Wed. Aug 12th, 2026
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सृष्टि आपकी, दृष्टि हमारी

 

नेपाल, सांस्कृतिक और प्राकृतिक सौन्दर्य का धनी देश । विभिन्न जाति, भाषा और परम्पराओं का सम्मिलन है यह देश और कई मायने में अपने पड़ोसी देश भारत के करीब भी । दो अलग देश किन्तु संस्कृति, परम्परा और मान्यताओं के आधार पर एक ही आत्मा को धारण करते हैं । सीमाएँ हैं किन्तु बन्धन नहीं । कुछ बातें और कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं जिन्हें जोड़ने के लिए प्रयास की आवश्यकता नहीं होती है वह स्वतः जुड़ते Pustak Samikchhaचले जाते हैं । कुछ ऐसा ही आत्मीय रिश्ता है नेपाल और भारत का । कहते हैं आप जिनके जितने करीब होते हैं, तकरार भी वहीं अधिक होती है किन्तु यह तकरार दूरियाँ नहीं बढ़ाती बल्कि  रिश्ते को और भी मजबूती ही प्रदान करती है । नेपाल की सांस्कृतिक विरासत सदियों की है और भारत से रिश्ता भी तब से ही । हमारे धर्म, हमारे वेद, हमारे पुराण, उपनिषद सब एक हैं । हमारी संस्कृति, हमारी परम्परा इन पर टिकी हुई है और यही इन दोनों देशों की साँझी विरासत है । कोशिशों के बावजूद इस सच्चाई को नकारा नहीं जा सकता कि हमारी नींव कहीं ना कहीं एक ही है । भौगोलिक सीमाएँ अलग हो सकती हैं, पर हम एक दूसरे के सुख और दुख में एक ही हैं । पुस्तक के निबन्ध तुलसीदास और भानुभक्त ः सामाजिक और साँस्कृतिक परिदृश्य में प्रो. अरुण होता ने उल्लेख किया है कि भानुभक्त ने भक्तमाला में लिखा है ः
बडो दुर्लभ जानोस भारत भूमि को जन्म जनले ।
सहज मिलछन् ठाकुर हरि, भजलिया शुद्ध मनले ।।
इस पद को सिर्फ भक्ति का पद न माना जाय, इस पद के माध्यम् से भारत नेपाल की साँस्कृतिक घनिष्ठता क ीओर भी इशारा किया गया है । नेपाली लेखकों ने हिन्दी प्रदेशों में और हिन्दी लेखकों ने नेपाल देश प्रदेश में साँस्कृतिक समन्वय के मार्ग को प्रशस्त किया है ।
डॉ. सत्यप्रकाश तिवारी जी ने एक महत् कार्य किया है और वो है, तुलसीदास और भानुभक्त दो दिव्य आत्माओं को एक साथ, एक ही कृति में समाहित करने की । आपके सम्पादन में आनन्द प्रकाशन कोलकाता से प्रकाशित ‘सांस्कृतिक अस्मिता के प्रतीक ः तुलसीदास और भानुभक्त’ पुस्तक निःसन्देह दो देशों की प्रगाढ़ता को और भी मजबूत करेगी यह विश्वास है । वैसे भी साहित्य, संगीत और कला की कोई भौगोलिक सीमा नहीं होती और उस हाल में तो और भी नहीं होती जब आप कई स्तर पर एक ही हों । कई बार आवश्यकता महसूस होती रही है, इन दो भक्त कवियों पर एक साथ विश्लेषणात्मक और विहंगम दृष्टि डालने की और इस दिशा में यह पुस्तक मील का पत्थर साबित होगी । एक साथ कई विद्वानों के आलेखों को सम्पादित कर पुस्तक का रूप देने के लिए तिवारी जी ने भगीरथ प्रयास किया है और उनके सतत प्रयास का परिणाम है यह पुस्तक । तुलसीदास और भानुभक्त के सभी पहलु को विद्वानों ने अपने–अपने आलेखों में समेटने की कोशिश की है । लगता नहीं कि कोई पक्ष छूटा है ज्ञान की इस गंगा में प्रवाहित होने हेतु । कुल बाइस महत्वपूर्ण आलेख इस पुस्तक में हैं जो तुलसीदास और भानुभक्त से सम्बद्ध हर पक्ष को उद्भाषित करने में सक्षम हैं और पठनीय हैं । प्रो.अरुण होता, प्रो.शम्भुनाथ, प्रो.दामोदर मिश्र, प्रो.मोहन पी दहाल, डॉ.प्रतापचन्द्र प्रधान, डॉ.चक्रधर प्रधान, ड‘ा.ओमप्रकाश पाण्डेय, मनीषा झा, ड‘ा.मुन्नालाल प्रसाद, वासुदेव थापा, रेमिका थापा, डॉ.भीखी प्रसाद वीरेन्द्र, श्री रामावतार शर्मा, देवेन्द्रनाथ शुक्ल, सोनाम शेर्पा, डा.कृष्ण कुमार श्रीवास्तव, सरोज कुमारी शर्मा, ड‘ा. मो. मजीद मिया, लोकनाथ प्रधान, डॉ.सुशील कुमार तिवारी, ड‘ा.मनोज कुमार मिश्रा, डॉ. सत्यप्रकाश तिवारी जैसे हिन्दी भाषा और नेपाली भाषा के विद्वानों ने अपने विचारों से पुस्तक को सजाया और सँवारा है । भानुभक्तीय रामायण की मौलिकता को सिद्ध करते हुए प्रा. शम्भुनाथ ने अपने निबन्ध में लिखा है कि ः यह महत्वपूर्ण बात नहीं है कि भानुभक्त ने अध्यात्म रामायण से क्या लिया था, रामचरितमानस से क्या लिया । मुख्य बात यह है कि उन्होंने नेपाली भाषा को एक ऊँचाई दी, उसे नेपाली लोगों के आत्मसम्मान का प्रतीक बनाया । वह अपनी रामायण में नेपाली जनता के सांस्कृतिक जीवन की झाँकी भी जगह जगह दिखाते हैं । नेपाली समाज में स्त्री कर्मठ होती है, उसकी बड़ी इज्जत होती है । यही वजह है, भानुभक्त की रामायण में राम की चरण धूलि से जब अहिल्या का उद्धार होता है और सामने अहिल्या जीती जागती खड़ी हो जाती है तो राम अहिल्या को प्रणाम करते हैं । तुलसी के मानस में अहिल्या राम को प्रणाम करती है । भानुभक्त की रामायण में अहिल्या शिलारू से जैसे ही एक सुन्दर नारी मूर्ति बनकर खड़ी हो जाती है, राम उसका नमन करते हैं । भानुभक्त की यह मौलिक उद्भावना उस नेपाली लोक संस्कृति के अनुरूप है जिसमें स्त्री का आत्मसम्मान एक अर्थ रखता है ।
पुस्तक का हर निबन्ध महत्वपूर्ण है । यह भारत और नेपाल दोनों के सांस्कृतिक पक्ष को उजागर करने में सक्षम है । निःसन्देह पुस्तक साहित्य जगत के लिए एक अमूल्य कृति है । तुलसीदास और भानुभक्त इन दोनों ने ही सामाजिक जागरण तथा नैतिक शिक्षा का संदेश  दिया है । चाहे ‘मानस’ हो या ‘भानुभक्त रामायण’, इनकी हर एक पंक्ति सूक्त है, नीति है । आज समाज में जो व्यभिचारिता, नैतिक पतन और मानवता का ह«ास दिख रहा है उसमें बहुत योगदान पाश्चात्य संस्कृति का अंधानुकरण है । हमारी पौर्वात्य संस्कृति कहीं पीछे पड़ रही है, ऐसे में आज समाज में एक बार फिर से इन धर्म ग्रंथों की अपरिहार्यता महसूस हो रही है । आज आवश्यकता है कि हमारी पीढ़ी इन से जुड़े और इनमें समाहित नीति तत्वों को अपनी जीवनशैली में उतारे । निःसन्देह सांस्कृतिक अस्मिता के प्रतीक ः तुलसीदास और भानुभक्त एक संग्रहनीय और उपयोगी पुस्तक है जिसे बार बार पढ़ने की इच्छा होगी ।
प्रस्तुति ः डा. श्वेता दीप्ति

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