भारत ने नेपाल के लिपुलेक वाले दावे को सिरे से खारिज कर दिया है,
काठमांडू/नई दिल्ली, ४ भाद्र।
लिम्पियाधुरा, लिपुलेक और कालापानी को लेकर नेपाल–भारत के बीच फिर से मसला जोड़ पकड़ा है। भारत ने नेपाल के दावे को सिरे से खारिज करते हुए इसे “ऐतिहासिक तथ्यों पर आधारित न होने वाला, एकतरफा और अस्वीकार्य” बताया है। वहीं नेपाल ने दोहराया है कि यह भूभाग उसके संविधान और आधिकारिक नक्शे के अनुसार “नेपाल का अभिन्न हिस्सा” है।
भारत की आधिकारिक प्रतिक्रिया
भारत के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जैसवाल ने बुधवार को प्रेस विज्ञप्ति जारी करते हुए कहा—
- लिपुलेक मार्ग से भारत–चीन के बीच सीमा व्यापार 1954 से चलता आया है।
- यह व्यापार हाल के वर्षों में कोविड और अन्य कारणों से बाधित हुआ था, जिसे अब आपसी सहमति से पुनः शुरू करने का निर्णय लिया गया है।
- नेपाल का भूभाग संबंधी दावा किसी भी ऐतिहासिक तथ्य या प्रमाण पर आधारित नहीं है।
- “एकतरफा दावे या कृत्रिम रूप से भूभाग विस्तार के प्रयास अस्वीकार्य हैं।”
भारत ने यह भी जोड़ा कि वह नेपाल के साथ शेष सीमा विवाद को संवाद और कूटनीतिक माध्यमों से हल करने के लिए तैयार है।

नेपाल की आपत्ति
भारत–चीन के बीच लिपुलेक मार्ग से व्यापार पुनः शुरू करने की सहमति पर नेपाल ने आपत्ति जताई है।
नेपाल के विदेश मंत्रालय ने तीन बिंदुओं वाली विज्ञप्ति जारी करते हुए स्पष्ट किया—

- नेपाल के संविधान में शामिल आधिकारिक नक्शे के अनुसार महाकाली नदी के पूर्व का क्षेत्र — लिम्पियाधुरा, लिपुलेक और कालापानी — नेपाल का अभिन्न हिस्सा है।
- भारत को बार–बार आग्रह किया गया है कि वह इस क्षेत्र में सड़क निर्माण, विस्तार या सीमा व्यापार जैसी गतिविधियाँ न करे।
- इस विषय की जानकारी नेपाल ने मित्र राष्ट्र चीन को भी करा दी है।
नेपाल का कहना है कि सीमा विवाद को केवल ऐतिहासिक संधियों, समझौतों, तथ्य और प्रमाणों के आधार पर, आपसी संवाद और कूटनीति के जरिये ही सुलझाया जा सकता है।
विवाद की पृष्ठभूमि
यह मुद्दा दशकों से नेपाल और भारत के बीच विवादित रहा है। 2020 में नेपाल ने संविधान संशोधन कर नया नक्शा जारी किया था, जिसमें लिम्पियाधुरा, कालापानी और लिपुलेक को आधिकारिक रूप से अपने भूभाग में शामिल किया गया। भारत ने उस समय भी नेपाल की इस पहल को खारिज कर दिया था।
अंत में
लिपुलेक विवाद ने एक बार फिर दोनों देशों के संबंधों में तनाव बढ़ा दिया है।
- भारत नेपाल के दावे को “कृत्रिम विस्तार” मानता है।
- नेपाल इसे “संवैधानिक और ऐतिहासिक अधिकार” बताता है।
अब समाधान का रास्ता केवल संवाद और कूटनीति से ही निकल सकता है, लेकिन दोनों पक्ष अपनी–अपनी ज़मीन पर अडिग दिख रहे हैं, जिससे निकट भविष्य में विवाद का हल निकलना कठिन दिखाई देता है।

