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“बुढ़ापे का प्रांगण” (कहानी बदलाव परिवर्तन की) : मुकेश भटनागर,

 


मुकेश भटनागर, नोएडा । बुढ़ापे में अक्सर इंसान स्वयं को हतोत्साहित लाचार व अकेलेपन की स्थिति में पाता है।‌ जितना वह स्वयं को इस प्रकार महसूस करता है, उतना ही और चिंताग्रस्त व असहाय पाता है। अक्सर पैंसठ सत्तर उम्र के लोगों में यह लक्षण देखे जाते है। राम सहाय 72 वर्ष का हो चला था, पर न जाने क्यों उसे बुढ़ापे का कौन सा रोग लग गया, वह दिन भर आंगन में लेटे लेटे सोचता रहता और बूढ़े आम के बूढ़े पेड़ को निहारता रहता। पतझड़ के मौसम में जब टहनियों से पत्ते गिरते तो वह और भी अवसाद से घिर जाता, न जाने जैसे उसका सब कुछ लुटा गया हो।

एक दिन आंगन का वहीं आम का पेड़ उसका दोस्त बनकर उसके सामने आ खड़ा हुआ और कहने लगा – “खबरदार जो मुझे बूढ़ा पेड़ कहा मैं बूढ़ा नहीं हूं जरा पुराना हो गया हूं, हर बरस मैं ढेरों आम तुम्हें देता हूं, तुम्हारा पूरा परिवार चाव से खाता है, तुम्हारे बच्चो के बच्चे भी मेरे मीठे फल खा कर खुश होते हैं, मैं हर बरस इन दिनों का इंतजार करता हूं और खुद को नया और नौजवान समझता हूं, कोयल और दूसरे प्यारे प्यारे पक्षी मेरी शाखाओं पर आ कर बैठते है, घोसलां बनाते हैं चहचहाते है, जैसे कोई मधुर संगीत हो, हर दिन मैं वह सब देख आनंद महसूस करता हूं, मेरे पत्ते झड़ जाते हैं फिर नये आ जाते हैं और मैं नया महसूस करता हूं तभी तो मुझ पर मीठे रसदार फल आते हैं, राम सहाय तुम भी चिंतामुक्त और आनंदित रहा करो, कुछ न कुछ नया किया करो, तुम सारी चिंताओं से मुक्त हो जाओगे ऐसा मेरा वायदा है” – इतना कह कर पेड़ गायब हो गया।

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फिर नई सुबह फिर एक नया दिन आया, राम सहाय ने आम के पेड़ पर चहचहाते पक्षी देखें, तोते कच्चे आम खाते देखें पर पेड़ को कोई ग़म नहीं था वह जस का तस था, वह उसे और भी लहराता हुआ नजर आया, राम सहाय ने भी स्वयं में नयी उर्जा महसूस करी और बहुत दिनों बाद नदी किनारे सैर के लिए निकल पड़ा।

कुछ बच्चे नदी में पत्थर फैक रहे थे तो कुछ एक दूसरे को भी मारते। राम सहाय ने उनको रोका और समझाया पत्थरों से बांध बनते है, पत्थरो से सड़क बनती है राम जी का पुल भी पत्थरों से बना था, और आलिशान मकान भी बनते है, पत्थरो से मूर्तिकार कितनी सुंदर मूर्ति बनाता है, इनको लड़ाई के लिए इस्तमाल मर करो। बच्चों को बात समझ में आयी और वह एक नयी सीख ले कर अपने अपने घर चले गये।

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राम सहाय को फिर सपने वाले पेड़ की बात याद आयी, हर दिन कुछ नया करना चाहिए। उसने कुछ सुंदर गोल सपाट से पत्थर चुने और घर ले आया। वह अब जब भी पेड़ को देखता उसे कुछ नया रचनात्मक करने का मन करता। आखिर पेड़ से ही उसे पुनः एक चिंगारी मिली, आम के पेड़ पर लटकते नटखट बंदर देखता तो कभी पक्षियों को। राम सहाय ने अपने पोते को बुला कर रंग और ब्रश मंगवाया और नदी से बटोरें पत्थरों पर, चित्रकारी बना दी। गांव के सब लोगों को और बच्चों को भी राम सहाय की वह कलाकारी अच्छी लगी। उसको मान सम्मान मिला और उसकी सोच भी बदली । उसका सोया हुआ सुस्त प्रांगण अब कलाकारों का जमघट और कलाकृतियों का प्रदर्शनी स्थल बन गया।

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मुकेश भटनागर*
*वरिष्ठ पत्रकार, साहित्यकार एवं समाज सेवी*
*दिल्ली, भारत से*

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