आई ना कुछ खबर संविधान की …

कञ्चना झा:
इन्तहाँ हो गयी इन्तजार की
आई ना कुछ खबर संविधान की ।
अब तो बस यही पंक्ति नियति बन गई है नेपाली जनता के लिए । संविधान, संविधान, कब आयेगा ये संविधान – विक्रम सम्वत् २०६२-६३ मंे हुए जन आन्दोलन नेपाल की राजनीतिक व्यवस्था में यू र्टन लेकर आया । राजा के हाथ में रही सभी शक्ति जनता ने ले ली और स्थापित हो गई एक नई राजनीतिक प्रणाली । इस परिवर्तन के साथ ही नेपाल संघीय लोकतान्त्रिक गणतन्त्र बन गया । राजनीतक दलों में इतना जोश था कि, उन्होंने दो साल के अन्दर नया संविधान जारी करने का उद्घोष कर डाला । राजनीतिक दलों की घोषणा अव्यावहारिक होते हुए भी जनता को विश्वास था कि दो साल के अन्दर उन्हे नया लोकतान्त्रिक संविधान मिलेगा । जनता अच्छे दिनों की कल्पना करने लगी, मनचाहा संविधान मिलेगा और कुछ ही दिनों में देश की अर्थ व्यवस्था दौडÞ पडेÞगी । बिजली, पानी, सभी को रोजगार और भोजन सब कुछ मिलेगा बस थोडÞे ही दिनों की तो बात है । अशान्ति और गरीबी तो बस अब कुछ दिनों का ही मेहमान है समझकर बडÞी संख्या में, बडेÞ उत्साह के साथ पहली बार लोगों ने संविधान सभा के चुनाव में भाग लिया ।

निर्वाचन में अत्यधिक मत प्राप्त कर माओवादी संविधानसभा की सबसे बडÞी पार्टर्ीीन गयी । काँगे्रस, एमाले और मधेशवादी दलों ने भी अपनी अच्छी उपस्थिति जताई, यद्यपि किसी भी दल को जनता ने स्पष्ट बहुमत नहीं दिया । जनता की इच्छा थी कि संविधान बन रहा है तो उसमें हर तबके के लोगों के विचार को समाहित किया जाय और इसलिए उन्हांेने किसी भी एक दल को शक्तिशाली बनने नहीं दिया । लेकिन दो साल गुजरते देर नहीं लगी और राजनीतिक दलों का असली रंग सामने आ गया । दो साल के अन्दर संविधान देने की बात नेतागण भूल गए और फिर ६ महीने का समय मांगा गया । राजनीतिक दलों के बीच, संघीयता, शासकीय स्वरूप और निर्वाचन प्रणाली जैसे कुछ अहम मुद्दे में सहमति नहीं हो पाई और संविधान जारी करने की तारीख फिर बढर्Þाई गई, फिर बढर्Þाई गई और अन्ततः चार साल में भी नेता गण संविधान नहीं बना पाये । राजनीतिक दलों की अकर्मण्यता को देखकर सर्वोच्च अदालत ने हस्तक्षेप किया और संविधान सभा को अंतिम मौका दिया लेकिन दर्ुभाग्य, नेतागण इस मौके का भी उपयोग नहीं कर पाए और संविधान बनाये बगैर संविधानसभा का विघटन हो गया ।
पहली संविधानसभा अपना मकसद पूरा नहीं कर पायी । फिर दूसरी बार संविधानसभा का निर्वाचन हुआ और इसबार काँग्रेस सबसे बडÞी पार्टर्ीीन गयी । एमाले दूसरी और पहले संविधानसभा में बहुत अच्छे मत प्राप्त करने वाली एमाओवादी और मधेशवादी दल की स्थिति इस बार अच्छी नहीं रही । फिर भी नेतागण पुरानी गलती नहीं दोहराएंगे कहते हुए पिछले साल माघ- ८ गते को घोषणा कर दिया कि अगले साल ठीक इसी दिन संविधान जारी करेंगे । लेकिन एक बार फिर वैसा नहीं हो सका जैसी उन लोगों ने प्रतिबद्धता व्यक्त की थी । संविधान जारी करने की समय सीमा अन्त होने से दो दिन पहले विभिन्न राजनीतक दलों के नेता ने संविधानसभा भवन में जो करतूत दिखाया, उसने सारे विश्व के आगे नेपाल का सिर झुका दिया । माघ -६ गते दिन के एक बजे बुलाई गयी संविधानसभा की बैठक रात करीब १२ बजे शुरु हर्ुइ । संवैधानिक राजनीतिक संवाद सहमति समिति के अध्यक्ष डाक्टर बाबुराम भट्टर्राई ने संविधानसभा को सम्बोधन करते हुए कहा कि काफी प्रयास के बाबजूद दलों के बीच सहमति नहीं हो पायी । कुछ मामलों में दल बहुत नजदीक आ पहुँचे है जानकारी देते हुए उन्होने संविधानसभा अध्यक्ष सुवास चन्द्र नेम्वाङ से कुछ और मोहलत मांगा । लेकिन नेकपा एमाले की ओर से संविधानसभा अध्यक्ष नेम्वाङ ने एक न सुनी और प्रश्नावली समिति गठन का प्रस्ताव लेकर आने के लिए काँग्रेस सभासद चिनकाजी श्रेष्ठ को आग्रह किया । फिर जो कुछ हुआ उसे देखकर सारा देश शर्मसार हो गया । एमाओवादी और मधेशवादी दल के सभासदों ने काँगे्रस नेता चिनकाजी श्रेष्ठ को रोकने के लिए भरपूर प्रयास किया । वे कर्ुर्सियाँ तोडÞने लगे, माइक फेंकने लगे और संविधानसभा अध्यक्ष नेम्वाङ को लक्षित कर जूता प्रहार भी किया ।
काँग्रेस और एमाले अपने दो तिहाई के बल पर जबरदस्ती कर रहे थे और एमाओवादी एवं मधेशवादी दल का कहना था कि सब कुछ सहमति से ही हो । वैसे भी अभी संविधान निर्माण हो रहा है तो नये संविधान में सभी जनता का अधिकार सुनिश्चित होना चाहिए । जनता ने किसी भी एक दल को इसलिए नहीं बहुमत दिया क्यांेकि जनता भी चाहती है कि सभी मिलकर संविधान बनावें ।
जो भी हो लेकिन माघ-८ इसी खींचातानी में बीत गया । जनता को एक बार फिर निराशा हाथ लगी । निरीह नेपाली जनता करतेे भी तो क्या उसे तो सिर्फयह चिन्ता है कि रात में चूल्हा जलेगा या नहीं । शायद इसलिए अधिकतर नेपाली जनता माघ-८ गते के दिन भी संविधानसभा भवन के आगे न होकर ग्ौस लेने के लिए लाइन में खडÞे थे । उन्हे संविधान से भी ज्यादा जरुरत ग्ौस की है । काठमांडू कालोपुल के अशोक दंगाल कहते हंै- भाई मुझे गैस चाहिए, संविधान बने या नहीं बने अब नेपाली जनता को कोई मतलब नहीं । उन्हंे पता है कि संविधान सभा के ६०१ सदस्य, जो अपने आप को जनप्रतिनिधि कहते हैं वे राष्ट्र की सम्पति पर ब्रह्मलूट मचा रहे हैं । नेता को संविधान से कोई मतलब नहीं उन्हंे तो बस अपना कमीशन आना चाहिए । आक्रोश प्रकट करते हुए वह आगे कहते हैं- सबके सब गैर जिम्मेवार हैं ।
जिम्मेदार कौन –
हिन्दी में बडÞी पुरानी कहावत है- चोर चोर, मौसेरे भाई । बस यही हो रहा है नेपाल के संविधानसभा में । राजनीतक दलांे के नेता अपना निकम्मापन छिपाने के लिए एक दूसरे पर दोष मढÞ रहे हंै । सत्तारूढ काँग्रेस और एमाले का कहना है कि एमाओवादी और मधेशवादी दलों के हठ के कारण संविधान नहीं बन पाया । काँग्रेस सभापति सुशील कोइराला हों या एमाले के अध्यक्ष केपी शर्मा ओली दोनों का कहना है कि एमाओवादी और मधेशवादी दल संविधान न बनने देने के षड्यन्त्र में लगे हुए है । वहीं एमाओवादी और मधेशवादी दलों के नेता काँगे्रस और एमाले पर संविधान बनने न देने के षड्यंत्र में लगे रहने का दोष दिखा रहे हैं । नेपाल की राजनीति बडÞी तेजी से ध्र्रुवीकरण की ओर बढÞ रही है और दोनों समूह एक दूसरे पर विदेशी के इशारे पर चलने की बात करते हैं ।
दरअसल पहली संविधानसभा से ही गलती शुरु हो गई थी । जनता ने जिन नेताओं को दुलत्ती मारकर फेंक दिया था धीरे-धीरे उन्हीं लोगों के हाथ में शक्ति आ गयी । जनता के मत की इतनी खिल्ली उडर्Þाई गई कि निर्वाचन में हारे नेता प्रधानमन्त्री तक बन गये । देश और राजनीति कुछ नेता की मुठ्ठी में चली गयी और संविधानसभा में बैठे बाकी सभासद कथित शर्ीष्ा नेता के कठपुतली बनकर रह गये ।
संविधानसभा खर्च
राजनीतिक दलों के हठ के कारण संविधान जारी करने का समय बढÞता जा रहा है । और यह समय जितना बढÞ रहा है, राज्यकोष का खर्च भी उसी अनुपात में बढÞ रहा है । जन आन्दोलन २०६२-६३ से लेकर अभी तक संविधान के नाम पर करीब एक खर्ब ४१ अर्ब से ज्यादा खर्च हो चुका है । इस खर्च की बात करें तो यह राशि नेपाल के कुल गार्हस्थ उत्पादन का लगभग ७ प्रतिशत है । जनसंख्या के हिसाब से देखा जाय तो प्रत्येक नागरिक का करीब पाँच हजार रुपया खर्च हो चुका है, संविधान के नाम पर । संविधानसभा सचिवालय के अनुसार पहला संविधानसभा का कुल खर्च ९१ अर्ब २६ करोडÞ रुपया रहा । संविधानसभा निर्वाचन की ही बात करें और दोनों निर्वाचन में लगे खर्च को जोडÞा जाय तो लगभग २२ अर्ब खर्च हो चुका है । सभासद के वेतन और अन्य सुविधा को जोडÞा जाय तो वे लोग राज्य कोष से एक वर्षके समय में एक अर्ब १३ करोडÞ रुपया ले चुके हैं । प्रत्येक सभासद को मासिक पारिश्रमिक ४४ हजार १ सौ ८०, निजी सचिवालय खर्च २४ हजार ४ सौ, आवास ६ हजार ६ सौ, टेलिफोन २ हजार सहित विभिन्न आठ शर्ीष्ाक पर मासिक ८० हजार ६ सौ २८ रुपया मिलता है । इसके अलावा संसद या संविधानसभा की बैठक के लिए प्रति बैठक दो सौ, परिवहन खर्च १ सौ ५० और बैठक में सहभागी वाले दिन उन्हंे खाना खाने के लिए २ सौ ५० रुपया मिलते हंै । कितने तो ऐसे भी सभासद हैं, जो बैठक में सहभागी नहीं हुए लेकिन खाने का कूपन चार-चार बार झटकने में कामयाब रहे ।
इस एक वर्षकी बात की जाय तो संविधानसभा अध्यक्ष सुवास नेम्वाङ ने अकेले २५ लाख ५३ हजार ३ सौ ६० रुपया, उपाध्यक्ष ओनसरी र्घर्ती ने २१ लाख ४६ हजार ३ सौ ८०, विपक्षी दल के नेता एमाओवादी अध्यक्ष पुष्प कमल दाहाल ने २० लाख १० हजार ५ सौ १६ रुपया लिया है । जबकि इसी अवधि में आम सभासदों को करीब ९ लाख ६७ हजार ५ सौ ३६ रुपया मिला है । इसी तरह संविधानसभा और संस्ाद अर्न्तर्गत के विभिन्न समिति के सभापतियों ने इस एक वर्षकी अवधि में सुविधा के नाम पर १५ लाख ५७ हजार ७ सौ ५६ रुपया ले लिया है । लेकिन इतना पैसा लेकर भी समय पर संविधान न देकर राजनीतिक दलों ने जनता के साथ जो धोखा किया है, इसकी सजा उन्हंे मिलनी चाहिए ।

