पूर्वी नेपाल में सत्याग्रह का एक अनोखा आगाज : संतोष मेहता
संतोष मेहता, हिमालिनी अंक जुलाई, २०२५ ।
पुल टूटा, पर संकल्प नहीं
नेपाल के ताप्लेजुङ जिले के पवित्र शक्तिपीठ मुक्कुमलुङ (पाथिभारा परिसर) में वनों के विनाश के विरुद्ध एक अनोखा आंदोलन चल रहा है । असार १ (जून मध्य) को निर्धारित सामूहिक वृक्षारोपण में शामिल होने के लिए मैं और विभिन्न क्षेत्रों से हजारों लोग वहाँ की ओर चले । मेरे साथ मधेश मे अभियानरत चुरे बन जंगल संरक्षण अभियान के नेता दिपक यादब सहित की टोली जनकपुर से आए थे, जैविक दार्शनिक मोहन तिम्लसिना सहित एक गाड़ी मे हम लोग फेदेम से ढलान उतर रहे थे कि अचानक हेवा नदी का पुल टूट गया । कई घायल हुए, कई घायलों को बचाकर हम लोगों ने अस्पताल पहुँचाया । आगे जाने का मार्ग अवरुद्ध हो गया था, पर हम नहीं रुके । अगले दिन रास्ता साफ हुआ, और हम फुंगलिङ्ग की ओर बढ़े । वृक्षारोपण केवल पर्यावरण बचाने के लिए नहीं, बल्कि अपनी आस्था और पहचान बचाने के लिए था ।
वृक्षारोपण क्यों है सांस्कृतिक प्रतिरोध ?
राज्य आमतौर पर वृक्षारोपण को प्रोत्साहित करता है, लेकिन मुक्कुमलुङ में इसे दो बार रोका गया । अगले साल भी यही संघर्ष समिति ने ऐसा ही कार्यक्रम का आयोजन किया था उसवक्त भी राज्य ने अवरोध किया था । कारण ? क्योंकि यहाँ वृक्षारोपण केवल पर्यावरणीय कार्य नहीं, बल्कि आस्था, पहचान और राज्य की नीतियों के विरुद्ध एक सांस्कृतिक प्रतिरोध है । यहाँ वृक्ष लगाना केवल एक पर्यावरणीय कार्य नहीं, बल्कि किरात–राई समुदाय के मुन्धुम दर्शन के अनुसार, पूर्वजों की आत्मा को पुनर्जीवित करने का कर्म है । मुक्कुमलुंग (पाथिभारा) के लोगों ने अवरोधों के बावजूद वृक्षारोपण किया, क्योंकि यह उनके लिए प्रकृति, पूर्वजों और आत्मा से जुड़ाव का प्रश्न था । यह राज्य की उन नीतियों के खिलाफ प्रतिरोध है, जो प्रकृति को केवल “संसाधन” मानती हैं ।
वृक्ष और मानव सभ्यता
वन मानव सभ्यता के आधार हैं । वायु शुद्धि, जल संरक्षण, जैवविविधता, जलवायु संतुलन और आध्यात्मिक शांति–सभी वनों पर निर्भर हैं । नेपाल की अर्थव्यवस्था (कृषि, पर्यटन, जलस्रोत) भी वनों से जुड़ी है । प्राचीन परंपराओं में मंदिरों, नदी किनारों और सार्वजनिक स्थलों पर वृक्ष लगाने की प्रथा रही है । आज जब पूरी दुनिया पर्यावरणीय संकट से जूझ रही है, तब समाधान प्राचीन ज्ञान–प्रकृति के साथ सहअस्तित्व–में छिपा है ।
मुन्धुम दर्शनः वृक्ष ही हैं हमारे पहले पूर्वज
किरात–राई, लिम्बु और याक्खा समुदायों का मुन्धुम (मौखिक धर्मग्रंथ) कहता है । सृष्टि की शुरुआत पहाड़, जल और वृक्ष से हुई । “थुङ्वा मुन्धुम” के अनुसार, पहली संतान वृक्ष थी, जिससे अन्य जीव उत्पन्न हुए । मुन्धुम (धार्मिक ग्रंथ) एक गहन प्रकृतिवादी दृष्टिकोण है, जिसमें सृष्टि का आरंभ वृक्ष–पहाड–पानी से हुआ माना जाता है । किरात सभ्यता का आत्मिक मेरुदंड मुन्धुम; जो केवल धर्मग्रंथ नहीं, बल्कि एक जीवित ज्ञान–संहिता है, जो जलवायु संकट का वृक्षारोपण समाधान लेकर उपस्थित है । यह दर्शन प्रकृति और मानव के सह–अस्तित्व को ही नहीं, बल्कि वृक्ष को पूर्वज की आत्मा, जीवन का आधार और सामूहिक संबंध की जड़ मानकर उच्चतम सम्मान देता है ।
वृक्षारोपण की बात करते हुए, मुन्धुमीय जीवनदर्शन इस क्रिया को केवल पर्यावरणीय कर्म के रूप में नहीं, बल्कि एक पवित्र सांस्कृतिक और आत्मिक दायित्व के रूप में प्रस्तुत करता है । मुन्धुमीय दर्शन के अनुसार संसार की उत्पत्ति किसी ठोस भौतिक पदार्थ से नहीं, बल्कि एक प्रकार की अराजक परंतु चेतन शक्ति से हुई है, जैसेः थेक्थाप, याक्थाप या तगेरा निंग्वाफुमा । इस चेतना ने क्रमशः जल, हवा, मिट्टी और फिर वनस्पति को जन्म दिया ।
थुङ्वा मुन्धुम में कहा गया हैः पहले पहाड़ उठे, उनसे जल बहा, जल के स्पर्श से जीवन की कली फूटी । इस वर्णन के अनुसार, जीवन का मूल या पहली संतान वृक्ष ही है, जिससे अन्य प्राणियों ने जन्म लिया । इसलिए वृक्ष कोई पदार्थ मात्र नहीं, बल्कि सृष्टि का आदिम प्राण है । मुन्धुमीय विश्वदृष्टि में, आत्मा अमर है और शरीर के मरने के बाद भी अस्तित्व में रहती है । यह आत्मा पृथ्वी के विभिन्न तत्वों के साथ, अक्सर वृक्ष, पत्थर, जल या पहाड़ में एकाकार हो जाती है ।
सक्कार मुन्धुम में कहा गया है, मरने वाली आत्मा कभी पीपल बन जाती है, कभी सल्लो, कभी हवा–लेकिन अस्तित्व में बनी रहती है । इस आधार पर वृक्ष पूर्वजों का निवास स्थान हैं । इसलिए वृक्ष लगाना केवल हरियाली फैलाना नहीं, बल्कि अपने मृत पूर्वजों की आत्मा को पुनः निवास देना है । और वृक्ष काटना उन आत्माओं पर प्रहार करना है । परंपरागत किरात घर के आसपास विशेष वृक्ष लगाए जाते हैं–जिन्हें शिमङ्गा कहा जाता है । यह वृक्ष घर का रक्षक, कुल की आत्मा और देवी–देवताओं का निवास माना जाता है । मुन्धुम कहता है ः पूर्वज रिश्तेदारों से पहले वृक्ष हैं । वृक्ष के बिना घर मृत आत्माओं का स्थान है ।
मुक्कुमलुङ जैसे पवित्र स्थलों में वृक्षारोपण का संदर्भ मुन्धुम दर्शन में अत्यंत गहरा, पवित्र और सांस्कृतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जाता है । किरात लिम्बु समुदाय के मुन्धुम के अनुसार, मुक्कुमलुङ केवल एक भौगोलिक स्थान नहीं, बल्कि सृष्टि, आत्मा और पूर्वजों की चेतना का केंद्र है । यहाँ वृक्षों का अस्तित्व और रोपण धार्मिक, सामाजिक और आत्मिक चेतना की पुनस्र्थापना से जुड़ा हुआ है । इस स्थल को किरात मुन्धुम में ज्ञान, पूजा, सृष्टि और आत्मिक शिक्षा का स्थान माना जाता है । मुन्धुम के अनुसार, यहीं पर सृष्टि के पहले मनुष्यों को प्रकृति के नियम सिखाए गए थे । मानवीय ज्ञान और कला यहीं सिखाई गई थी ।
मुन्धुमीय कथाओं के अनुसार, मुक्कुमलुङ क्षेत्र में वृक्ष केवल वनस्पति नहीं थे, बल्कि उनमें पूर्वजों की आत्मा निवास करती थी । विशेष रूप से यहाँ देव वृक्ष÷फुङ्माबुङ या आत्मा निवास वृक्ष (जैसे सालः कुल आत्मा का प्रतीक, पीपलः रक्षा करने वाला वृक्ष, सल्लो, सिंसारे÷सिमलः स्त्री आत्मा का स्वरूप, लालीगुराँसः देव पुष्प, असारे, तामाको झार ÷ तिमुर, बरः देव वृक्ष) को सामाजिक ज्ञान के संरक्षक के रूप में देखा जाता था । वृक्ष काटना आत्मा काटने के समान है, और वृक्ष लगाना अपने कुल आत्मा का घर पुनः बनाना है–ऐसी मान्यता है ।
मुक्कुमलुङ क्षेत्र के लिए वृक्ष चयन करते समय केवल पर्यावरणीय पहलू ही नहीं, बल्कि मुन्धुमीय आध्यात्मिकता और सांस्कृतिक स्मृति को भी ध्यान में रखना होता है । वृक्षारोपण भी निश्चित विधि के साथ किरात पंचांग के अनुसार पूजा स्थल, मूल पत्थर (माङहिम) के आसपास, रास्ते के किनारे, पहाड़ की ढलान पर करने का निर्देश दिया गया है । मुन्धुम के अनुसार लिपा प्रणाली (सामूहिक कार्य) में सबसे उत्तम कर्म वृक्षारोपण है । इसलिए मुक्कुमलुङ में वृक्षारोपण करना कोई सामाजिक सेवा मात्र नहीं, बल्कि आध्यात्मिक उत्तरदायित्व है । यही कारण है कि यह प्रश्न आस्था का प्रश्न बन गया, जो पहचान से जुड़ गया और पहचान से जुड़े होने के कारण राज्य वृक्षारोपण के प्रति असहिष्णु हो गया ।
बौद्ध दर्शनः
बौद्ध दर्शन में वृक्ष का सबसे महान प्रतीक बोधिवृक्ष है–जिसकी छाया में सिद्धार्थ गौतम ने ज्ञान प्राप्त किया और बुद्ध बने । यह वृक्ष को केवल पर्यावरणीय घटक नहीं, बल्कि ज्ञान, बोध और मुक्ति का मूल स्रोत मानता है । बुद्ध ने स्वयं कहा है कि एक वृक्ष तुम्हें जितनी छाया देता है, उतना ही ध्यान भी देता है । बौद्ध परंपरा में वृक्षारोपण करना “भूत–वर्तमान–भविष्य“ का संतुलन बनाना है । नेपाल, तिब्बत, थाईलैंड, श्रीलंका आदि देशों में आज भी वृक्ष लगाने के कार्य को ‘सार्वजनिक ध्यान’ माना जाता है ।
जैन और ताओवादी दृष्टिकोणः
जैन धर्म अहिंसा की चरम प्रतिमूर्ति है । जैनों के लिए वृक्ष आत्मायुक्त प्राणी हैं । वृक्ष काटना हत्या है, वृक्ष लगाना उद्धार है । एक प्रसिद्ध जैन कथा में उल्लेख है कि जो एक पीपल को बचाता है, वह सौ प्राणियों को मुक्ति देता है । ताओवादी दर्शन (लाओ त्से, “ताओ ते चिंग“) में वृक्ष को विनम्रता, सहनशीलता, धैर्य और दीर्घजीवन का प्रतीक माना जाता है । वृक्ष लगाना ‘ताओ’ के अनुसार जीवनपथ चुनना है–जहाँ हम प्रकृति के साथ एकाकार होते हैं ।
हिंदू और वैदिक दर्शनः
वेद विशेषकर ऋग्वेद, अथर्ववेद प्रकृति और मानव के बीच के संबंध की आधारशिला हैं । वेदों में वृक्षों को ‘उद्भिद देवता’, ‘वनस्पतिरूपिणी माता’ और ‘पृथ्वी की आत्मा’ के रूप में चित्रित किया गया है । वेद वृक्ष को जीवनदाता ही नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक चेतना का वाहक मानते हैं । वृक्षारोपण वेदों के अनुसार “पुण्यकर्म” है, जो ऋत–सृष्टि की शाश्वत व्यवस्था को बनाए रखता है ।
इसी प्रकार विष्णुधर्मोत्तर पुराण के अनुसार पेड़–पौधे लगाने से अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त होता है । मनुस्मृति में कहा गया है, पेड़–पौधे लगाने से यज्ञ करने जितना पुण्य मिलता है । भविष्य पुराण में कहा गया है, संतान न होने पर दंपति के लिए पेड़ संतान के समान है । पद्म पुराण में लिखा है, पूजा स्थल, जलाशय के निकट पीपल का पेड़ लगाने से सैकड़ों यज्ञों का फल मिलता है । वराह पुराण में कहा गया है, जो एक पीपल, नीम, बरगद, दो अनार, संतरा, पाँच आम के पेड़ और दस फूलों के पौधे लगाता है, वह नरक में नहीं जाता । मत्स्य पुराण के अनुसार एक कुंड दस तालाबों के बराबर, एक पुत्र दस कुंडों के बराबर और एक पेड़ दस पुत्रों के बराबर होता है । शिव पुराण कहता है, जो ध्यान स्थल, सुनसान और दुर्गम स्थानों में पेड़–पौधे लगाते हैं, वे अपने अतीत और भविष्य की पीढि़यों को तार देते हैं ।
पेड़–पौधे नौ ग्रहों से संबंधित हैं । ज्योतिष ग्रंथों में नवग्रह शांति और दोषों से बचने के लिए विशेष पेड़ लगाने की विधि बताई गई है । जैसेः सूर्य के लिए मदार, चंद्रमा के लिए पलाश, मंगल के लिए खैर, बुध के लिए अपमार्ग (चिरचिटा), गुरु के लिए पीपल, शुक्र के लिए गुलार, शनि के लिए शमी, राहु के लिए दूर्वा, केतु के लिए कुश । आषाढ़ महीने में भगवान विष्णु की आराधना के साथ वृक्षारोपण की विधि भी शास्त्रों में बताई गई है । इस महीने में लगाए गए पेड़–पौधे दोषों को दूर करते हैं ।
आधुनिक संकट और प्राचीन समाधान
आज वैश्विक पर्यावरणीय संकट (जलवायु परिवर्तन, मरुस्थलीकरण) का कारण वृक्षों की कटाई है । पर आधुनिक “वृक्षारोपण अभियान” अक्सर यांत्रिक होते हैं–जैसे “एक पेड़ काटो, एक लगाओ” । जबकि पारंपरिक दर्शन इसे संबंधों की पुनस्र्थापना मानता हैः जैसे, प्रकृति से संवादः वृक्ष लगाते समय माटी, जल, और आत्मा से जुड़ना । संरक्षण की पद्धतिः मुन्धुम में वृक्ष काटने से पहले पूजा या प्रतिकार देना अनिवार्य है । सामूहिक जिम्मेदारीः लिपा प्रणाली में पूरा समुदाय भाग लेता है । पूर्वीय दर्शन वृक्ष को “संबंध पुनस्र्थापना” का माध्यम बनाता है; जहाँ मनुष्य, मिट्टी, जल, वायु और आत्मा के बीच पुनः संवाद होता है । हमें अब भी पूर्वीय ज्ञान, संस्कार और परंपरा के अनुरूप वृक्षारोपण को संवेदनशील, दार्शनिक और क्रांतिकारी कार्य के रूप में लेना चाहिए ।
रोपण ही नहीं, संरक्षण और काटने की विधि भी पूर्वीय दर्शन में उल्लिखित है । आज भी नेपाल, भारत, बांग्लादेश, तिब्बत, चीन में विशेष वृक्षों जैसे पीपल, बरगद, बेल, साल आदि को देवी–देवताओं के रूप में पूजा जाता है । इस कारण, वृक्ष काटना सहज नहीं होता; यह संरक्षण का आधार बनाता है । मुन्धुम में इन वृक्षों को काटते समय विशेष अनुमति, पूजा या प्रतिकार देना पड़ता है । किरात जीवनदर्शन में न्याय केवल सामाजिक या कानूनी हिसाब नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ संतुलन की पुनस्र्थापना है ।
वृक्षारोपण एक क्रांति है
मुक्कुमलुङ का संघर्ष हमें याद दिलाता है कि वृक्षारोपण केवल हरियाली नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पहचान बचाने का माध्यम है । राज्य की नीतियों के विरुद्ध एक शांतिपूर्ण प्रतिरोध है । पूर्वजों की आत्मा को जीवित रखने का तरीका है ।
आइए, हम वृक्षारोपण को “प्रोजेक्ट” न मानकर एक पवित्र कर्म के रूप में अपनाएँ । जैसे मुन्धुम कहता हैः “जब वृक्ष रोते हैं, तो समाज संकट में होता है ।”जब समाज में बाढ़ आती है, सूखा बढ़ता है या रोग फैलता है, तब पुराने मुन्धुमी पुजारी कहते हैंः वृक्ष रो रहे हैं, वृक्ष लगाओ, सेवा करो नीति में हैं । जब नीति खो जाती है, वृक्ष रोते हैं । इसलिए वृक्षारोपण एक प्रकार का प्रायश्चित भी है ।
मुक्कुमलुङ संघर्ष का विशिष्ट स्वरूप
विश्व के पर्यावरण आंदोलनों के इतिहास में १९७० का दशक एक महत्वपूर्ण मोड़ था, जब भारत के चिपको आंदोलन ने वृक्षों को बचाने के लिए महिलाओं के अभूतपूर्व संघर्ष को जन्म दिया । आज नेपाल के ताप्लेजुङ जिले का मुक्कुमलुङ क्षेत्र एक ऐसे ही नए युग का सूत्रपात कर रहा है, जहाँ वृक्षारोपण केवल पर्यावरणीय गतिविधि नहीं, बल्कि किरात समुदाय की सांस्कृतिक पहचान और धार्मिक आस्था का प्रतीक बन गया है । यह संघर्ष “नए चिपको” के रूप में उभरकर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ध्यान आकर्षित कर रहा है ।
चिपको आंदोलन की तरह ही मुक्कुमलुङ का संघर्ष स्थानीय समुदाय के जीवनयापन और आस्था से जुड़ा है । जहाँ चिपको में महिलाओं ने वृक्षों से चिपककर “हमारा जीवन, हमारा वन” का नारा दिया, वहीं मुक्कुमलुङ के लोग मुन्धुम दर्शन के अनुसार वृक्षों को अपने पूर्वजों की आत्मा मानकर उनकी रक्षा कर रहे हैं । दोनों ही आंदोलनों में धार्मिक विश्वासों ने संघर्ष को शक्ति प्रदान की है ।
सांस्कृतिक अधिकारों का प्रश्नः यह संघर्ष स्वदेशी समुदायों के उन अधिकारों की रक्षा का प्रतीक है जो उनकी धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं से जुड़े हैं । अंतर्राष्ट्रीय समर्थनः सिक्किम सहित विभिन्न क्षेत्रों से आए समर्थकों की भागीदारी ने इस आंदोलन को अंतर्राष्ट्रीय स्वरूप प्रदान किया है । धार्मिक सहिष्णुता का प्रतीकः हिन्दू, बौद्ध और किरात समुदायों की साझा आस्था इस स्थल को विशेष बनाती है ।
मुन्धुम दर्शन की वैश्विक प्रासंगिकता
मुन्धुम दर्शन में वर्णित प्रकृति और मानव के अटूट संबंध की अवधारणा आज के जलवायु संकट के समय विशेष रूप से प्रासंगिक है । जहाँ पश्चिमी दर्शन प्रकृति और मानव को पृथक मानते हैं, वहीं मुन्धुम दर्शन दोनों के सह–अस्तित्व पर बल देता है ।
मुक्कुमलुङ का यह संघर्ष नेपाल में पहले स्वदेशी–नेतृत्व वाले जलवायु आंदोलन के रूप में विकसित हो सकता है । संयुक्त राष्ट्र की स्वदेशी अधिकार घोषणा (ग्ल्म्च्क्ष्ए) इस तरह के आंदोलनों को कानूनी आधार प्रदान कर सकती है । मुक्कुमलुङ का संघर्ष हमें यह सीख देता है कि पर्यावरण संरक्षण और धार्मिक, सांस्कृतिक एवं पहचान एक ही सिक्के के पहलू हैं । जिस प्रकार चिपको आंदोलन ने विश्व को एक नई दिशा दिखाई, उसी प्रकार मुक्कुमलुङ का यह आंदोलन न केवल नेपाल बल्कि सम्पूर्ण विश्व के लिए प्रेरणा का स्रोत बन सकता है । वृक्ष केवल लकड़ी का स्रोत नहीं, बल्कि हमारी सभ्यता की जीवंत आत्मा हैं– यही संदेश मुक्कुमलुङ का संघर्ष हम तक पहुँचाता है ।

लेखक ः राष्ट्रीय मुक्ति पार्टी नेपाल के नेता हैं ।



