साजिश का शिकार मधेश प्रदेश : कंचना झा
कंचना झा, हिमालिनी अंक नवंबर ०२५। कार्तिक २२ गते से मधेश प्रदेश की राजनीति जिस मोड़ पर पहुँची है, उसने पूरे प्रदेश को अनिश्चितता, अव्यवस्था और गहरे राजनीतिक संकट में धकेल दिया है । मुख्यमंत्री जितेन्द्र सोनल के इस्तीफे के बाद शुरू हुई हलचल आज कार्तिक २९ गते पहुँचकर भी थमने का नाम नहीं ले रही । जनकपुर, जो मधेश प्रदेश की राजधानी है, जहाँ से मधेश प्रदेश की पूरी प्रशासनिक गतिविधियां संचालित होती हैं, आज पूरी तरह ठप है– कार्यालय बंद हैं, निर्णय प्रक्रिया रुकी हुई है और चारों ओर राजनीतिक अराजकता फैली हुई है ।
अभी वर्तमान अवस्था में मधेश में क्या हो रहा है ? खासकर पिछले सात दिनों में मधेश प्रदेश ने जो घटनाएँ देखी हैं, वे हैं सोनल द्वारा दिया गया इस्तीफा, मुख्यमंत्री सरोज यादव की नियुक्ति, प्रदेशसभा के सभामुख के विरुद्ध पद पर अनुचित आचरण के लिए प्रस्ताव, सभामुख द्वारा पाँच सांसदों को पदमुक्त करना, फिर उप सभामुख का इसपर प्रतिकार करना, सुमित्रा भंडारी का बर्खास्त होना, नए प्रदेश प्रमुख के रूप में डा. सुरेन्द्र लाभ का आना, उनके द्वारा सर्वदलीय बैठक बुलाना, सात दलीय गठबंधन द्वारा बैठक का बहिष्कार करना, तोड़फोड़ करना ये सब अभी मधेश में हो रहा है । यहाँ अभी राजनीतिक अराजकता देखी जा रही है । और ये भी किसी को नहीं मालूम की ये कबतक होता रहेगा ? किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए यह बहुत ही चिंता का विषय हैं–
इन सभी घटनाओं ने मिलकर मधेश को एक ऐसे मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है, जहाँ प्रशासनिक सुचारुता से लेकर राजनीतिक स्थिरता तक सब सवालों के घेरे में हैं ।
इसी बीच कात्र्तिक २९ गते मुख्यमंत्री सरोज यादव का विवादित बयान आया कि “भारत मधेश आंदोलन को हवा दे रहा है,मधेश आंदोलन को भड़काने का काम कर रहा है” पहले से तनावग्रस्त राजनीतिक माहौल में और भी उथल–पुथल आया । सात दल जो उनके विरोध में उतरी हुई है । उनका खुलेआम विरोध कर रही है । यहाँ तक की मधेश प्रदेश प्रमुख ने कात्र्तिक २९ गते को सर्वदलीय बैठक बुलाई जिसमें मुख्यमंत्री सरोज यादव ने भाग लिया । उनके भाग लेने के कारण उनके विरोधी सात दलीय गठबंधन ने इस बैठक का बहिष्कार किया । उनके इस बहिष्कार, उनके विरोध को भारत हवा दे रही है । ये कहना है मधेश प्रदेश के मुख्यमंत्री सरोज यादव का ।
आपका अपने प्रदेश में नहीं चल पा रहा है । २२ गते से सब काम ठप है । जनता परेशान है । आप एक दूसरे से वार्ता के लिए तैयार नहीं हैं तो हर गलती का दोष बाहरी ताकतों पर कैसे मढ़ा जा सकता है ? कबतक ऐसे चलेगा ?
अब सवाल है कि आखिर यह सब मधेश प्रदेश में कब और कैसे शुरु हुआ ? क्या ये किसी साजिश के तहत किया जा रहा है । वैसे विश्लेषकों का कहना है कि ये सब मधेश को बदनाम करने के लिए किया जा रहा है । मधेश अशांत रहेगा तो संघीयता को आसानी से हटाया जा सकेगा । एक साजिश के तहत ही यह सब किया जा रहा है ।
सबकुछ तुलनात्मक रूप से शांत था– तब तक, जब तक तत्कालीन प्रदेश प्रमुख सुमित्रा भंडारी ने चुपके से सिंधुली के एक होटल में एमाले के सरोज यादव को मुख्यमंत्री की शपथ नहीं दिला दी । मधेश के लोगों का सवाल जायज है कि जिस प्रक्रिया को सार्वजनिक होना चाहिए था, वह परदे के पीछे पूरी हुई । क्या वजह रही इस घटना के पीछे ? यही वह क्षण था जब मधेश की सड़कों पर उग्र विरोध, झंडा अपमान, सरकारी कर्मियों की पिटाई और पुलिस से हाथापाई जैसी घटनाएँ हुईं– जो अत्यंत ही निंदनीय हैं ।
एक वीडियो बहुत वाइरल हुआ जिसमें कुछ नेता एक कर्मचारी को पीट रहे हैं । इस वीडियों ने आम लोगों के मन में इस सवाल को जन्म दिया कि क्या हमें ऐसे ही नेता चाहिए ? जो मारपीट भी करें अपनी जनता के साथ ।
इसी तरह एक जगह का नजारा कि पुलिस के साथ भी हाथापाई की गई । किस संस्कार को हम अपनाते जा रहे हैं कुर्सी और पावर के लिए । इतना ही नहीं सबकुछ तहस नहस कर दिया । लाखों सामान को तोड़ा फोड़ा । इसका हर्जाना कौन देगा ? आपने अपने ही हाथों से बनाएं सामान को तोड़ दिया फोड़ दिया । आपका उग्र होना सही है लेकिन उग्रता में इस तरह की हरकत नहीं करनी चाहिए । उस दिन जो कुछ भी मधेश में हुआ – वह न केवल संविधान के मर्म के खिलाफ था, बल्कि संघीयता की आत्मा पर भी प्रहार था ।
एकबार सबकुछ तहन नहस हो चुका हैं फिर उसी गलती को क्यो दुहराना ? हम विरोध करें, ये सभी का अधिकार है लेकिन इस तरह अपने अधिकार का दुरुपयोग करने की किसी को छुट नहीं है । किसी भी लोकतांत्रिक समाज में विरोध का अधिकार है, हिंसा का नहीं । आम लोगों के मन में भी सवाल उठ रहे हैं कि क्या सोनल एक सोची–समझी राजनीतिक रणनीति के तहत बाहर किए गए ?
यदि उन्हें मालूम होता कि २५ दिन के बाद ही उन्हें इस्तीफा देना होगा तो वो इस पद पर आते ही क्यू ? उन्होंने इस पद को स्वीकार किया इसका मतलब था कि उन्हें पूर्ण विश्वास था कि उन्हें विश्वास मत मिल जाएगा । एक समय था कि उन्हें लग रहा था कि विश्वास मत वो हासिल कर लेंगे, लेकिन जब यह स्पष्ट हो गया कि मुख्यमंत्री सोनल को प्रदेश सभा में बहुमत का समर्थन नहीं मिलेगा, तब उन्होंने सभा के भीतर से ही अपने इस्तीफे की घोषणा की । उन्होंने स्पष्ट कहा कि प्रदेश सभा में विश्वास मत प्राप्त करने का माहौल नहीं था, इसलिए उन्होंने अपने पद से इस्तीफा देने का निर्णय लिया ।
मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने के तुरंत बाद ही इस विषय को लेकर चर्चा होने लगी कि आखिर ऐसा क्यों हुआ ?सोनल ने मीडिया से बात करते हुए सीेधे सीधे सभामुख पर यह आरोप लगाया कि सभामुख ने निष्पक्ष भूमिका नहीं निभाई । मधेश प्रदेश के सभामुख प्रदेश के है ही नहीं । वो हमेशा दलीय हिसाब से काम करते हैं । वो जो दल के लिए बेहतर होता है्र उसे लेकर काम करते हैं । संसद से बाहर आने के तुरंत बाद सोनल ने कहा कि इस्तीफा देने से पहले उन्होंने बार बार सभामुख से अनुरोध किया था कि उनके कुछ सांसद बाहर निकल चुके हैं । कुछ नाश्ता करने के लिए कैंटिन में हैं इसलिए बैठक को कुछ देर के लिए रोकें ताकि विश्वास मत के लिए माहौल बना सके लेकिन सभामुख ने उनकी एक नही सुनी और बार बार घंटी बजाते रहे । हारकर उन्होंने इस्तीफा दे दिया । उनके इस्तीफे के बाद तत्कालीन प्रदेश प्रमुख का चोरी छिपे सिन्घुली के होटल में मुख्यमंत्री नियुक्त करना इस घटना ने आग में घी का काम किया । यह खबर आग की तरह फैली सभी हरकत में आ गए ।
भंडारी के काम को लेकर जब सभी दलों ने आपत्ति जताई और जोर शोर से उनका विरोध किया तो केन्द्र सरकार होश में आई और प्रदेश प्रमुख को बर्खास्त कर दिया । भंडारी के बाद प्रदेश प्रमुख के रुप में डॉ. सुरेन्द्र लाभ ने शपथ ग्रहण किया है । डॉ.लाभ आम लोगों की पसंद हैं । डॉ. सुरेन्द्र लाभ का आना आम जनता के लिए राहत की खबर थी । लाभ आमजन से जुड़े, संतुलित दृष्टिकोण वाले व्यक्ति माने जाते हैं । ये उनकी बहुत बड़ी खूबी है । उनके प्रदेश प्रमुख बनने के बाद भी विरोध जारी है । अभी की अवस्था की अगर बात करें तो पूरा मधेश आक्रोशित है । कहें तो आक्रोश की आग में जल रहा है मधेश । और उसकी यह जलन, उसकी छटपटाहट केन्द्र तक आ रही थी ।
वैसे डॉ. सुरेन्द्र लाभ ने आते ही– सभी राजनीतिक दलों से शांति की अपील की है । उन्होंने सभी पक्षों से अपील की है कि सभी संयमित और जिम्मेदार राजनीतिक व्यवहार अपनाए । उन्होंने एक विज्ञप्ति जारी करते हुए कहा कि प्रदेश में बढ़ती अनिश्चितता और अविश्वास के कारण शासन–प्रशासन से लेकर विकास कार्य तक प्रभावित हो चुके हैं ।
प्रदेश प्रमुख लाभ ने कहा कि समाज निरंतर गतिशील रहता है, इसलिए राजनीतिक उतार–चढ़ाव स्वाभाविक हैं, लेकिन अनुशासन, संयम और दृढ़ता के साथ साझा लक्ष्य की ओर आगे बढ़ना आवश्यक है । उन्होंने कहा, “प्रदेश में बढ़ रही आशंका और आक्रोश से संपूर्ण कार्य प्रणाली प्रभावित हो रही है । सहअस्तित्व, समन्वय और सहयोग को आत्मसात करते हुए एक–दूसरे के अस्तित्व और गरिमा का सम्मान करना चाहिए ।”
संघीयता के कार्यान्वयन में मधेश ने सदैव अग्रणी भूमिका निभाई है, यह स्मरण कराते हुए प्रदेश प्रमुख ने कहा कि यहाँ के नागरिकों, राजनीतिक नेतृत्व और पूरे प्रदेश सरकार के कंधों पर संघीय प्रणाली को मजबूत बनाने की मुख्य जिम्मेदारी है ।
वर्तमान राजनीतिक विवाद को विधिसम्मत ढंग से समाधान करने और सुशासन, शिक्षा, स्वास्थ्य तथा समृद्धि प्राप्त करने के साझा अभियान में सभी शक्ति–केन्द्रों– राजनीतिक दल, जनप्रतिनिधि, पत्रकारिता क्षेत्र, बुद्धिजीवी, व्यवसायी, नागरिक समाज से लेकर सरकारी कर्मचारियों तक– को एकजुट होने का आह्वान भी उन्होंने किया ।
लेकिन मधेश प्रदेश के सभामुख रामचन्द्र मण्डल की गतिविधियों से राजनीतिक संकट गहरा गया है, ऐसा आरोप लगाते हुए सात राजनीतिक दलों ने कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की है । संयुक्त विज्ञप्ति जारी कर उन्होंने आरोप लगाया कि सभामुख ने संविधान और अपने पद की मर्यादा का खुला उल्लंघन किया है ।
सात दलों के सांसद ‘सभामुख ने पद के अनुरूप आचरण नहीं किया’–यह आरोप लगाते हुए संविधान २०७२ तथा प्रदेश सभा कार्य संचालन नियमावली २०७५ के नियम १८०(१०) के अनुसार सुझाव प्रस्ताव दर्ता कराना चाह रहे थे । लेकिन आरोप है कि स्वयं सभामुख ने ही दर्ता प्रक्रिया में बाधा उत्पन्न की और सचिवालय के कर्मचारियों को भी धमकी दी ।
इसके अलावा, जब सभामुख के विरुद्ध ही कारवाई प्रक्रिया आगे बढ़ रही थी, उसी दौरान पाँच सांसदों को पदमुक्त करने के निर्णय को दलों ने पूर्णतया असंवैधानिक बताया है । सभामुख ने नागरिक उन्मुक्ति पार्टी की उर्मिला देवी सिंह तथा जसपा नेपाल के मनिष कुमार सुमन, संजय कुमार यादव, सिंहासन साह कलवार और शारदा शंकर प्रसाद कलवार का पद रिक्त होने की सूचना सार्वजनिक की थी ।
इस कदम को सात दलों ने ‘असंवैधानिक, दुर्भाग्यपूर्ण और राजनीतिक मर्यादा विपरीत’ बताते हुए चेतावनी दी कि इससे प्रदेश को टकराव की स्थिति की ओर धकेलने का प्रयास हो रहा है । विज्ञप्ति में कहा गया है, “जब सभामुख स्वयं कारवाई के दायरे में हैं, ऐसे में उनके एकतरफा निर्णय ने प्रदेश में गंभीर राजनीतिक अस्थिरता उत्पन्न की है । यदि इसे कानून के अनुसार संशोधित नहीं किया गया, तो इसकी पूरी जिम्मेदारी सभामुख पर ही आएगी ।”
यह संयुक्त विज्ञप्ति नेपाली कांग्रेस, जसपा नेपाल, जनमत पार्टी, माओवादी केन्द्र, लोसपा नेपाल, एकीकृत समाजवादी तथा नागरिक उन्मुक्ति पार्टी द्वारा जारी की गई है ।
दलों ने प्रदेश में बढ़ते तनाव को कम करने के लिए सभामुख से संविधान सम्मत रास्ते पर लौटने की अपील की है तथा राजनीतिक स्थिरता पुनःस्थापित करने में सभी निकायों से अपनी भूमिका निभाने का आह्वान किया है ।
सवाल उठता है कि सबसे ज्यादा नुकसान किसका हुआ ? सबसे बड़ा नुकसान जनता के विश्वास का हुआ है । राजनीतिक दल तो अपनी –अपनी राजनीतिक रणनीति में व्यस्त हैं । वो मधेश की जनता के बारे में नहीं सोच पा रहे हैं कि इन सात दिनों में मधेश को कितना नुकसान पहुँचा है ? सबसे पहले आप मानव है । तब अपने गाँव, अपने शहर, फिर देश और सबसे अंत में पार्टी के नेता या कार्यकर्ता हैं । लेकिन यहाँ की अवस्था बिल्कुल अलग है । यहाँ सबसे पहले लोग पार्टी के हैं । देश अनुरूप नहीं, सभी पार्टी अनुरूप काम करते हैं जिसका ज्वलंत उदाहरण बन रहा है मधेश ।
मधेश में विकास कार्य रुक गया है । प्रशासन ठप है । राजनीतिक अविश्वास गहराती जा रही है । और सबसे अहम तो यह कि संघीयता पर सबसे बड़ा खतरा उत्पन्न हो गया है । मधेश हमेशा से संघीयता का वाहक रहा । लेकिन आज जानबूझकर मधेश को अस्थिर दिखाने की साजिश रची जा रही है ।
जब मधेश कमजोर होगा, संघीयता पर प्रहार करना आसान होगा । यह कोई सामान्य घटनाएँ नहीं– एक राजनीतिक स्क्रिप्ट है, जिसके निशाने पर मधेश और संघीयता दोनों है । प्रदेश प्रमुख लाभ ने सही कहा– “राजनीति उतार–चढ़ाव से भरी है, लेकिन संयम, अनुशासन और समन्वय ही समाधान का मार्ग है ।” फिलहाल मधेश की राजनीति को लेकर इतना ही कहा जा सकता है कि ं प्रदेश में अराजकता और अस्थिरता बढ़ रही है । मधेश नेपाल की आत्मा है । अगर मधेश में आग लगेगी, तो उसका धुआँ केवल जनकपुर तक सीमित नहीं रहेगा, वह संविधान, संघीयता और देश की स्थिरता तक पहुँच जाएगा । राजनीति आएगी–जाएगी, पर मधेश और उसकी जनता स्थायी हैं । आज जरूरत है कि नेता दलगत स्वार्थ छोड़ प्रदेश और जनता को प्राथमिकता दें । मधेश को बचाना केवल मधेश की जिम्मेदारी नहीं– पूरे नेपाल की जिम्मेदारी है ।

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