरार रखते हुए स्वामी एकार्थानन्द जी को अष्टावक्र सम्मान से विभूषित किया गया। वहीं  दार्शनिक डा विद्या सागर उपाध्याय जी को याज्ञवल्क्य मेधा सम्मान से सम्मानित किया गया। तथा आचार्य भुवनेश्वर चौधरी जी को जानकी सम्मान से विभूषित किया गया।

    ऐसी अनूठी उपलब्धि हासिल करने वाला आज का कार्यक्रम जनकपुरधाम की गरिमा के लिए अधिक प्रभावी एवं विश्वसनीय साबित हुआ। वेद पुराण और उपनिषद पुरातन हिन्दू के सनातनी पवित्र ग्रन्थ हैं, जिनकी चर्चा और परिचर्चा हर काल और खंड में बराबर की जाती रही है। स्वामी एकार्थानन्द, दार्शनिक डा विद्या सागर उपाध्याय तथा आचार्य भुवनेश्वर चौधरी जी के मुखारविंद से उदभाषित निम्न पंक्तियों से कार्यक्रम के आंशिक सारांश विवरण के रूपमे उल्लेख किया जा रहा है।

    ·        वेद पुराण और उपनिषद में से वेदों ( Vedas ) को संहिता भी कहा जाता है।

    ·        श्रुति साहित्य में वेदों का प्रथम स्थान है। वेद शब्द ‘विद’ घातु से बना है, जिसका अर्थ है ‘जानना’। वेदों से आर्यों के जीवन तथा दर्शन का पता चलता है।

    ·        वेदों की संख्या चार है। ये हैं- ऋग्वेद, यजुर्वेद, समावेद और अर्थवेद।

    ·        वेदों के संकलन का श्रेय महर्षि कृष्ण द्वैपायन वेद-व्यास को है।

    ·        ऋग्वेद में 10 मण्डलों में विभाजित है। इसमें देवताओं की स्तुति में 1028 श्लोक हैं। जिसमें 11 बालखिल्य श्लोक हैं।10462 मंत्रों का संकलन है। पहला ताथा 10वां मंडल क्षेपक माना जाता है। नौवें मंडल में सोम की चर्चा है। 33 देवताओं का उल्लेख है। उपनिषदों की कुल संख्या 108 है।
    वेदांग की संख्या 6 है। महापुराणों की संख्या 18 है। धर्म शब्द का प्रयोग विधि(नियम) के रूप में किया गया है। ऋग्वेद की पांच शाखाएं हैं- वाष्कल, शाकल, आश्वलायन, शंखायन और माण्डुक्य

    ·        यजुर्वेद: यजुर्वेद में अनुष्ठानों तथा कर्मकांडों में प्रयुक्त होने वाले श्लोकों तथा मंत्रों का संग्रह है।
    कृष्ण यजुर्वेद गद्य तथा शुक्ल यजुर्वेद पद्य में रचित है। यजुर्वेद में राजसूय, वाजपेय तथा अश्वमेघ यज्ञ की चर्चा है। यजुर्वेद में 40 मंडल तथा 2000 ऋचाएं(मंत्र) है।

    ·        सामवेद: सामवेद में अधिकांश श्लोक तथा मंत्र ऋग्वेद से लिए गए हैं।  सामवेद का संबंद संगीत से है। सामवेद में मंत्रों की संख्या 1810 है।

    ·        अथर्ववेद: अथर्ववेद की ‘रचना’ अर्थवा ऋषि ने की थी। अथर्ववेद के अधिकांश मंत्रों का संबंध तंत्र-मंत्र या जादू-टोने से है। रोग निवारण की औषधियों की चर्चा भी इसमें मिलती है। अथर्ववेद के मंत्रों को भारतीय विज्ञान का आधार भी माना जाता है।

    ·        उपनिषद: सूर्य का वर्णन एक ब्राह्मण विद्यार्थी के रूप में किया गया है। उपवेद, वेदों के परिशिष्ट हैं जिनके जरिए वेद की तकनीकी बातों की स्पष्टता मिलती है। वेद पुराण और उपनिषद में से वेदों की क्लिष्टता को कम करने के लिए वेदांगों की रचना की गई। शिक्षा की सबसे प्रामाणिक रचना प्रातिशाख्य सूत्र है। व्याकरण की सबसे पहल तथा व्यापक रचना पाणिनी की अष्टाध्यायी है। ऋषियों द्वारा जंगलों में रचित ग्रंथों को आरण्यक कहा जाता है।
    वेद पुराण और उपनिषद में से वेदों ( Vedas ) की दार्शनिक व्याख्या के लिए उपनिषदों की रचना की गई। उपनिषदों ( Upanishads ) को वेदांत भी कहा जाता है। वेद पुराण और उपनिषद में से उपनिषद का शाब्दिक अर्थ है एकान्त में प्राप्त ज्ञान। यम तथा नचिकेता के बीच प्रसिद्ध संवाद की कथा कठोपनिषद् में वर्णित है। श्वेतकेतु एवं उसके पिता का संवाद छान्दोग्योपनिषद में वर्णित है।भारत का सूत्र वाक्य सत्यमेव जयते मुण्डकोपनिषद् से लिया गया है।

    ·        तुलसीदास के हस्तलिखित रामचरित्र मानस का सिर्फ अयोध्या कांड के पांडुलिपि ही उपलब्ध है। अतः क्षेपण की संभावनाओं को नकारा नहीं जा सकता।

    ·        ज्ञान सदा से उपलब्ध है। वेद का अर्थ सिर्फ पुस्तकाकार ग्रंथ ही नहीं है। विशाल ब्रहमाँड़ में सन्निहित ज्ञान भी है। आदि आदि अनंत जानकारियाँ और सूक्ष्मतम विदुओं का विश्लेषण किया गया। श्रोताओं की ओर से अधिकांश प्रश्न मानस और राम सीता के जीवन तथा जातीय भेदभाव के पोशाक श्लोकों के संदर्भ में देखा गया।

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