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देवेन्द्र यादव: अपराधी नहीं, मधेस आंदोलन के एक प्रतीक : जेपी आनन्द स्टेटस

 

जय प्रकाश आनन्द स्टेटस, काठमांडू। मधेस आंदोलन के दौरान हुई घटनाओं के न्यायिक निष्कर्ष में राज्य की जीत के परिणामस्वरूप कई आंदोलनकारियों की तरह ही देवेन्द्र यादव को भी अपराधी की श्रेणी में रखा गया है, जबकि वे स्वयं मूलतः अपराधी नहीं हैं।

पुलिसकर्मी थमन बिक की निर्मम हत्या एक निंदनीय और अक्षम्य कृत्य है, इस पर कोई दो राय नहीं है। हालांकि, इस दुखद घटना में मधेस आंदोलन के उस समय के नेताओं जैसे देवेन्द्र यादव की संलग्नता, “गौर राइस मिल घटना” में उपेन्द्र यादव की संलग्नता, “मलेठ हत्याकांड” में केपी शर्मा ओली की भूमिका या माओवादी संघर्ष के दौरान हुई कई भयावह आपराधिक घटनाओं में प्रचंड की भूमिका से सिद्धांततः अलग नहीं है।

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फिर भी, मधेस आंदोलन के नेता न तो केपी ओली, प्रचंड जैसे शीर्ष नेता बन सके और न ही अपने ही बिरादरी के उपेन्द्र यादव की तरह प्रभावी साबित हुए। आम मधेसी जनता के लिए यह एक कड़वी सच्चाई रही कि आंदोलन को सफलता नहीं मिली और मधेसी हारे ही। यही कारण है कि उनके प्रति सहानुभूति तो है, लेकिन राजनीतिक हैसियत सीमित रही।

देवेन्द्र यादव एक प्रतीक हैं—ऐसे नेता जो अपनी सुरक्षा और राजनीतिक अस्तित्व के लिए किसी सशक्त दल का संरक्षण खोजते हैं। वे मधेसी हैं, लेकिन मानव तस्करी या बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार में शामिल होने वाली हैसियत के नहीं। उन्होंने अपेक्षाकृत आसान रास्ता चुना और शायद कांग्रेस को नजदीक माना। लेकिन, अपने घर की कमजोरी के समय जिस राजनीतिक आश्रय की उम्मीद की थी, वह भी उनके काम नहीं आया। सदस्यता मिलने के अगले ही दिन कांग्रेस ने उन्हें पार्टी से निष्कासित कर स्वच्छ छवि का संदेश देने की कोशिश की।

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उधर, कांग्रेस में लंबे समय से बुढ़ाते और कमजोर होते विजय गच्छदार, विमलेन्द्र निधि, सुरेन्द्र चौधरी और फर्मुल्लाह मंसूर के स्थान पर नई नेतृत्वकारी शक्ल की तलाश चल रही थी। इसी क्रम में देवेन्द्र यादव पर नजर थी, लेकिन यह प्रयोग भी कांग्रेस के लिए सफल नहीं हो सका और मधेस में कांग्रेस का कमजोर होता आधार नहीं संभल पाया।

इस घटनाक्रम पर ‘रास्वपा’ के मनीष जी ने भी हल्के-फुल्के अंदाज़ में टिप्पणी करते हुए इसे रोचक बताया है। 😄

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