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रक्सौल में आरएसएस एवं साहित्यिक संस्था के संस्थापक साहित्यकार, पत्रकार स्व. चन्द्रेश्वर प्र. वर्मा की प्रतिमा लगाने का साहित्य प्रेमियों ने किया माँग.

 

रक्सौल : भारत एवं नेपाल के प्रवेश द्वार स्थित रक्सौल में साहित्यिक गतिविधियों में इन दिनों काफी कमी आ गयी है।जिसे पुनः जगाना अतिआवश्यक है।रक्सौल में साहित्यिक गतिविधियों के जन्मदाता सह आरएसएस के संस्थापक स्व. चन्द्रेश्वर प्रसाद वर्मा का जन्म 5 जनवरी 1939 को हुआ था। उन्होंने रक्सौल में साहित्य जगत को सींचने में अपना बहुमूल्य योगदान दिया है।
उनके जाने के बाद साहित्यिक गतिविधियां लगभग ठप सी पड़ गयी है।
शहर के तुमड़िया टोला निवासी स्मृतिशेष चंदेश्वर प्रसाद वर्मा साठ एवं सत्तर के दशक में रक्सौल में हिन्दी साहित्य साधक के रूप में बड़े अदब से लिया जाता रहा है। धोती कुर्ता पहने अक्सर पान की गिलौरी में मुँह दबाये, दुबले – पतले लेकिन तीखे नयन नक्श के स्वामी वर्मा की सादगी सब को कायल करती थी। उनकी सादगी न केवल जीवन में बल्कि उनकी साहित्यिक यात्रा में परिलक्षित होती थी। उनकी भाषा की सादगी एक अलग तरह के भाषा सौदर्य उनकी पत्रिका “अनलकण” में साफ तौर पर झलकता था।
मुंशी सिंह सिंह कॉलेज मोतिहारी और लंगट सिंह कालेज मुजफ्फरपुर से एम. ए की पढ़ाई के अध्ययन के दौरान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संपर्क में आने वाले चंदेश्वर प्रसाद वर्मा पर हिन्दी, हिंदुत्व और हिंदुस्तानी का ऐसा रंग चढ़ा की उन्होंने अपनी एम. ए की शिक्षा समाप्त करने के पश्चात पश्चिम चंपारण के मझौलिया स्थित मोतीलाल उच्च विद्यालय में शिक्षक के रूप में अपने कैरियर की शुरुआत किया।सन 1965 में उन्होंने रक्सौल में आर. एस. एस. की स्थापना किया और अटल बिहारी वाजपेयी के सानिध्य और उनके व्यक्तित्व से प्रभावित होकर उनके कहने पर सरकारी नौकरी छोड़ कर जनसंघ पार्टी से 1967 में शिक्षक की नौकरी छोड़ कर पहली बार जनसंघ पार्टी के चुनाव चिन्ह दीपक छाप से विधानसभा का चुनाव पहली बार लड़ा। जिसमें चार वोट से पराजित हुए पुनः 1972 में भी चुनाव लड़े जिसमें 40 वोटों से पराजय का सामना करना पड़ा।क्षीणकाय शरीर में सबल आत्मा धारण करने वाले वर्मा जी द्वारा उन दिनों राष्ट्रीयता पर दिए गए जोशीले भाषणों की याद आज भी बड़ी संख्या में लोगों को है। जनसंघ के टिकट पर बिहार विधानसभा चुनाव में दो-दो बार अपनी किस्मत आजमाने वाले रक्सौल जनसंघ के पूर्व उपाध्यक्ष वर्मा ने सचमुच से इलाके में एक जनसंघी माहौल बनाया था। लंबी अवधि की अनवरत अस्वस्थता के कारण चंदेश्वर प्रसाद वर्मा सक्रिय राजनीति से संन्यास लेने को बाध्य किया। सक्रिय राजनीति से विरक्त स्व. वर्मा ने उन दिनों आर्यावर्त हिन्दी दैनिक में उपसंपादक के रूप में सेवायें दी तथा रक्सौल से स्व. श्रीनिवास मस्करा के संपादकत्व में प्रकाशित ” मर्यादित सीमा” एवं कुछ अन्य पत्र पत्रिकाओं के लिए राजनीतिक लेख आदि लिखा। सन 1972 के जनवरी माह रक्सौल के साहित्योत्थान के लिए समर्पित चंदेश्वर वर्मा प्रसाद वर्मा के संपादकत्व में “अनलकण” नाम से एक शुद्ध साहित्यिक त्रैमासिक का शुभारंभ हुआ। इस अनल कण पत्रिका ने अपनी शुद्ध साहित्यिकता के कारण सुधि साहित्य प्रेमियों को खूब आकृष्ट किया। यह पहला अवसर था जो रक्सौल की किसी पत्रिका के माध्यम से पाठकों को स्थानीय नये – पुराने हस्ताक्षरों के साथ हिन्दी जगत के मूर्धन्य कलाकारों को एक साथ पढ़ने को मौका मिला। साहित्य- जगत में इस पत्रिका ने अच्छी प्रतिष्ठा प्राप्त की। लेकिन सीमित संसाधनों से संचालित ऐसी शुद्ध साहित्यक पत्रिका सन 1972, 1973 एवं 1975 में प्रकाशित होने के बाद वर्मा के खराब स्वास्थ्य कारणों एवं अर्थाभाव के कारण प्रकाशन बंद हो गया।एक वक्त जब रक्सौल में साहित्य की सरिता बहती थी लेकिन सोशल मीडिया के प्रादुर्भाव के साथ ही शहर में साहित्य की सरिता लगभग सुख सी गयी है।ऐसी-ऐसी साहित्य विभूतियों को शहर ने भूला दिया है। ऐसे में शहर में साहित्य जागरण के लिए साथ ही वर्तमान पीढ़ी को उनके कृतित्व एवं व्यकित्व से रू-ब-रू करने की नितांत आवश्यकता है, तभी साहित्य जागरण की परिकल्पना साकार हो सकती है। वर्माजी का वर्ष 1994 में निधन के उपरांत शहर में साहित्यिक गतिविधियां लगभग ठप सी पड़ गयी है । वहीं स्व. वर्मा के सुपुत्र राजेश कुमार वर्मा अपने पिताजी की विरासत को आगे बढ़ाते हुए पत्रकारिता में कदम रखा तथा 1995 में दैनिक जागरण, 1999 से लेकर 2020 तक दैनिक हिंदुस्तान और अभी दैनिक भास्कर हिन्दी दैनिक में प्रधान संवाददाता के रूप में अपनी सेवाएं दे रहे हैं।इसके अतिरिक्त तह तक में,हिमालनी सहित विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में अपने कलम की जादू बिखेर रहे हैं। बता दें कि स्व. वर्मा की स्मृति के आलोक में तत्कालीन पश्चिम चम्पारण सांसद स्व. डाॅ. मदन प्रसाद जायसवाल ने गर्ल्स काॅमन रूम का निर्माण कराया था कालांतर में उसे हटा दिया गया । वर्तमान में शहर के साहित्य प्रेमियों की सरकार से अपेक्षा है कि स्व. वर्मा की स्मृति व सम्मान में अनकी प्रतिमा रक्सौल में लगायी जाए या कोई सरकारी योजना उनके नाम से संचालित किया जाए। उम्मीद सरकार इस पहल को एक साहित्यकार के सम्मान में अमलीजामा अवश्य पहुंँचायेगी, जिससे आने वाली पीढ़ी शहर के इस साहित्यिक विभूति के कृतित्व एवं व्यकित्व से रू-ब-रू हो सके।

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