हिन्दी विभाग काशी हिंदू विश्वविद्यालय वाराणसी द्वारा हिन्दी ग़ज़ल पर अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन
दिनांक 29/08/2025 को काशी हिंदू विश्वविद्यालय वाराणसी और साहित्य अकादमी नई दिल्ली के संयुक्त तत्वावधान में हिन्दी विभाग के रामचंद्र शुक्ल सभागार में त्रिदिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी के द्वितीय दिवस आयोजन हुआ।
प्रथम आकस्मिक सत्र पर “ग़ज़ल, स्वरूप- संरचना, परंपरा और विकास” विषय पर परिचर्चा हुई।
इसकी अध्यक्षता कर रहे प्रो. कृष्णमोहन सिंह ने कहा कि हिंदी और उर्दू ग़ज़ल में यह भ्रम नहीं होना चाहिए कि उर्दू ग़ज़ल केवल इश्किया है और हिंदी ग़ज़ल आमजन की समस्याओं की शायरी है बल्कि दोनों के कथ्य में एकता भी है। हिंदी ग़ज़ल दुष्यंत के समय एक नई पहचान हासिल करती है लेकिन इसकी लोकप्रियता के पीछे ग़ज़ल की लंबी परंपरा का ही योगदान है। उन्होंने मुक्तिबोध की कविता प्रस्तुत करते हुए ड्राईंगरूम संस्कृति से बचने की बात कही।
प्रो. नसीम अहमद ने कहा कि जो ज़ुबान हिंदुस्तान में बोली जाती है वो ज़ुबान हिंदी है क्योंकि यह हिंदुस्तान में सबको जोड़ने का काम करती है। उन्होंने बताया कि शोधार्थी की पहली आवश्यकता है संदेह करना जो कह दिया उस पर यकीन नहीं करना बल्कि ख़ुद उसकी जांच परख करना चाहिए।
डॉ. लक्ष्मण गुप्ता ने अपने वक्तव्य में कहा कि हिंदी ग़ज़ल की शुरुआत में उर्दू जैसा कुछ नहीं मिलता बल्कि हिंदवी, रेख़्ता से होती हुई बाद में यह उर्दू में लिखी जाने लगी। ग़ज़ल को लेकर हिंदी-उर्दू विवाद भले हो रहा हो लेकिन यदि लिपि को अनदेखा कर दें तो हिंदुस्तानी भाषा और उर्दू में बहुत अंतर नहीं। अमीर ख़ुसरो ने ग़ज़ल की चार श्रेणियां बताई। मीर के यहां अवाम की बात बताई। इन्होंने ग़ज़ल से संबंधित अनेक आलोचकों के विचार और उनकी पुस्तकों की चर्चा की और कहा कि मेरे लिए ग़ज़ल का मतलब हिन्दुस्तानी ज़बान की ग़ज़लें हैं।
डॉ. भावना ने कहा कि ग़ज़ल का स्वरूप आज बदल चुका है जो अपनी पुरानी रूढ़ियों से और छंद के कठोर बंधन से मुक्त हो चुकी है। कोई भी भाषा लचीलेपन के बिना मृत हो जाती है। जिसमें हिंदी का एहसास है उसके कहन का अंदाज़ है, हिंदी संस्कृति है, वह हिंदी ग़ज़ल है।

डॉ. कासिम अंसारी जी ने कहा यह आयोजन हिन्दुस्तान का पहला कार्यक्रम है जहां हिंदी और उर्दू ग़ज़ल बगैर तकरार किए हाथ मिलाकर आगे बढ़ रही हैं।
आज ग़ज़ल पूरी तरह से हिंदुस्तानी ज़बान में है। ग़ज़ल में बहुत तरह के आरोप लगे कि यह सिर्फ़ इश्क़ और मोहब्बत की बात करती है लेकिन ग़ज़ल ने हौसला नहीं हर और वह अपनी तर्जुमानी आमफ़हम की भाषा में प्रस्तुत किया।
जसप्रीत कौर ने कहा कि हिंदी ग़ज़ल वर्तमान समय की एक सशक्त विधा है। इन्होंने पंजाबी ग़ज़ल और ग़ज़लकारों की विशेषताओं को प्रस्तुत किया और कहा कि पंजाबी ग़ज़ल में सामाजिक सांस्कृतिक यथार्थ, नारी की वेदना और पंजाब की लोकचेतना का चित्रण है। उन्होंने कशिश होशियारपुरी जी का शेर प्रस्तुत किया।
महबूब की ज़ुल्फ़ो में गिरफ़्तार नहीं है,
अब शायरी पाजेब की झंकार नहीं है।
भरोसा क्या करे कोई तिजारत के हवालों का
न सत्ता पे यकीं हमको न सत्ता के दलालों का।
इस सत्र में डॉ. भावना की पुस्तक ‘चुने हुए शेर’ का विमोचन हुआ। कार्यक्रम का कुशल संचालन डॉ. प्रभात कुमार मिश्र ने किया।
द्वितीय अकादमिक सत्र का विषय “हिंदी ग़ज़ल का परिप्रेक्ष्य, प्रेम और परिवार” था। इसकी अध्यक्षता कर रहे प्रो. सतीश पाण्डेय ने कहा कि हिंदी ग़ज़ल अपनी बोली और व्याकरण के अनुसार अपनी संस्कृति को व्यक्त करती है। हिंदी ग़ज़ल का वर्तमान चरित्र कथ्य की प्रमुखता है। हिंदी ग़ज़ल के नये इतिहास में ग़ज़ल का समावेश होना चाहिए। उन्होंने समकालीन ग़ज़ल में नारी चित्रण को प्रस्तुत किया।
प्रो. जगदम्बा प्रसाद दुबे ने अपने वक्तव्य में कहा कि “दूरियां बढ़ने से क्या मिला ज़माने को,जब तब भी आना जाना था और अब भी आना जाना है।” इसलिए हिंदी उर्दू ग़ज़ल की अलगाने की आवश्यकता नहीं।

धर्मेंद्र गुप्त साहिल ने हिंदी ग़ज़लों में प्रस्तुत विभिन्न विमर्श बाल विमर्श, वृद्ध विमर्श, पारिवारिक विघटन, आदि की बात की। ग़ज़ल जब दरबारों से निकलकर खेतों खलिहानों, बाजारों, चाय की दुकानों तक पहुंची तब वह हिंदी ग़ज़ल हुई।
डॉ. दिनेश पाठक ने अपने वक्तव्य में कहा कि हिंदी ग़ज़ल आम-आदमी की पीड़ा का मुकम्मल बयान है। सामाजिकता की बात करते समय राजनीतिक परिप्रेक्ष्य को नहीं छोड़ा जा सकता। हिंदी ग़ज़ल की वर्तमान संवेदना राजनीतिक प्रतिरोध है। इन्होंने दुष्यंत कुमार को आधुनिक हिंदी ग़ज़ल का जनक कहा।
डॉ. आदित्य विक्रम सिंह ने अपने वक्तव्य वशिष्ठ अनूप की ग़ज़ल तुलसी के, जायसी के, रसखान के वारिस हैं प्रस्तुत करते हुए कहा कि ग़ज़ल की खासियत है कि यह ज़बान में बस जाती है। उर्दू ग़ज़ल में नफासत है, नज़ाकत है, रूमानियत है लेकिन हिंदी ग़ज़ल में प्रेम होते हुए भी मुख्य रूप से लोक है, समाज है, मानव जीवन और रिश्ते हैं। हमारी फ़िल्मों में भी ग़ज़लें खूब गई गई हैं। उन्होंने मुनव्वर राणा के मां पर लिखी ग़ज़लों के संग्रह की जानकारी दी।
डॉ. टीकमणि पटवारी ने मध्यप्रदेश के गजलकारों की चर्चा की। उन्होंने बाबा धरणी की बेहतरीन ग़ज़लें प्रस्तुत कीं।
नेपाल काठमान्डू त्रिभुवन विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग की अध्यक्ष डॉ. श्वेता दीप्ति ने ग़ज़ल में जज्बातों के अभिव्यक्ति की बात की। उन्होंने कहा निराला, त्रिलोचन और शमशेर ने इसकी पृष्ठभूमि तो तैयार की लेकिन इसे उन्नति के शिखर तक दुष्यंत ने पहुंचाया। समकालीन हिंदी ग़ज़ल में दलित चिंतन, आदिवासी चिंतन, किसान चिंतन की अभिव्यक्ति पर अपने विचाराें काे रखा ।
कार्यक्रम का संचालन डॉ. प्रीति त्रिपाठी ने और धन्यवाद ज्ञापन डॉ मानसी श्रीवास्तव ने किया।
तृतीय अकादमिक सत्र में ‘वैश्विक चुनौतियां और हिंदी ग़ज़ल’ विषय पर परिचर्चा हुई। इस सत्र की अध्यक्षता श्री सुनील कुमार शर्मा ने कहा कि हिंदी ग़ज़ल मे सवालों के साथ – साथ उम्मीद की किरण भी दिखाई देती है। अब यह अपने आप में समृद्ध और लोकप्रिय विधा है। उन्होंने आज AI के बढ़ते प्रयोग से उत्पन्न समस्याओं के प्रति सचेत किया।
प्रो. मुन्ना तिवारी ने अपने वक्तव्य में कहा कि वर्तमान समय के ग़ज़ल समीक्षकों को विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। हिंदी को बचाने की पहली लड़ाई भक्तिकाल के उत्तरार्द्ध और रीतिकाल के आरंभ में लड़ी गई। जिस समय अरबी फारसी की ग़ज़ल अपनी रूमानियत के उत्कर्ष पर थी उस समय हमारे यहां घोर रूमानियत के बीच भी लोक संस्पर्श की ओर बढ़ रही थी। दुष्यंत के बाद की हिंदी ग़ज़ल हमारी हिंदी कविता के अधिक निकट है इसलिए इसे मुख्यधारा के साहित्य में पढ़ाया जाना चाहिए।
डॉ. राम सुथार ने कहा कि साहित्य की कोई भी विधा हो जो जन सरोकार से जुड़ी हो, जिसे लोग पसंद कर रहे हों उसका कथ्य बड़ा हो तो वह कविता बड़ी है। उन्होंने बनारस के शायरों की ग़ज़लों में व्याप्त विश्वस्तर की चुनौतियां चाहे युद्ध हो, तानाशाही हो, बाज़ारवाद हो सबको उदाहरण सहित प्रस्तुत किया।
ऑस्ट्रेलिया से ऑनलाइन जुड़ी डॉ. रेखा राजवंशी ने कहा कि आज की ग़ज़ल में समकालीन कविता की संवेदना मुखरित होती है। “चांद रोता रहा न जाने क्यों, दर्द होता रहा न जाने क्यों” उन्होंने बताया कि आज सोशल मीडिया और वैश्वीकरण के दौर में लोग ग़ज़ल को पढ़, लिख और ख़ूब सुन रहे हैं। हिंदी ग़ज़ल का भविष्य अपार संभावनाओं से भरा है।
नीदरलैंड से ऑनलाइन जुड़ी डॉ. ऋतु शर्मा ने बताया कि सूफी कवियों के समय से ग़ज़ल का स्वरूप भारतीय हुआ। विदेशों में गए लोग अपनी भाषा- संस्कृति के साथ -साथ ग़ज़ल को भी ले गए। उन्होंने बताया कि हम विदेशों में बच्चों को पहले छोटी- छोटी लय में लिखना सिखाते हैं धीरे धीरे ग़ज़ल या कविता की ओर ले जाते हैं।
डॉ. नलिनी सिंह ने अपने वक्तव्य में हिंदी ग़ज़ल में प्रस्तुत की जा रही पर्यावरण की समस्याएं और समसामयिक वैश्विक चुनौतियों के बारे में बताया।
चतुर्थ सत्र “हिंदी ग़ज़ल: धर्म, दर्शन, इतिहास एवं संगीत” विषय पर आधारित था। इस सत्र की अध्यक्षता प्रसिद्ध संगीतकार पद्म श्री राजेश्वर आचार्य ने की। उन्होंने ग़ज़ल और गायकी के संबंध और उसकी परंपरा को अनेक उदाहरणों के माध्यम से स्पष्ट किया। डॉ. ज्ञानेश पाण्डेय ने कई महत्वपूर्ण ग़ज़ल गायकों के द्वारा गाई गई प्रसिद्ध ग़ज़लों को प्रस्तुत करते हुए हिंदी ग़ज़ल से उसके संबंध को रेखांकित किया। इस सत्र में डॉ. विवेक मणि त्रिपाठी, डॉ. अंबरीश चंचल, डॉ. भूपेंद्र कुमार, डॉ. सुशांत शर्मा आदि ने अपने विचार प्रकट किए। सत्र का संचालन डॉ. रविशंकर सोनकर ने और धन्यवाद ज्ञापन डॉ. शशिकला ने किया।
सांध्यकालीन काव्यपाठ कमलेश भट्ट कमल, हरेराम समीप, अनिरुद्ध सिन्हा, डॉ० भावना, सुनील कुमार शर्मा, कपिल लामिछाने, लक्ष्मण प्रसाद गुप्त, शिव कुमार पराग, जसप्रीत कौर फ़लक, अभिनव अरुण,
धर्मेन्द्र गुप्त साहिल, गिरीशचंद्र पाण्डेय, सिध्दनाथ शर्मा, विजय कुमार त्रिपाठी आदि कवियों ने किया। इस कार्यक्रम में विभाग के शिक्षक, शोधार्थी और भारी मात्रा में छात्र छात्राएं उपस्थित रहे।
प्रस्तुति – दिव्या शुक्ला



