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भयानक अस्थिरता : नेपाल की सत्ता और सुरक्षा व्यवस्था पर गहराता संकट

 

काठमांडू, 10 ऑक्टोबर । नेपाल इन दिनों एक भयानक राजनीतिक और प्रशासनिक अलमल (भ्रम और असमंजस) के दौर से गुजर रहा है। प्रधानमंत्री सुशीला कार्की और गृहमंत्री ओमप्रकाश अर्याल के बीच समन्वय की कमी ने न केवल सरकार की विश्वसनीयता पर प्रश्न खड़ा किया है, बल्कि संविधान, लोकतंत्र और कानून-व्यवस्था की नींव तक हिला दी है।

राजनीतिक विश्लेषक बसन्त बस्नेत के अनुसार, सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोग दिशाहीन जहाज के कप्तान की तरह दिख रहे हैं—न कोई स्पष्ट नीति, न निर्णायक नेतृत्व। सुरक्षा तंत्र से लेकर अर्थतंत्र तक, हर मोर्चे पर निर्णयहीनता का माहौल है।

प्रधानमंत्री और गृहमंत्री के बीच गहराता अविश्वास

प्रधानमंत्री सुशीला कार्की इस समय गहरे दुविधा में हैं। उन्हें आगामी फागुन में चुनाव कराना है, परन्तु राजनीतिक दलों से संवाद की स्थिति बेहद जटिल है।
तीन वर्ष पहले हुए चुनावों में विजयी दल अब जन-आक्रोश का सामना कर रहे हैं, जबकि हालिया जेनजी आन्दोलन ने सत्ता की बुनियाद हिला दी है।

कार्की की उलझन यह है कि जिन दलों ने हालिया जनविरोध झेला है, उन्हीं से चुनाव में सहयोग की अपेक्षा कैसे की जाए? कई बार उन्हें लगता है कि यह जिम्मेदारी राष्ट्रपति रामचन्द्र पौडेल या किसी अन्य संस्थागत शक्ति को सौंप दी जाए।

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गृहमंत्री ओमप्रकाश अर्याल की नीतिगत अस्थिरता

गृहमंत्री अर्याल जेनजी आन्दोलन की पृष्ठभूमि में पद पर आए थे। शुरुआत में उन्होंने “राज्य आतंक” और “अराजक विध्वंस”—दोनों पर सख्त कार्रवाई का वादा किया था। परंतु जल्द ही वे विरोधाभास में फंस गए।

23 भदौ (सितंबर) के सरकारी दमन के दोषियों को गिरफ्तार करने की घोषणा की गई, लेकिन 24 भदौ की अराजक घटनाओं के जिम्मेदारों को जांच आयोग के हवाले कर टाल दिया गया।
इस दोहरे रवैये ने जनता में यह संदेश दिया कि सरकार राजनीतिक झुकाव के आधार पर कार्रवाई कर रही है।

अर्थमंत्री की सक्रियता और सरकार का दोहरापन

अर्थमंत्री रामेश्वर खनाल ने आगजनी से तबाह भाटभटेनी सुपरमार्केट और हिल्टन होटल का दौरा कर पीड़ित उद्यमियों को भरोसा दिलाया कि “सरकार आपके साथ है।”
लेकिन इसी बीच गृहमंत्री के निर्देश से कई गिरफ्तार अराजक तत्वों को दशैं से पहले ही रिहा कर दिया गया।

इस विरोधाभासी रवैये ने यह स्पष्ट कर दिया कि सरकार के भीतर ही नीति और प्राथमिकताओं पर गहरा मतभेद है—एक ओर आर्थिक पुनर्निर्माण का भरोसा, दूसरी ओर कानून-व्यवस्था की उपेक्षा।

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सुरक्षा तंत्र में भ्रम और खतरा

वरिष्ठ सुरक्षा अधिकारियों के अनुसार, सरकार की असफलता का बोझ अब सुरक्षाकर्मी झेल रहे हैं।
एक अधिकारी ने कहा,

“मैं भीड़ नियंत्रित करने मैदान में था, लेकिन मेरी बेटी उसी भीड़ का हिस्सा थी — हमारी गोलियां हमारे अपने परिवार पर चल रही थीं।”

साभार

यह बयान सुरक्षा तंत्र के भीतर व्याप्त नैतिक और भावनात्मक टूटन को उजागर करता है।

सुरक्षा विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि हथियारों की लूट और कानून की अनदेखी से नेपाल में “हाइटी या साउथ सुडान” जैसी अराजकता की जमीन तैयार हो रही है।

व्यवसायी वर्ग में भय और निराशा

अराजक घटनाओं के दौरान कई उद्यमियों के प्रतिष्ठान जलाए गए, लूटपाट हुई और कर्मचारियों को धमकाया गया।
अर्थमंत्री के सांत्वना दौरे के बावजूद, गृहमंत्री के ढीले रवैये ने उद्योग जगत का भरोसा तोड़ दिया है।

अब कारोबारी वर्ग नई परियोजनाओं में निवेश करने से डर रहा है।

“अब सवाल मुनाफे का नहीं, सुरक्षा का है,” — एक व्यापारी ने कहा।

कई युवाओं ने निष्कर्ष निकाला है कि “नेपाल में व्यवसाय करना असंभव होता जा रहा है।”

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जनता का सवाल: यह राज्य आखिर किसका है?

बसन्त बस्नेत के लेख में एक गहरा प्रश्न उठाया गया है — “यह राज्य आखिर किसका है?”
यदि सत्ता में बैठे लोग केवल अपने समर्थकों को बचाते हैं और विरोधियों को कुचलते हैं, तो लोकतंत्र का अर्थ ही समाप्त हो जाता है।

निष्कर्ष: सत्ता का अलमल, राज्य का संकट

नेपाल इस समय “दोहरी नीति” और “निर्णयहीन नेतृत्व” के कारण एक गंभीर मोड़ पर है।
प्रधानमंत्री, गृहमंत्री और अर्थमंत्री — तीनों अलग दिशाओं में खींच रहे हैं, और परिणामस्वरूप पूरा शासन-तंत्र ठप सा प्रतीत होता है।

अगर 23 भदौ के राज्य आतंक और 24 भदौ की अराजकता — दोनों के दोषियों पर समान नीति नहीं अपनाई गई, तो देश किसी और बड़े विस्फोट की ओर बढ़ सकता है।

संदेश स्पष्ट है: कोई भी प्रदर्शन अंतिम नहीं होता।
सत्ता बदलती रहती है, लेकिन देश रहना चाहिए — स्थिर, न्यायपूर्ण और लोकतांत्रिक। लेखक बसन्त बस्नेत के लेख पर आधारित रिपोर्ट

 

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