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मौलिक षडयंत्र के मूल : अजय कुमार झा

 

अजयकुमार झा, जलेश्वर । सन १७५७ के निर्णायक पलासी युद्ध में संपूर्ण बंगाल अंग्रेजों के अधीन हो जाते हैं । सन १७८३ प्रधान न्यायधीश के हैसियत से सर विलियम जॉन्स का आगमन हुआ, जिन्होंने अभिज्ञान शकुंतलम और मनुस्मृति जैसे संस्कृत शास्त्रों का सन १७९४ के करीब अंग्रेजी में अनुवाद किया । इसके बाद हेनरी टामस काल्वक सन १८०६ में ‘आन द वेदाज’ नामक निबंध लिखा । इसके कुछ वर्षों बाद जर्मनी के वान विश्व विद्यालय में आगस्ट विल्हेल्म फान स्लैगल संस्कृत का प्रधान अध्यापक नियुक्त हुए । इनके भाई फ्राइडिस स्लैगल और मित्र हॉर्न विल्हेल्म फान हांबोल्ट भी संस्कृत प्रेमी थे । विगत शताब्दी में ही कुछ ऐसे फ्रांसीसी तथा जर्मन दार्शनिक और विचारक हुए हैं, जिन्होंने पूर्ण ईमानदारी के साथ भारतीय सभ्यता, संस्कृति, धर्म दर्शन तथा जीवन पद्धति की उत्कृष्टता तथा उदात्तता को स्वीकार किया था । हांबोल्ट ने गीता के संबंध में लिखा है कि “कदाचित यह गंभीरतम उच्च वस्तु है, जो संसार को दिखानी है ।” इसके बाद जर्मनी के प्रसिद्ध दार्शनिक आर्थर शोपनहार ने फ्रेंच लेखक अंक वेटिल डुपेरीन द्वारा लैटिन में अनुवादित उपनिषद् को पढ़कर कहा कि “यह मानव मस्तिष्क की सर्वोच्च उपज है । उनके विचार अति मानुष हैं, और यह हमारी शताब्दी की सबसे बड़ी देन है ।” उनकी मेज पर यह उपनिषद हमेशा खुला रहता था और वो इसकी आराधना किया करते थे । विष्ट निट्रेज ने लिखा है, “जब भारतीय साहित्य पश्चिम में सर्वप्रथम विदित हुआ तो लोगों की रुचि भारत से आनेवाले प्रत्येक साहित्य ग्रन्थ को अति प्राचीन युग का मानने को थी । वे भारत पर इस प्रकार दृष्टि डालते थे जैसे कि वह मानव सभ्यता की दौलत के समान हो । इसके बाद तो पश्चिम में भारतीय साहित्य, विज्ञान और स्थापत्य की खोज तथा अध्ययन का होड़ ही लग गया और भारत की प्राचीन सांस्कृतिक सभ्यता को देखकर यूरोप आश्चर्यचकित रह गया ।”

इस प्रकार संस्कृति के गौरव को यूरोप पर जगमगाते देख इंग्लैंड के कुछ विद्वानों ने ईसाई धर्म ग्रंथों को संस्कृत में अनुवाद कराने का विचार किया । सन १८११ में कर्नल बौड़म ने ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में एक विभाग स्थापित किया, जिसका उद्देश्य ईसाई ग्रंथों को संस्कृत में अनुवाद करना और उच्चवर्णीय भारतीय को ईसाई बनने को अभिप्रेरित करना था । यहीं से ईसाई मिशनरियों का हिंदू विरुद्ध लिपिबद्ध षडयंत्र का आरंभ हुआ । इस विभाग (आमंदी ) का प्रथम महोपाध्याय होरेन हमैन विल्सन ने “दि रिलीजंस एंड फिलोसोफियल सिस्टम ऑफ दी हिंदुज” नामक पुस्तक लिखा; जिसका उद्देश्य जॉन मूर को पारितोषित प्रदान कर हिंदुओं के विश्वास को उत्कृष्ट खंडन करना था । इसके बाद सन १८०१–१८४० तक फ्रांस में संस्कृत प्राध्यापक रहे (यूजेन बर्नफ) के दो मुख्य जर्मन शिष्य; (एडोल्फ रॉय और मैक्समूलर ) ने वेद के संदर्भ में हीन भावना से ग्रसित हो वेद को साधारण सिद्ध करने के हेतु से अनेकों लेख लिखे । जिसके नकारात्मक प्रभाव आजतक भारत और वैश्विक हिंदु समाज पर देखा जा सकता है ।

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मूलर ने सन १८६६ में अपनी पत्नी को लिखे पत्र में लिखा था कि,“मेरा यह वेदों का संस्करण तथा मेरा वेद भाष्य, उत्तरकाल में भारत के भाग्य पर भी भारी प्रभाव डालेगा । यह उनके धर्म का मूल ग्रन्थ है, और मैं निश्चय पूर्वक कह सकता हूं कि उन्हें उसका दिग्दर्शन कराती गत तीन हजार वर्षों की दीर्घकालीन आस्तिक भावना को निर्मूल कर देगा ।” मूलर ने एकबार भारत के तात्कालीन मंत्री ‘ड्यूक आब अर्गाइल’ को लिखा था कि, “भारत का धर्म नष्टप्रायः है । अब यदि ईसाई धर्म उसका स्थान नहीं लेता है तो दोष किसका ?” सन १८६९ में स्वामी दयानंद और काशी के क्वींस कालेज के प्रिंसिपल रुडोल्फ हर्नले, बुलर, मोनियर और विलियम्स के बीच अनेक बार वेद विषय पर शास्त्रार्थ हुआ था । उन सबको यही लगा कि दयानंद को मूल वेद का ज्ञान होगा नहीं जिससे वो अवैदिक हो जाएंगे और ईसाई धर्म को स्वीकार कर लेंगे । परन्तु स्वामी जी ने पाश्चात्यों के इस हीन भावना को ताड़ लिया था । इसी तरह मद्रास विश्वविद्यालय के इतिहासाचार्य नीलकंठ शास्त्री ने लिखा था कि, “भारतीय समाज और इतिहास के विषय में पाश्चात्यों ने जो आलोचना पद्धति आरम्भ की है वह उन्नीसवीं शताब्दी के यूरोप की ईसाइयत के विचारों से प्रभावित है । राय बहादुर मि.आर.कृष्णाचार्य ने भी उपरोक्त विचार का समर्थन किया है ।
मैक्स मूलर और लार्ड मैकॉले दोनों ने भारतीय संस्कृति और सनातन धर्म के प्रति गहरे परंतु बहुत भिन्न–दृष्टिकोण अपनाए ।

मैक्स मूलर
एक जर्मन विद्वान थे जिन्होंने संस्कृत और वैदिक ग्रंथों का गहन अध्ययन किया । उन्होंने “सेक्रेड बुक्स ऑफÞ द ईस्ट” नामक श्रृंखला का संपादन किया, जिसमें उपनिषद, वेद, और अन्य ग्रंथों के अनुवाद शामिल थे । मूलर ने भारतीय संस्कृति को अत्यंत समृद्ध और गूढ़ माना । उन्होंने कहा था कि यदि मानवता की सबसे गहन आध्यात्मिक खोजों की बात की जाए, तो वह भारत की ओर इशारा करेंगे । हालांकि, उनके अनुवादों में ईसाई दृष्टिकोण की छाया थी और वे औपनिवेशिक एजेंडे से भी प्रभावित थे ।
लार्ड मैकॉले
ब्रिटिश औपनिवेशिक प्रशासक थे, जिन्होंने १८३५ में उन्होंने विवरण पत्र प्रस्तुत करते हुए भारतीय पारंपरिक शिक्षा प्रणाली को “अप्रासंगिक” बताते हुए अंग्रेजी शिक्षा को प्राथमिकता देने की सिफारिश की । उनका उद्देश्य था एक ऐसा वर्ग तैयार करना जो “रक्त और रंग से भारतीय हो, लेकिन सोच और नैतिकता में अंग्रेजÞ” हो । मानसिक उपनिवेश की नींव डालने हेतु से उन्होंने पारंपरिक गुरुकुल, वेद, उपनिषद, और संस्कृत शिक्षा को “निरर्थक” बताया । इसके स्थान पर अंग्रेजÞी शिक्षा को लागू किया गया, जिससे सनतानियों को अपनी जड़ों से काटकर पश्चिमी सोच के अनुरूप ढालने की कोशिश की गई । मैकाले का मानना था कि “जब तक हम भारत की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक रीढ़ नहीं तोड़ते, तब तक हम इस देश को जीत नहीं सकते ।” इस कथन का आशय था कि सनातन संस्कृति को कमजोर किए बिना भारत को पूरी तरह गुलाम नहीं बनाया जा सकता । मूलर ने वेदों, उपनिषदों और अन्य ग्रंथों का अनुवाद कर उन्हें वैश्विक मंच पर पहुँचाया । इससे भारतीयों को अपनी परंपरा पर गर्व करने की प्रेरणा मिली । मूलर ने वेदों को “मानव मस्तिष्क की सर्वोत्तम रचनाओं में से एक” कहा । उन्होंने ऋग्वेद को विशेष रूप से मानव इतिहास का सबसे पुराना ग्रंथ माना और इसे “प्राचीन आर्य चेतना की झलक” बताया । मैक्स मूलर का वेदों के प्रति दृष्टिकोण गहरा, विद्वत्तापूर्ण और साथ ही ईसाई धार्मिक पृष्ठभूमि से प्रभावित था । वे एक कट्टर ईसाई थे, और उनके वेद–अध्ययन में यह धार्मिक दृष्टिकोण कई बार झलकता है ।

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ईसाई मिशनरियों ने भारत में धर्मांतरण के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य और सेवा संस्थानों का उपयोग किया । कई आदिवासी क्षेत्रों में सनातन परंपराओं को “अंधविश्वास” कहकर नकारा गया और विदेशी धर्मों को “सभ्य” बताया गया । वर्तमान में मोदी विरोधी राजनीतिक पार्टियां, सिनेमा और टिभी धारावाहिक सांस्कृतिक समूह, सोशल मीडिया के लेखक, कलाकार, समाचार वाचक लगायत विश्वविद्यालय के बुद्धिजीवी समूह, गैरसरकारी संस्थाएं, उद्योगी– व्यापरियों का एक जबरदस्त समूह को हम देख रहे हैं । इन विद्वानों पर आरोप है कि उन्होंने वेदों को राजनीतिक और सामाजिक संघर्षों के दस्तावेजÞ के रूप में देखा, न कि आध्यात्मिक और दार्शनिक ग्रंथों के रूप में । इससे वेदों की आध्यात्मिक गरिमा को कमतर आँका गया । इसमें उनके बौद्धिक हैसियत और क्षुद्रता भी झलकता है । साथ ही सनातनियों को इन शत्रुओं से सावधान भी रहना चाहिए । इन उदाहरणों से स्पष्ट होता है कि जब वेदों की व्याख्या श्रद्धा, साधना और सांस्कृतिक समझ के बिना की जाती है, तो वह केवल शब्दों का अनुवाद बनकर रह जाती है–ज्ञान का नहीं । आचार्य चाणक्य के अनुसार, विद्वान शत्रु के विचारों को भी सावधानीपूर्वक जांचे बिना स्वीकार नहीं करना चाहिए, क्योंकि उसकी विद्वता के पीछे छिपी दुर्भावना अधिक घातक हो सकती है । चाणक्य नीति में कहा गया हैः
“नास्ति विश्वासः शत्रुषु सुहृद्भावेऽपि नित्यशः ।”

अर्थात् शत्रु चाहे जितना भी मित्रवत व्यवहार करे, उस पर पूर्ण विश्वास नहीं करना चाहिए । विद्वता से अधिक महत्वपूर्ण है उस विद्वता का उद्देश्य । यदि ज्ञान का प्रयोग किसी समाज को भ्रमित करने या उसकी जड़ों से काटने के लिए किया जाए, तो उससे सावधान रहना आवश्यक है । ज्ञान का उपयोग केवल जानकारी देने के लिए नहीं, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक प्रभाव डालने के लिए भी किया जा सकता है । जब ज्ञान का उद्देश्य किसी समाज की सोच को बदलना या उसे उसकी जड़ों से काटना हो, तो वह एक औजार बन जाता है–कभी निर्माण का, तो कभी नियंत्रण का । विद्वान शत्रु अपनी बुद्धिमत्ता का उपयोग करके आपको भ्रमित कर सकता है । वह अपने विचारों में सत्य का आभास देकर आपको गलत दिशा में ले जा सकता है । शत्रु यदि विद्वान है, तो वह अपने ज्ञान का उपयोग आपके विरुद्ध रणनीति बनाने में करेगा । कई बार शत्रु अपने व्यवहार में परिवर्तन लाकर मित्रवत दिखता है, परंतु यह केवल एक चाल होती है । ऐसे में उसके विचारों को बिना जांचे स्वीकार करना आत्मघाती होता है ।

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आज के संदर्भ में ज्ञान केवल पुस्तकों तक सीमित नहीं रहा–यह अब एक रणनीतिक संसाधन बन चुका है, जिसका उपयोग शिक्षा, तकनीक, व्यापार, राजनीति और यहां तक कि युद्ध में भी हो रहा है । युद्ध अब केवल हथियारों से नहीं, बल्कि ज्ञान और तकनीक के बल पर लड़े जा रहें हैं । साइबर युद्ध, सूचना युद्ध और जैविक हथियारों के पीछे गहन वैज्ञानिक ज्ञान होता है । यह दिखाता है कि ज्ञान अब एक रणनीतिक हथियार भी बन चुका है । ज्ञान का वैश्विक आदान–प्रदान अब इतना तेजÞ हो गया है कि संस्कृतियों पर प्रभाव डालना आसान हो गया है । सोशल मीडिया, ऑनलाइन कोर्स और डिजिटल कंटेंट के माध्यम से विचारों का प्रसार हो रहा है–कभी सकारात्मक रूप में, तो कभी सांस्कृतिक भ्रम, राजनीतिक उन्माद, धार्मिक दंगा और वैचारिक ऊहापोह को फैलाने के लिए । बेशक, आज का युग “ज्ञान का युग” है, लेकिन यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि उस ज्ञान का उद्देश्य क्या है । यदि ज्ञान का उपयोग मानव–कल्याण, नवाचार और सामाजिक सुधार के लिए हो, तो वह वरदान है । लेकिन यदि उसका उपयोग नियंत्रण, भ्रम या शोषण के लिए हो, तो वही ज्ञान मानवीय अस्तित्व के लिए एक चुनौती बन जाता है । जिसका प्रत्यक्ष प्रमाण ईरान–इजरायल, रूस–यूक्रेन, भारत–पाकिस्तान, भारत–चीन, ईसाई–इस्लाम, हिन्दू– इस्लाम, गोरा–काला, ब्राह्मण–शूद्र, शासक–शासित आदि के बीच उत्पन्न भयंकर विवाद और संघर्ष है । जो दिन प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा है । वैज्ञानिक और बुद्धिमान लोग मानव संहार के लिए ही अपनी पूरी ऊर्जा को सक्रिय किए हुए है । यह विचारणीय पक्ष है ।

अजयकुमार झा, जलेश्वर ।

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