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सर्वोच्च अदालत ने हितेन्द्रदेव शाक्य को हटाने का सरकारी निर्णय बदर किया, पूर्ववत पद पर पुनः बहाली

 

काठमांडू, 8 दिसम्बर। नेपाल विद्युत् प्राधिकरण (NEA) के तत्कालीन कार्यकारी निर्देशक हितेन्द्रदेव शाक्य को हटाने संबंधी सरकार का निर्णय सर्वोच्च अदालत ने सोमवार को उलट दिया है। न्यायाधीश नहकुल सुवेदी तथा श्रीकान्त पौडेल की संयुक्त इजलास ने ऊर्जा जलस्रोत तथा सिंचाईमंत्री कुलमान घिसिङ द्वारा मन्त्रिपरिषद् में पेश किए गए प्रस्ताव को पूर्वाग्रही तथा प्रतिशोधपूर्ण करार दिया।

अदालत के आदेश के अनुसार शाक्य को पुनः प्राधिकरण के कार्यकारी निर्देशक के रूप में बहाल किया गया है। साथ ही अदालत ने सरकार द्वारा शाक्य को जल तथा ऊर्जा आयोग में “ऊर्जा विशेषज्ञ” के रूप में सरुवा करने का निर्णय भी बदर कर दिया।

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अदालत की मुख्य टिप्पणियाँ

सर्वोच्च अदालत ने आदेश में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया कि—

  • विभागीय मंत्री द्वारा लाया गया प्रस्ताव प्रतिशोधपूर्ण था।
  • यह निर्णय कानून, न्याय तथा निष्पक्ष प्रशासनिक प्रक्रिया के मानकों के अनुरूप नहीं था।
  • सरकार द्वारा अपनाई गई प्रक्रिया “स्वेच्छाचारी” दिखी और वैधानिक प्रावधानों के विपरीत थी।
  • शाक्य को हटाते समय उनके सेवा–शर्त या कार्यसम्पादन समझौतों में निर्धारित प्रक्रियाओं का पालन नहीं किया गया।

अदालत ने कहा कि ऐसी कार्यवाही को “स्वच्छ, न्यायसंगत तथा उचित कारणों पर आधारित निर्णय” नहीं माना जा सकता।

मामला कैसे शुरू हुआ?

ऊर्जा मंत्री के रूप में शपथ लेने के बाद ही कुलमान घिसिङ ने मंत्रिपरिषद् में प्रस्ताव रखकर हितेन्द्रदेव शाक्य को नेपाल विद्युत् प्राधिकरण से हटाते हुए जल तथा ऊर्जा आयोग के सचिवालय में विशेष पद सृजित कर उनकी सरुवा की थी।

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इसके विरुद्ध शाक्य ने कात्तिक २१ (7 नवंबर) को सर्वोच्च न्यायालय में रिट दायर किया था, जिसमें उन्होंने अपने पद को प्राधिकरण में ही बनाए रखने की मांग की।

क्या कहा अदालत ने ? (आदेश के अंश)

अदालत ने कहा कि—

“विभागीय मन्त्रीको प्रस्ताव नै पूर्वाग्रही र प्रतिशोधपूर्ण देखिन आएको छ। सो प्रस्तावमा आधारित निर्णय कानून तथा न्यायको रोहमा कायम रहन सक्ने देखिएन।”

यह टिप्पणी बताती है कि अदालत ने पूरे सरकारी निर्णय को अनुचित, स्वेच्छाचारी तथा कानूनी आधार से रहित माना।

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क्या होगा आगे ?

सर्वोच्च अदालत के आदेश के बाद हितेन्द्रदेव शाक्य पुनः कार्यकारी निर्देशक के तौर पर सभी कार्य तथा अधिकारों के साथ काम करेंगे। अर्थात् प्राधिकरण का नेतृत्व फिर शाक्य के हाथ में लौट आया है।

इस फैसले को नेपाल के ऊर्जा तथा प्रशासनिक क्षेत्र में महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि सरकारी निर्णय भी कानून और निष्पक्ष प्रक्रिया के अनुरूप होना चाहिए—अन्यथा वे न्यायिक समीक्षा के दायरे में आएंगे।

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