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जन का नहीं रहा जनकपुर ! – चन्द्रकिशोर

 

जन का नहीं रहा जनकपुर !
– चन्द्रकिशोर

जब कोई श्रम का हल चलाता है
जब कोई चुल्हे चौके का बेलन लेकर सड़कों पर नारे लगाता है
जब कोई अरमानों का पंक्चर मरम्मत करने की जिद ढोता है
जब कोई चुप्पियों के दरवाजे खोलने को मचलता है
जब कोई गुप्त अखाड़ों का मूर्ति भंजन जी भर कर करता है
जब कोई गर्भ का अंधेरा चीर कर उदय होता है
जब कोई अपार खामोशी भेदकर दसों दिशाओं में प्रतिध्वनित होता है
तब एक जनकपुर गढ़ पाता है
तभी कोई जनकपुर बन पाता है ।

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यह नई राजधानी जो है
जहां विकसित हुआ है
जीवंत सौंदर्य का नया व्याकरण
अपनाने लगे हैं पुरवासी नई राजसंहिता
कि अब रोकने, टोकने, झकझोरने के
चक्कर में पड़ना नहीं चाहता कोई,
“काहे माहौल बिगाड़ा जाए ” समझाने लगे हैं हर कोई।

“अहो रूपं अहो ध्वनि” वैभवयुक्त शहर
केवल सुत्रधार के तर्जनी निर्देश पर
करतब दिखाने को आतुर कतारें
करतल ध्वनि बजाने वालों की प्रतिस्पर्धा
जहां बैल के सींगों पर बजने लगी वीणा ।

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सियासत के सूजे हुए कन्धों पर
उसकी एक मीठी कसक थी ।
“सपना “
जिसे अकाल मरने का पता भी नहीं चला
और वह मर गया।

यह वह जनकपुर नहीं
जो कभी समय की शिनाख्त करता था
खुद अदम्य जिजीविषा का रचनाकार हुआ करता था,
सत्ता – गह्वर के दुष्प्रभावों की जादुई तलाशता था ।
नई संस्कृति में,
आलोचना के खतरे कोई नहीं उठाते
शीशे के घर में रहने लगे लोग, अब पत्थर नहीं चलाते।
शतरंज की बिसात पर फाइलों की शह और मात
यही व्यसन, यही अनुशासन।

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वह जनकपुर कहां है?
जहां उगते थे खुली आंखों के सपने सूरज कि मानिंद हर कोने में,
विवेक का चांद झांकते हर उस पगडंडियों में
सौहार्द बुनने वाली कहानियां गुंजते हर मेड़ों में
हां हां इसी जनकपुर ने था रचा अपना एक संविधान।
यह सत्ताधीशों का जनकपुर अब
जन का नहीं रहा जनकपुर अब !

चन्द्रकिशोर
कवि, लेखक, साहित्यकार एवं पत्रकार

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