कम्युनिस्ट आंदोलन अब समाप्ति की ओर : उपेन्द्र यादव ने कसा तंज
काठमांडू, ७ साउन (२०८२) — जनता समाजवादी पार्टी नेपाल (जसपा) के अध्यक्ष उपेन्द्र यादव ने कहा है कि नेपाल में कम्युनिस्ट आंदोलन अब अपने अंत की ओर बढ़ रहा है। उनका कहना है कि यह आंदोलन अब उदार प्रजातांत्रिक (लिबरल डेमोक्रेटिक) दिशा में भटक चुका है और अपनी मूल विचारधारा से दूर हो गया है।
उपेन्द्र यादव यह वक्तव्य पुष्पलाल श्रेष्ठ की ४७वीं स्मृति सभा में दे रहे थे। इस सभा के मंच पर माओवादी केन्द्र के अध्यक्ष पुष्पकमल दाहाल ‘प्रचण्ड’, एकीकृत समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष माधव कुमार नेपाल और नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव नेत्रविक्रम चन्द ‘विप्लव’ जैसे प्रमुख वामपंथी नेता भी मौजूद थे।
यादव ने कहा कि नेपाल में कम्युनिस्ट आंदोलन की नींव ही षड्यंत्रों के साथ रखी गई थी और यह प्रवृत्ति आज भी खत्म नहीं हुई है। उन्होंने कम्युनिस्ट पार्टी के संस्थापक महासचिव पुष्पलाल श्रेष्ठ का उदाहरण देते हुए कहा कि पार्टी की स्थापना के महज दो वर्षों के भीतर ही उन्हें षड्यंत्रपूर्वक महासचिव के पद से हटा दिया गया था।
उनके शब्दों में —
“नेपाल में जीवनभर गणतंत्र के पक्ष में और राजतंत्र के विरुद्ध बिना किसी समझौते के संघर्ष करनेवाले व्यक्तित्व के रूप में पुष्पलाल को लिया जाना चाहिए। दुर्भाग्य है कि २००६ साल में उन्होंने कलकत्ता में कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना की, लेकिन दो साल के भीतर ही षड्यंत्रकारी लोग पार्टी में घुस गए और २००८ साल में ही उन्हें महासचिव के पद से हटा दिया गया।”
उन्होंने कहा कि उस समय से लेकर आज तक कम्युनिस्ट पार्टियों में षड्यंत्र की संस्कृति बनी हुई है।
“षड्यंत्र तो कम्युनिस्ट पार्टी के जन्मकाल से ही चलता आ रहा है, जो आज तक खत्म नहीं हुआ है।”
आगे उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा —
“मुझे लगता है कि नेपाल में कम्युनिस्ट आंदोलन अब लगभग समाप्ति की स्थिति में पहुँच गया है। यह आंदोलन अब लिबरल डेमोक्रेटिक मूवमेंट की ओर भटक गया है।”
यह बयान ऐसे समय आया है जब नेपाल में वाम एकता को लेकर फिर से बहस हो रही है। उपेन्द्र यादव का यह वक्तव्य वामपंथी नेताओं के लिए एक तीखा संदेश माना जा रहा है, जिसमें उन्होंने न केवल कम्युनिस्ट इतिहास को कठघरे में खड़ा किया, बल्कि वर्तमान नेतृत्व की प्रासंगिकता पर भी सवाल उठाए।
उपेन्द्र यादव की यह टिप्पणी यह संकेत देती है कि नेपाल की वाम राजनीति अब वैचारिक और सांगठनिक संकट के दौर से गुजर रही है। ऐसे में उदार लोकतांत्रिक शक्तियों के लिए यह एक अवसर भी हो सकता है, जबकि वामपंथी दलों के लिए यह आत्ममंथन का समय है।


