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स्वाद की संस्कृति : मैथिली भोजन परंपरा

 

(धीरेन्द्र प्रेमर्षि द्वारा लिखित तथा कांतिपुर में प्रकाशित से साभार)

साभार कांतिपुर

काठमांडू, ९ अगस्त, ०२५। मिथिला का भोजन केवल व्यंजन सूची भर नहीं है, बल्कि यह एक संपूर्ण जीवन दर्शन है। इसमें ऋतु, रस और कौशल का ऐसा संगम है, जिसे ‘सचार’ कहा जाता है—जहां स्वाद के साथ समय, सोच और स्थान का भी स्वाद घुला होता है।

मिथिला भोजन : स्वाद, संस्कृति और परंपरा का संगम

मिथिला केवल गौरवशाली सभ्यता का उद्गम स्थल ही नहीं, बल्कि विपरीत परिस्थितियों में भी स्वाद की ‘सचार’ लगाने वाली एक अनूठी संस्कृति है। यहां के भोजन में भाषा और भाव की मसालेदारी, परंपरा का नमक, कला और आस्था का हल्दी, त्योहारों की मिठास—सब एक थाली में सजते हैं।
परिवार और समाज में भोजन केवल पेट भरने का साधन नहीं, बल्कि प्रेम, परंपरा और अपनापन बाँटने का माध्यम है। मां से बेटी तक पीढ़ियों में यह कला हस्तांतरित होती है।

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इतिहास और नारी का योगदान

मुगल आक्रमण के बाद उच्च कही जाने वाली जातियों की महिलाएं घर की चारदीवारी में सीमित हो गईं। ऐसे में उन्होंने अपने भीतर की रचनात्मकता को निखारते हुए चित्रकला, संस्कार गीत और पाक कला में अद्वितीय कौशल विकसित किया। मैथिली नारी के योगदान से ही यह भोजन आज भी स्वाद, संतुलन और पोषण का जीवंत उदाहरण है।

मौसमी संतुलन और स्वास्थ्य

मिथिला का भोजन ऋतु के अनुसार बदलता है—

  • वसंत (चैत–वैशाख) : सातु, मौसमी सब्जियां, आम का टिकुला, नीम–बैंगन की सब्जी।
  • ग्रीष्म (जेठ–असार) : चिउरा-दही, सातु, करेला भरवा, सूखी सब्जियों का झोल।
  • वर्षा (सावन–भादो) : बरी, अदौरी, कुम्हरौरी के झोल, ओल की चटनी, तरुवे।
  • शरद (असोज–कार्तिक) : दशहरा, कोजागरा, छठ के खास प्रसाद—ठकुआ, भुसबा, खजुर।
  • हेमंत (मार्गशीर्ष–पौष) : बगिया, खिचड़ी, बरी, मकर संक्रांति के तिल–गुड़ के व्यंजन।
  • शिशिर (माघ–फाल्गुन) : तिल-लड्डू, तरुल का तरुवा, फागुन का मालपुआ।
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हर मौसम में भोजन न केवल स्वाद, बल्कि शरीर को अनुकूल रखने का साधन है। ‘आदिमे घी आ अन्तमे दही’—यानी शुरुआत घी से और अंत दही से—यह परंपरा स्वाद और स्वास्थ्य दोनों का ध्यान रखती है।

विशेष व्यंजन और ‘तरुवा’ का महत्व

तरुवा यानी तले हुए व्यंजन—तिलकोर का तरुवा खास माना जाता है, जो ब्लड शुगर नियंत्रित करने और पाचन मजबूत करने में मददगार है। मखाना, जिसे आज ‘सुपरफूड’ कहा जाता है, मिथिला का प्रमुख उत्पादन है और कई पर्वों का अभिन्न हिस्सा है।

साँठ–सचार : परोसने की कला

मिथिला में परोसने की एक खास शैली है—‘साँठ’ (खाद्य सामग्री का संयोजन) और ‘सचार’ (सुंदर सजावट)। यह खास मेहमानों जैसे दामाद या समधी के लिए किया जाता है।

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व्यावसायिक पहल

आज वैश्विक भोजन संस्कृति के प्रभाव में भी मिथिला का भोजन अपनी मौलिकता बनाए हुए है। शेफ सन्तोष साह ने ‘मिथिला थाली’ को व्यावसायिक रूप से जनकपुर, ललितपुर और काठमांडू तक पहुंचाया है। भारत में मधुबनी के ‘मिथिला हाट’ और नेपाल के कई शहरों में यह धीरे-धीरे व्यवसाय का रूप ले रहा है।

निष्कर्ष

मिथिला का भोजन केवल पाककला नहीं, बल्कि एक जीवनशैली है—जहां परंपरा, प्रकृति और पोषण का अनुपम मेल है। यही कारण है कि यह स्वादिष्ट होने के साथ-साथ स्वास्थ्यवर्धक भी है।
जैसा कि एक उक्ति में कहा गया है—
“मिथिलाक भोजन तीन—कदली, कबकब, मीन”
अर्थात केला, पिंडालु और मछली—मिथिला के भोजन की आत्मा हैं।

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