जीवित राष्ट्र की पहचान है आन्दोलन:शवेता दीप्ति

देश की दशा और दिशा किसी ना किसी रूप में हर जागरुक नागरिक को चिन्तनशील बनाती है । आज देश जिस दौर से गुजर रहा है उसे सिर्फ संक्रमणकाल नहीं कहा जा सकता । दरअसल देश सुलग रहा है । असन्तोष की आग कब जोर पकड़ लेगी यह कहा नहीं जा सकता । लोकतंत्र को लेकर जितनी उम्मीदें आम जनता में थी वो सब समय के साथ धारासायी हो रही हैं । हम सभी जानते हैं और विश्व का इतिहास गवाह है कि वर्चस्व की नीति ही असन्तोष को जन्म देता है और वही किसी भी देश को विखण्डन के मोड़ पर ला खड़ा कर देता है । संविधान निर्माण का जो हौव्वा खड़ा किया गया है, उसका कोई सही रूप सामने नहीं आ रहा । देश का एक अहम हिस्सा जो कभी अत्यन्त समृद्ध हुआ करता था, आज आँकड़ा बता रहा है कि वह हर क्षेत्र में दिन ब दिन पिछड़ रहा है । आखिर इसके पीछे कौन सी 
वजहें हैं ? क्या सरकार खुद को इस मुद्दे से बरी कर सकती है ? आखिर सत्ता पक्ष की जिम्मेदारी क्या है ? उसे सन्तुष्ट किया जाय, समानता का अधिकार दिया जाय या फिर बहलावे का खिलौना देकर कुछ वक्त के लिए टाल दिया जाय ? ऐसे ही सवालों के साथ हिमालिनी ने बुद्धिजीवी वर्ग से जुड़ने की कोशिश शुरु की है, समय सन्दर्भ विचार श्रृंखला के रूप में । कुछ मुख्य क्षेत्र से जुड़े व्यक्तित्व के सामने इस प्रश्न को रखा गया और प्रतिक्रिया तथा विचारों के फलस्वरूप जो बातें उभर कर आईं उसका सम्पादित अंश आपके समक्ष है ।
- दीवार गिराने आए थे आप दीवार उठाते चले गए:माथवर सिंह बस्नेत,वरिष्ठ पत्रकार
- नियम बनने से नहीं होगा नीयत सही होनी चाहिए:अमर मोक्तान,राजनीतिक विश्लेषक
- जहाँ बहुलता है, वहाँ अन्तर्द्वन्द्ध स्वाभाविक है:श्री कृष्ण हछेथू,प्राध्यापक
- समाधान संसद भवन से ही निकलेगा:तुलानारायण साह ,मानव अधिकारवादी
- नई पीढ़ी को अवसर देना होगा:युग पाठक,साहित्यकार
- मधेश हक के लिए माओवादी का साथ छोड़ना होगा:सरिता गिरि,महिला नेतृ
- मधेश के उद्योगों का ह्रास सुनिश्चित नीति के तहत:विजय कर्ण ,पूर्व राजदूत
- नागरिकता नहीं तो राष्ट्रीयता कैसी ?:दीपेन्द्र झा ,कानून व्यवसायी
- देश का विखण्डन मधेश नहीं, पहाड़ी सोच कर देगी:युगनाथ शर्मा,पत्रकार
- आन्दोलन होता रहा है और होता रहेगा:रवि ठाकुर,पत्रकार

