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जसपा अधिवेशन…तानाशाही का नमूना : कंचना झा

 

 

कंचना झा, काठमांडू, असार १ – जनता समाजवादी पार्टी नेपाल का पहला महाधिवेशन समाप्त तो हो गया है लेकिन अपनी समाप्ति के साथ ही पार्टी में एक नाराजगी छोड़ गया है । पार्टी के बहुत से लोग कुछ निर्णय से संतुष्ट नहीं है  कुछ खुलकर तो कुछ दबी जुबान में ही सही विरोध भी जता रहे हैं । एकबार फिर यादव की तानाशाही को लेकर चर्चा है पार्टी में ।
वैसे तो अध्यक्ष यपेन्द्र यादव निर्विरोध एक बार फिर अध्यक्ष चुने गए हैं और बाकी पदाधिकारियों तथा सदस्यों के चयन की जिम्मेदारी अध्यक्ष उपेन्द्र यादव को सौंप दिया गया है ।
जसपा नेपाल की स्थापना के १६ साल के बाद यह पहला महाधिवेशन बहुत ही तामझाम के साथ शुरु हुआ । देश विदेश के पार्टी अध्यक्ष तथा अन्य लोगों को निमंत्रण दिया गया था इसमें शामिल होने के लिए । महधिवेशन जानकी की नगरी जनकपुर में पूरे तामझाम के साथ की गई । वैसे महाधिवेशन की तारीख तीन चार महीने पहले ही तय कर ली गई थी ।
महाधिवेशन की तारीख तय होने के बावजूद जसपा नेपाल में फूट भी पड़ गई । अशोक राई सात सदस्यों के साथ जसपा नेपाल से किनारा करते हुए सरकार में शामिल हो गए ।
खैर पार्टी स्थापना के १६ वर्ष बाद जेठ २८ गते को महाधिवेशन का उद्घाटन किया गया । इस महाधिवेशन से पदाधिकारी सहित २०१ सदस्यीय केन्द्रीय कार्य समिति चयन करने की कार्यसूचि थी । अध्यक्ष का चुनाव तो बिना किसी अवरोध के हो गया लेकिन बाकी पदों पर एक से ज्यादा लोगों ने अपनी उम्मीदवारी दी ।
गुरुवार को मतदान तालिका सार्वजनिक की गई । उम्मीदवारों ने मत को गिनना शुरु भी किया । लेकिन इसी बीच गुरुवार की ही सुबह ८ बजे उपेन्द्र यादव ने निर्वतमान कार्यकारिणी समिति की बैठक रख ली । उपेन्द्र यादव के साथ ही इस बैठक में राजकिशोर यादव, लालबाबु राउत, रकम चेम्जोङ, शिवलाल थापा, मृगेन्द्र सिंह यादव, गोबिन्द चौधरी, मनिष सुमन, विजयकुमार यादव शामिल हुए और यह बैठक लगभग तीन बजे तक चली ।
इस बैठक से यह अनपेक्षित निर्णय हुआ कि बाकी पदाधिकारी और केन्द्रीय समिति बनाने का अधिकार उपेन्द्र यादव की दी जाएं । मधेश प्रदेश के प्रमुख सचेतक नेता रामअशिष यादव ने कहा कि – मतदान की प्रक्रिया से नेता व्यवस्थापन में कुछ ज्यादा ही समस्या दिख रही थी जिस कारण अध्यक्ष को ही पदाधिकारी चयन करने का अधिकार देने का सर्वसहमत निर्णय किया गया है । लेकिन जैसे ही इस निर्णय का पता प्रतिनिधियों को लगा कि यह जिम्मेदारी अध्यक्ष यादव को दिया गया है तो सभी प्रतिनिधि नाराज हो गए और आक्रोशित होते हुए नारेबाजी करने लगे । कार्यकर्ताओं ने नारेबाजी करते हुए कहा कि सम्मेलन में प्रतिनिधियों का नेता चुनने का लोकतांत्रिक अधिकार छीन लिया गया है ।
इससे भी ज्यादा कार्यकर्ताओं तब बुरा लगा जब बाकी पदाधिकारियों और नेताओं के चयन का अधिकारी स्वयं लेने के बाद उपेन्द्र यादव ने महाधिवेशन की प्रक्रिया को ही स्थगित कर दिया । उनके इस कारनामें से जसपा के कार्यकर्ताओं में बहुत ज्यादा नााराजगी दिखी । एक असंतुष्ट नेता ने खुलकर कहा कि ‘अध्यक्ष के एकमात्र निर्णय से ही यदि नया नेतृत्व का चयन होना था तो इतना नाटक और तामझाम करना जरुरी था क्या ? अपनी नाराजगी व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा कि – अगर यही सब करना था तो इतनी फिजुल खर्ची क्यों ? जो जिम्मेदारी उन्होंने महाधिवेशन करके की, वो तो पहले भी कर सकते थे । ये झूठमूठ का दिखावा क्यों ? उन्होंने बताया कि महाधिवेशन से नेता चुने जाने का जो अधिकार था उसे छीन लिया गया है इसका एक कारण महाधिवेशन मतदान से जो नतीजे आने वाले थे । उससे अध्यक्ष डर गए हैं । नेता ने बताया कि ‘उम्मीदवारी दर्ता की अवस्था को देखते हुए कि पार्टी को जिन लोगों की जरुरत है उनमें से बहुत से छुट जाते । नेता कहते हैं, ’’जब खुली प्रतियोगिता होती है तो सम्मेलन स्थगित करना पड़ता है क्योंकि गैर–आरक्षित गैर–सदस्य जीत नहीं पाते । ’’
उनके अनुसार महाधिवेशन में १३ सौ में से ७ सौ प्रतिनिधि यादव समुदाय से हैं । ‘प्रतिनिधि में यादवों का बहुमत है और अधिकांश पद में यादव उम्मीदवार होने के कारण नतिजा के बारे में पूर्वानुमान करना सहज था ।’ ‘ऐसे समय में मतदान करने का मतलब है अन्य समुदाय के नेता किनारे हो जाते जिसकी प्रबल सम्भावना थी । इसलिए अध्यक्ष ने यह निर्णय लिया और इसे मतदान प्रक्रिया में जाने ही नहीं दिया ।’
स्रोत के अनुसार, मनोनयन दर्ता होने की प्रक्रिया को रोककर अध्यक्ष उपेन्द्र को जिम्मीवारी देने के निर्णय के प्रति राजकिशोर यादव ने भी अपनी असहमति रखी थी । वो अंतिम समय तक इस बात पर अड़े थे कि मतदान ही हो । लेकिन ९ कार्यकारिणी सदस्य ने उपेन्द्र का साथ दिया तो ऐसे में राजकिशोर यादव पीछे हट गए ।
एक नेता के अनुसार राजकिशोर मतदान पर इसलिए जोड़ दे रहे थे कि उन्हें पूर्ण विश्वास था कि मतदान की प्रक्रिया से वो चुनाव जीतते । राजकिशोर ने सहअध्यक्ष पद में अपनी उम्मीदवारी दी थी । उनके साथ ही इसी पद में चेम्जोङ और लालबाबु राउत ने भी अपनी उम्मीदवारी दी थी ।

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नेताओं के अनुसार उपेन्द्र यादव की इच्छा है कि सह अध्यक्ष में चेम्जोङ को लाया जाए । क्योंकि गत २३ वैशाख में अशोक राई के नेतृत्व में पार्टी विभाजन होने के समय में चेम्जोङ ने उपेन्द्र यादव को पूरा सहयोग दिया था । जबकी चेम्जोङ अशोक राई साथ साथ ही जसपा नेपाल के नेता बने थे । लेकिन उपेन्द्र यादव यह समझ गए थे कि अगर मतदान किया जाता है तो चेम्जोङ की जीतने की बहुत कम गुंजाइश है । चेम्जोङ के साथ ही लालबाबु राउत को भी समटने का यादव पर दबाब है । इसका भी एक कारण यह है कि अभी हाल ही में मोहम्मद ईस्तियाक राई ने पार्टी छोड़ दी है ।
ऐसे समय में पहाड़ी जनजाति समुदाय से चेम्जोङ और मुस्लिम समुदाय से राउत को हराने के बाद अगर राजकिशोर सह–अध्यक्ष पद जीत जाते हैं तो उपेन्द्र के लिए यह आसान नहीं होता ।
उपेन्द्र यादव अभी पार्टी टूूटने के डर से इतने त्रसित हैं कि उन्हें लगता है कि अगर राजकिशोर जीतते तो भी उपेन्द्र आश्वस्त नहीं हो सकते थे । क्योंकि अगर सह–अध्यक्ष बनने के बाद राजकिशोर ने कभी भी पार्टी छोड़ने का फैसला किया तो इसका नुकसान उपेन्द्र को उठाना पड़ेगा । और इस अवस्था में यादव अभी नहीं हैं कि पार्टी टूटे । महाधिवेशन में प्रायः हर पद के लिए दो से ज्यादा लोगों ने उम्मीदवारी दी थी ।
सहअध्यक्ष के चुनाव के बाद भी उन्हें एक और भय था महासचिव पद को लेकर । इसका जो संभावित नतीजा आना था इसे लेकर भी वो परेशान थे और इसे टालने के लिए ही उन्होंने मतदान रोकने का फैसला किया था ।
महासचिव में दो लोग रह सकते हैं इसकी व्यवस्था है जसपा नेपाल में । इसमें भी उपेन्द्र यादव रामकुमार शर्मा और दीपक कार्की को लाना चाहते थे । अशोक राई द्वारा पार्टी विभाजन करने के बाद कार्की को सचिव पद दिया था तो अब जसपा, नेपाल में महासचिव पद देना उपेन्द्र यादव की बाध्यता थी ।

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इतना ही नहीं इस पद पर और लोगों की भी उम्मीदवारी थी । जिसमें बोमबहादुर दरलामी मगर, रामकुमार शर्मा, विजय कुमार, दीपक कार्की, मनिषकुमार सुमन और अशोक कुमार यादव यानी ६ लोगों की उम्मीदवारी थी और कौन जीतता ? यह स्पष्ट नहीं थी । सच कहें तो यादव के लिए यह निर्णय करना भी आसान नहीं रहा होगा कि मतदान की प्रक्रिया नहीं की जाए । इसके बाद के पदों पर भी एक साथ बहुत बड़ी संख्या में उम्मीदवारी डाली गई थी । पाँच अपाध्यक्ष के लिए ६ महिला सहित २३ लोगों ने उम्मीदवारी दी थी । इसका चुनाव किस तरह किया जाता यह यादव के लिए बड़े पेशोपेश का विषय था ।
मृगेन्द्रकुमार सिंह यादव, हरिनारायण यादव, आङ देन्डी शेर्पा, विद्युत बज्राचार्य, अर्जुन थापा, गोविन्द चौधरी, शिवलाल थापा मगर, सरोजकुमार यादव, मोहमद खालिद, प्रकाश अधिकारी, बच्चा राउत अहिर, सुरेन्द्रप्रसाद कुर्मी, रामबचन अहिर यादव, मानध्वज बलोन, अमरेश नारायण झा, राजन केसी र सुमनकुमार चौधरी ने उपाध्यक्ष पद के लिए उम्मीदवारी दी थी । इसी तरह महिला की ओर से रेखा यादव, लीलादेवी सिटौला, शोभा देवी, सुनी लामा, सविता यादव और राधा थापा ने भी उपाध्यक्ष पद के लिए अपन्ी उम्मीदवारी दी थी ।
तीन उपहासचिव पद के लिए खुला से डा. सुरेन्द्रकुमार यादव, रामबाबु प्रसाद यादव, रामकिशोर प्रसाद यादव, राजकुमार राई, योगेन्द्र राई यादव, शैलेन्द्रप्रसाद साह, सुरेशकुमार मण्डल, डा. जय प्रकाश राई यादव और जयराम यादव ने अपनी उम्मीदवारी दी थी । महिला की ओर से सीताकुमारी यादव, विनिताकुमारी यादव और निर्मला यादव की उम्मीदवारी थी ।

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इसी तरह कोषाध्यक्ष पद में रेणुकुमारी यादव, बलराम महतो और सञ्जय कुमार यादव ने अपनीउम्मीदवारी दी है । ७ सचिव पद में ३४ लोगों ने उम्मीदवारी दी है ।
‘पदाधिकारी में सहअध्यक्ष से लेकर सचिव तक के लिए दी गई उम्मीदवारी में उपर से लेकर नीचे तक समावेशीता का ध्यान रखते हुए पदाधिकारी चयन करने की पार्टी अध्यक्ष की योजना है । एक नेता के अनुसार– अगर निर्वाचन होता तो ये करना असम्भव और कठिन हो जाता ।
इसलिए उपेन्द्र यादव ने मतदान रोककर स्वयं मनोनयन करने का रास्ता निकाला ताकि वो अपने अनुकूल पार्टी बना सकें । क्योंकि अभी तक उपेन्द्र की जो इच्छा होती है इसके विपरीत जसपा में किसी ने भी जिम्मेदारी नहीं प्राप्त की है । उनका पूरा तानाशाही पहले भी चलता था और अब भी वो यही चाहते हैं । लेकिन जहाँ तक जसपा के प्रवक्ता मनिष सुमन की बात है तो उनका कहना है कि – महाधिवेशन के समय भीतर नेतृत्व चयन नहीं हो पाया इस कारण यह जिम्मेदारी अध्यक्ष को दिया गया है । उन्होंने बताया कि – ‘निर्वाचन की तारीख ३० गते तक ही थी । उसके बाद भी निर्वाचन ३१ गते तक चली । ३ सौ से ज्यादा उम्मीदवार थे । साथ ही ‘निर्वाचन प्रक्रिया बहुत ही जटिल थी इसलिए उम्मीदवारों ने अध्यक्ष को ही निर्णय करने की जिम्मेदारी दी ।’
नेताओं के अनुसार – उपेन्द्र यादव के लिए केन्द्रीय समिति बनाना में कम से कम एक महीने लग जाएंगे ।
यद्यपि पदाधिकारी और केन्द्रीय समिति चयन करना भी उपेन्द्र यादव के लिए एक चुनौति ही है । आकांक्षियों की संख्या बहुत ज्यादा है । उपर से यादव को पार्टी विभाजन का डर भी है । पार्टी विभाजन के दुख से अभी भी वो उबर नहीं पाए हैं । इसलिए यह काम जितना देखने में आसान लग रहा है उपेन्द्र यादव के लिए उतना आसान नहीं होगा । जहाँ अपनी ही पार्टी के लोग नाराज हो जाते हैं वहाँ अध्यक्ष को एक बहुत सोच समझ के साथ आगे बढ़ना होता है । देखें यादव क्या रुख अपनाते हैं । अपनी इच्छानुसार अपने पदाधिकारियों का चयन करते हैं या फिर …. ।

 

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