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प्रथमं शैलपुत्री, नवदुर्गाओं में प्रथम दुर्गा हैं, जानिए कलश स्थापना शुभ मुहूर्त

 

काठमान्डू 3अक्टूबर

दुर्गाजी पहले स्वरूप में ‘शैलपुत्री’ के नाम से जानी जाती हैं। ये ही नवदुर्गाओं में प्रथम दुर्गा हैं। पर्वतराज हिमालय के घर पुत्री रूप में उत्पन्न होने के कारण इनका नाम ‘शैलपुत्री’ पड़ा। नवरात्र पूजन में प्रथम दिवस इन्हीं की पूजा और उपासना की जाती है। इनका वाहन वृषभ है, इसलिए यह देवी वृषारूढ़ा के नाम से भी जानी जाती हैं। इस देवी ने दाएँ हाथ में त्रिशूल धारण कर रखा है और बाएँ हाथ में कमल सुशोभित है। यही सती के नाम से भी जानी जाती हैं।

मन्त्र:

वन्दे वाञ्छितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम्‌।
वृषारूढां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्‌ ॥

कलश स्थापना शुभ मुहूर्त
शारदीय नवरात्रि के पहले दिन कलश स्थापना करने के लिए दो शुभ मुहूर्त बन रहे हैं. कलश स्थापना के लिए पहला शुभ मुहूर्त सुबह 6.15 मिनट से 7 बजकर 22 मिनट तक है और घट स्थापना के लिए आपको 1 घंटा 6 मिनट का समय मिलेगा. इसके अलावा दोपहर में भी कलश स्थापना का मुहूर्त अभिजीत मुहूर्त में है. यह सबसे अच्छा समय माना जाता है. दिन में आप 11.46 मिनट से दोपहर 12.33 मिनट के बीच कभी भी कलश स्थापना कर सकते हैं. दोपहर में आपको 47 मिनट का शुभ समय मिलेगा.

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नौ दिनों तक नवरात्रि मनाने से जुड़ी मान्यता
धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, माता दुर्गा ने असुर महिषासुर के साथ भीषण युद्ध कर उसका वध किया था। यह युद्ध पूरे नौ दिनों तक चला, और दसवें दिन मां दुर्गा ने महिषासुर का वध कर असुरी शक्तियों का अंत किया। माना जाता है कि जब मां दुर्गा ने महिषासुर का वध किया, तब वह समय आश्विन मास का था। इसी कारण हर साल आश्विन मास की प्रतिपदा से लेकर नौ दिनों तक नवरात्रि का त्योहार मनाया जाता है, जिसे शारदीय नवरात्रि कहा जाता है। इस पर्व में मां दुर्गा की पूजा कर उनके शक्तिशाली रूप का स्मरण किया जाता है, जो बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है।

क्या है नवरात्रि मनाने का इतिहास
मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा-अर्चना से जुड़े नवरात्रि के पावन पर्व से कई पौराणिक कथाएं जुड़ी हुई हैं। एक प्रसिद्ध कथा के अनुसार, असुर महिषासुर को ब्रह्मा जी से अमर होने का वरदान प्राप्त था, जिसके अनुसार उसकी मृत्यु न तो किसी मानव, न देवता, और न ही असुर के हाथों हो सकती थी। उसकी मृत्यु केवल एक स्त्री के हाथों निश्चित की गई थी। इस वरदान के बाद महिषासुर अत्याचारी बन गया और मानवों तथा देवताओं को सताने लगा।

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महिषासुर के अत्याचारों से त्रस्त होकर, सभी देवता त्रिदेव—ब्रह्मा, विष्णु और महेश—के पास सहायता के लिए पहुंचे। तब तीनों देवताओं ने मिलकर आदिशक्ति का आवाहन किया, और उनके तेज से मां दुर्गा की उत्पत्ति हुई, जिन्हें महिषासुर मर्दिनी कहा गया। देवताओं ने उन्हें अपने अस्त्र-शस्त्र और शक्तियां प्रदान कीं, और मां दुर्गा ने महिषासुर को युद्ध के लिए ललकारा।

महिषासुर और मां दुर्गा के बीच पूरे 9 दिनों तक घमासान युद्ध चला, और दसवें दिन मां दुर्गा ने महिषासुर का वध कर दिया। इसलिए नौ दिनों तक नवरात्रि का त्योहार मनाया जाता है। मान्यता है कि युद्ध के दौरान सभी देवताओं ने भी नौ दिनों तक प्रतिदिन पूजा-पाठ कर देवी दुर्गा को महिषासुर के वध के लिए शक्ति प्रदान की। तभी से नवरात्रि के पर्व को मनाने की परंपरा शुरू हुई।

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भगवान श्रीराम से जुड़ा है नवरात्रि का इतिहास
एक अन्य कथा के अनुसार नौ दिनों तक नवरात्रि का पर्व मनाए जाने की कथा श्रीराम से जुड़ी है. इसके अनुसार जब रावण ने माता सीता का हरण कर लिया था. तब रावण से लड़ाई में विजय प्राप्त करने और माता सीता को छुड़ाने के लिए भगवान राम ने पूरे नौ दिनों तक मां दुर्गा की पूजा का अनुष्ठान किया और दसवें दिन देवी दुर्गा ने प्रकट होकर भगवान राम को युद्ध में विजय प्राप्ति का आशीर्वाद दिया. भगवान श्रीराम ने दसवें दिन रावण का वध किया. इसके बाद से नवरात्रि मनाने की परंपरा की शुरुआत हुई और दसवें दिन रावण का पुतला दहन किया जाता है.

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