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हाशिए पर दलित समुदाय : नगण्य उपस्थिति, शून्य अधिकार : डॉ. श्वेता दीप्ति

 

 

डॉ. श्वेता दीप्ति, हिमालिनी अंक सेप्टेंबर 024। ‘दलित’ शब्द का शाब्दिक अर्थ है जिसका दलन और दमन हुआ है, दबाया गया है, शोषित, उत्पीडि़त, सताया हुआ, अपेक्षित, घृणित, हतोत्साहित आदि । समाज में वर्ण व्यवस्था के आधार पर जो जातिगत बंटवारा हुआ है । यह पूर्णतः असमानता, वर्चस्व और शोषण पर आधारित है । दलित कोई एक रूपीय समाज नहीं है । इसकी अनेक परते हैं ।

रामचन्द्र वर्मा ने अपने शब्दकोश में दलित का अर्थ लिखा है, मसला हुआ, मर्दित, दबाया, रौंदा या कुचला हुआ । पिछले छह–सात दशकों में ‘दलित’ पद का अर्थ काफी बदल गया है । भारत में डॉ. भीमराव अम्बेडकर के आंदोलन के बाद यह शब्द समाज में सबसे निचले पायदान पर स्थित सैकड़ो वर्षों से असमझी जाने वाली तमाम जातियों के लिए सामूहिक रूप से प्रयोग होता है । अब दलित पद अस्पृश्य समझी जाने वाली जातियों की आंदोलनधर्मिता का परिचायक बन गया है । भारतीय संविधान में इन जातियों को अनुसूचित जाति नाम से जाना जाता है । भारतीय समाज में  भंगी को सबसे नीची जाति समझा जाता रहा है और उसका पारंपरिक पेशा मानव मल की सफाई करना रहा है । परन्तु आज के समय में इस स्थिति में बहुत बदलाव आया है । दलित का अर्थ शंकराचार्य ने मधुराष्टकम् में द्वैत से लिया है । उन्होंने “दलितं मधुरं” कहकर श्रीकृष्ण को संम्बोधित किया है ।

यूरोप में हुए पुनर्जागरण और ज्ञानोदय आंदोलनों के बाद मानवीय मूल्यों का महिमा मंडन हुआ । यही मानवीय मूल्य यूरोप की क्रांति के आदर्श बने । इन आदर्शों की जरिए ही यूरोप में एक ऐसे समाज की रचना की गई जिसमें मानवीय मूल्यों को प्राथमिकता दी गई । ये अलग बात है कि औद्योगिकीकरण के चलते इन मूल्यों की जगह सबसे पहले पूंजी ने भी यूरोप में ली । लेकिन इसके बावजूद यूरोप में ही सबसे पहले मानवीय अधिकारों को कानूनी मान्यता दी गई । इसका सीधा असर भारत पर पड़ना लाजमी था और पड़ा भी । इसका सीधा सा असर हम भारत के संविधान में देख सकते हैं । भारतीय संविधान की प्रस्तावना से लेकर सभी अनुच्छेद इन्ही मानवीय अधिकारों की रक्षा करते नजर आते हैं । भारत में दलितों की कानूनी लड़ाई लड़ने का जिम्मा सबसे सशक्त रूप में डॉ. अम्बेडकर ने उठाया । डॉ अम्बेडकर दलित समाज के प्रणेता हैं । बाबा साहब अम्बेडकर ने सबसे पहले देश में दलितों के लिए सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक अधिकारों की पैरवी की ।

साफ तौर पर भारतीय समाज के तात्कालिक स्वरूप का विरोध और समाज के सबसे पिछडे और तिरस्कृत लोगों के अधिकारों की बात की । राजनीतिक और सामाजिक हर रूप में इसका विरोध स्वाभाविक था । यहां तक की महात्मा गांधी भी इन मांगों के विरोध में कूद पड़े । बाबा साहब ने मांग की कि दलितों को अलग प्रतिनिधित्व (पृथक निर्वाचिका) मिलना चाहिए यह दलित राजनीति में आज तक की सबसे सशक्त और प्रबल मांग थी । अम्बेडकर की प्रयासों का ही ये परिणाम है कि दलितों के अधिकारों को भारतीय संविधान में जगह दी गई । यहां तक कि संविधान के मौलिक अधिकारों के जरिए भी दलितों के अधिकारों की रक्षा करने की कोशिश की गई ।

उपरोक्त संदर्भ का तात्पर्य यह है कि, नेपाल के परिप्रेक्ष्य में जब दलित अधिकार की बात सामने आती है तो सबसे पहले इस बात की आवश्यकता नजर आती है कि यहाँ भी बाबा साहब जैसे सशक्त नेतृत्व की आवश्यकता है । क्योंकि बिना किसी सशक्त नेतृत्व के आज तक अधिकार प्राप्त करने की कोई भी लड़ाई लक्ष्य तक नहीं पहुँच पाई है ।

हम सभी जानते हैं कि कोई भी राष्ट्र विभिन्न जातियों, धर्मों, संस्कृतियों, समुदायों या संप्रदायों का एकीकृत रूप होता है । और यह आवश्यक होता है कि राष्ट्र के सर्वांगीण विकास के लिए उस राष्ट्र में रहने वाले सभी समुदायों का विकास हो । किन्तु इस से इतर नेपाल के संदर्भ में अगर दृष्टि डाली जाए तो यह स्पष्ट दिखता है कि दलित, मधेशी और जनजातियों सहित अधिकांश अल्पसंख्यक और हाशिये पर रहने वाले समुदाय अब तक राज्य की मुख्यधारा में नहीं आ पाए हैं । मधेसी दलित समुदाय की स्थिति भी काफी दयनीय है ।

नेपाल में तराई मधेस प्रदेश का तात्पर्य देश की समतल भूमि से है । देखा जाए तो तराई का यह क्षेत्र देश की रीढ़ है जिसका कमजोर होना देश की आर्थिक व्यवस्था का कमजजोर होना है । बावजुद इसके यह क्षेत्र और यहाँ के निवासी हमेशा से विभेद का शिकार होते रहे हैं । कोशी, मेची, नारायणी, महाकाली, गंडकी आदि प्रमुख नदियाँ इसी प्रांत से होकर बहती हैं । इसी प्रकार, इस क्षेत्र में घने जंगल, आर्द्रभूमि, जंगली जानवरों के आवास और कृषि योग्य भूमि की सिंचाई के लिए पानी और नदियों की उपलब्धता और विभिन्न जातियों और भाषाओं के लोगों का सामाजिक घनत्व इस प्रांत की मुख्य विशेषताएं हैं । ब्राह्मण, छेत्री, वैश्य और शूद्र के अलावा इस प्रदेश की प्रमुख जनजातियाँ थारू, झांगर, राजवंशी, धीमल, सतार आदि हैं । इसी प्रकार, नेपाली भाषा के अलावा तमांग, मैथिली, भोजपुरी, अवधी, थारू आदि स्थानीय भाषा के रूप में बोली जाती हैं । अतः सामाजिक एवं सांस्कृतिक पहलू में इस क्षेत्र की अपनी तरह की मौलिकता है ।

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देश में २०७२ में नया संविधान लागु किया गया और इसके साथ ही देश ने संघीयता को अपनाया । इस संघीय ढांचे में देश को ७ प्रदेशों में बांटा गया है और इसी आधार पर तराई मधेस प्रदेश का शासन भी संघीय ढाँचे के अनुसार किया गया है । राजनीतिक दल संघीय ढांचे की प्रशासनिक कानूनी प्रणाली के माध्यम से तराई मधेस प्रदेश में विभिन्न सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक मुद्दों को हल करने के लिए काम कर रहे हैं या कहा जाए कि करने की कोशिश कर रहे हैं । किन्तु तराई मधेस राज्य में रहने वाले प्रमुख आदिवासियों, दलितों और पिछड़े वर्ग के लोगों को अभी भी सामाजिक न्याय और राजनीतिक अधिकार नहीं मिल पा रहे हैं । इसके अलावा, उस समुदाय के लोग जो व्यवसाय प्राचीन काल से पारंपरिक रूप से करते आ रहे हैं, उनका भी लगातार ह्रास हो रहा है । तराई मधेस प्रदेश में ही ऊंची जातियों और वर्गों की तरह उनका आर्थिक और सामाजिक उत्थान नहीं हो पा रहा है तो अन्य क्षेत्र की तो बात ही क्या की जाए । इसलिए राज्य को उस पर ध्यान देना जरूरी है । यह आवश्यक है कि सामाजिक एकीकरण, राजनीतिक भागीदारी, सह–अस्तित्व और समावेशिता, आर्थिक सशक्तिकरण के माध्यम से तराई मधेस प्रदेश में विभिन्न समुदायों या जातियों या भाषाओं के नागरिकों को एक साथ बांधा जाए, तभी सभी का उत्थान संभव है ।

इतिहास गवाह है कि प्राचीन काल से ही तराई मधेस प्रदेश के विभिन्न हिस्सों में रहने वाले दलित, आदिवासी, जनजातीय और पिछड़ी जाति या समुदाय के नागरिकों को अपने सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक अधिकारों से वंचित होना पड़ा है । और आज भी, मौजूदा राज्य संरचना के कारण इस समुदाय के लोग राज्य के हर हिस्से, स्तर और संस्था तक पहुंचने और अपनी पहचान बनाने में असमर्थ हैं ।
केंद्रीय राज्य सरकार की नीति और इस केंद्रीय राज्य सरकार के अधीन अन्य स्थानीय सरकारी निकायों द्वारा अपनाई गई इस प्रकार की जटिल प्रशासनिक संरचना के कारण, विशेष रूप से तराई मधेस क्षेत्र में रहने वाले लोगों की भाषा, पोशाक और सांस्कृतिक मूल्यों जैसे सामाजिक पहलू प्रभावित हुए हैं । इसका असर दलित, आदिवासी और पिछड़ी जातियों पर भी पड़ा है । इसलिए इन गंभीर मुद्दों पर जोर देते हुए राज्य को सभी मधेस नागरिकों को, जो समुदाय का प्रतिनिधित्व करते हैं, राजनीतिक अधिकार देना चाहिए और सभी प्रकार की सामाजिक समस्याओं का उचित तरीके से समाधान करना चाहिए और उनके आर्थिक विकास के लिए राज्य को कृषि पेशे का विकास और विस्तार करना चाहिए जो कि इस प्रदेश में परंपरागत रूप से किया जाता रहा है ।

राष्ट्रीय दलित आयोग की जाति अनुसूची रिपोर्ट में बताया गया है, नेपाल में २६ प्रकार के दलित समुदाय हैं । इनमें तराई–मधेशी दलितों के अंतर्गत कलर, ककैहिया, कोरी, खटिक, खत्वे (मण्डल खंग), चमार (राम, मोची, हरिजन, रविदास), चिडि़मार, डोम (मरिक), तत्मा (ताँती, दास), दुसाध (पासवान हजरा), धोवी (रजक हिन्दु) पासी, बाँतर, मुसहर, मेस्तर (हलखोर), सरभङ्ग (सरवरिया), नटुवा, ढाँडी, धरिकार धन्कार आदि जाति हैं । इसी तरह पहाड़ में कामी, दमाई, सार्की, बादी और गाईने जाति हैं । नेपाल के इतिहास में १९१० के नागरिक अधिनियम ने जाति भेदभाव और अस्पृश्यता को राज्य चलाने के एक साधन के रूप में संस्थागत बना दिया, जो उपरोक्त जाति समुदायों को ऐसी जातियों के रूप में परिभाषित करती थी, जो अछूत हैं ।

सामाजिक भेदभाव और उत्पीड़न के एक शक्तिशाली संयोजन के कारण, दलित समाज में दूसरे दर्जे के नागरिक के रूप में रहने को मजबूर हैं । मधेश में लगभग ४० प्रतिशत दलित भूमिहीन हैं और उन्हें जीवित रहने के लिए भी गैर–दलित समुदायों पर निर्भर रहना पड़ता है । चाहे वे पहाड़ी दलित हों या मधेसी दलित, दोनों ही गैर–दलित समुदायों द्वारा शोषित और पीडि़त हैं । पहाड़ी दलित छुआछूत और भेदभाव के शिकार रहे हैं, खासकर ब्राह्मणों, क्षेत्रियों और जनजातियों से, जबकि तराई–मधेश के दलित मधेसी ब्राह्मण–क्षेत्री (झा, साह, यादव, कुर्मी) सहित गैर–दलितों से पीडि़त रहे हैं ।

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तुलनात्मक रूप से कहें तो मधेसी दलित पहाड़ी दलितों की तुलना में अधिक शोषित हैं । मधेसी दलित इसलिए अधिक पीडि़त हैं क्योंकि वे पहले दलित हैं और बाद में मधेसी भी । यदि संघर्ष का तुलनात्मक अध्ययन किया जाए तो दोनों समुदाय पहले भी और अब भी भेदभाव और छुआछूत के खिलाफ लड़ते रहे हैं । पहाड़ी दलितों ने कुछ पहाड़ी जिलों में लड़ाई लड़ी और मधेसी दलितों ने तराई मधेश गांवों और जिला मुख्यालयों में लड़ाई लड़ी । चाहे माओवादी जनयुद्ध हो, जनआंदोलन हो या मधेश आंदोलन, सभी आंदोलनों में मधेसी दलित और पहाड़ी दलित दोनों ने अपना समर्थन दिया है ।

एन.एस.आई.एस(नेपाल सामाजिक समावेशी सर्वेक्षण) के आंकड़ों के अनुसार, ३६.७ प्रतिशत पहाड़ी दलित भूमिहीन हैं और ४१.४ प्रतिशत मधेसी दलित भूमिहीन हैं । नेपाल में दलितों की औसत शिक्षा दर ५२.४ प्रतिशत है । जिसमें ५२.४ प्रतिशत पहाड़ी दलित हैं और ३४.५ प्रतिशत मधेसी दलित शिक्षित हैं । इसी तरह, नेपाल में कुल दलित महिलाओं की उच्चतम शैक्षिक दर ४५.५ प्रतिशत है, जबकि डोम और मुसहर महिलाओं की शैक्षिक दर १७.९ प्रतिशत है । नेपाल में ७७ प्रतिशत दलितों को ही संतुलित भोजन मिलता है जिसमें ५६.० प्रतिशत पहाड़ी दलित और ५३.७ प्रतिशत मधेसी दलित शामिल हैं । स्थानीय स्तर पर, १४.६ प्रतिशत पहाड़ी दलितों के साथ स्वास्थ्य केंद्रों पर सेवाएं लेते समय भेदभाव किया जाता है, जबकि ४३ प्रतिशत मधेसी दलितों के साथ भेदभाव किया जाता है । नेपाल में, ७७ प्रतिशत महिलाएँ जब स्वास्थ्य सेवाएँ लेने जाती हैं तो उन्हें समस्याओं का सामना करना पड़ता है, जिनमें ७९ प्रतिशत पहाड़ी दलित महिलाएँ और ८५ प्रतिशत मधेसी महिलाएँ शामिल हैं । सिविल सर्विस रिकॉर्ड (ऑफिस) २०६३ के आंकड़ों के मुताबिक, नेपाल में कुल सरकारी कर्मचारियों में से १.९४ फीसदी दलित सरकारी कर्मचारी हैं, जबकि मधेसी दलितों की संख्या का जिक्र नहीं है ।

राज्य के द्वारा दलितों के लिए जो भी सेवाएँ प्रदान की जाती हैं, उनका फायदा काठमांडू तक ही सीमित रह जाता है । राष्ट्रीय दलित आयोग की संरचना पर भी नजर डालें तो वहाँ भी सदस्यों में दलितों की उपस्थिति कम ही नजर आती है । दलित गैर सरकारी संगठनों की स्थिति भी कुछ ऐसी ही है । मधेसी दलित नेताओं का आरोप है कि ऐसे संगठनों के पदाधिकारियों ने जातीय छुआछूत और मधेसी दलितों के साथ भेदभाव और शोषण की घटनाओं को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नहीं उठाया है ।

मधेसी संघ संगठन में भी मधेसी दलितों की स्थिति बहुत ही निम्न है । हालाँकि सामाजिक प्रबंधन स्तर सहित सामान्य स्तर पर कुछ भागीदारी है, लेकिन ऐसा लगता है कि निर्णय लेने के स्तर पर लगभग ०.५ प्रतिशत ही भागीदारी है । यदि हम मधेश केंद्रित राजनीतिक दलों में मधेसी दलितों की भागीदारी पर नजर डालें तो यहाँ भी बहुत ही दयनीय स्थिति है । नेपाल के अंतरिम संविधान २०६३ के बाद कुछ सुधार नजर आता है, लेकिन यह संतोषजनक नहीं है । मधेशी दलों से अलग जो भी राष्ट्रीय दल हैं वहाँ इनकी उपस्थिति मधेशी दलों से बेहतर है किन्तु यहाँ भी उनकी उपस्थिति संतोषजनक नहीं है । इस प्रकार, मधेसी दलित किसी भी राजनीतिक दल और संघ संगठन में संतोषजनक भागीदारी नहीं निभाते नजर आते हैं । मधेश आंदोलन के बाद २०६३ में अंतरिम संविधान में संशोधन किया गया था । जिसने काफी हद तक दलित, मधेशी, जनजाति सहित अल्पसंख्यकों और हाशिए पर रहने वाले समुदायों के अधिकारों को संबोधित किया था । जैसे राज्य के प्रत्येक निकाय में समानुपातिक भागीदारी, नागरिकता, भूमिहीन दलितों के संदर्भ में भूमि प्रदान करना, आवास व्यवस्था, चुनाव प्रणाली और अन्य अधिकार । जिसे नेपाल के संविधान २०७२ में हटा दिया गया है । हम कह सकते हैं कि इस दृष्टिकोण से वर्तमान संविधान प्रगतिशील की बजाय प्रतिगामी है ।

नेपाल के संविधान २०७२ का मसौदा तैयार होने के बाद काठमांडू में दलित आंदोलनकारियों ने विरोध प्रदर्शन शुरू किया था, जिसमें मधेसी दलितों की संख्या न्यूनतम थी । विरोध प्रदर्शन में राज्य की ओर से १०० से अधिक प्रदर्शनकारी घायल हो गए थे । आंदोलन के परिणामस्वरूप, संविधान के मौलिक अधिकार अनुच्छेद ४० दलित अधिकार में “समानुपातिक–समावेशी” शब्द जोड़ा गया और आंदोलन ठंडा हो गया ।
अनुच्छेद ४० दलितों के अधिकार (१) के अनुसार दलितों को समानुपातिक समावेशन के सिद्धांत के आधार पर सभी राज्य निकायों में भाग लेने का अधिकार होने की बात कहता है । इसमें कहा गया है कि सार्वजनिक सेवा समेत रोजगार के अन्य क्षेत्रों में दलित समुदाय के सशक्तिकरण, प्रतिनिधित्व और भागीदारी के लिए कानून के तहत विशेष प्रावधान किये जायेंगे । यहां राज्य के सभी निकायों में “समानुपातिक समावेशी” शब्द रखा गया है, लेकिन अंत में इस शब्द को कानून के अनुरूप लाकर अटका दिया गया है ।
दलितों ने अपने अधिकार के लिए आंदोलन की शुरुआत तो की किन्तु यह कमजोर पड़ गया । जिसका मुख्य कारण यह है कि दलित वर्गों आपस में ही बंटे हुए हैं । कुछ पहाड़ी दलित बड़ी पार्टियों के गुलाम हैं जो अपने आकाओं के खिलाफ एक शब्द भी नहीं बोल सकते और कुछ बड़ी रकम लेकर दलित आंदोलन को नष्ट करने के अभियान पर हैं । तराई मधेश के कुछ मधेसी दलित भी बड़ी पार्टी के गुलाम बनकर गुलामी की जिंदगी जी रहे हैं ।
हाल के दिनों में दलितों में यह जागरूकता आई है कि मधेश में राजनीतिक तौर पर आगे बढ़ने की जरूरत है । मधेसी दलितों में भी इस बात की जागरूकता है कि उन्हें राजनीतिक और सामाजिक तौर पर आगे बढ़ना है और राज्य के निर्णायक स्तर तक पहुंचना है । लेकिन पहाड़ी दलितों में ऐसी मानसिकता विकसित होती नहीं दिख रही है । वे ब्राह्मण पार्टी में रहकर हक की लड़ाई लड़ने की बात करते हैं । क्या सभी दलित एक चुनाव चिन्ह या एक झंडे के नीचे नहीं आ सकते ? यह प्रश्न वर्तमान नेपाली दलित आन्दोलन का जटिल प्रश्न है ।
आज के समय की आवश्यकता यह है कि नेपाल में मधेसी दलितों के समग्र कल्याण के लिए पहाड़ी दलितों और मधेसी दलितों के बीच की खाई को भरा जाए । जब तक पूरे दलित समुदाय के अधिकार सुनिश्चित नहीं हो जाते, तब तक दलित समुदाय के भीतर मतभेद और खामियाँ वैसे ही बनी रहेंगी । किसी भी जातीय मुक्ति संघर्ष में समानता एक महत्वपूर्ण मुद्दा है । शांतिपूर्ण और सशस्त्र विद्रोह सहित दुनिया का कोई भी संघर्ष समानता और समावेशन के मुद्दे को नहीं छोड़ सकता ।

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जाति एक ऐसी अवधारणा है जो प्राचीन काल में शासकों द्वारा या तो युद्ध जीतने के उन्माद से और दूसरे अपने सामंती शासन की दीर्घकालिक स्थिरता के लिए बनाई गई थी । रंग, क्षेत्र, नस्ल, जाति जैसे मामलों में भेदभाव या अलगाव स्वाभाविक नहीं है । दुनिया के कई देशों को जाति के नाम पर अलगाववादी आंदोलन का अप्रिय अनुभव भी झेलना पड़ा । श्रीलंकाई तमिल (एलटीटीई) जैसे अन्य सशस्त्र और अलगाववादी आंदोलनों के उदाहरण देखे और पढ़े जा सकते हैं । आज भी एक जाति के समुदायों और दूसरी जाति के समुदायों के बीच मारपीट की घटनाएं होती रहती हैं । भारत सहित कुछ देशों में और यहां तक कि हमारे अपने देश में भी जातिगत वोटों का दुरुपयोग, झगड़े और यहां तक कि हिंसा भी होती है । यहां तक कि मैदानी और पहाड़ी इलाकों में भी चुनाव के दौरान जातिगत आधार पर ही उम्मीदवारों को वोट देने की प्रवृत्ति है । ऐसी घटनाएं अभी भी क्षेत्रीय और स्थानीय निकाय चुनावों में देखी और अनुभव की जा सकती हैं । जहां जिस जाति की उपस्थिति अधिक होती है वहाँ उसी जाति का उम्मीदवार चुनाव जीतता है ।
दलित मुक्ति आंदोलन, आदिवासियों, पिछड़े वर्गों के कुछ कार्यकर्ताओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि जाति या समुदाय को जीवित रखा जाना चाहिए । दलित शिक्षित और सक्षम युवाओं की राय है कि दलित शब्द हटा देना चाहिए । शायद दलित वर्ग, समुदाय जातिगत संकीर्णता से मुक्त होना चाहता है । दलित, आदिवासी, लुप्तप्राय, पिछड़े वर्ग, महिलाएं, मेहनतकश युवा, गरीब, किसानों की अपनी–अपनी समस्याएं हैं । भाषा, धर्म और पहचान की समस्याओं में एकरूपता नहीं है । और कोई भी समुदाय अपनी सामान्य समस्याओं को दूर करने के लिए संयुक्त संघर्ष की दिशा से अवगत नहीं है । अलग–अलग रास्तों, अलग–अलग समूहों, स्वार्थों के कारण एक संयुक्त उत्पीडि़त आवाज नहीं उठ रही है और यही कारण है कि वो अपने अधिकारों को प्राप्त करने में समर्थ नहीं हो रहे हैं । आवश्यकता यहाँ भी भीमराव अम्बेदकर जैसे सशक्त नेता की है जो इनकी मजबूत आवाज बन सकें ।

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