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दलित अपने आप में समस्या और समग्र विकास में विशाल बाधा : कैलाश महतो

 

कैलाश महतो, नवलपरासी । ‎’दलित’ शब्द संस्कृत के ‘दल’ धातु से बना है, जिसका अर्थ ‘कुचला हुआ’, ‘दबाया हुआ’, या ‘विभाजित’ होता है। इसका प्रयोग पहले सामान्य शब्दों जैसे : ‘मर्जित’, ‘खण्डित’ आदि के लिए होता था, लेकिन १९वीं सदी में ज्योतिबा फुले और डॉ. अंबेडकर के प्रयासों के बाद यह शब्द सामाजिक रूप से शोषित और उत्पीड़ित जातियों के लिए सामूहिक रूप से प्रयोग होने लगा। ब्रिटिश काल के एक मराठी-अंग्रेजी शब्दकोश (१८३१) में इसके प्रयोग का पहला प्रमाण मिलता है, जिसके बाद समाज सुधारकों ने इसे अछूत मानी जाने वाली जातियों के लिए एक आंदोलनधर्मी पहचान के रूप में स्थापित किया।

उत्पत्ति और विकास:

‎संस्कृत मूल:

‎’दलित’ शब्द संस्कृत से आया है और इसका शाब्दिक अर्थ है दलन किया हुआ, मसला हुआ, या कुचला हुआ।

प्रारंभिक प्रयोग:

‎शब्दकोशों में इसके कई अर्थ मिलते हैं, जैसे प्रफुल्लित, खण्डित, विक्षिप्त, और यहाँ तक कि गणित में विभाजन की क्रिया के लिए भी इसका प्रयोग हुआ है। यह किसी मनुष्य के लिए विशेषण के रूप में प्रयुक्त नहीं होता था।

आधुनिक युग में प्रयोग:

‎जे.जे. मोल्सवर्थ की डिक्शनरी (१८३१) : इस शब्द का आधुनिक काल में पहला प्रमाण ब्रिटिश काल में प्रकाशित जे.जे. मोल्सवर्थ की मराठी-अंग्रेजी डिक्शनरी में मिलता है, जिसका अर्थ समाज के उच्च कहे जाने बाले वर्गों के तुलना में अत्यन्त निचले कोटी के जन समूहों को इंगित करता है।

‎ज्योतिबा फुले : इन्होंने अछूतों और पिछड़ी जातियों के लिए ‘दलित-पटदलित’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल कर इस शब्द को समाज से जोड़ा।

‎‎डॉ. अंबेडकर : डॉ. अंबेडकर के आंदोलनों के बाद इस शब्द का व्यापक प्रयोग होने लगा, जिससे यह हिंदू समाज व्यवस्था में सबसे निचले पायदान पर स्थित सामाजिक रूप से वंचित जातियों के लिए एक सामूहिक पहचान बन गया।

‎आधिकारिक प्रयोग पर रोक: हालांकि, भारतीय संविधान में ‘अनुसूचित जाति’ शब्द का प्रयोग हुआ है, और भारत सरकार ने २००८ में राष्ट्रीय आयोग के निर्देश पर तथा २०१८ में इसे आधिकारिक दस्तावेजों में ‘दलित’ शब्द के प्रयोग को प्रतिबंधित किया है।

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अर्थ का विस्तार:

‎आज ‘दलित’ शब्द केवल अछूत या अनुसूचित जातियों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह आर्थिक रूप से पिछड़े, शोषित और दबे-कुचले सभी वर्गों, समुदायों व जात व जातियों के लिए भी प्रयोग किया जाता है।

‎यह शब्द अब केवल शोषण का बोध नहीं कराता, बल्कि दुख, अपमान, दासत्व, अशिक्षा, अवसरहीनता, हीन भाव के साथ-साथ विश्वबंधुत्व और क्रांति की आवश्यकता का बोध भी कराता है।

‎‎भारत और नेपाल के संविधानों ने भले ही दलितों का अर्थ और परिभाषा को व्यापक और आधुनिक किये गये हों, मगर सत्यता हिन्दु समाज में आज भी वही है, जो मनुस्मृतिक काल (200 ईसा पूर्व से 200 ईस्वी के बीच) से शुरु हुआ था। यह ग्रंथ हिंदू धर्म के कानूनों और सामाजिक भेदों को स्पष्ट रुप से दर्शाता है, जिसके अनुसार समाज के वृहतर  सामाजिक कोषों (मनुष्यों) को क्षुद्र, अछूत, अष्पर्श्य, शुद्र, आदि जैसे अमानवीय शब्दों, व्यवहारों और स्तरों से नवाजा गया। अछूतों और शूद्रों के नाम पर उनके साथ ना केवल सामाजिक रुप में विभेद किये गये, बल्कि दैनिक जीवन यापन समेत में उनके साथ अत्याचार; जैसे : स्कूल न जाने, शिक्षा प्राप्त न करने, मन्दिर प्रवेश न करने, वेदों को सुनने से दूर रहने, सुन्दर लड़कियों से शादी न करने, दलित महिलाओं को वक्ष को न ढकने, पगड़ी न बांधने देने, जुत्ते चप्पल न पहनने, अच्छे घरों में न रहने, भू-स्वामी होने से रोकने, संपत्ति आर्जन करने, गाँव के बीच में रहने देने पर प्रतिवन्ध लगाने जैसे नियमों को उनपर जबरन लादा गया। नतीजतन उनकी हालत ऐसी हो गयी कि वे रंग रुप से मानव दिखने के बाहेक मानव होने के सारे हक उनसे छीन ली गयी।

‎‎आज जो और जैसा भी समानतायुक्त कहे जाने बाली क़ानून क्यों न बना दिए गये हों, शारीरिक और भौतिक प्रताड़णाओं के रूपों में थोड़े किए गये बदलाव के बाहेक आज भी सामाजिक और राजनीतिक जीवन दलितों का वही हजारों साल पुराने हैं। दलितों के लिए सौभाग्य से और उच्च जातियों के लिए दुर्भाग्य से अंग्रेजों के पनाह और सुरक्षा में अगर डॉ. भीमराव अम्बेडकर ना जन्मे होते, तो किताबों और संविधानों के पन्नों पर दिख रहे समानता के हक और जातीय रुप में शारीरिक दोहन आज भी यूँही क़ायम होता।

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‎नेपाल सरकार द्वारा निर्मित भूमि आयोग से प्रकाशित भूमि वितरण फारम भरने के ३५ दिने सूचना को दलित भूमिहीनों में जानकारी देने, फारम भरने और फारम भरने के तरीकों के बारे में जानकारी देने हम अपने स्वाधीन मधेश जन-अभियान और नागरिक प्रथम अभियान के संयुक्त “अन्त्योदय आन्दोलन अभियान” के तहत मधेश के जिलों में लगातार कार्यरत होते कल्ह भाद्र २० गते के दिन महोत्तरी के रामगोपालपुर पहुँचे थे। सभा में ज्यादातर महिलाओं की सहभागिता थी।

‎‎हमने उनके सभा हॉल में उनके ही मैथिली भाषा में भूमि, फारम, समय, तरीके और जमीन लेने के उपायों के बारे में बताना जब शुरु की, तो अधिकांश महिलायें और युवा पुरुष समेत ने जमीन तुरन्त वहीं पर देने की माँग करते हुए हल्ला करने लगे। वे यह समझ लिए कि हम उन्हें लालपूर्जा देने वहाँ पहुँचे थे। भीड़ अच्छी खासी थी। उस भीड़ में हम जहाँ उन्हें सरकार से भूमि लेने के तरीके बता रहे थे, वहीं वे दूसरी ओर हम उन्हें जमीन देने पहुँचे होने की निर्णायक सोंच उनमें व्याप्त थी।

‎‎वे आज भी समझ से दूर, शिक्षा से लाचार, चिंतन से दरिद्र, लड़ने से घबड़ाहट, धैर्यता से पतले और दृष्टि से कमजोर दिख रहे हैं। समझाते कुछ हैं, समझता कुछ और है। सुनाते कुछ हैं, सुनता कुछ और है। कहते कुछ हैं, करता कुछ है।

‎‎अभी मधेश में कुछ राजनीतिक पार्टियों के बाजार में उनके कुछ एजेंट कार्यकर्ताओं ने एक हल्ला फैला रखा है कि सरकार द्वारा भूमि वितरण फारम भराई सूचना को बन्द करना है। उनका कहना है कि सरकार द्वारा संसद से पारित भूमि विधेयक मधेश विरोधी है।

‎भूमि विधेयक निश्चित ही मधेश विरोधी है। मगर फारम भरना सरकार के विधेयक का काउंटर है और भूमिहीनों के लिए जीवन धारा है। भूमिहीनों द्वारा भरे जाने बाले फारमों के आधार पर मधेश का जमीन मधेशी भूमिहीनों को मिलना तय है, अगर मधेशी दल थोड़ा हिम्मत, त्याग और बुद्धि लगाये तो। क्योंकि किसी भी मधेशी दल में न तो भूमि विधेयक को रोकने की हैसियत है, न कोई राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक इमानदारिता।

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दलितों, थारुओं और मुसलमानों का मूल समस्या :

‎१. एक जुटता की अभाव।

‎२. एक दूसरे पर विश्वास का संकट।

‎३. दलित नेताओं में दलित को, मुस्लिम नेताओं में मुस्लिमों को और थारु नेताओं में थारुओं को ठगकर सत्ता पाने की चतुराई।

‎४. शिक्षा और समझ की अभाव।

‎५. हजारों सालों की दमित मानसिकता।

‎६. आत्म विश्वास की कमी।

‎७. लड़ाकूपन स्वाभाव न होना।

‎८. सेवा और दयभाव में जीने की आदत।

‎९. खुद से उठने और चलने की हिम्मत न होना।

‎१०. राजनीति से साझा सम्बन्ध न होना।

‎११. अंध विश्वास और दान के धर्म पर भरोसा करना।

‎१२. हिंदुत्व के बुखार में जीना।

‎१३. अनावश्यक नकक्ल करना।

‎१४. विद्रोही न होना।

‎१५. अहंकार से ग्रस्त रहना, आदि।

‎हक़ीक़त में दलितों का मूल कोई समस्या है तो आज के युग में दलित खुद अपने आप में एक बड़ी समस्या और समग्र विकास के लिए पहाड़ सा बाधक है। इस उत्तर आधुनिक युग में भी जब दलितों की अधिक से अधिक संख्या वही दीनहीन, गरीबी, अशिक्षा, भूख, नंगापान, अंधविश्वास, मंदिरों की प्यास, धर्मान्धता, असहायपना, परनिर्भरता, दया की चाहत, सेवा और सहानुभूति की आग्रह, आदि।

‎जबतक दलित, मुस्लिम और थारु लगायत के अत्ति पिछड़े वर्गों के पढ़ेलिखे युवा अपने समाज को विद्रोही न बनाये, दया की चाहत से दूर रखकर संयोजित हक की बात न सिखाये, तबतक  वही और उसी परंपरागत भूमि के कुछ छोटे से टुकड़े के लिए भीख माँगते रहेंगे, वार्ड सदस्य बनने में जीवन को न्यौछावर करते जायेंगे, चपरासी बनने में ही महान कहलाते रहेंगे और दयाभाव को ही अनन्त सुख का आधार मानते रहेंगे।

‎राजनीतिक समानुपातिकता के आलावे मधेश के दलित, मुस्लिम, थारु और अल्पसंख्यक, महिला तथा पहाड़ों के दलित और जनजातियों के लिए अन्य सारे विकास और समृद्धि के रास्ते बन्द प्रायः है और रहेंगे।

कैलाश महतो

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