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राजनीतिक अस्थिरता के बीच राजतंत्र की आहट : डॉ. श्वेता दीप्ति

 

डॉ श्वेता दीप्ति, हिमालिनी अंक मार्च 025 । नेपाल में लंबे समय से चली आ रही राजनीतिक अस्थिरता का नेपाली अर्थव्यवस्था के सभी हिस्सों पर बड़ा और दीर्घकालिक प्रभाव पड़ा है । बहुदलीय प्रणाली की बहाली के लगभग तीन दशक बाद भी नेपाल की अर्थव्यवस्था मजबूत नहीं हो सकी है । नेपाल के जिम्मेदार पक्षों की अक्षमता, भ्रष्टाचार और गैरजिम्मेदारी के कारण आज लगभग ३० मिलियन नेपालियों का भविष्य अंधकार में डूबा हुआ है ।

राजनीतिक दलों की निष्क्रियता के कारण देश में परिवर्तन के नाम पर अनेक आंदोलन हुए, जनता को कष्ट सहना पड़ा, केवल व्यवस्था बदली, लेकिन स्थिति जस की तस बनी रही । आज एक पूरी पीढ़ी राजनीतिक अस्थिरता की स्थिति में है । नेपाल में व्यवस्था परिवर्तन का परिणाम यह है कि कुछ सीमित वर्गों को छोड़कर आम नेपाली जनता के लिए कोई उपलब्धि नहीं हुई है ।

देश के आमूलचूल परिवर्तन के लिए कई बार शहीदों ने अपने प्राणों की आहुति दी । लेकिन आज शहादत के सपने को सत्ता और स्वार्थ का हथियार बना दिया गया है । नेपाल में विकास की कमी का एकमात्र कारण राजनीतिक अस्थिरता है । यह भी स्पष्ट है कि राजनीतिक अस्थिरता क्यों रही है क्योंकि राजनीति को एक पेशा बना दिया गया है । राजनीति के माध्यम से धन कमाने की प्रथा विकसित होने के कारण देश अपनी दिशा नहीं बदल पाया है । जनयुद्ध के नाम पर देश की अर्थव्यवस्था को पचास साल पीछे धकेल दिया गया और देश तबाह हो गया ।

आज कोई भी इस बात का संतोषजनक उत्तर नहीं दे पाया है कि जनयुद्ध क्यों लड़ा गया और इसकी उपलब्धियां क्या थीं । २०६२–०६३ के जनांदोलन के बाद आए लोकतंत्र में कुछ सांस लेने की जगह देने के बजाय, संविधान का मसौदा तैयार करने में आठ साल लग गए । अब उसी संविधान में खामियां ढूंढी जा रही है, जिसे अरबों रुपये की लागत से बनाया गया था । इसी संविधान पर सवाल उठाने की कोशिश की गई है । आठ वर्षों के बाद २०७२ ई.पू. में नया संविधान बना और २०७४ ई.पू. में संविधान के अनुरूप नई सरकार बनी, लेकिन राज्य जनता की बुनियादी जरूरतों को भी पूरा नहीं कर पाया । पार्टियों के बीच आंतरिक संघर्षों ने देश की अर्थव्यवस्था को अत्यंत नाजुक बना दिया है । जिससे बार–बार राजनीतिक अस्थिरता पैदा हो रही है । नेपाली जनता के सारे सपने नेपाल की राजनीतिक पार्टियों और उनके भीतर के गुटों और उप–समूहों के स्वार्थ और लालच के कारण चकनाचूर हो गए हैं ।

नेपाल में लोकतंत्र की बहाली के बाद नेपाल में शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और विकास में परिवर्तन तो हुए हैं । लेकिन यह तथ्यात्मक नहीं है । महत्वपूर्ण यह है कि लोगों को लंबे संघर्ष के बाद व्यवस्था से क्या मिला ? मूलतः लोगों के आय स्तर में कितना परिवर्तन आया है, क्या लोगों को भोजन, आवास, वस्त्र, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाएं आसानी से उपलब्ध हो पाई हैं, देश में कितने उद्योग और कारखाने खुले हैं, तथा देश के राजनीतिक और प्रशासनिक क्षेत्रों तक लोगों की पहुंच की स्थिति क्या है – ये व्यवस्था परिवर्तन के मापन की इकाइयां हैं । इन सब बातों को देखते हुए, नेपाली जनता को कुछ भी हासिल नहीं हो पाया है और देश की वास्तविक अर्थव्यवस्था सकारात्मक नहीं है, सब कुछ नकारात्मक ही नजर आता है ।

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आज आम जनता के लिए शिक्षा प्राप्त करना आसान नहीं है । नेपाल की शिक्षा प्रणाली भी दो प्रकार की है – निजी और सार्वजनिक । राज्य दूरदराज के गांवों में स्कूल नहीं खोल पाया है और जो स्कूल हैं, उनमें भी समय पर शिक्षा उपलब्ध नहीं करा पाया है । प्रदान की गई शिक्षा भी अव्यावहारिक है क्योंकि यह दोहरावपूर्ण और अस्पष्ट है । नेपाल की शिक्षा न तो देश–अनुकूल है और न ही समय–अनुकूल ।
परिणामस्वरूप, आज के शिक्षित युवाओं को अपने प्रमाण–पत्र बक्से में बंद करके काम की तलाश में विदेश पलायन करना पड़ रहा है और वे बेरोजगार हो रहे हैं । अगर राज्य उद्योग–धंधे और कारखाने खोलता, विकास कार्यों में तेजी लाता, भ्रष्टाचार खत्म करता, सिविल सेवा प्रशासन को राजनीति से अलग करता और प्रशासनिक कामकाज को सुव्यवस्थित करता तो नेपाल जैसे छोटे देश को विकास में छलांग लगाने के लिए सालों इंतजार नहीं करना पड़ता । लेकिन पार्टी के लचर रवैये के कारण देश राहत की सांस नहीं ले पा रहा है ।

नेपाल के पिछड़ने का मुख्य कारण यह है कि राजनीति लालच और धोखाधड़ी का साधन बन गई है । नेपाल की राजनीतिक पार्टियों ने राजनीति को एक पेशा और लूट का जरिया बना दिया है, और राजनीति अराजनीतिक होकर शर्म की राजनीति में बदल गई है । इसने देश के हर हिस्से को दूषित कर दिया है । चूंकि राजनीति, जिसे नीति का सबसे महत्वपूर्ण पहलू माना जाता है, दुर्गंधयुक्त हो गई है, इसलिए वह सरकार के किसी भी अंग को साफ–सुथरा नहीं बना पाई है, जिसमें शिक्षा, स्वास्थ्य, प्रशासन, वित्त, कानून, संचार, विदेशी मामले आदि शामिल हैं । राज्य का कोई भी हिस्सा शुद्ध और स्वच्छ नहीं है ऐसे में देश विकास की गति से कैसे आगे बढ़ सकता है ? राज्य के विकास के लिए सबसे पहले राजनीतिक हस्तक्षेप समाप्त करना होगा । राजनीतिक हस्तक्षेप ने देश की अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक प्रभाव डाला है । भ्रष्टाचार ने जड़ें जमा ली हैं, क्योंकि नेपाली राजनीति को खराब करने की आड़ में पार्टी नेताओं और कार्यकर्ताओं को पोषित किया जाता है । आज देश की प्रमुख संस्थाएं, जैसे कि प्रशासनिक, शैक्षणिक और न्यायिक, अव्यवस्थित हैं और सभी भ्रष्टाचार में डूबी हुई हैं ।
नेपाल निरंतर राजनीतिक अस्थिरता के रास्ते पर है । देश अब राजनीतिक स्थिरता चाहता है । लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है । राजनीतिक स्थिरता आर्थिक विकास, सतत विकास और शांति के द्वार खोलती है । लोकतंत्र से संघीय लोकतांत्रिक गणराज्य में परिवर्तन का एहसास अभी तक आम लोगों को नहीं हुआ है । सरकार की गैरजिम्मेदाराना कार्रवाइयों और कुप्रबंधन से नागरिकों का असंतोष राजनीतिक अस्थिरता का मार्ग प्रशस्त कर रहा है । यह देश और देशवासियों के लिए एक त्रासदी है ।

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देश की इसी त्रासदी ने देश की राजनीति में एक हलचल पैदा कर दी है । एकबार फिर से देश उस राजशाही को हवा दे रहा है जिससे मुक्त हुए अभी ज्यादा समय नहीं हुआ है । ७७ साल के ज्ञानेंद्र २००१ में राजा बने थे । उससे पहले उनके बड़े भाई बीरेंद्र बीर बिक्रम शाह और उनके परिवार की नृशंस हत्या कर दी गई थी । २००५ तक वे बिना किसी कार्यकारी या राजनीतिक शक्ति के देश के संवैधानिक प्रमुख बने रहे । इसके बाद उन्होंने यह कहकर पूर्ण सत्ता अपने हाथ में ले ली कि वे राजशाही विरोधी माओवादी विद्रोहियों को हराने के लिए ऐसा कर रहे हैं । राजा ज्ञानेंद्र ने सरकार और संसद को भंग कर दिया । नेताओं और पत्रकारों को जेल में डाल दिया । देश में आपातकाल की घोषणा कर संचार व्यवस्था ठप कर दी गई । इसके बाद सेना के जरिए देश पर शासन करने लगे । जिसके बाद बड़े पैमाने पर देश में विरोध प्रदर्शन हुए, जिसके चलते ज्ञानेंद्र को २००६ में एक बहुदलीय सरकार को सत्ता सौंपने के लिए मजबूर होना पड़ा । सरकार ने माओवादियों के साथ एक शांति समझौते पर हस्ताक्षर किए । जिससे एक दशक से चले आ रहे गृहयुद्ध का अंत हुआ, जिसमें हजारों लोगों की मौत हुई थी ।
२००८ में संसद ने नेपाल की २४० साल पुरानी हिंदू राजशाही को खत्म करने के लिए मतदान किया । इसके बाद देश एक धर्मनिरपेक्ष गणराज्य में तब्दील हो गया और इसके बाद राजा ज्ञानेंद्र को गद्दी छोड़नी पड़ी । इस तरह नेपाल में २००८ में लोकतंत्र आ गया लेकिन अभी भी यह शैशवावस्था में है । नेपाल के राजनीतिक दलों के बारे में कभी कोई अनुमान नहीं लगाया जा सकता है । वो सत्ता के लिए किसी के साथ कभी भी गठबंधन कर सकते हैं । जिन माओवादियों की लड़ाई से नेपाल में राजशाही का अंत हुआ था, वह काफी कमजोर होकर कई टुकड़ों में बंट चुकी है ।

 

विशेषज्ञों का मानना है कि राजनीतिक अस्थिरता के लिए दूसरों को दोष देने की प्रवृत्ति सत्ता के लिए लगातार सरकारों की होड़ से उपजी है । लोकतंत्र की बहाली के बाद से जनता ने किसी भी सरकार को अपना कार्यकाल पूरा करते नहीं देखा है । आज शायद जनता की इसी निराशा ने पूर्व राजा ज्ञानेन्द्र के समर्थन में उसे खड़ा कर दिया है । नेपाल की बदहाल होती अर्थव्यवस्था और राजनीतिक दलों से लोग खुश नहीं हैं । वो स्थिर सरकार और मजबूत अर्थव्यवस्था चाहते हैं । लोगों में राजनीतिक दलों से निराशा है, यह बात पूर्व राजा ज्ञानेंद्र को पता है । वो इसे भुनाने की कोशिश कर रहे हैं । यही वजह है कि २००८ से आमतौर पर निष्क्रिय रहे पूर्व राजा ज्ञानेंद्र राजनीतिक सक्रियता दिखा रहे हैं । पूर्व राजा दो महीने बाद राजधानी काठमांडू लौटे थे । इन दो महीनों में पूर्व राजा ने झापा और पोखरा के साथ–साथ एक दर्जन से अधिक जगहों खासकर मंदिरों और तीर्थस्थलों का दौरा किया । इस दौरान उन्होंने लोगों से मेल–मुलाकात कर राजनीतिक हालात जानने–समझने की कोशिश की थी । उनके इस कदम को महत्वपूर्ण कदम के रूप में देखा जा रहा है । पूर्व राजा ज्ञानेंद्र का काठमांडू में स्वागत करने के लिए राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी के नेता और कार्यकर्ता आगे थे । जब नेपाल के अन्य राजनीतिक दल कमजोर हो रहे हैं तब राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी पूर्व राजा के समर्थन में आगे आ रही है । इस पार्टी ने पूर्व राजा और राजतंत्र की बहाली का समर्थन करना तब चुना है, जब नेपाल में अगले दो साल में चुनाव होने हैं । और राजा के स्वागत में उमड़ी भीड़ ने सरकार को कुछ चिंतित तो कर ही दिया है क्योंकि स्थानीय प्रशासन ने राजधानी काठमांडू के कुछ स्थानों पर अगले दो महीने के लिए निषेधाज्ञा लगा दी है । इस दौरान निषेधाज्ञा वाली जगहों पर पांच से अधिक लोग जमा नहीं हो सकते हैं और न ही कोई जुलूस निकाल सकते हैं और न ही धरना–प्रदर्शन कर सकते हैं । यह आदेश सरकार की मनोदशा को समझने के लिए काफी है ।

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जहाँ तक राजतंत्र की वापसी का सवाल है तो यह संभव नहीं है, तो असंभव भी नहीं है क्योंकि पिछले समय में जिस तरह कई देशों में परिवर्तन हुए हैं, उस तरह जनता की दृढ सोच और उसकी निराशा यहाँ भी कुछ रंग तो दिखा ही सकती है । फिर भी वर्तमान में यह समझा जा सकता है कि नेपाल में राजतंत्र की बहाली के लिए पूर्व राजा ज्ञानेंद्र को जिस बड़े जनसमर्थन की जरूरत है वह नहीं दिख रहा है । क्योंकि राजतंत्र खात्मे के बाद पैदा हुई पीढी ने तो राजशाही को देखा भी नहीं है, ऐसे में क्या इस पीढ़ी का जनसमर्थन पूर्व राजा ज्ञानेंद्र को मिल पाएगा ? और क्या नेपाल की मुख्यधारा की राजनीतिक पार्टियां ऐसा होने देंगी ? इसका उत्तर जानने के लिए हमें और इंतजार करना होगा ।

डॉ श्वेता दीप्ति
सम्पादक, हिमालिनी

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