Fri. Dec 5th, 2025
English मे देखने के लिए क्लिक करें

विद्यापति : कालजयी महाकवि : विनोदकुमार विमल

सन्दर्भ – महाकवि विद्यापति की पुण्यतिथि 

 महाकवि विद्यापति भारतीय भाषा और साहित्य के भविष्य द्रष्टा थे । उन्होंने अपनी लेखनी से उन सभी सामाजिक और राष्ट्रीय समस्याओं को सामने रखा जो आज भी प्रासंगिक हैं । 

विद्यापति

विनोदकुमार विमल, काठमांडू, 8 नवम्बर, 2025 । भारतीय साहित्य के इतिहास में विद्यापति का नाम अत्यंत गौरवशाली है । वे मैथिली और संस्कृत के महान कवि थे, जिनकी रचनाओं में भक्ति, प्रेम और संस्कृति का अद्भुत संगम देखने को मिलता है । विभिन्न रसों के कवि कहे जाने वाले विद्यापति को `मैथिली के कबीर` और ‘मिथिला कोकिल’ जैसे विशेषणों से नवाज़ा गया । उनका साहित्यिक योगदान न केवल साहित्य प्रेमियों को प्रेरित करता है, बल्कि आज भी भारतीय संस्कृति की गहराई और विविधता को दर्शाता है । विद्यापति अत्यंत धार्मिक, रचनात्मक और सरल व्यक्ति थे । वे भक्ति और प्रेम के गीतों के रचयिता थे । उनके व्यक्तित्व में साहित्यिक गुणों के साथ-साथ आध्यात्मिकता का भी अद्भुत संगम था । विद्यापति  भारतीय साहित्य  की ‘शृंगार-परम्परा’ के साथ-साथ ‘भक्ति-परम्परा’ के प्रमुख स्तंभों में से एक और मैथिली  के सर्वोपरि महाकवि  के रूप में जाने जाते हैं ।

हिंदी काव्यधारा के सुदीर्घ इतिहास में `विद्यापति` एक ऐसे अनोखे व्यक्तित्व तथा महाकवि के रूप में उभरे जो आज भी मिथिलांचल के लोकमानस में निरंतर बने रहे l इनकी लोकप्रियता सिर्फ मिथिलांचल में ही नहीं, अपितु पूरे हिंदीभाषी क्षेत्र में तथा पूरे भारत में व्याप्त रही l विलक्षण प्रतिभा के धनी महाकवि विद्यापति आदिकाल और भक्तिकाल के काव्यचेतना के संधिकाल के कवि के रूप में जाने जाते हैं l यद्यपि उनकी अधिकतर रचना संस्कृत में ही है, किंतु साथ ही अवहट्ट और मैथिली में उनका समान अधिकार था l  विद्यापति मिथिला के स्वर्ण युग से संबंधित हैं । डॉ. जयकांत मिश्र ने ठीक ही कहा है कि विद्यापति का युग मैथिली साहित्य के लिए वैसा ही था जैसा शेक्सपियर का युग अंग्रेजी साहित्य के लिए और एशिलस का युग यूनानी साहित्य के लिए था । मिथिला की राष्ट्रीय प्रतिभा की सबसे प्रत्यक्ष और मौलिक अभिव्यक्ति, गीतिका इसी काल में विद्यापति के रूप में सबसे महान प्रतिपादक के रूप में सामने आई । इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि विद्यापति का पूर्वी भारत  के साहित्य पर गहरा प्रभाव पड़ा है, और उनके गीत बंगाल और बिहार के घर-घर में प्रचलित काव्य बन गए ।

विद्यापति

विद्यापति की सबसे बड़ी विशेषता है, नख-शिख, प्रेम-प्रसंग, दूती, मान, सखी-शिक्षा, मिलन, अभिसार, छलना, मान, विदग्ध विलास आदि रूढ़ियों का निर्वाह करते हुए भी उनके भीतर से राधा और कृष्ण के प्रेम का ऐसा चित्रण करना, जो अपनी तमाम परिस्थितियों, सुख-दुःख की भावनाओं, उल्लासपूर्ण मिलन और अश्रुसिक्त विरह की अवस्थाओं में पल कर एक जीवंत वस्तु प्रतीत हो । राधा और कृष्ण के इस प्रेम के परिपार्श्व में उनकी सारी दिनचर्या, समाज, परिवार, अनुशासन, लज्जा, संकोच आदि यथार्थ जीवन का अंग बनकर उपस्थित होते हैं । यह बिल्कुल निश्चित है कि विद्यापति की कई कविताओं का लगभग पूर्णतः आध्यात्मिक महत्त्व  है । यदि कुछ अन्य कविताएँ स्पष्ट रूप से धर्मनिरपेक्ष लगती हैं, तो हमें याद रखना चाहिए कि हमें ऐसी कविताओं को उनके संदर्भों से अलग करने का कोई अधिकार नहीं है । यह नहीं भूलना चाहिए कि विद्यापति के गीत, जयदेव से लेकर रवींद्रनाथ टैगोर तक सभी वैष्णव कवियों की तरह, गायन के लिए ही थे ।

भाषा की दृष्टि से इन्होंने संस्कृत, अवहट्ट  और मैथिली में काव्य-रचना की । इनमें ‘शैव सर्वस्व सार’, ‘गंगा वाक्यावली’, ‘दुर्गाभक्त तरंगिणी’, ‘भू परिक्रमा’, ‘दान-वाक्यावली’, ‘पुरुष परीक्षा’, ‘विभाग सार’, ‘लिखनावली’ और ‘गया पत्तलक-वर्ण कृत्य’ संस्कृत में है; जबकि ‘कीर्तिलता’ (भृंग-भृंगी संवाद के रूप में कीर्तिसिंह की वीरता का वर्णन) और ‘कीर्तिपताका’ (शिवसिंह की वीरता और उदारता का वर्णन) अवहट्ट भाषा में है । ‘गोरक्ष विजय’ गद्य-पद्य युक्त ग्रन्थ है जिसका गद्य भाग संस्कृत में और पद्य भाग मैथिली  में है । मैथिली  भाषा में रची गई ‘पदावली’ इनकी कीर्ति का आधार ग्रन्थ है ।

प्रकृति का चित्रण विद्यापति ने अधिकांशतः अलंकरण के रूपों में ही किया है । राधा और कृष्ण के प्रेम-प्रसंगों की लीला-भूमि के रूप में प्रकृति नाना रूप रंग में उपस्थित हुई है । नवलकिशोर और नवलकिशोरी की सहचरी के रूप में प्रकृति ने भी नवल आभा को धारण किया है । ‘नव वृंदावन नव नव तरुगन नव नव विकसित फूल’ भी इसी क्षण-क्षण नूतन प्रतीत होने वाली प्रकृति के सूचक हैं । वसंत तो जैसे कवि का प्रिय सहचर है । उसकी सुंदरता, मोहकता और मादकता कवि को अनेक परिस्थितियों में आकृष्ट करती है । माघ मास की श्रीपंचमी को प्रकृति के गर्भ से जन्म धारण करने वाले वसंत-शिशु के स्वागत में नागकेशर के पुष्पों की शंखध्वनि करता है और उसके युवक होने तक के हर अवसर पर अपनी स्नेहिल श्रद्धा का दान करता है । विद्यापति रूढ़ि परिपालन के लिए बारहमासा का भी प्रयोग करते हैं । षड्ऋतु का वर्णन प्राचीन साहित्य में प्रायः संयोग – शृंगार में और बारहमासा का वर्णन विरह में किया जाता था । विद्यापति ने ‘बारहमासा’ का प्रयोग विरह मे ही किया है और परिपाटी के अनुसार आषाढ़ मास से आरंभ भी किया है ।

यह भी पढें   इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने भ्रष्टाचार अभियोग को लेकर मांगी माफी

विद्यापति के गीत अपनी रागात्मकता और मार्मिकता के लिए काफी प्रसिद्ध हैं । विद्यापति के पहले परवर्ती संस्कृत साहित्य में क्षेमेंद्र और जयदेव ने मात्रिक गीत लिखने का प्रयत्न किया था किंतु वे गीत पूर्णतया लोक-चेतना से प्रभावित न थे । विद्यापति ने गीतों को लोक-जीवन के अत्यंत निकट ला खड़ा किया । बहुत बार तो उन्होंने लोकधुन और रागों तक को सीधे अपना लिया है । इसीलिए डॉ. बच्चनसिंह ने इन्हें ‘जातीय कवि’ कहा है । इन गीतों में गेयता है, इसका पता तो इनके आरंभ में दिये हुए राग – रागनियों के उल्लेख से ही चल जाता है । कवि स्वयं इन्हें गाते प्रतीत होते हैं । इसी से बार-बार कवि भणिता में ‘विद्यापति कवि गाओल’ की पुनरावृत्ति होती है । विद्यापति के गीतों की दूसरी विशेषता है, सहजता और स्वाभाविकता । इस दृष्टि से वे गीतों की आत्मा के पारखी थे । पदावली की भाषा प्राचीन मैथिली है, जिसमें ब्रजभाषा का भी प्रभाव है । इसे हम चाहें तो शिथिल अर्थ में `ब्रजबुलि` का प्राचीन रूप कह सकते हैं । विद्यापति की उपर्युक्त काव्य-विशेषताओं को आधार मानते हुए कालान्तर में पाठक समाज द्वारा उन्हें कई उपाधियों से विभूषित किया गया जिनमें ‘अभिनव जयदेव’, ‘कवि शेखर’, ‘कवि कंठहार’, ‘खेलन कवि’, ‘पंचानन’, और ‘मैथिल कोकिल’ प्रमुख हैं । हिंदी कविता की यात्रा में विद्यापति पद, गीत, और शृंगार  परंपरा की आरंभिक कड़ी है जिनके विकास से हिंदी कविता समृद्ध हुई ।

यह भी पढें   रक्सौल में आरएसएस एवं साहित्यिक संस्था के संस्थापक साहित्यकार, पत्रकार स्व. चन्द्रेश्वर प्र. वर्मा की प्रतिमा लगाने का साहित्य प्रेमियों ने किया माँग.

विद्यापति को मैथिली भाषा का जनक भी कहा जाता है । उन्होंने इस भाषा को साहित्यिक पहचान दिलाई और इसे जन-जन तक पहुँचाया । विद्यापति से पहले संस्कृत और अवधी साहित्य का बोलबाला था, लेकिन उन्होंने मैथिली को काव्य भाषा के रूप में स्थापित किया । विद्यापति की भाषा अत्यंत सरल, स्वाभाविक, किन्तु अत्यंत प्रभावशाली है । उन्होंने मैथिली को साहित्यिक रूप प्रदान किया और उसे जनभाषा के रूप में स्थापित किया । उनकी शैली में संगीतात्मकता, लय और भावात्मकता के दर्शन होते हैं ।

विद्यापति की रचनाएँ आज भी पूर्वी भारतीय साहित्य पर अपने गहन प्रभाव, आध्यात्मिक और मानवीय प्रेम के बीच सेतु बनाने की उनकी क्षमता और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण के कारण अत्यंत प्रासंगिक हैं, जो उन्हें आधुनिक समय में पठन और शोध के लिए मूल्यवान बनाती हैं । विद्यापति मैथिली साहित्य के एक आधारभूत व्यक्तित्व हैं और उनका प्रारंभिक बंगाली तथा अन्य पूर्वी भारतीय भाषाओं के विकास पर महत्त्वपूर्ण  प्रभाव पड़ा । अभिजात्य संस्कृत के बजाय आम लोगों की भाषा (मैथिली) के प्रयोग ने साहित्य को व्यापक पाठक वर्ग तक पहुँचाया, जो उस समय एक क्रांतिकारी विचार था । उनकी कविताएँ, खासकर `पदावली`, मानवीय प्रेम, लालसा और विरह की जटिल भावनाओं को गहराई से उकेरती हैं । मानवीय अनुभवों और स्त्री मनोविज्ञान के ये सजीव और यथार्थवादी चित्रण कालातीत हैं, जो विभिन्न पीढ़ियों और संस्कृतियों के पाठकों के साथ गहराई से जुड़ते हैं । विद्यापति के प्रेम गीतों में अक्सर कामुक प्रेम को आत्मा की गहन भक्ति और ईश्वर से एकाकार होने की लालसा (भक्ति) के रूपक के रूप में इस्तेमाल किया जाता है । ये रचनाएँ आज भी मिथिला और बंगाल की लोक परंपराओं में भक्ति गीतों (जैसे भगवान शिव को समर्पित नचारी) के रूप में व्यापक रूप से गाई जाती हैं, जिससे उनकी आध्यात्मिक प्रासंगिकता बनी रहती है । उनकी रचनाएँ, जैसे `कीर्तिलता` और `लेखनावली` 15 वीं शताब्दी के मिथिला के प्रशासनिक, सांस्कृतिक और सामाजिक – आर्थिक जीवन और उस युग के राजनीतिक संघर्षों के बारे में बहुमूल्य अंतर्दृष्टि प्रदान करती हैं । इन कृतियों का अध्ययन एक समृद्ध ऐतिहासिक और बौद्धिक अतीत से सीधा जुड़ाव प्रदान करता है ।

यह भी पढें   आज का पंचांग: आज दिनांक 2 दिसंबर 2025 मंगलवार शुभसंवत् :2082

उपसंहार

विद्यापति केवल कवि ही नहीं थे, बल्कि वे एक दूरदर्शी, समाज सुधारक और सांस्कृतिक वाहक भी थे । उनके पद प्रेम, भक्ति, सामाजिक चेतना और भावनात्मक गहराई का अद्भुत संगम हैं । साहित्यिक और सांस्कृतिक दृष्टि से उनकी रचनाएँ आज भी एक अमूल्य धरोहर हैं । उनकी रचनाएँ आज भी हमें प्रेम, भक्ति, श्रद्धा और सांस्कृतिक विरासत की याद दिलाती हैं । आज के दौर में जब लोग साहित्य से दूर होते जा रहे हैं, विद्यापति की रचनाएँ फिर से साहित्य प्रेमियों को आकर्षित कर रही हैं । उनके पदों पर आधारित गीत, नाटक और संगीत कार्यक्रम आज भी प्रस्तुत किए जाते हैं ।  महाकवि विद्यापति की पुण्यतिथि पर विनम्र श्रद्धांजलि । आपकी कालजयी रचनाएँ हमें सदैव प्रेरित करती रहेंगी ।

यह लेख मुख्यतः विद्यापति से संबंधित विभिन्न प्रकाशित दस्तावेजों के साथ-साथ स्नातकोत्तर स्तर पर तुलनात्मक साहित्य पढ़ाने के मेरे अनुभव पर आधारित है ।

लेखकः विनोदकुमार विमल

About Author

आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

You may missed