श्रीकृष्ण भागवत धर्म के महान् स्रोत : श्वेता दीप्ति
इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम्।
विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत।।४.१।।
श्री कृष्ण भगवान स्वयं अपने बारे में भगवद्गीता के चौथे अध्याय के आरंभ में कहते है कि “योग, अध्यात्म, जीव-माया-परमात्मा संबंधित जो ये परमज्ञान है। वह सर्वप्रथम मैंने ईश्वाकुवंश के प्रारंभिक सदस्य विवस्वान को दिया था जिसे विवस्वान ने मनु से कहा और मनु ने ईश्वाकु को, फिर यह गुरु शिष्य परंपरा से होता हुआ अब द्वापर युग के समापन तक आते आते छिन्न भिन्न हो चुका है।”
ब्रह्म संहिता भगवान कृष्ण की पहचान को सबसे अधिक स्पष्ट रूप से समझाती है: “कृष्ण सर्वोच्च नियंत्रक हैं, भगवान। उनके पास एक शाश्वत, आनंदित, आध्यात्मिक शरीर है। वे सभी की उत्पत्ति हैं, फिर भी उनकी कोई उत्पत्ति नहीं है। केवल यही एक कारण है।” सभी कारणों से। ”
इसलिए, संक्षेप में, जैसा कि वैदिक शास्त्रों की एक किस्म में स्पष्ट रूप से बताया गया है, भगवान कृष्ण देवत्व की सर्वोच्च व्यक्तित्व हैं और अन्य सभी अवतारों और भगवान के अन्य सभी रूपों का स्रोत हैं। वह सभी सत्य और दार्शनिक जांच का अंतिम लक्ष्य है, और वेदान्तिक अध्ययन का लक्ष्य या अंतिम शब्द। वह सर्व-आकर्षक व्यक्तित्व और आनंद का स्रोत है जिसके लिए हम हमेशा ललक में रहते हैं। वह वह मूल है जहां से बाकी सब प्रकट होता है। वह सभी शक्ति, धन, प्रसिद्धि, सौंदर्य, ज्ञान और त्याग का असीमित स्रोत है। इस प्रकार, कोई भी उससे बड़ा या उसके बराबर नहीं है और चूँकि कृष्ण सभी जीवित प्राणियों का स्रोत हैं, इसलिए वे परम पिता भी हैं।
श्रीकृष्ण को हिन्दू धर्म में भगवान विष्णु का अवतार माना जाता है। सनातन धर्म के अनुसार भगवान विष्णु सर्वपापहारी पवित्र और समस्त मनुष्यों को भोग तथा मोक्ष प्रदान करने वाले प्रमुख देवता हैं। श्रीकृष्ण साधारण व्यक्ति न होकर ‘युग पुरुष’ थे। उनके व्यक्तित्व में भारत को एक प्रतिभा सम्पन्न ‘राजनीतिवेत्ता’ ही नही, एक महान् ‘कर्मयोगी’ और ‘दार्शनिक’ प्राप्त हुआ, जिसका ‘गीता’ ज्ञान समस्त मानव-जाति एवं सभी देश-काल के लिए पथ-प्रदर्शक है। कृष्ण की स्तुति लगभग सारे भारत में किसी न किसी रूप में की जाती है। वे लोग जिन्हें हम साधारण रूप में नास्तिक या धर्म निरपेक्ष की श्रेणी में रखते हैं, निश्चित रूप से ‘श्रीमद् भगवद्गीता’ से प्रभावित हैं। ‘गीता’ किसने और किस काल में कही या लिखी यह शोध का विषय है, किन्तु ‘गीता’ को कृष्ण से ही जोड़ा जाता है।
ब्रज या शूरसेन जनपद के इतिहास में श्रीकृष्ण का समय बड़े महत्त्व का है। इसी समय में प्रजातंत्र और नृपतंत्र के बीच कठोर संघर्ष हुए। मगध राज्य की शक्ति का विस्तार हुआ और भारत का वह महान् भीषण संग्राम हुआ, जिसे महाभारत युद्ध कहते हैं। इन राजनीतिक हलचलों के अतिरिक्त इस काल का सांस्कृतिक महत्त्व भी है। मथुरा नगरी इस महान् विभूति का जन्मस्थान होने के कारण धन्य हो गई। मथुरा ही नहीं, सारा शूरसेन या ब्रज जनपद आनंदकंद कृष्ण की मनोहर लीलाओं की क्रीड़ाभूमि होने के कारण गौरवान्वित हो गया। मथुरा और ब्रज को कालांतर में जो असाधारण महत्त्व प्राप्त हुआ, वह इस महापुरुष की जन्मभूमि और क्रीड़ाभूमि होने के कारण ही प्राप्त हुआ। श्रीकृष्ण भागवत धर्म के महान् स्रोत हुए। इस धर्म ने कोटि-कोटि भारतीय जन का अनुरंजन तो किया ही, साथ ही कितने ही विदेशी इसके द्वारा प्रभावित हुए। प्राचीन और अर्वाचीन साहित्य का एक बड़ा भाग कृष्ण की मनोहर लीलाओं से ओत-प्रोत है। उनके लोकरंजक रूप ने भारतीय जनता के मानस-पटल पर जो छाप लगा दी है, वह अमिट है। ब्रज में भगवान श्रीकृष्ण को लोग कई नामों से पुकारते है- कान्हा, गोपाल, गिरधर, माधव, केशव, मधुसूदन, गिरधारी, रणछोड़, बंशीधर, नंदलाल, मुरलीधर आदि नामों से जाने जाते हैं।
वर्तमान ऐतिहासिक अनुसंधानों के आधार पर श्रीकृष्ण का जन्म लगभग ई. पू. 1500 माना जाता है। ये सम्भवत: 100 वर्ष से कुछ ऊपर की आयु तक जीवित रहे। अपने इस दीर्घ जीवन में उन्हें विविध प्रकार के कार्यों में व्यस्त रहना पड़ा। उनका प्रारंभिक जीवन तो ब्रज में कटा और शेष द्वारका में व्यतीत हुआ। बीच-बीच में उन्हें अन्य अनेक जनपदों में भी जाना पड़ा। जो अनेक घटनाएं उनके समय में घटीं, उनकी विस्तृत चर्चा पुराणों तथा महाभारत में मिलती है।
ब्रह्मवैवर्त पुराण अनुसार कृष्ण नाम की महिमा और कृष्ण का अर्थ
कृषिरुत्कृष्टक्चनो णश्च सद्भक्तिवाचकः।
अक्षापि दातृवचनः कृष्णं तेन विदुर्बुधाः ॥३२॥ कृषिद्ध परमानन्दे गश्च तद्दास्यकर्मणि। क्योर्दाता च यो देवस्तेन कृष्णः प्रकीर्तितः ॥३३॥ – ब्रह्मवैवर्त पुराण श्रीकृष्ण जन्म खण्ड अध्याय १११-३२-३३
संक्षिप्त भावार्यः (श्रीराधा जी द्वारा ‘कृष्ण’ नाम की व्याख्या। श्रीराधा जी कहती है- ‘कृषि’ उत्कृष्टवाची, ‘ण’ सद्भक्तिवाचक और ‘अ’ दातृवाचक है: इसी से विद्वानलोंग उन्हें ‘कृष्ण’ कहते हैं। परमानन्द के अर्थ में ‘कृषि’ और उनके दास्य कर्म में ‘ण’ का प्रयोग होता है। उन दोनों के दाता जो देवता है, उन्हें ‘कृष्ण’ कहा जाता है।
कोटिजन्मार्जित पापे कृषि क्लेशे च वर्तते। भक्तानां यश्च निर्वाण तेन कृष्णः प्रकीर्तितः ॥३४ ॥
सहस्रनराम्राः दिष्यानां त्रिरावृत्या चयत्फलम्। एकावृत्त्या तु कृष्णस्य तत्फलं लभते नरः ॥३५॥ कृष्णनाम्रः परं नाम न भूतं न भविष्यति।।
सर्वेभ्यश्च परे नाम कृष्णेति वैदिका विदुः ॥३६॥
कृष्ण कृष्णोति है गोपि यस्त स्मरति नित्यशः।
जल मिल्वा यया पद्म नरकादुद्धरेच्च सः ॥३०॥
ब्रह्मवैवर्त पुराण श्रीकृष्ण जन्म खण्ड अध्याय २११. ३४-३७
पुराणों में विष्णु के अवतारों की कथा है। कृष्ण पूर्णावतार हैं। करोड़ों लोग आज भी उनकी आराधना बाल रूप से लेकर द्वारकाधीश तक के तौर पर अलग अलग रूपों में करते हैं। कृष्ण के प्रति प्रेम का आनंद ही यही है कि उन्हें जिस रूप में स्मरण किया जाए, अद्भुत आनंद मिल सकता है। कहते हैं कि गोपियों ने एक बार कृष्ण से पूछ लिया कि तुम हमें क्या सुख दे सकते हो? कृष्ण ने सहजता से उत्तर दिया, ‘मैं तुम्हें सुख नहीं दे सकता, आनंद दे सकता हूं।’ सुख और आनंद के बीच की महीन रेखा को या तो एक सच्चा प्रेमी समझ सकता है, या एक सच्चा साधक। कृष्ण के व्यक्तित्व के रहस्य को जानने की कोशिश के करीब तक भी जाया जाए तो पता चलता है कि सच्चा प्रेम भी किसी साधना से कम नहीं होता।


