मधेश के अधिकार के लिए सडक से सदन तक संघर्ष : अध्यक्ष यादव
कैलास दास,जनकपुर, फागुन १ । मधेशी जनअधिकार फोरम नेपाल के केन्द्रीय अध्यक्ष उपेन्द्र यादव ने कहा है कि अगर सत्तारुढ दल वार्ता के लिए वातावरण नही बनाया तो मधेश के अधिकार के लिए सडक से सदन तक संघर्ष करेंगे ।
जनकपुर में शुक्रवार प्रेस कन्फ्रेन्स में आन्दोलन के बारे में जानकारी कराते हुए उन्होने कहा कि हम वार्ता विरोधी नही है । किन्तु वार्ता में बैठने से पहले विश्वास का वातावरण होना चाहिए । और इस पर सत्तारुढ दल गम्भीर नही है । सहमति में संविधान बनने की ग्यारेण्टी होने के पश्चात् ही वार्ता की सार्थकता होगी ।
उन्होने यह भी कहा कि राष्ट्रीय—अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र से सहमति में संविधान सभा निर्माण का सल्लाह सुझाव आने के बाद भी सत्ता पक्ष गम्भीर नही बनी है । वार्ता का वातावरण बिगाडने का काम सत्ता पक्ष ही कर रहें है । सहमति का वातावरण बना तो मोर्चा वार्ता करने के लिए तैयार है ।
विगत में हुये सम्झौता को अगर सरकार नही मानती है तो आने वाला कल के दिन में पूर्वराजा ज्ञानेन्द्र भी कहेगा की हम यह समझोता नही मानेगें फिर सम्झौता का कोई महत्व नही रह जाऐगा । कोई भी सम्झौता व्यक्ति विशेष का नही होता है । उस समय कौन प्रधानमन्त्री था, किसके साथ हुआ यह विशेय नही है । विशेय है सम्झौता क्या क्या हुआ ।
उन्होन कहा राष्ट्रीय मिडिया अभी तक लिख रहा है कि एमाओवादी मधेशवादी जातीय प्रदेश के पक्ष में है । लेकिन मैं यह कहाना चाहुँगा कि मधेश प्रदेश कौन सा जात है । मधेश कोई जाती नही है । मधेश में रहने वाला सभी जातजाती, भाषाभाषी के समान अधिकार जब तक सुनिश्चित नही होगा चाहे वह दलित हो, मुस्लिम हो, अल्पसंख्यक हो तबतक हमको संविधान स्वीकार नही होगा । परिवर्तन का प्रमुख सम्वाहक माओवादी मधेशवादी को बाहर रखकर अगर देश में संविधान बना तो बहुत बडा द्वन्द सृजना होगा । और वैसी परिस्थिति में संविधान का कोई अर्थ नही होगा स्पष्ट किया ।
अध्यक्ष यादव के संयोजकत्व में ९ सदस्यीय आन्दोलन परिचालन समिति गठन किया गया है । समिति में पार्टी उपाध्यक्ष लालवावु राउत, महासचिव रामसहाय यादव, कोषाध्यक्ष रेणु कुमारी यादव, मोहम्मद ईतियाक राई, सहसराम यादव, हरिनारायण यादव, विजय कुमार और संजय कुमार सिंह है । आन्दोलन को तीब्रता देने के लिए गाउँ तथा क्षेत्रीय स्तर में आन्दोलन समिति बनाने का निर्णय भी किया गया है ।
वैठक मेंं केन्द्रीय कार्यसमिति के ६५ और सल्लाहकार समिति का १५ कर कूल ८० का सहभागिता था

