अनिर्णय और विनाश : अजय कुमार झा
अजयकुमार झा, हिमालिनी अंक मार्च 025 । जीवन का सत्य कर्म से उपलब्ध है या ज्ञान से ? यदि कर्म से उपलब्ध है, तो उसका अर्थ होगा कि वह हमें आज नहीं मिला हुआ है, श्रम करने से कल मिल सकता है । यदि कर्म से उपलब्ध होगा, तो उसका अर्थ है, वह हमारा स्वभाव नहीं है, अर्जित वस्तु है । यदि कर्म से उपलब्ध होगा, तो उसका अर्थ है, उसे हम विश्राम में खो देंगे । जिसे हम कर्म से पाते हैं, उसे निष्कर्म में खोया जा सकता है । निश्चित ही जीवन का सत्य ऐसी कोई वस्तु नहीं है, जो कर्म करने से मिलेगा । जीवन का सत्य मिला ही हुआ है, उसे हमने कभी खोया नहीं है, उसे हम चाहें तो भी खो नहीं सकते हैं, हमारे प्राणों का प्राण वही है । हमने सिर्फ उसकी स्मृति खोई है, उसकी सुरति खोई है । जो हमारे लिए संशय का कारण बन गया ।
ध्यान रहे, जब चित्त संशय से बहुत गहन रूप से भर जाता है, तो विनाश को उपलब्ध होता है । क्यों ? क्योंकि जो यही तय नहीं कर पाता कि करूं या न करूं, वह कभी नहीं कुछ कर पाता । जो यही तय नहीं कर पाता कि यह हो जाऊं या वह हो जाऊं, वह कभी भी कुछ नहीं हो पाता । सृजन के लिए निर्णय चाहिए, असंशय निर्णय चाहिए । विनाश के लिए अनिर्णय काफी है । विनाश के लिए निर्णय नहीं करना पड़ता । किसी भी व्यक्ति को स्वयं को नष्ट करना हो, तो इसके लिए किसी निर्णय की जरूरत नहीं होती । सिर्फ बिना निर्णय के बैठे रहें, विनाश अपने से घटित हो जाता है ।
किसी को पर्वत शिखर पर चढ़ना हो, तो श्रम पड़ता है, निर्णय लेना पड़ता है । लेकिन पत्थर की भांति पर्वत शिखर से लुढ़कना हो घाटियों की तरफ, तब किसी निर्णय की कोई जरूरत नहीं होती और श्रम की भी कोई जरूरत नहीं होती । हम नेपाली नागरिक और नेता, किसान और विद्वान, उद्योगी व्यापारी और कर्मचारी ने हमेशा इस देश को संशय के चौराहे पर विनाश को उपलब्ध होने के लिए मजबूर किया है । क्योंकि विवेक शून्यता हमारी परंपरागत धरोहर है । जड़ता का स्वागत मूढ़ता का सम्मान हमारी जीवनशैली है । विज्ञान का अपमान और दरिद्रता का गुणगान हमारा संस्कार है । जिसकी पुष्टि राजवादी, समाजवादी, साम्यवादी, माओवादी, माक्र्सवादी, लेनिनवादी और गणतंत्रवादी रूपी चक्रव्यूह में सहज और सरल भावना मे गतिशील सीधा साधा नेपाली जनता को पीसते हुए आज पुनः राजतन्त्र और गणतंत्र रूपी चक्की का दाना बनाया जारहा है । क्योंकि “गणतंत्र हटाओ राजतंत्र लाओ” यह नारा और आंदोलन आम नेपाली नागरिक के अन्तःप्रज्ञा से प्रस्फुटित न होकर, मुट्ठीभर लोगों के राजनीतिक मनसाय का उपज है, जो भविष्य में भीषण दुर्घटना अर्थात् मास द्विविधा को उत्पन्न करनेवाला साबित होगा । जो पुनः एक अन्य आंदोलन के लिए युवाओं को अभिप्रेरित करेगा ।
जो लोग कहते हैं कि उन्होंने जनांदोलन के माध्यम से २४० साल पुरानी सत्तावादी सत्ता को उखाड़ फेंका, आपने उस सत्ता को क्यों उखाड़ फेंका ? आपने लोगों के बीच किस तरह के सपने फैलाये हैं ? और देश की स्थिति कहां पहुंच गयी है ? अगर हम कानून के शासन पर आधारित राज्य बनाने में सक्षम होते, अगर हम लोगों को सुशासन की भावना दे पाते, अगर हमने भ्रष्टाचार के खिलाफ शून्य सहनशीलता रखी होती, अगर हम सत्ता और पैसे की चाह में अनगिनत घोटालों में नहीं उलझे होते, तो क्या यह दिन आज आता ? क्या लोगों का एक समुद्र इस तरह सड़कों पर उमड़ पड़ता, और कहता कि वे राजशाही वापस चाहते हैं ?
यदि राजा ज्ञानेन्द्र किसी विदेशी का झंडा, आदर्श और नाम इस तरह से आगे बढ़ाने के लिए तैयार हो जाते, तो क्या उन्हें नारायणहिटी छोड़ना पड़ता ? यहां तक कि जिन लोगों ने गणतंत्र की निष्क्रियता से निराश नागरिकों और राजा के नाम सड़कों अपनी आवाजें आदित्यनाथ की वह तस्वीर देखी है! इसलिए, हमारा लेनिन और माओ से कोई सीधा संबंध नहीं है । लेकिन आदित्यनाथ का जन्म उत्तराखंड में हुआ था, जो कभी नेपाल हुआ करता था । और, वह भारत के गोरखपुर में गोरखनाथ पीठ के महंत हैं, जहां गोरखनाथ मंदिर के संरक्षक हमारे राजा हुआ करते थे! गुरु गोरक्षनाथ दोनों के एक सामान्य आध्यात्मिक योगी थे! उपरोक्त सभी आयामों और घटनाओं का ठीक ठीक विश्लेषण किया जाय तो सबके सब अनिर्णय के शिकार दिखेंगे । और जब आपका नेतृत्व वर्ग ही द्विविधाग्रस्त है, संशयग्रस्त है, डांवाडोल है तो आपका भविष्य अंधकारमय होगा ही, दुखद होगा ही, नेपालियों की तरह अस्तव्यस्त होगा ही ।
क्या आप नेपाल में जनांदोलन के दौरान सीताराम येचुरी और सरदार सुरजीत द्वारा दिए गए योगदान को भूल जाएंगे ? क्या हम भूल गए हैं कि नेपाल के अग्रणी सर्वोच्च नेता ने भारत में शरण ली थी और उनकी सेनाओं को भी भारत में ही प्रशिक्षण मिला था ? क्या हम भारत में कांग्रेस, एमाले, माओवादी सहित तत्कालीन सात दलों और माओवादियों के बीच हुए १२ सूत्री समझौते को भूल गए हैं ? क्या कल माओत्से तुंग के नाम पर पार्टी खोलकर, छाती पर लेनिन का नाम और झंडा लगाकर, दीवारों पर विदेशी नेताओं और शासकों की तस्वीरें चिपकाकर राजशाही के खिलाफ आंदोलन नहीं चलाया गया था ? क्या वे गृह युद्ध, जिनमें हजारों नेपाली मारे गए, विदेशी दर्शन और नीतियों पर आधारित नहीं थे ? क्या वे दिल्ली में बैठकर किसी समझौते पर नहीं पहुंचे थे ? क्या आपके शयनकक्ष में स्टालिन से लेकर चे ग्वेरा तक की तस्वीरें नहीं हैं ? क्या यूएसएआईडी से प्राप्त धनराशि हमारी संघवाद और वित्तीय साक्षरता के नाम पर नहीं है ? क्या सीपीएन, जो इतिहास की सबसे बड़ी पार्टी होने का दावा करती है, ने खुले तौर पर चीनी पार्टी के साथ प्रशिक्षण कार्यक्रम नहीं चलाया था ? क्या हमारा गणतंत्र सीताराम एचुरी सहित अन्य भारतीय नेताओं द्वारा नहीं लाया गया था ? क्या ओली द्वारा संसद भंग किए जाने पर देउबा, प्रचंड और माधव नेपाल ने हर जगह पत्र लिखकर विदेशी हस्तक्षेप की गुहार नहीं लगाई थी ?
जब ४ नवम्बर २००५ को नेताओं ने दिल्ली से सीधे निर्देश पर एक साथ मिलकर १२ सूत्रीय समझौते पर हस्ताक्षर किये थे, तब आपका राष्ट्रवाद कहां चला गया था ? जो कोई भी देश की गरिमा को विदेशियों को बेचता है और राष्ट्रवाद के नाम पर राजा का विरोध करता है, वह सच्चा राष्ट्रवादी नहीं हो सकता । वह राष्ट्रीयता और राष्ट्रवाद को नहीं समझ पा रहा है । विदेशी नेताओं और विचारकों के आदर्श को शिरोधार्य कर नेपाल में पार्टी खोलना और बहुमत प्राप्त कर सरकार के नेतृत्व करने में सफल होना; यह नेपाली जनता के भीषण अज्ञानता को प्रदर्शित करता है । जिस प्रकार समय पर सही निर्णय न ले पाने पर व्यक्ति और परिवार बर्बाद हो जाता है, उसी तरह देश भी बर्बाद और आवाद होता है । नेपाल में कांग्रेस के पतन का कारण भी यही है । बाकी अन्य पार्टी भी इससे अछूता नहीं है । साथ ही विदेशियों के इशारे पर निर्णय लेने के कारण भी नेपाली जनता के दृष्टि में सभी लोकतांत्रिक पार्टियां घृणा के केंद्र बना गई है । यदि हम भीतर से समझ रखते हैं तो फिर हमें किसी से भी डरने की आवश्यकता नहीं होगी । किसी के आगे हाथ नहीं फैलाना पड़ेगा । नहीं किसी के अधीनस्थ को स्वीकारने की विवशता होगी । हमें इजरायल के राष्ट्रवाद से समझ पैदा करना चाहिए था ।
आज के समय में भी राजतंत्र की वैधता पर बहस हो सकती है! रोमन साम्राज्य ने दो हजÞार साल पहले राजाओं को समाप्त कर दिया था, और ब्रिटिश साम्राज्य के खत्म होने के बाद भी राजशाही अभी भी मौजूद है । नागरिकों को अपनी भू–राजनीति, सांस्कृतिक परंपराओं और प्राथमिकताओं के आधार पर अपनी सरकार की प्रणाली चुनने का अधिकार है । हां, राजशाही को बहाल करने में उतनी ताकत और तर्क नहीं है, जितनी उसे जारी रखने में है । लेकिन जो लोग गणतंत्र चाहते हैं वे भी नेपाली नागरिक हैं, और जो लोग राजा के समर्थन में सड़कों पर उतर रहे हैं वे भी नेपाली नागरिक हैं । वैश्वीकरण के इस युग में, हम पुतिन के पक्ष में बोलते हैं, डोनाल्ड ट्रम्प के समर्थन में लिखते हैं और माओ की प्रशंसा करते हैं । अन्य लोग हमारे पूर्व राजा के पक्ष में बोल सकते हैं ।
कल लोग मूर्ति चोरों से नाराज थे । आज लोग उन लोगों से नाराज हैं जिन्होंने पशुपतिनाथ की जलहरी को गायब कर दिया । जनता ने देखा है कि कल जिन लोगों ने ज्ञानेंद्र शाह पर गैंडे की खाल बेचने का आरोप लगाया था, आज वही लोग क्विंटलों सोने की तस्करी कर रहे हैं । लोगों ने यह भी देखा । कल लोग सैन्य संकट में थे, आज लोग आर्थिक संकट में हैं । लाखों युवा विदेशियों का शिकार बनने को मजबूर हो गए हैं । बँधुआ मजदूर परंपरा नेपाल में समाप्त हो गई है, लेकिन रोमानिया के खेतों में नेपाली बँधुआ मजदूर क रूपमें काम कर रहें है । नेपाल में दास प्रथा समाप्त कर दी गई है, लेकिन हजारों नेपाली लड़कियां कुवैत और अरब के खाड़ी देशों में गृह कामदार के नाम पर बंदी बनी हुई हैं । आखिरकार ए सब क्यों है ? कहीं न कहीं हम मानसिक स्तर पर दयनीय अवस्था में हैं । बौद्धिक दिवालियापन के कारण हम अपने लिए स्वयं ही गड्ढा खोदते जा रहे हैं । बौद्धिक नपुंसकता पर इतनी गौरव है कि करोड़ों मधेसी जनता के मांग को स्वीकार कर समझौता तो करते हैं लेकिन उसे व्यवहार मे लागू करने से डरते हैं । सात बुँदे, दस बुँदे, बारह बुँदे, समझौता के पिटारी को खोलने से हम डरते हैं, क्योंकि निर्णय करना पड़ेगा जो हम जैसे नपुंसकों से संभव है ही नहीं । देशको अनिर्णय के मोहजाल में फसाकर देशभक्त कहे जाने वाले हम अपनी मूढ़ता पर मौज मनाते हैं । और विदेशियों के आगे हाथ फैलाते हैं ।
ध्यान रहे, सनातन धर्म प्रवृत्ति और निवृत्ति का मार्ग दर्शाता है । प्रवृत्ति मार्ग राज्य प्रशासन, समाज प्रबंधन, धर्म की रक्षा और कर्तव्य से संबंधित है । त्याग का मार्ग योग, ध्यान और वैराग्य से संबंधित है । गोरखनाथ परम्परा में इन दोनों मार्गों को अपनाया गया है । नेपाल में सनातन परंपरा मजबूत रही क्योंकि शाह वंश के राजा गोरखनाथ संप्रदाय का सम्मान करते थे । मेपयल के सांसद का उद्घाटन और समापन बाबा पशुपति नाथ के प्रार्थना और आशीर्वाद से होता था । इधर माता जानकी समग्र मधेश को एक सूत्र मे बांधकर रख रही हैं । इस तरह आज भी ली कुआन यू, महाथिर मोहम्मद, शिंजो आबे और मोहम्मद बिन राशिद अल मकतूम, फिदेल कास्त्रो, मार्टिन लूथर किंग जूनियर, ए.पी.जे. अब्दुल कलाम, हो ची मिन्ह और ह्यूगो चावेजÞ भी महलों की दीवारों के भीतर नहीं, बल्कि झोपडÞियों में रहने वाली नेपाली माताओं की कोख से पैदा हो सकते हैं । लेनिन, माओ और स्टालिन की तस्वीरें रखने वाले अपराधी अभी भी जनता को संशयग्रस्त करने की कोशिश कर रहे हैं! वर्तमान के राजबादी आंदोलन इसी का नतीजा है ।
यदि हम नेपाली लोग मूर्खता का शिकार होना बंद नहीं करेंगे तो सभी प्रकार की बुराइयां हमारा स्वागत करेंगी । वर्तमान कष्टदायक होगा और भविष्य भयानक होगा । हम तिब्बत की तरह अस्तित्वहीन हो जायेंगे । जो व्यक्ति, समाज और राष्ट्र विवेक का दुरुपयोग करते हैं, उनका न तो कोई वर्तमान होता है और न ही कोई भविष्य । मानव जीवन में नैतिक और राजनीतिक धर्म दोनों आवश्यक हैं । नीति मानव आचरण, सामाजिक जीवनशैली और राजनीति का मार्गदर्शन कर मार्ग प्रशस्त करती है, लोगों को धर्म के पथ पर गतिशील रहने के लिए प्रेरित करती है । यदि हम आज के भ्रमित करने वाले राजनीतिक माहौल और निराशाजनक सामाजिक ढांचे के सामने भी अपनी मूल सोच को बदलने का साहस और उत्साह नहीं दिखाते हैं, तो हमारे बच्चे हमें भष्मासुर जैसे उपनामों से पुकारेंगे ।
अब हमें इन मुर्खों द्वारा बनाए गए दुष्चक्र को तोड़ने का साहस दिखाना होगा, भले ही इसका मतलब यह हो कि हमें अपने बच्चों द्वारा खुद को अपमानित नहीं होने देना पड़े । और इसके लिए सद्गुणी, गुणवान, ज्ञानवान और सुसंस्कृत को अपने जीवन का परम आदर्श बनाने का साहस दिखाना होगा । हमारे वर्तमान नेताओं में से किसी में भी ये मूल्य नहीं हैं । ऐसा लगता है कि यह न केवल दुर्भाग्य है बल्कि हमारे देश के लिए अभिशाप भी है । चूंकि विश्व विकास और गतिशीलता का प्रतीक है, इसलिए हमें भी अपने जीवन में गतिशीलता लाने में सक्षम होना चाहिए । और इसके लिए सबसे पहले विचार को परिष्कृत और परिवर्तित करना आवश्यक है । इन परिष्कृत विचारों को व्यवहार में लाने से ही बेहतर और दूरगामी राजनीतिक और सामाजिक परिणाम प्राप्त करने की संभावनाएं बढ़ेंगी । राजनीतिक रूप से, सद्गुण प्रणाली उस उत्कृष्ट बौद्धिक परिवर्तन का विषय है । मैं आपसे अनुरोध करता हूं कि मेरी भावनाओं को समझें क्योंकि हत्या, डकैती, बेईमानी, षडयंत्र, युद्ध और दंगों से मुक्त एक विशुद्ध मानवीय और आनंदमय राजनीतिक व्यवस्था का कोई विकल्प नहीं है और आज के समय में जिस प्रकार शिक्षा का स्तर बढ़ा है, ऐसे में एक ऐसा वातावरण बनने की संभावना है जहां इस विषय पर गहन चर्चा हो सके ।
नोटः कोई भी समस्या कहकर नहीं आती, और एक ही रूप में भी नहीं आता है । हर बार नए रूपरंग और जटिलताओं से संयुक्त होता है । इसका समाधान खोजना हर व्यक्ति, राष्ट्र, समाज, संस्था और राजनीतिक दल के लिए अनिवार्य होता है । जो समाधान खोजने मे असफल अथवा निर्णय लेने में देर कर देते हैं उसका विनाश शुरू हो जाता है । हम निर्णय नहीं कर पा रहे है तो, इसका यह अर्थ नहीं कि दुनियाँ भी हमारी तरह मौन साधे हुआ है । कोरोना महामारी मे हम किस तरह विश्व के सामने जीवन का भीख मांग रहे थे, यह याद होगा ही ।

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