उम्मीदों की आत्महत्या -दिल्ली चुनाव : मुरलीमनोहर तिवारी “सीपू”
मुरलीमनोहर तिवारी सीपू, बीरगंज । दिल्ली में भाजपा के खाते में 48 सीटें मिली, जबकि आम आदमी पार्टी 22 पर सिमट गई । भाजपा की दिल्ली में 27 साल बाद वापसी हो रही है। भाजपा ने 1993 में दिल्ली में सरकार बनाई थी। उस चुनाव में उसे 49 सीट पर जीत मिली थी। भाजपा 2015 के चुनाव में सिर्फ तीन सीट पर सिमट गई थी जबकि 2020 के चुनाव में उसके सीट की संख्या बढ़कर 8 हो गई थी।
अन्ना आंदोलन से नेता के रूप में उभरे अरविंद केजरीवाल केजरीवाल ने 26 नवंबर 2012 को ‘आम आदमी पार्टी’ (‘आप’) बनाई। पार्टी बनते समय अन्ना हजारे को खुद को इस पार्टी से अलग करना और कुछ बाद के समय मे उनके साथियों में कुमार विश्वास, किरण बेदी, शशिभूषण, योगेंद्र यादव जैसे लोग, जो विभिन्न क्षेत्रों से आए थे, इस सब का अलग होना, कुछ गलत होने की आशंका पैदा कर गया था।
आम आदमी पार्टी ने 2013 के अपने पहले चुनाव में आप ने 31 सीट जीती थीं लेकिन वह सत्ता से दूर रह गई थी। बाद में कांग्रेस के समर्थन से केजरीवाल पहली बार दिल्ली के मुख्यमंत्री बने थे। फिर 2015 में 67 सीट जीतकर सरकार बनाई और 2020 में 62 सीट जीतकर सत्ता में धमाकेदार वापसी की थी। करीब 12 साल बाद ‘आप’ ना सिर्फ राष्ट्रीय पार्टी बन गई, बल्कि बीजेपी, कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस के बाद चौथे नंबर पर आ गई। दिल्ली के बाद पंजाब में भी सरकार बनाई। दिल्ली एमसीडी पर भी कब्जा किया। गुजरात और गोवा में भी पार्टी की उपस्थिति दर्ज की गई। राज्यसभा में चौथे नंबर की पार्टी बनी, जिसके सबसे ज्यादा सांसद हैं।
वैकल्पिक और ईमानदार राजनीति के साथ भ्रष्टाचार पर प्रहार के दावे के साथ राजनीति में कदम रखने वाले केजरीवाल का हरियाणा के हिसार में 16 अगस्त 1968 में इलेक्ट्रिकल इंजीनियर पिता के परिवार में जन्म हुआ। आईआईटी खड़गपुर से 1989 में मैकेनिकल इंजीनियरिंग (बीटेक) करने वाले केजरीवाल ने भारत की सबसे प्रतिष्ठित प्रशासनिक सेवा (आईआरएस) से इस्तीफा देकर समाज सेवा में कदम रखा।
केजरीवाल ने 1989 से 1992 तक टाटा स्टील, जमशेदपुर में काम किया और फिर वहां से इस्तीफा देकर सिविल सर्विसेज की तैयारी करने लगे। इस दौरान वह कोलकाता में मदर टेरेसा से मिले और कुछ समय के लिए मिशनरीज ऑफ चैरिटी के लिए स्वयं सेवक का कार्य किया।
राजनीति में प्रवेश से पहले केजरीवाल ने ‘परिवर्तन’ नाम का एनजीओ बनाया जो जन वितरण प्रणाली, सोशल वेलफेयर स्कीम, इनकम टैक्स और बिजली से संबंधित जनता की समस्याओं के संबंध में काम करता था। इसी संस्था ने सूचना का अधिकार (RTI) जैसे अहम कानून लाने में विशेष योगदान दिया, जिसके चलते उन्हें बड़ी पहचान मिली। इसके साथ ही उन्होंने अन्ना हजारे के साथ मिलकर जन लोकपाल बिल लाने के लिए भी संघर्ष किया। अरबिंद केजरीवाल के शैक्षिक और सामाजिक पृष्ठभूमि को देखते हुए आम जनता में उन्हें राजनीति के विकल्प के रूप में देखा गया।
शिक्षा, स्वास्थ्य जैसे क्षेत्र में ‘क्रांति’ लाने का दावा करने वाली पार्टी आखिर क्यों अपने गढ़ में इस तरह से ढह गई ? इसके जवाब में कई तर्क दिए जा रहे हैं। कुछ लोग भाजपा की मजबूती गिना रहे हैं तो कुछ लोग यह तलाश रहे हैं कि इसमें कांग्रेस का क्या हाथ है। हालांकि, अरविंद केजरीवाल पर करीब से निगाह रखने वाले कुछ विश्लेषकों का यह भी कहना है कि “केजरीवाल को खुद ‘केजरीवाल’ ने ही हराया है”।
दरअसल, 2012 में जब आम आदमी पार्टी का गठन किया गया था तब से अब तक अरविंद केजरीवाल कई मुद्दों पर खुद को जितना बदल चुके हैं, उसको लेकर जनता में अब कहीं ना कहीं उनकी छवि खराब हुई। ईमानदारी, लोकपाल, भ्रष्टाचार मुक्त शासन, आम आदमी की जीवन शैली, राजनीतिक शुचिता आदि के केजरीवाल ने जो सपने दिखाए थे और वादे किए थे, उन कसौटियों पर खुद फेल होते चले गए और अंतत: आम आदमी की नजरों से उतरते चले गए। भाजपा ने इस हालात का सियासी फायदा उठाते हुए ना केवल आम जनमानस के सामने केजरीवाल की कथनी और करनी का अंतर सामने लाया बल्कि पिछले एक दशक में ‘आप’ मुखिया को हर दिन उनके ही तय किए गए मानकों में तौलती रही।
कांग्रेस की यूपीए-2 सरकार के खिलाफ दिल्ली के रामलीला मैदान में आंदोलन चलाने के बाद राजनीति में उतरे केजरीवाल ने शुरुआत में अपनी छवि एक बेहद साधारण व्यक्ति के रूप में गढ़ी। कभी एक नीली वैगनार कार में तो कभी ऑटो या कभी मेट्रो में सफर करते हुए दिखते। साधारण कपड़े, चप्पल और कान से गले तक मफलर लेपेटे हुए केजरीवाल ने अपनी एक खास छवि बना ली। वह उन दिनों मुख्यमंत्रियों के बड़े बंगलों को भी बड़ा मुद्दा बनाते थे। केजरीवाल तब कहा करते थे कि वह सीएम बनेंगे तो 2-3 कमरों का एक छोटा घर ही पर्याप्त होगा। वह सुरक्षा, सरकारी गाड़ी और बड़े बंगले ना लेने के लिए एक शपथपत्र भी नई दिल्ली में घर-घर बांट चुके थे। समय बीतने के साथ वह इन मानकों को तोड़ते रहे। अब उनके पास हाईटेक गाड़ियों का काफिला रहा, जिस बंगले में वह बतौर सीएम रह रहे थे,उसे शीशमहल की तरह बनवाया। उसमें सुख सुविधा के लिए करोड़ों रुपए ख़र्च के आरोप हैं। वे दिल्ली के साथ पंजाब पुलिस की सुरक्षा भी ले रहे थे। भाजपा एक दशक में आए उनके बदलावों को जोरशोर से उठाती रही और ये मुद्दे सोशल मीडिया से निकलकर आम जनता की जुबान तक पहुंच चुके थे।
एक दशक पहले जहां अरविंद केजरीवाल की पहचान भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने वाले एक लड़ाके की थी तो अब वह खुद शराब घोटाले में जमानती बन चुके हैं। मुख्यमंत्री रहते हुए उनकी सरकार पर शराब घोटाले का आरोप लगा और मुख्यमंत्री रहते हुए उन्हें जेल जाना पड़ा। केजरीवाल के अलावा उनके कई मंत्री भी तिहाड़ में बंद हुए। कभी आरोप लगते ही इस्तीफे की मांग करने वाले केजरीवाल जेल जाने के बाद भी पद पर बने रहने को अड़ गए। उन्होंने तब तक इस्तीफा नहीं दिया जब तक सुप्रीम कोर्ट ने उन पर कई सख्त पाबंदियां नहीं लगा दीं। शराब घोटाले के अलावा उनकी सरकार पर क्लासरूम घोटाला, पैनिक बटन, मोहल्ला हॉस्पिटल स्कैम आदि का आरोप भी लगा। जो केजरीवाल कभी दूसरों को भ्रष्टाचारी का सर्टिफिकेट देते थे उन्हें अब खुद उनकी ईमानदारी पर जनता में संदेह पैदा हो चुका था।
अरविंद केजरीवाल को इस चुनाव में जिन मुद्दों पर सबसे अधिक घेरा गया, उनमें से रहा, यमुना और इसका प्रदूषण। 2020 चुनाव के दौरान अरविंद केजरीवाल ने डंके की चोट पर वादा किया था कि 2025 चुनाव से पहले वह खुद यमुना में जाकर डुबकी लगाएंगे। लेकिन यमुना के प्रदूषण में किसी तरह की कोई कमी नहीं आई। अरविंद केजरीवाल को खुद भी यह स्वीकार करना पड़ा।
कभी भाजपा और कांग्रेस से समान दूरी रखने की कसमें खाने वाले अरविंद केजरीवाल का एक वाक्य खूब प्रसिद्ध हुआ था- “सब मिले हुए हैं जी”। लेकिन समय बीतने के साथ भले ही भाजपा से उनकी दूरी बनी रही, लेकिन कांग्रेस समेत अन्य दलों से उनकी नजदीकी बढ़ती चली गई। केजरीवाल जिन दलों और नेताओं को कभी भ्रष्ट बताते हुए लिस्ट जारी करते थे अब उनके साथ अक्सर गले और हाथ मिलाते हुए उनकी तस्वीरें आने लगी थी।
अरविंद केजरीवाल ने पिछले चुनाव में दिल्लीवालों को यूरोप जैसी सड़कें और 24 घंटे साफ पानी देने का वादा किया था। लेकिन हुआ कुछ उल्टा। एक तरफ जहां दिल्ली की सड़कों पर गड्ढ़े भर गए तो घरों में सप्लाई होने वाला पानी बद से बदबूदार होता चला गया। अलबत्ता यह कि गंदे पानी की भी सप्लाई समय पर नहीं हो पाती थी। गर्मियों में तो टैंकरों के पीछे दौड़ते दिल्लीवालों की तस्वीरें इंटरनेशनल मीडिया तक में छा गईं। खुद अरविंद केजरीवाल को चुनाव के बीच स्वीकार करना पड़ा कि वह इन वादों को पूरा करने में विफल रहे। उन्होंने जनता से एक और मौके की मांग की थी।
अरविंद केजरीवाल की हार के पीछे, 1 फरवरी को पेश हुए बजट में 12 लाख की कमाई पर अब कोई इनकम टैक्स नहीं लगेगा इसी ऐलान ने अरविंद केजरीवाल के हार की पटकथा लिख दी। जितने वोट से अरविंद केजरीवाल नई दिल्ली सीट पर हारे हैं, उतने ही वोट कांग्रेस उम्मीदवार संदीप दीक्षित को मिले हैं।
चुनाव आते है जाते है, कोई हारता है तो कोई जीतता है, ये लोकतांत्रिक व्यवस्था की समान्य प्रक्रिया है, लेकिन दिल्ली चुनाव में अरबिंद केजरीवाल की हार ने उस सपनों की हत्या कर दी जो आम आदमी ने देखा था, आम आदमी केजरीवाल में अपनी छवि देखता था, जब वह छवि धूमिल और दागदार हो गई तो सभी गरीब और मध्य वर्गीय लोगो का सपना टूटा, उम्मीद टूटी। अब दूर-दूर तक क्रांति और परिवर्तन के लिए कोई चेहरा नही रहा। अरबिंद केजरीवाल ने लोकतंत्र में परिवर्तन की उम्मीदों की आत्महत्या करा दी।



