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लोकहित सैद्धांतिक दलीय संस्कार को खोजता नेपाल -अजय कुमार झा

 

अजयकुमार झा, हिमालिनी अंक दिसम्बर 024 । नेपाल के आम नागरिक एक ऐसे लोक कल्याणकारी पार्टी के इंतजार में है, जो लोक संस्कृति, परंपरा, आधुनिकता और लोक आदर्श तथा सिद्धांतों से संस्कारित सशक्त राजनीतिक दल हो । यह किसी परिवार, जाति या वर्ग विशेष की नहीं बल्कि विशुद्ध मानवीय संस्कार से संपुष्ट कार्यकर्ताओं और अभियंताओं का संघ हो । नेपाल के सांस्कृतिक मूल्य, निष्ठाएं और सनातन के परम वैभव को अपने पुरुषार्थ से प्राप्त करने का दृढ़ संकल्प तथा आत्मविश्वास से संपुष्ट हो । नेपाल और नेपालियों का संरक्षण, संवर्धन और संपोषण ही परम् धर्म और लक्ष्य हो । मेची से महाकाली तक फैले इस दिव्य भूखण्ड और यहां के दिव्य नागरिकों के साथ–साथ सनातन हिंदू राष्ट्र के दिव्य पुरुषों से आच्छादित समग्र भूखंड के शिरोमणि, हिमालय के गोद में सुशोभित “मातृभूमि नेपाल की सदैव जय हो ।” इस पौराणिक भूखंड के समस्त कुटुंबों में प्रेम और समझदारी ही भावी सुरक्षा को परिलक्षित करने में सक्षम होने के कारण समस्त भाई बहनों में सहृदयता और सहानुभूतिजन्य विचारधारा को संप्रेषित और संवहन कर सकने की क्षमता रखता हो । वैश्विक आधुनिकता के दौर में हमारा अस्तित्व आज के जैसे भिखारियों की तरह नहीं, बल्कि इजराइलियों की तरह अत्याधुनिक और गौरवपूर्ण हो । सुई से लेकर जेटविमान तथा फाइटर जेट्स तक नेपाल निर्मित हो । अन्न, जल, औषधि, जड़ीबूटी, फल, तरकारी और समग्र सौंदर्य प्रसाधन तथा सुविधा जन्य सामग्री स्वदेशी हो । तब हम नेपालीपन पर गौरव कर सकेंगे ।

यह देश हमारी माता है और हम सभी नेपालवासी उसकी संतान हैं । एक मां की संतान होने के नाते सभी नेपालवासी सहोदर भाई–बहन हैं । नेपाल माता कहने से भौगोलिक अखंडता और व्याहारिक एकता के साथ हमारी सांस्कृतिक समरसता का भी ध्यान बना रहता है । इस जयघोष से हमारा वह संकल्प भी घोषित होता है, जो वैश्विक शान्ति, अहिंसा और सौहार्द का परम् संदेश है । जो मनुष्य और समाज के बीच कोई संघर्ष नहीं देखता, बल्कि मनुष्य के स्वाभाविक विकास–क्रम और उसकी चेतना के विस्तार से परिवार, गाँव, राज्य, देश और सृष्टि तक उसकी पूर्णता देखता है । यह दृष्टिकोण प्रकृति और मनुष्य में मां का संबंध देखता है, जिसमें प्रकृति को स्वस्थ बनाए रखते हुए अपनी आवश्यकता की चीजÞों को उपलब्ध किया जाता है । नेपाल भले ही बाईसी चौबीसी राज्यों के सम्मिश्रण से बना हो; लेकिन यह नवोदित राष्ट्र नहीं है, बल्कि यह विश्व मानचित्र पर सुशोभित हिन्दू, बौद्ध तथा किरात धर्म के मूल स्थान के गरिमासंपन्न सनातन राष्ट्र है । विशाल सांस्कृतिक धरोहरों से युक्त इस देश की विविधता से विश्व परिचित है । विविधता एकता इस देश की शोभा है । हमारा राष्ट्रवाद सांस्कृतिक है केवल भौगोलिक नहीं । इसीलिए नेपाल के भूखंड में अनेक राज्यों का इतिहास होने पर भी सांस्कृतिक धरोहरों तथा विरासत ने राष्ट्र को बांधकर रखने का काम किया है । जबकि यहां के बुद्धिजीवियों और सत्ताधारियों ने नागरिकों के विश्वास और आस्था को भंग करने का काम मात्र किया है । सत्ताधीशों ने चंद पैसों और व्यक्तिगत पद लोलुपता के कारण देश को विदेशियों के हाथों में गिरवी रखने में भी संकोच नहीं किया । देश के प्राकृतिक संसाधन तथा औद्योगिक क्षेत्रों को नेस्तनावुद कर दैनिक उपभोग्य के वस्तुओं को आयात करने में अपनी बुद्धिमत्ता और नेतृत्व को सफल माना है ।
संस्कृत में एक और मंत्र है– ‘वादे वादे जयते तत्व बोधः’ । इसका अर्थ है संवाद के माध्यम से हम सत्य तथ्य तक पहुँच जाते हैं । आपसी संवाद से जीवन और जगत के सत्य तक पहुंचने का यह मंत्र ही लोकतंत्र का प्राण है, जिसका नेपाली राजनीति में शून्य स्थान है । परिणामस्वरूप नेपाल का लोकतंत्र, गणतंत्र, प्रजातंत्र, राजतंत्र और जहानियाँ तंत्र में मौलिक रूप से कोई भेद नहीं दिखता । कारण है; पार्टी में एकलौती सत्ता केंद्रित प्रणाली का अलोकप्रिय अलोकतांत्रिक व्यवस्था । ओली, प्रचंड, देउबा, कोइराला, यादव, ठाकुर, थापा, राउत आदि आदि ।

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उपरोक्त द्विविधाग्रस्त राष्ट्रीय प्रणाली के दीर्घकालीन निकास और जनकल्याण के लिए संभवतः एक ऐसा राजनीतिक दल का निर्माण हो, जो हर तीसरे साल स्थानीय समिति से लेकर राष्ट्रीय अध्यक्ष तक के नियमित चुनाव कराबे और हर वर्ग, जाति, प्रदेश के कार्यकर्ता को राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने का सहज प्रावधान दे सके, तथा दो बार से अधिक एक पद पर आसीन होने की अलोकतांत्रिक व्यवस्था न हो । जिससे आंतरिक लोकतांत्रिक व्यवस्था का द्वार सभी प्रतिभावान लोगों को पार्टी के अलग–अलग स्तरों से लेकर चोटी तक पहुंचने के लिए खुला रहे और पहुंचना संभव भी हो । एक चाय बेचने वाला युवक भी देश का प्रधानमंत्री बन सके जैसे सशक्त अवधारणा वर्तमान में नेपाली युवाओं के अंतस में उफान मारते देखा जा सकता है । जिसे दबाने के चक्कर में लोकतांत्रिक प्रणाली से ही युवाओं का भरोसा उठने लगा है । जिसका दोष सभी दलों के केंद्रीय नेतृत्व और सत्ताधारियों के ऊपर जाता है । सत्ता धारियों के अदूरदर्शिता और अपरिपक्व राजनीतिक÷कूटनीतिक संस्कार उन्हें कब राष्ट्रहित में खड़ा कर देता है, और कब राष्ट्र के अहित में यह वो गंभीरता पूर्वक नहीं समझ पा रहे हैं । और सबसे बड़ी बात है कि वो व्यक्तिगत और निहित पारिवारिक स्वार्थ में इस कदर डूबे हुए है कि आम नागरिक और राष्ट्र के हित में वो समझदारी की बात करना भी नहीं चाहते हैं । यही हम नेपालियों की सबसे बड़ी कमजोरी है; हमारा दुर्भाग्य भी । प्रज्ञा के कमी के कारण जिस प्रकार के दुर्घटना संभव होता है; वह नेपाल के राजनीतिक प्रांगण में बड़ी सहजता से देखा जा सकता है ।

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सनातन के आधार भूमि होते हुए भी सनातन के कुंभ से अपने को अलग थलग कर कालिदासीय प्रवृति के पोषक बनते जा रहे हम नेपाली बुद्धिजीवी को इतना तो विचार करना ही चाहिए कि जिस भाषा को पढ़कर हम वैश्विक मंच पर शोभायमान होते आ रहे हैं; आज उसी भाषा के जड़ को उखाड़कर अति कठिन चीनी भाषा को हृदयंगम करके किस बुद्धिमत्ता का शंख फूंक रहे हैं ? ज्ञातव्य हो ! भाषा, अर्थात् ज्ञान और विज्ञान के अवगाहन का माध्यम । विचार और व्यवहार के प्रशोधन का माध्यम । चिंतन और मनन के परिमार्जन का माध्यम । सामाजिक सद्भाव तथा सांस्कृतिक धरोहरों को संवाद और तर्क के जरिए आधुनिकतम स्तर से संस्कारित करने का माध्यम । अतः विश्व में नेपाल को छोड़कर ऐसा एक भी देश देखने को नहीं मिलेगा जो अपनी जड़ को दूसरे देश के बहकावे तथा क्षणिक आर्थिक लाभ के प्रलोभन में पड़कर नास्तनावुद कर दिया हो । हम नेपालियाें के बुद्धि का स्तर कालिदास और भस्मासुर प्रभावित होते हुए अब शुतुरमुर्ग में प्रवेश करने लगा है । विदेशों के बहकावे में हमने अपनी उत्पादन क्षेत्रों तक को नष्ट कर डाला । उद्योगों को शमशान घाट बना डाला । कृषक को दीनहीन भिखारी बना डाला । सामान्य व्यापारियों को दया का पात्र बना डाला । युवा पीढियों को विदेशियों के हाथों बेच डाला । बुद्धिजीवियों को पार्टी का गुलाम बना डाला । राजा को मौन धारण करने के लिए मजबूर कर डाला । अतः राष्ट्रीय गरिमा और अस्तित्व को संरक्षित तथा संवर्धित करने के लिए अब बाँकी रहा ही क्या ?

विश्व मानचित्र के प्रज्ञा सम्राट, ज्ञानपुंज, एशिया के तारा, चार आर्य सत्य और अष्टांगिक मार्ग के जन्मदाता नेपाल के परम् विभूति गौतम बुद्ध के वंशज हम नेपाली वो जड़ बुद्धि हैं जिसने न बुद्ध के द्वारा स्थापित सम्यक जीवन पद्धति को समझने का प्रयास किया नहीं शोषणमुक्त और समतायुक्त समाज की स्थापना हेतु गांधीवादी सामाजिक दृष्टिकोण को ही लागू कर पाया । परंतु जातीय छुआछूत रूपी विषैले व्यवस्था का शिकार आम आदमी को जरूर बना दिया । अन्य देश के सरकार अपनी प्राज्ञयिक धरोहरों को सम्मानित वैचारिक परंपरा के रूम में हृदयंगम करते हैं, जबकि हम अपने ही जड़ों को खोखला करने में बहादुरी समझते हैं । पाश्चात्य के कोपर्निकस, गैलिलियो, डेकार्ट,सुकरात, प्लेटो, अरस्तू, कांट, हीगल, फ्रायड, आइंस्टीन,कार्लमार्क्स की चिंतन–धारा भी हमारे लिये प्रणम्य है ।

लेकिन व्यास, वाल्मीकि, गौतम, कपिल, जैमिनि, अष्टावक्र, राम, कृष्ण, महावीर, बुद्ध शंकराचार्य, रामानंदाचार्य, कबीर, नानक, तुलसीदास, महात्मा गांधी और ओशो की वैचारिक परम्परा और ज्ञानधारा को हमने समझने का प्रयास नहीं किया है । जिसके परिणाम स्वरूप हम शरीर से सनातनी होते हुए भी मन बुद्धि से सनातन विरोधी हो गए । हम स्वयं ही अपने अस्तित्व और इतिहास को मजाक बनाने में लगे हैं । क्योंकि हमारे भीतर वैचारिक गहराई और संस्कार नहीं रहा । मनुष्य मात्र की समानता और गरिमा का यह दार्शनिक आधार है । देश को सामाजिक शोषण से मुक्त कराकर समरस समाज बनाना हमारी आधारभूत निष्ठा है ।

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सनातन के मूलभाव में धर्म किसी पुस्तक, पैगम्बर या पूजा पद्धति में निहित नहीं है । हमारे यहाँ धर्म का अर्थ है जीवन शैली । अग्नि का धर्म है दाह करना और जल का धर्म है शीतलता । राजा को कैसे रहना और व्यवहार करना है यह है उसका राज–धर्म, पिता की क्या जिÞम्मेदारियां हैं, उसे क्या करना चाहिए, यह है पितृ–धर्म । इसी तरह पुत्र–धर्म और पत्नी–धर्म हैं । इसीलिए धर्मनिरपेक्षता का अर्थ धर्म से निरपेक्ष हो जाना नहीं है ।
सर्वपंथ समादर और सर्वजन हिताय का भाव है । शासक किसी पंथ को, किसी भी पूजा पद्धति को राज–पंथ, राज–धर्म या राज–पद्धति नहीं मान सकता । वह सभी धर्मों, पंथों एवं पद्यतियों को समान आदर देते हुए प्राणी मात्र के कल्याण एवं सुख समृद्धि के तत्पर रहेगा । जो इन सूत्रों से अपने को अलग थलग मानते हैं, वो कदापि राष्ट्रप्रेमी और जनहित में नहीं हो सकते । जिनके व्यवहार में सर्वजन हिताय के बदले जातीय, क्षेत्रीय, धार्मिक और दलीय तुष्टिकरण का कीड़ा समाया हुआ है, उनका हर निर्णय राष्ट्र के मौलिक भावना के विरुद्ध होगा । आम नागरिक के भौतिक और मानसिक उत्थान के विरुद्ध होगा । राष्ट्रीय अस्मिता के विरुद्ध होगा । जो कालान्तर में भीषण संग्राम और नर संहार को निमंत्रण देगा । नेपाल आज उसी भावी महाभारत रूपी भीषण संग्राम की ओर उन्मुख है ।

महाभारत युद्ध में सारे भरतवंशी मारे जाएंगे,’ यह ज्ञान वेद व्यास, विदुर, पितामह और कृष्ण इन चारों को था ।’ लेकिन अयोग्य, उद्दंड और क्षुद्र बुद्धि दुर्योधन तथा महा षडयंत्रकारी शकुनी के कारण सारे के सारे योद्धा मूक दर्शक साबित हुए । आज हम नेपाली जनता उसी मोड़ पर आकर रुक गए हैं । हमारी जीवन की गाड़ी सत्ता समीकरण और विदेशियों के द्वारा रचे वैश्विक दलदल में धंसती जा रही है । दुख की बात तो यह है कि जो हमें समूल नष्ट करने के लिए दलदल में धकेल रहे हैं, नागफास में फसकर डस रहे है, हम उसी से मार्ग निर्देशन भी लेने को मजबूर हैं । उसी के इशारे पर बड़े गौरव और शान के साथ आगे की कदम रखने को बाध्य हैं । यह है हमारी वर्तमान के राजनीतिक संस्कृति और सोच का सामूहिक स्खलन । जिसका गहन और निरंतर संवाद के माध्यम से परिमार्जन होना सर्वजन हिताय सिद्ध होगा तो वहीं भगवान भरोसे रहने से काश्मीरी पंडितों के स्थिति का पुनस्र्वागत होगा ।

अजय कुमार झा
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