शिक्षा मन्त्री की एक सकारात्मक पहल : लिलानाथ गौतम
लिलानाथ गौतम, हिमालिनी अंक जुलाई 024 ।सामुदायिक विद्यालयों की शैक्षिक गुणस्तर सुधार संबंधी विषय को लेकर हर साल बहस होती है । नया शैक्षिक सत्र शुरु होने से पहले हो या बजट विनियोजन के समय में ! इस विषय को लेकर जरूर विचार–विमर्श चलता है । पिछले कुछ सालों से शैक्षिक बहस में एक और विषय भी प्रवेश हुआ है । नयी व्यवस्था (संघीयता)के अनुसार विद्यालय स्तरीय शिक्षा की जिम्मेदारी स्थानीय सरकार को दी गई है । स्थानीय पाठ्यक्रम, शिक्षकों का तबदला, नियुक्ति तथा बर्खास्ती संबंधी व्यवस्था के प्रति आज भी कई शिक्षक नाराज हैं ।
ऐसी ही परिस्थिति में पिछली बार मन्त्री बन कर आई हैं– सुमना श्रेष्ठ । मन्त्री बनने के बाद जब उन्होंने शैक्षिक सुधार के नाम में नीतिगत परिवर्तन संबंधी कुछ काम शुरु किया, तब सामुदायिक विद्यालय के शिक्षक वर्ग आन्दोलित हो गए । सिर्फ शिक्षक ही नहीं, कांग्रेस, एमाले, माओवादी… जैसे पुराने पार्टी के शीर्ष नेता भी मन्त्री श्रेष्ठ द्वारा सम्पादित काम को लेकर बहस में उतर आए । बहस आज संसद् में प्रवेश किया है । स्मरणीय है, मन्त्री श्रेष्ठ राष्ट्रीय स्वतन्त्र पार्टी (रास्वपा) से आबद्ध समानुपातिक सांसद् हैं । उनके काम को लेकर आम जनता में कुछ हद तक प्रशंसा हो रही है । लेकिन पुराने राजनीतिक पार्टी और कार्यकर्ता आलोचना कर रहे हैं ।
क्या है विवाद ?
मन्त्री सुमना श्रेष्ठ का मानना है कि सामुदायिक विद्यालयों की शैक्षिक गुणस्तर में सुधार कर विद्यार्थियों को सक्षम योग्य बनाने के लिए शिक्षकों को दलगत आबद्धता से दूर रखना होगा । इसी मान्यता के साथ उन्होंने राजनीति में क्रियाशील शिक्षकों के ऊपर कारवाही प्रक्रिया शुरु किया है । एक सूचना जारी करते हुए उन्होंने राजनीतिक दलों की सदस्यता त्याग करने के लिए शिक्षकों से आग्रह किया और कहा कि अगर राजनीतिक आबद्धता त्याग नहीं करते हैं तो कारवाही भुगतने के लिए तैयार रहें । मन्त्री श्रेष्ठ की इसी नीति के विरुद्ध विभिन्न राजनीतिक दल से आबद्ध शिक्षक संगठन सड़क आन्दोलन में उतर आए हैं, प्रमुख पार्टी के शीर्ष नेता बहस में उतर आए हैं । मन्त्री श्रेष्ठ के विरुद्ध उतरनेवाले शिक्षक और नेताओं का कहना है कि हर व्यक्ति और पेशागत व्यवसायियों को ‘ट्रेड युनियन’ का अधिकार है, लेकिन मन्त्री श्रेष्ठ उस अधिकार को छीन रही हैं । इसी दो भिन्न मत के बीच जारी बहस अब संसद् में प्रवेश किया है ।
मन्त्री श्रेष्ठ का मानना है कि राजनीतिक दल से आबद्ध शिक्षकों को शिक्षक पद और पेशा से भी हटाया जा सकता है । प्रतिनिधिसभा बैठक में ही उन्होंने इस बात का जिक्र किया है । संसद् में जारी बजट संबंधी बहस के दौरान सांसदों की ओर से किए गए प्रश्न का जबाव देते हुए उन्होंने कहा है कि राजनीतिक पार्टी से आबद्ध शिक्षकों को बर्खास्त करने का अधिकार कानून में ही विद्यमान है । वि.सं. २०६८ साल में की गई संशोधित शिक्षा ऐन का हवाला देते हुए उन्होंने ऐसा कहा है । उन्होंने कहा– ‘शिक्षकों को दलीय राजनीति से अलग रखने के लिए मैं जो प्रयास कर रही हूँ, वह कानूनी व्यवस्था अन्तर्गत ही है, इसमें मुझे पूरा संसद् का सहयोग चाहिए ।’
लेकिन पूर्व शिक्षा मन्त्री तथा नेकपा माओवादी केन्द्र के नेता देवेन्द्र पौडेल ने संसद् में दावा किया है कि शिक्षा मन्त्री सुमना शिक्षकों का ट्रेड युनियन अधिकार छीन रही हैं और शिक्षकों के मनोबल को कमजोर बना रही है । उन्होंने यह भी कहा है कि शिक्षकों को गाली करने से और उनको ट्रेड युनियन अधिकार से वंचित रखने से शैक्षिक गुणस्तर में सुधार आनेवाला नहीं है । नेता पौडेल को साथ देनेवाले अन्य नेता भी हैं, जो विभिन्न राजनीतिक दलों से आबद्ध हैं । यहाँ तक कि पूर्व प्रधानमन्त्री तथा नेकपा एमाले के अध्यक्ष केपीशर्मा ओली भी मन्त्री श्रेष्ठ के विरुद्ध सार्वजनिक बहस में उतर आए हैं । उन्होंने कहा है कि मन्त्री श्रेष्ठ बचपना देखा रही हैं । अध्यक्ष ओली ने मन्त्री सुमना को विदेशी नागरिक होने का अप्रत्यक्ष आरोप भी लगाया है ।
स्मरणीय है, सुमना श्रेष्ठ ने एक विदेशी युवा से शादी की थी । लेकिन उनका परिवारिक जीवन टूट गया, उसके बाद वह नेपाल में ही क्रियाशील हैं । इसी विषय को लेकर आज सुमना के ऊपर प्रश्न करनेवाले भी बहुत सारे हैं । संसद् में भी इस विषय को लेकर कई बार प्रश्न उठा है । पिछली बार पूर्व प्रधानमन्त्री भी रहे एमाले अध्यक्ष केपीशर्मा ओली ने इसी विषय को लेकर टिप्पणी की थी । मन्त्री सुमना के व्यक्तिगत और परिवारिक जीवन को लेकर अध्यक्ष ओली द्वारा व्यक्त विचार को लेकर अलोचना भी हो रहा है ।
शिक्षा मन्त्री का एक अकेला प्रयास
राजनीतिक पार्टी से आबद्ध शिक्षकों को उनकी पदीय जिम्मेवारी से हटाने का जो प्रयास हो रहा है, इसमें शिक्षा मन्त्री सुमना को खुलकर साथ देनेवाले कोई भी नहीं है । शिक्षा मन्त्री अकेले ही इस प्रयास में हैं । विशेषतः प्रमुख राजनीतिक पार्टी, नेता और पार्टियों से आबद्ध शिक्षक वर्ग मन्त्री सुमना के खिलाफ हैं । बताया जाता है कि मन्त्रालय के सचिव तथा अन्य कर्मचारी भी मन्त्री सुमना को साथ नहीं दे रहे हैं, तब भी उन्होंने दलीय आबद्धता में रहनेवाले शिक्षकों को बर्खास्त करने के लिए प्रक्रिया शुरु किया है। मन्त्री सुमना को मानते हुए पार्टी सदस्यता त्याग करनेवाले शिक्षकों की संख्या आज के दिन ८०० से अधिक हैं । बाकी (जिन्होने राजनीतिक सदस्यता) त्याग नहीं की है, उनको बर्खास्त करने की तैयारी में शिक्षा मन्त्री हैं । लेकिन शिक्षा मन्त्री विरुद्ध आन्दोलन करनेवाले शिक्षकगण मन्त्री सुमना को चेतावनी दे रहे हैं कि दम है तो कारवाही करके दिखा लें । विभिन्न राजनीतिक पार्टी से आबद्ध शिक्षक संगठनों की साझा संस्था नेपाल शिक्षक महासंघ के अध्यक्ष कमल तुलाधार ने सार्वजनिक रूप में चेतावनी दिया है । उन्होंने कहा है– ‘मन्त्री सुमना शिक्षकों के ऊपर कारवाही के लिए उतर आई है । हम भी देखते हैं कि वह किस तरह कारवाही करती हैं । चार लाख शिक्षकों के ऊपर कारवाही करना पड़ेगा । देखते हैं, उनमें कितना दम है !’
एक कड़वा सच
शैक्षिक दृष्टिकोण से आज समाज दो भागों (वर्ग) में विभाजित हो रहा है । एक– समुदायिक (सरकारी) विद्यालय में अपने बच्चों को पढ़ानेवाले अभिभावक और दूसरे निजी विद्यालय में पढ़ानेवाले अभिभावक । समाज में यह एक प्रतिष्ठा का विषय भी बन गया है । सरकारी विद्यालय में अपने बच्चों को पढ़ानेवालों अभिभावकों को देखने का नजरिया भी बदलता जा रहा है । हां, सरकारी स्कूल में अपने बच्चों को पढ़ानेवाले अभिभावक खुद को गिल्टी फिल करते हैं और कहते हैं कि सरकारी स्कूल में बच्चों को पढ़ाना बाध्यता है । इसके विपरित निजी स्कुलों में बच्चे पढ़ानेवाले अभिभावकों का रूबाब कुछ अलग ही होता है ।
ऐसी परिस्थिति क्यों सिर्जना हो गई ? यही प्रश्न मन्त्री सुमना श्रेष्ठ का भी है । वह कहती हैं कि शिक्षा आर्जन के दृष्टिकोण से समाज में कोई भी मत भिन्नता और विभेद नहीं होना चाहिए । सर्वसाधारण नागरिक ही नहीं, शिक्षा क्षेत्र से जुड़े हुए कई विज्ञों का भी मानना है कि शिक्षकों की राजनीतिक आबद्धता ऐसी परिस्थितियों का मुख्य कारण है । यह सिर्फ आरोप नहीं है, कुछ तथ्य पर नजर ड़ालते हैं तो इस बात की पुष्टि भी होती है । तथ्य जानने के लिए अधिक अध्ययन आवश्यक नहीं है । सरकारी सेवा–सुविधा लेनेवाले शिक्षकों के बालबच्चे कहां पढ़ते हैं ? यही एक प्रश्न इस परिस्थितियों को उजागर करने के लिए काफी है । हां, अधिकांश सरकारी शिक्षकों के बच्चे निजी स्कूल में पढ़ते हैं । क्यों ? क्योंकि सरकारी शिक्षक को स्वयम् अपने विद्यालय के प्रति विश्वास नहीं है ।
यह एक आश्चर्य की बात है । यही आश्चर्य के भीतर निजी स्कूल में होनेवाली राजनीति, नेताओं का निजी स्कूल में होनेवाला निवेश और सामुदायिक विद्यालयों की शैक्षिक गुणस्तर का राज छुपा हुआ है । निजी स्कूल में पढ़ानेवाले शिक्षकों की तुलना में सरकारी स्कूल के शिक्षक कई गुणा दक्ष और अनुभवी होते हैं । सरकारी शिक्षक बनने के लिए निर्धारित परीक्षा में शामिल होकर पास भी होना पड़ता हैं । कई सरकारी विद्यालय की भौतिक सुविधा भी निजी विद्यालय की तुलना में काफी अच्छी है । सरकारी शिक्षकों की तलबी सुविधा भी निजी स्कूल के शिक्षकों के तुलना में बेहतर है । यहां तक की अधिकांश निजी स्कूल के संचालक कक्षा ८, ९ और १० कक्षा के विद्यार्थियों को पढ़ाने के लिए सरकारी विद्यालय के शिक्षकों को ही ‘पार्ट टाइम शिक्षक’ के रूप में ‘हायर’ करते हैं । तब भी शैक्षिक नतीजा में सरकारी स्कूल हरदम पीछे पड़ जाता है और निजी स्कूल कई गुणा आगे ! क्यों ? इस प्रश्न के पीछे एक जबाव है– शिक्षकों की राजनीतिक आबद्धता ! बताया जाता है कि सरकारी तलब और सुविधा लेकर सरकारी शिक्षक राजनीतिक दलों के लिए काम करते हैं और विद्यालय की शैक्षिक सुधार के लिए वे कोई प्रयास नहीं करते हैं । इसके विपरित खुद निजी स्कूल में निवेश करते हैं और सरकारी स्कूल को कमजोर बनाकर अभिभावकों निजी स्कूल में बच्चों को ले जाने के लिए बाध्यात्मक परिस्थिति सिर्जना करते हैं ।
यह जबाव और विवाद आज का नहीं है । कई सालो से है । इसीतरह शिक्षकों को राजनीतिक आबद्धता से दूर रखने की बात भी आज की नहीं है । लेकिन आज तक यह सामने नहीं आ रहा था । इस बार मन्त्री सुमना श्रेष्ठ ने प्रयास किया है ! प्रयास सफल हो सकता है या नहीं ? इस प्रश्न का जबाव अब संसद् और सांसदों के विवेक में कैद है । ऐन संशोधन के लिए सुमना ने तो अपना काम कर दिया है ! अब बांकी काम सुमना को लेकर विरोध में उतर आनेवाले अन्य पार्टी और नेताओं का है ।


