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रावल का निष्कासन : तानाशाही प्रवृत्ति या दलगत आवश्यकता : डॉ. श्वेता दीप्ति

 

डॉ श्वेता दीप्ति, हिमालिनी अंक जनवरी 025। एक मशहूर मुहावरा है, “जल में रहकर मगरमच्छ से बैर नहीं करना चाहिए । ” अर्थ स्पष्ट है कि जो शक्तिशाली हैं वो अपने सामने किसी को टिकने नहीं देते इसलिए उनसे नहीं उलझना चाहिए और राजनीति में तो यह मुहावरा बहुत ही सटीक बैठता है । यहाँ कोई अपने पार्टी या अध्यक्ष के खिलाफ नहीं बोल सकता, अगर ये गलती कर दी तो फिर इसका भुगतान तो करना ही होता है । पिछले दिनों नेकपा एमाले में यह सब देखने को मिला, जहाँ पूर्व उपाध्यक्ष भीम रावल, स्थायी समिति सदस्य बिंदा पांडे और केंद्रीय सदस्य उषा किरण तिम्सिना के खिलाफ की कार्रवाई ने पार्टी के भीतर हलचल पैदा कर दी । भीम रावल नेपाल की राजनीति में कोई छोटे कद के नेता नहीं हैं । नेकपा एमाले के साथ इनका पचास वर्ष का रिश्ता रहा है । अपने छात्रकाल से अर्थात् २०३० से नेपाल की राजनीति में सक्रिय रावल आज पार्टी विहीन बने हुए हैं ।

भीम रावल २०४७ साल में तत्कालीन कृषि मंत्री झलनाथ खनाल के राजनीतिक सलाहकार बने और उसके बाद रावल गृहमंत्री से उप प्रधानमंत्री एवं रक्षा मंत्री तक का सफर तय किया । एमाले अध्यक्ष ओली से इनके रिश्ते भी काफी नजदीकी के बने रहे किन्तु इस रिश्ते पर उस समय ग्रहण लगना शुरु हुआ जब २०७९ मंसिर को दसवें महाधिवेशन में रावल ओली से मुकाबले के लिए जा खड़े हुए । उन्होंने पार्टी अध्यक्ष पद के लिए ओली से प्रतिद्वंदिता की । हालांकि ओली ने इन्हें उपाध्यक्ष बनने को कहा किन्तु इन्होंने यह दलील दी कि लोकतंत्र को जीवित रखने के लिए यह आवश्यक है । इस मुकाबले में रावल को महज २२३ वोटों से संतोष करना पड़ा और ओली १८३७ वोटों से जीतकर अध्यष पल पर पुनः आसीन हो गए । इसके उपरांत ही भीम रावल के प्रति केपी ओली का व्यवहार बदल गया । और अंततः भीम रावल को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया है । उन पर यह आरोप लगा कि उन्होंने पार्टी में रहकर पार्टी के खिलाफ काम किया और पार्टी को कमजोर करने की कोशिश की । बात सीधी सी है कि आप पार्टी के हर सही गलत कार्य में जब तक साथ हैं, तब तक सुरक्षित हैं, अन्यथा आपकी उस पार्टी में कोई जगह नहीं है । यह सिर्फ किसी एक पार्टी या व्यक्ति की बात नहीं है । यह आम चलन है जो हर पार्टी में देखने को मिल जाता है ।

एमाले के इस कदम को कई नेताओं ने यह कह कर आलोचना की, कि एमाले पतन की दिशा में जा रही है । देखा जाए तो एमाले के इस कदम को उठाने पर पार्टी के भीतर आंतरिक लोकतंत्र काफी कमजोर नजर आ रहा है । एक के बाद एक नेतृत्व के फैसले पर सवाल उठाने वालों पर कार्रवाई का डंडा चलाकर उन्हें निष्कासित करना तानाशाही प्रवृत्ति की ही तरफ इशारा कर रहा है । स्थायी समिति सदस्य बिंदा पांडे और केंद्रीय सदस्य उषा किरण तिम्सिना को ६ महीने के लिए जिम्मेदारी से मुक्त कर दिया गया क्योंकि इन्होंने दान की जमीन पर भवन बनाने के पार्टी निर्णय के प्रति अपनी असहमति जताई थी । इनके विचार पार्टी के हित और फैसले के खिलाफ हैं, यह कहते हुए उनसे स्पष्टीकरण मांगा गया । रावल भी पार्टी के इस निर्णय के खिलाफ थे, उनसे भी स्पष्टीकरण मांगा गया था । पांडे और तिम्सिना ने अपनी ओर से स्पष्टीकरण दिया किन्तु रावल ने नहीं दिया । और परिणाम सबके समक्ष है । पांडे और तिम्सिना पर छः महीने की पाबंदी लगी वहीं रावल को निष्कासन मिला । किन्तु यही एक घटना रावल के निष्कासन की वजह नहीं बनी है । यह तो तात्कालिक कारण है जबकि रावल ने पार्टी और पार्टी अध्यक्ष के कार्यों के प्रति विरोध करना बहुत पहले ही शुरू कर दिया था । कई वर्ष पहले काठमांडू में एक मिशनरी संस्था द्वारा आयोजित अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में नेपाल सरकार सह–आयोजक बनी थी । जिसमें प्रधानमंत्री केपी ओली कुछ दिनों तक एक पांच सितारा होटल में रुके थे । जिसका व्यापक विरोध हुआ था और उस समय भीम रावल की उनके खिलाफ विरोधी आवाजÞ सबसे तेजÞ थी ।

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भीम रावल ने सीके राऊत को मुख्यधारा में लाने के तरीके और समझौते के तरीके पर भी सरकार के खिलाफ सवाल उठाए थे । हालाँकि, राउत को विभाजनकारी अभियान से वैध राजनीति में लाना सरकार की एक महत्वपूर्ण सफलता थी । इसी तरह लंबे समय से संसद में लंबित नागरिकता कानून पर रावल की अलग राय थी । उनका मानना था कि नेपाल को नागरिकता नीति कड़ी करनी चाहिए । खास तौर पर विदेशी बहू–दामादों को नागरिकता देने के मामले में वो चाहते थे कि कोई ढीला–ढाला प्रावधान ना हो । जिसने उन्हें अतिराष्ट्रवादी व्यक्तित्व के तौर पर पहचान दिलाई जो यहाँ की राजनीति का सबसे महत्त्वपूर्ण पक्ष हमेशा से रहा है ।
२०७६ में नेपाल सरकार ने पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए एक अरब रुपये खर्च कर काठमांडू में भारतीय फिल्म पुरस्कार आयोजित करने की तैयारी की थी । रावल ने इसका कड़ा विरोध किया और अंततः व्यापक विरोध के बाद यह रद्द कर दिया गया था । पार्टी में राष्ट्रपति भंडारी के दखल पर भी रावल ने पार्टी के भीतर अपना विरोध जताया था ।

रावल की विरोधी भूमिका ललिता निवास मामले में भी देखी गई थी । उन्होंने जगह कब्जा करने वालों के खिलाफ कड़ी कारवाही करने की सार्वजनिक मांग की थी । इसी तरह उन्होंने पार्टी द्वारा राजपा के साथ गठबंधन करने के विषय पर भी विरोध जताया था । भीम रावल उन मुख्य किरदारों में से एक हैं जिन्होंने अमेरिका के साथ सरकार के एमएमसी समझौते को विवाद में घसीटा था और समझौते के कई बिंदुओं पर सवाल उठाया था । यानि कि आज जो हुआ है उसकी जड़ें बहुत पहले ही जम चुकी थीं । प्रायः महत्त्वपूर्ण मंत्रालय का आनंद रावल ले चुके हैं ऐसे में एक ख्वाहिश उनकी अवश्य होगी कि वो प्रधानमंत्री के पद पर आसीन हों । परंतु उनके विगत के कार्यशैली को देखकर उन्हें बहुत सफल नहीं माना जा सकता है । पाए गए किसी भी मंत्रालय में बहुत असरदार कार्य उन्होंने नहीं किया है । ऐसे में आज के परिप्रेक्ष्य में उनसे बहुत उम्मीद नहीं की जा सकती है । उम्र के इस पड़ाव पर एक नए पार्टी का गठन और सत्ता तक पहुँचने की ललक दोनों ही प्रभावकारी नहीं दिखते हैं । हाँ अन्य कई पार्टी का आमंत्रण उन्हें मिल रहा है ऐसे में एक अवसरवादी नेता की तरह अगर वो आमंत्रण स्वीकार करें और कहीं फिट बैठ जाएँ तो शायद एक नई शुरुआत की उम्मीद की जा सकती है ।

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पार्टी द्वारा निष्कासन पर प्रतिक्रिया देते हुए रावल ने कहा है कि, ‘मेरे खिलाफ कार्रवाई ओली की निरंकुश, मनमानी और तानाशाही मानसिकता की उपज है । ओली लंबे समय से कम्युनिस्ट पार्टी के फैसलों, मूल्यों और मान्यताओं के खिलाफ काम कर रहे हैं जो अब उनकी सहनशक्ति से बाहर की बात है । ’ रावल का मानना है कि ओली बहुदलीय लोकतंत्र और नेपाल के संविधान द्वारा दिए गए अधिकारों को कुचलने के लिए एक–सशस्त्र तानाशाह बनने की कोशिश कर रहे हैं । उन्होंने ओली पर आरोप लगाते हुए कहा है कि वो नेपाल के राष्ट्रीय हित के खिलाफ बाहरी ताकतों के सामने नेपाल के राष्ट्रीय हित के खिलाफ कई फैसले लिए हैं । अपने लिए निष्कासन के सवाल पर रावल कहते हैं कि “मैं इस फैसले से नाराज नहीं हूँ । मैंने पांच दशकों तक लगातार और निडर होकर देश और जनता के लिए आवाज उठाई है । देश का स्वाभिमान, देश का झंडा न झुके, नेपाल की जनता का गौरव न झुके, इसके लिए मैं हमेशा तत्पर रहा हूँ और आज भी मैंने जो कदम उठाए हैं वह देश की ही खातिर है । ”
अब यह सारी बातें आगामी समय में क्या रंग लाती हैं और रावल का जोश उन्हें कहाँ ले जाता है यह तो समय बताएगा । क्योंकि यह सारे दावे कमोबेश हर नेता करता है । जिनकी अंतिम चाहत मुख्य पद को प्राप्त करना ही होती है । राजनीति का अर्थ है देश और जनता के सर्वोत्तम हित के लिए कार्य करना । अगर कोई जनता का प्रतिनिधि ऐसा नहीं करता है तो राजनीति का औचित्य समाप्त हो जाता है । किन्तु यह नैतिकता की बात है । जिसकी कमी नेपाल की राजनीति में यत्र तत्र दिखती है । आज के परिप्रेक्ष्य में जिस तरह से केपी ओली सत्ता के लिए प्रचंड से लेकर शेर बहादुर देउबा तक किसी भी तरह की ताकत से खेलने को तैयार हैं, उससे उनकी देश हित से अधिक सत्ता लिप्सा की चाहत अधिक नजर आती है ।
आज के समय में एमाले के भीतर कई चेहरे हैं जो ओली के एकछत्र राज के खिलाफ जाना चाहते हैं, परंतु वो सार्वजनिक तौर पर ऐसा कर नहीं पा रहे क्योंकि इसका नतीजा वो अच्छी तरह जानते हैं । वो रावल, पांडे, तिम्सिना से पहले ओली के खिलाफ बोलने वाले माधव नेपाल, झलनाथ खनाल और घनश्याम भुसाल को भी नहीं भूल पाए हैं । आज एक असंतुष्ट पक्ष एमाले के भीतर है जो ओली को पदच्यूत करना चाहते हैं और एक मजबूत विकल्प की तलाश में हैं । ऐसे में पूर्व राष्ट्रपति विद्यादेवी भंडारी का एक बार फिर से सक्रिय राजनीति में आने की चर्चा बेवजह नहीं हो सकती । अपने पोखरा यात्रा के दौरान भंडारी की एमाले कार्यकर्ताओं और नेताओं से मिलना और सक्रिय होना राजनीति में एक नई चर्चा को हवा दे रही है । इससे पहले यह भी चर्चा हुई थी कि ओली ने पार्टी बैठक में नेताओं को भंडारी को सक्रिय राजनीति में आने के लिए प्रोत्साहित नहीं करने की चेतावनी दी है । जबकि एमाले के अंदर यह राय बढ़ती जा रही है कि भंडारी को सक्रिय राजनीति में लाया जाना चाहिए । लेकिन ओली भंडारी के एमाले में शामिल होने से नाखुश हो सकते हैं ।
पूर्व राष्ट्रपति भंडारी सात दिनों तक पोखरा में रहीं और हजारों एमाले कार्यकता एवं नेताओं से उन्होंने मुलाकात की । इन बातों को राजनीतिक विश्लेषक एमाले के ग्यारहवें महाधिवेशन की पूर्व पीठिका के तौर पर देख रहे हैं । बताया जा रहा है कि पोखरा में भंडारी के समक्ष यह बात रखी गई कि वो आगामी समय में देश की बागडोर संभालने के लिए एक पसंदीदा चेहरा हो सकती हैं । इन दिनों भंडारी की सक्रियता बढ़ी है वहीं यह भी आकलन किया जा रहा है कि संभवतः भंडारी प्रतिस्पर्धा करने के बजाय पार्टी से सर्वसम्मति से स्वागत की अपेक्षा रखती हों । संभवतः इसलिए, जब उनके करीबी नेता सक्रिय राजनीति में वापसी के मुद्दे पर उनकी प्रतिक्रिया जानना चाहते हैं, तो वो यह तर्क देती हैं कि ‘अगर पार्टी इसे जरूरी समझेगी तो देखा जाएगा । ’भंडारी के एक करीबी नेता का कहना है कि हालांकि अभी तक कोई निश्चित स्वरूप नहीं बन पाया है, लेकिन पार्टी के अंदर विरोधाभास बढ़ गया है, ऐसे में केपी सत्ता सौंप सकते हैं । इसमें प्रचंड–माधव फैक्टर भी शामिल हो सकता है ।’

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एक टेलीविजन इंटरव्यू में सक्रिय राजनीति के बारे में पूछे जाने पर भंडारी ने कहा, ‘मैंने अभी तक अपना मन नहीं बनाया है । मुझे नहीं पता कि मैं प्रत्यक्ष राजनीति में लौटूंगी या नहीं । देश के हालात को देख रही हूँ । लेकिन मैंने राष्ट्रीय एजेंडे में मुख्यधारा के राजनीतिक दलों का समर्थन करने के बारे में सोचा है ।’

उन्होंने कहा कि वह ऐसे काम करने में सक्रिय रहेंगी जो देश और लोगों के लिए अच्छा होगा । एमाले को प्यार करती हूँ क्योंकि मैं कृतघ्न नहीं हूं । ’ इससे उनकी रुचि का अहसास तो हो ही जाता है किन्तु पूर्व राष्ट्रपति का पुनः सक्रिय राजनीति में आना मर्यादित नहीं माना जा सकता है क्योंकि राष्ट्रपति का पद एक ऐसा पद है जो दलीय संबद्धता को अस्वीकार करता है । पार्टी के संकीर्ण दायरे, मर्यादाओं से ऊपर उठने वाला व्यक्ति ही राष्ट्रपति के पद के लिए तैयार होता है । पूर्व हो जाने पर भी वह पद गरिमामय प्रकृति का होता है । ऐसे में उस महत्त्वपूर्ण पद से मुक्त हुआ व्यक्ति अगर पुनः राजनीतिक दलदल में आना चाहता है तो, इसका मतलब है कि उसे अपनी गरिमा की समझ नहीं है । सक्रिय राजनीति की चाहत को ‘सत्ता भोग’ के संदर्भ में समझा जाना चाहिए ।

डॉ श्वेता दीप्ति
सम्पादक, हिमालिनी

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