वैश्विक शक्तियों का खेल: अफगानिस्तान से यूक्रेन तक : प्रेमचन्द्र सिंह
प्रेमचन्द्र सिंह, लखनऊ । अफगानिस्तान और यूक्रेन दोनों ही वैश्विक शक्ति-संतुलन के केंद्र में हैं। अमेरिका, रूस और चीन जैसे बड़े देश अपने- अपने प्रभाव क्षेत्र को मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं, जबकि छोटे देश (जैसे यूक्रेन और अफगानिस्तान) इन संघर्षों में पिस रहे हैं। अफगानिस्तान से लेकर यूक्रेन तक वैश्विक शक्तियों (जैसे अमेरिका, रूस, चीन, यूरोपीय संघ) की रणनीति अलग- अलग होती है, लेकिन उनके मूल में आमतौर पर भूराजनीतिक प्रभाव, संसाधनों पर नियंत्रण, सुरक्षा चिंतायें और आर्थिक हित होते हैं।
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने तालिबान के साथ जो बातचीत की, वह अफगानिस्तान के लिए एक बड़ी भूल साबित हुई। उन्होंने अफगान सरकार को नजरअंदाज करके तालिबान से सीधी बातचीत की, जिससे अफगानिस्तान में हालात बिगड़ गए। अब वह यूक्रेन को लेकर भी वही कर रहे हैं। वह रूस के साथ बातचीत में यूक्रेन को अलग कर रहे हैं और अमेरिका की नीति को यूक्रेन की मदद से हटाने की ओर ले जा रहे हैं। यह यूक्रेन की संप्रभुता एवं अखंडता के लिए खतरे की घंटी है। यूक्रेन अपने खनिज संसाधनों पर अमेरिका को साझेदारी का अधिकार देने वाले एक समझौते पर हस्ताक्षर करने के लिए तैयार दिख रहा है, ताकि भविष्य में सुरक्षा की गारंटी मिल सके। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के समर्थक इसे अपनी जीत मान रहे हैं, क्योंकि वे पूर्व राष्ट्रपति जो बाइडेन के बिना शर्त यूक्रेन समर्थन की आलोचना करते रहे हैं। लेकिन यह अभी भी साफ नहीं है कि ऐसा समझौता यूक्रेन की सुरक्षा की गारंटी की प्राविधानों को सम्मिलित करेगा या नहीं। लेकिन यूक्रेन को यह जरूर समझना चाहिए कि अंतरराष्ट्रीय प्रसंगों में समझौता करने के मामले में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का उपलब्धि बहुत संतुलित नहीं रहा है। हालांकि, वह खुद को इस काम में माहिर मानते हैं, लेकिन उनकी पिछली उपलब्धियाँ उतनी असरदार और फलप्रद नहीं रही हैं।
राष्ट्रपति ट्रंप के संबंध में लिखी गई संस्मरण ‘द आर्ट ऑफ़ द डील’ में बताया गया है कि उन्हें सौदेबाजी पर पूरा भरोसा है। इस किताब में उनके द्वारा अपनाई जाने वाली रणनीति समझाई गई है, जिसमें एक अहम बात यह है कि किसी भी सौदे में अपनी ताकत और क्षमता का इस्तेमाल करके उसे अपने फायदे में लाना ही अपेक्षित होना चाहिए। राष्ट्रपति ट्रंप ने तब सभी को चौंका दिया जब उन्होंने रूस- यूक्रेन युद्ध के समाधान के लिए सऊदी अरब में हुई बातचीत से यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की और यूरोपीय देशों को बाहर कर दिया। ऐसा करते हुए उन्होंने अपनी ही सलाह भूल गए, जिसमें वे कहते हैं कि ताकत और प्रभाव का सही इस्तेमाल ही सौदेबाजी में जीत की कुंजी है। भले ही उन्होंने यूक्रेन से 500 अरब डॉलर की अमेरिकी मदद की मांग की तुलना में कम कीमत (लगभग 350 अरब अमेरिकी डॉलर) पर दुर्लभ खनिजों का सौदा किया हो, लेकिन इससे अमेरिका की स्थिति रूस के सामने कमजोर हो गई। राष्ट्रपति ट्रंप ने न सिर्फ यूक्रेन पर पश्चिमी देशों के प्रभाव को कमजोर कर दिया, बल्कि बिना कोई रियायत लिए रूस को बातचीत की मेज पर बुलाकर उसके तीन साल के अलगाव को खुद ही खत्म कर दिया। इससे भी आगे बढ़कर, अमेरिका ने ही यूक्रेन को वार्ता से बाहर कर दिया, उसकी नाटो सदस्यता की इच्छा को ठुकरा दिया और यह तक कह दिया कि वह 2014 से पहले की अपनी सीमायें दोबारा हासिल नहीं कर सकता। राष्ट्रपति ट्रंप ने यूक्रेन पर युद्ध शुरू करने का झूठा आरोप लगाकर और राष्ट्रपति जेलेंस्की को “तानाशाह” कहकर उन्हें और कमजोर कर दिया। इस हफ्ते अमेरिका ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में रूस और यूक्रेन के बीच प्रश्नगत संघर्ष को लेकर रूस और चीन के साथ मिलकर मतदान भी किया।
राष्ट्रपति ट्रंप का रूस के प्रति नरम रवैया और सहयोगी रुख अमेरिकी नीति में बड़े बदलाव को दर्शाता है। पहले के अमेरिकी प्रशासन ने रूस पर आर्थिक प्रतिबंध लगाए थे और यूक्रेन को सैन्य तथा कूटनीतिक सहायता दी थी। अब यूक्रेन और पश्चिमी देश यह सोच रहे हैं कि राष्ट्रपति ट्रंप रूस से समझौता करने के लिए और क्या क्या रियायतें देंगे। हालांकि अफगानिस्तान और यूक्रेन की स्थितियाँ अलग हैं, लेकिन यूक्रेन को लेकर राष्ट्रपति ट्रंप की शुरुआती रणनीति उसी तरह की दिख रही है, जैसे अमेरिका ने तालिबान के साथ किया था, जिसका नतीजा विनाशकारी साबित हुआ। 9/11 के आतंकी हमलों के जवाब में, अमेरिका के नेतृत्व वाले गठबंधन ने अक्टूबर 2001 में अफगानिस्तान पर हमला किया। उन्होंने तुरंत तालिबान सरकार को हटा दिया और एक पश्चिमी समर्थित सरकार बनाई। लेकिन जब 2017 में ट्रंप राष्ट्रपति बने, तब तक युद्ध बिना किसी नतीजे के जारी था। स्थिति और मुश्किल इसलिए थी क्योंकि अमेरिका हर साल इस युद्ध पर करीब 27 अरब डॉलर खर्च कर रहा था। इसे देखते हुए, ट्रंप जल्द से जल्द अफगानिस्तान से हटना चाहते थे। हालांकि, उनकी राष्ट्रीय सुरक्षा टीम, जिसमें कई पूर्व और वर्तमान सैन्य जनरल शामिल थे, ने उन्हें समझाया कि अमेरिका को अफगानिस्तान में अपनी प्रतिबद्धता बढ़ानी चाहिए। इस नई रणनीति में तालिबान के साथ बातचीत के जरिए समाधान की शर्तें तय करना भी शामिल था।
अगले साल, जब कोई खास प्रगति नहीं हुई, तो राष्ट्रपति ट्रंप नाराज हो गए और कहा कि अमेरिका को अफगानिस्तान से बाहर निकल जाना चाहिए क्योंकि उनकी रणनीति पूरी तरह से नाकाम रही थी। इस दौरान, अमेरिका ने अफगान सरकार को शामिल किए बिना सीधे तालिबान से बातचीत शुरू कर दी, जो तालिबान की एक बड़ी मांग थी। यह वार्ता आगे चलकर अंतर-अफगान बातचीत की संभावना को अपने में समेटे हुए थी, लेकिन इसका नतीजा यह हुआ कि अफगान सरकार को इस प्रक्रिया से पूरी तरह अलग कर दिया गया। यह एक बेहद खराब समझौता था, जिसे अमेरिकी हितों के लिए नुकसानदायक और अफगानिस्तान के लिए विनाशकारी माना गया। आखिर में, तालिबान ने आतंकवाद के खिलाफ अपनी प्रतिबद्धताओं को पूरा नहीं किया और अंतर-अफगान वार्ता को भी ठीक से आगे नहीं बढ़ाया। इस समझौते ने तालिबान को ताकत के बल पर अफगानिस्तान पर कब्जा करने का रास्ता दे दिया। हालांकि, 2021 में ट्रंप के बाद राष्ट्रपति जो बाइडेन के प्रशासन में अमेरिका की अव्यवस्थित वापसी अफगान सरकार के लिए विनाशकारी साबित हुई। ट्रंप के तालिबान समझौते में अमेरिका के अफगान सहयोगियों को शामिल नहीं किया गया, बल्कि तालिबान को ज्यादा रियायतें दी गईं। यह आंशिक रूप से इस सोच पर आधारित था कि अमेरिकी डॉलर अफगानिस्तान में बेकार जा रहे थे। दुर्भाग्य से, यही रवैया अब ट्रंप के यूक्रेन को लेकर उनके रुख में फिर से दिख रहा है।
अतः रूस के साथ बातचीत को लेकर राष्ट्रपति ट्रंप का रुख यूक्रेन और पश्चिमी देशों के लिए अच्छा संकेत नहीं है। अगर राष्ट्रपति ट्रंप रूस के साथ वैसा ही शांति समझौता करते हैं जैसा उन्होंने तालिबान के साथ किया था, तो सिर्फ यूक्रेन की इस युद्ध में हार ही नहीं होगी बल्कि रूस के कब्जे वाली यूक्रेन अपनी करीब 20% भूमि भी गवां बैठेगा। इसके साथ ही यूरोप के बाकी देशों की स्थिति भी रूस के समक्ष कमजोर हो जाएगी। भारत का हमेशा मानना रहा है कि युद्ध किसी भी समस्या का हल नहीं है, बल्कि बातचीत से ही सभी पक्षों के लिए लाभदायक और स्वीकार्य समाधान निकाला जा सकता है। रूस- यूक्रेन संघर्ष के शांतिपूर्ण समाधान में भारत ने सहयोग की इच्छा जताई थी और कई देश भी इस विचार से सहमत थे। अगर ऐसा होता, तो संभव था कि दोनों देशों के लिए एक संतुलित और सम्मानजनक समाधान निकल सकता था। खैर, रामचरित मानस में कहा गया है –
‘होइहि सोइ जो राम रचि राखा। को करि तर्क बढ़ावै साखा’

लेखक।
लखनऊ,



