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अपहरण में फंसा ‘जेनजी आन्दोलन’ और फाल्गुन २१ का चुनाव : लिलानाथ गौतम

जेनजी पीढ़ी को आज स्वतन्त्रता और पारदर्शिता चाहिए । यदि रोजगार और अवसर की माँग पूरी नहीं हुई तो अगला विद्रोह निश्चित है ।

लीलानाथ गौतम, हिमालिनी अंक सितम्बर । वि.सं. २०८२ साल भाद्र २३ नेपाल के राजनीतिक इतिहास में एक नया अध्याय जुड़ गया । इस दिन को ‘काला दिन’ कहा जाए या ‘ऐतिहासिक क्रांति का दिन’ ! भविष्य में इसके परिणाम ही तय करेंगे कि इसका नामकरण कैसा होगा । उस दिन राज्य की ओर से निर्दोष २० युवाओं की हत्या किए जाने के बाद अगले दिन, यानी भाद्र २४ को पूरे देश में आन्दोलन भड़क उठा । इस आन्दोलन ने देश के प्रमुख प्रशासनिक निकाय सिंहदरबार से लेकर जिलों के प्रशासनिक कार्यालयों को ध्वस्त कर दिया । राज्य के तीनों प्रमुख अंग– विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका पूर्ण रूप से आन्दोलनकारियों के नियन्त्रण में चले गए । अब तक के आँकड़ों के अनुसार इस आन्दोलन में ७२ लोगों की जान जा चुकी है और सैकड़ों घायल अस्पताल में उपचाररत हैं और खरबों की क्षति हुई है ।

स्कूल और कॉलेज के विद्यार्थियों ने सोशल मीडिया पर समूह बनाकर आन्दोलन की घोषणा की थी । यह ‘जेनजी’ समूह अर्थात् १२ से २८ वर्ष की उम्र के युवाओं का आन्दोलन था । लेकिन इस आन्दोलन को इन किशोर–किशोरियों के अभिभावकों का भी समर्थन मिला । अनेक सामाजिक अभियंता, कलाकार और तकनीकी उद्यमियों ने भी नैतिक समर्थन दिया । सरकार द्वारा सोशल मीडिया पर लगाए गए प्रतिबंध ने ही आन्दोलन की पृष्ठभूमि तैयार की । प्रतिबंध लगने के बाद सोशल मीडिया पर ही ‘नेपोबेबी’ अभियान शुरू हुआ था । इस अभियान में उच्च पदस्थ नेता व प्रशासकों के बच्चों और आम नागरिकों के बच्चों के बीच की असमानता को उजागर करने का प्रयास किया गया । इसी समूह ने सुशासन की मांग करते हुए भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन की घोषणा की । भले तत्कालीन पृष्ठभूमि साधारण दिखाई दी हो, लेकिन इसके पीछे आम जनता का गहरा असन्तोष और आक्रोश संचित था ।

क्यों हुआ जेनजी आन्दोलन ?

सोशल मीडिया और तकनीक से निकटता रखने वाली जेनजी पीढ़ी (सन् १९९७ से २०१२ तक जन्मे लोग) ने नेताओं और प्रशासकों तथा आम नागरिकों के जीवन में गहरी असमानता देखी । उन्हें लगा कि राज्य तंत्र दलालों, बिचौलियों, भ्रष्टाचारियों और माफियाओं के नियन्त्रण में है । उन्होंने समझा कि हमारे ही राजनीतिक दलों के नेता इनके संरक्षक बने हुए हैं । यही कारण है कि नेपाल के युवा देश छोड़ना चाहते हैं । प्रतिभा और परिश्रम की तुलना में दलालों और दलतंत्र ने पूरे देश को जकड़ लिया है, यह उन्होंने स्वयं अनुभव किया । इसका प्रत्यक्ष परिणाम था– ‘जेनजी आन्दोलन’ ।
हाँ, जेनजी आन्दोलन के शुरू होने का मुख्य कारण युवाओं का राज्य के प्रति गहरा असन्तोष ही था । सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक क्षेत्र में अन्याय, असमानता और अपारदर्शिता ने उन्हें सड़क पर उतरने को बाध्य किया । तकनीक में पले–बढ़े इस पीढ़ी ने केवल सोशल मीडिया पर ही नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय, पारदर्शिता और समावेशी शासन की माँग करते हुए सड़क पर भी प्रदर्शन किया । लेकिन राज्य ने बेरहमी से दमन किया । परिणामस्वरूप देशभर आगजनी हुई, अरबों का नुकसान हुआ ।

नागरिकों को शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, प्रशासनिक सेवा जैसी मूलभूत आवश्यकताएँ आसानी से मिलनी चाहिए । यह हर नागरिक का अधिकार है । लोकतांत्रिक शासन का आधार यही है कि सेवाएँ बिना घूस और बिचौलियों के मिलें । इससे राज्य के प्रति जनता का विश्वास बढ़ता है और नागरिक सशक्त बनते हैं । लेकिन यदि इन सेवाओं के लिए चाकरी और सोर्स–फोर्स की जÞरूरत पड़े तो युवाओं में आक्रोश होना स्वाभाविक है । जेनजी पीढ़ी योग्यता और क्षमता आधारित प्रणाली की माँग कर रही है । वे पुराने ढाँचे में जकड़े नातावाद, कृपावाद और राजनीतिक पहुँच पर आधारित नियुक्तियों और अवसरों को अस्वीकार करते हैं । वे विद्यालय, विश्वविद्यालय, नौकरशाही और राज्य के सम्पूर्ण निकायों से दलतंत्र और दलाल संस्कृति का अन्त चाहते हैं । उनके दृष्टिकोण में शिक्षा, रोजÞगार, नेतृत्व और अवसर की पहुँच सभी के लिए समान होनी चाहिए ।
लेकिन बीते कुछ दशकों से राज्य में यह स्थिति नहीं है । जेनजी पीढ़ी मानती है कि इसके लिए पुरानी पीढ़ी के नेता ही जिम्मेदार हैं । परिणामस्वरूप तीन प्रमुख दलों के नेता– शेरबहादुर देउबा, केपीशर्मा ओली और पुष्पकमल दाहाल ‘प्रचण्ड’ के घरों पर हमला हुआ । इनमें ओली तत्कालीन प्रधानमंत्री थे और देउबा व दाहाल पूर्व प्रधानमंत्री । ओली और दाहाल को नेपाली सेना सुरक्षित स्थान पर ले गई, इसलिए उन पर भौतिक हमला नहीं हुआ । लेकिन शेरबहादुर देउबा और उनकी पत्नी व तत्कालीन विदेश मंत्री आरजु राणा (देउबा) पर शारीरिक हमला हुआ । नेपाली सेना ने किसी तरह उनकी जान बचाई । इसी प्रकार पूर्व प्रधानमंत्रियों झलनाथ खनाल, माधवकुमार नेपाल और डा. बाबुराम भट्टराई सहित कई नेताओं के घरों पर भी हमले हुए ।

आन्दोलन ‘हाइजैक’ हुआ !

हालाँकि आशंका यह भी है कि जेनजी के नेतृत्व में शुरू हुआ आन्दोलन किसी और ने ‘हाइजैक’ कर लिया है । खुद आन्दोलनकारियों ने भी स्वीकारा कि इसमें व्यापक घुसपैठ हुई है । यदि ऐसा नहीं होता तो आन्दोलन इतना हिंसक नहीं बनता । स्कूल ड्रेस में शामिल बालक–बालिकाएँ राज्य संरचनाओं पर धावा नहीं बोलते । आन्दोलन से पहले उन्होंने शान्तिपूर्ण रहने का संकल्प भी लिया था ।
राष्ट्रीय स्तर पर राजावादी समूह, प्रमुख विपक्षी माओवादी, राष्ट्रीय स्वतन्त्र पार्टी जैसे दलों की घुसपैठ बताई जाती है । अन्तर्राष्ट्रीय शक्ति केन्द्रों की संलिप्तता का भी संदेह है । एनजीओ–आईएनजीओ चलाने वाले कई समूह इस आन्दोलन का श्रेय लेने की होड़ में थे । नई सरकार बनाने की प्रक्रिया में भी यही समूह निर्णायक बने । इसलिए आन्दोलन अपने मूल उद्देश्य और मर्म के अनुसार पूरा नहीं हो सका । जेनजी आन्दोलन की मुख्य माँग प्रत्यक्ष निर्वाचित कार्यकारी थी । लेकिन इसके लिए आवश्यक संवैधानिक संशोधन हुए बिना ही नई सरकार बन गई ।
जेनजी आन्दोलन युवाओं का ऐतिहासिक विद्रोह था । ऐसा विद्रोह अभूतपूर्व राजनीतिक उपलब्धि दिला सकता था और उसे तुरन्त संस्थागत किया जा सकता था । वर्तमान संविधान को खारिज कर अस्थायी संविधान जारी करके नई सरकार बन सकती थी, या वर्तमान संविधान में संशोधन किया जा सकता था । लेकिन ऐसा नहीं हुआ । प्रधानमंत्री के इस्तीफे और राष्ट्रपति की पहल के बाद आन्दोलन के जनादेश को वैधानिक ढंग से संस्थागत किया जाना चाहिए था । लेकिन राजनीतिक दलों को अस्तित्वहीन मानकर संवाद नहीं किया गया । जबकि आन्दोलन ने उन्हें कमजोर किया था, पर वे भी एक राजनीतिक शक्ति हैं, इस तथ्य को भूला गया । हां, संसद में मौजूद दलों को विश्वास में लिए बिना उपलब्धियों को संस्थागत करना सम्भव नहीं था ।

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यदि सही समय पर ध्यान दिया जाता तो कम से कम अन्तरिम सरकार, संवैधानिक संशोधन और नए चुनाव की माँग पूरी हो सकती थी । यही तीन मुद्दों पर राष्ट्रपति, राजनीतिक दल और आन्दोलनकारी पक्ष सहमति बना सकते थे । लेकिन ऐसा नहीं हुआ । अन्ततः अन्तरिम सरकार को ही मुख्य मुद्दा बनाया गया । अब जो चुनाव होने जा रहा है, वह पुराने संविधान के अनुसार ही होगा । पुराने संविधान के आधार पर निर्वाचित होने वाले नेता और शक्तियाँ भी पुरानी ही होंगी । इसलिए यह कहना कठिन नहीं कि जेनजी आन्दोलन ‘हाइजैक’ हो गया ।

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अब क्या करना चाहिए ?

आन्दोलन का मुख्य उद्देश्य भावी पीढ़ी के लिए रहने योग्य देश बनाना है । इसके लिए राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय अनुभवों का विश्लेषण, समीक्षा और व्यापक बहस जÞरूरी है । जेनजी केवल विरोध ही नहीं, बल्कि समाधान के प्रस्ताव भी ला रहे हैं– नीति निर्माण में वैज्ञानिक सोच, समावेशी दृष्टिकोण और उन्नत राष्ट्र । इस आन्दोलन को लोकतन्त्र को मजबूत करने, दलतंत्र की सीमाओं से मुक्त कराने और नागरिकों के जीवन पर प्रत्यक्ष प्रभाव डालने वाली शासन प्रणाली की ओर उठाया गया सार्थक कदम मानना चाहिए ।
आज के दलों ने जनता का विश्वास खो दिया है । कांग्रेस, एमाले, माओवादी जैसे पुराने दल समाज की चाहना और विचारों को साथ नहीं ले जा पा रहे हैं । उनकी दूसरी–तीसरी पीढ़ी के नेता भी भ्रष्टाचार और सत्ता–लिप्सा में डूब चुके हैं । जेनजी पीढ़ी ऐसे नेतृत्व को स्वीकार नहीं करेगी । इसलिए नए समीकरण की आवश्यकता है । जेनजी पीढ़ी को आज स्वतन्त्रता और पारदर्शिता चाहिए । यदि रोजÞगार और अवसर की माँग पूरी नहीं हुई तो अगला विद्रोह निश्चित है ।
देश में फिर विद्रोह न हो, इसके लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली और गोली चलाने का आदेश देने वाले प्रशासकों पर जाँच होनी चाहिए । प्रत्यक्ष निर्वाचित कार्यकारी प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति प्रणाली लाने के लिए संवैधानिक संशोधन प्रक्रिया शुरू करनी होगी । यदि अभी संशोधन नहीं हुआ तो बाद में सम्भावना बहुत कम रह जाएगी । भ्रष्टाचार का मूल स्रोत आज संघीयता है, इसलिए तत्काल प्रादेशिक मन्त्रिपरिषदों को भंग करना चाहिए । बाद में संघीय ढाँचे को सुधार कर इसे रखना है या या समाप्त करना है, तय कर सकते हैं ।
आज संघीय प्रतिनिधिसभा में २७५ सदस्य हैं । इनके दोगुने प्रादेशिक सदस्य भी हैं । राष्ट्रीय, संघीय और प्रादेशिक मिलाकर ८०० से अधिक सांसद हैं । नेपाल जैसे छोटे और कमजोर अर्थव्यवस्था वाले देश में इतनी बड़ी संख्या क्यों ? इसलिए संसद को १०० के आसपास सीमित करने के लिए निर्वाचन क्षेत्र का पुनरावलोकन किया जा सकता है । सरकारी सेवाओं को पूर्ण रूप से डिजिटल और पारदर्शी बनाकर भी युवाओं का विश्वास जीता जा सकता है ।

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फाल्गुन २१ को चुनाव सम्भव है ?

पूर्व प्रधानन्यायाधीश सुशीला कार्की के नेतृत्व में नवगठित अन्तरिम सरकार ने ६ महीनों के भीतर, आगामी फाल्गुन २१ को आम चुनाव कराने की घोषणा की है । लेकिन क्या यह सम्भव है ? इस पर संदेह गहराता जा रहा है । बहुतों का मानना है कि उस दिन चुनाव सम्भव नहीं है ।
पहली बात, जेनजी आन्दोलन ने जिन नेपाली कांग्रेस, एमाले और माओवादी केन्द्र को तत्काल के लिए कमजोर किया, वे ही प्रमुख राजनीतिक शक्तियाँ हैं । इनके सहयोग के बिना चुनाव सम्भव नहीं । इन दलों ने सरकार को असंवैधानिक करार दिया है और संसद विघटन की प्रक्रिया को असंवैधानिक बताया है । उनकी माँग चुनाव नहीं, बल्कि संसद पुनःस्थापना है । ‘नेपाल बार एसोसिएशन’ ने भी संसद विघटन को असंवैधानिक बताया है । अब जल्द ही सर्वोच्च अदालत में इसके विरुद्ध याचिका दायर होने की सम्भावना है । वकील हों या न्यायाधीश, अधिकांश कांग्रेस, एमाले और माओवादी के समर्थक माने जाते हैं । इसलिए अदालत से संसद पुनःस्थापना की सम्भावना अधिक है ।

हाँ, यदि पुराने दल आन्दोलनकारियों को आत्मसात कर लें तो संसद पुनःस्थापना की कोशिश न भी हो सकती है । लेकिन ६ महीनों में चुनाव होना कठिन है । आवश्यक कानून, मतदाता सूची अद्यावधिक, प्रशासनिक भवनों का पुनर्निर्माण– सब चुनौतीपूर्ण है । आन्दोलन में शामिल २०–३० प्रतिशत युवाओं के नाम मतदाता सूची में ही नहीं हैं । आर्थिक संकट भी गहराएगा । चुनाव के लिए आवश्यक बजट कैसे जुटेगा ? यह भी बड़ा प्रश्न है । फिर भी यदि प्रमुख राजनीतिक शक्तियों की इच्छाशक्ति और नीयत साफ हो तो चुनाव असम्भव भी नहीं है ।

लिलानाथ गौतम

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