राजनीतिकरण के दल–दल से विश्वविद्यालय निकल पाएगा ? : अंशुकुमारी झा
अंशुकुमारी झा, हिमालिनी अंक नवंबर । विक्रम संवत् २०१६ में त्रिभुवन विश्वविद्यालय स्थापना के बाद देश में बहुत सारे विश्वविद्यालयों की स्थापना हुई । जिसका एक ही उद्देश्य था सबके लिए उच्च शिक्षा । सत्य भी यही है कि जिस समाज के व्यक्ति शिक्षित होंगे वह समाज सबसे आगे होगा । समाज आगे होगा तो देश आगे बढ़ेगा । एक समय था जब उच्च शिक्षा के लिए विश्वविद्यालय में एडमिशन होना मुश्किल होता था । सीट सीमित रहती थी विद्यार्थी अत्यधिक रहते थे परन्तु अभी सब विपरीत है । विश्वविद्यालय भी है, सीट भी है पर विद्यार्थियों की संख्या घट गई है । विश्वविद्यालयों में विद्यार्थियों के जगह गाय, भैंस चारा ढूँढ रहे हैं और चारों ओर झाडि़याँ उगने लगी हैं । आखिर ऐसा क्यों हो रहा है ? विद्यार्थी कहाँ गए ? इत्यादि बहुत सारे प्रश्न उठने स्वभाविक हैं ।
विश्वविद्यालय किसी भी राष्ट्र की बौद्धिक और सांस्कृतिक चेतना का केन्द्र होता है । यहाँ से समाज के लिए शिक्षित, विचारशील और जिम्मेदार नागरिक तैयार होते हैं । किन्तु आज के समय में यह ज्ञान का मन्दिर राजनीति के प्रभाव से अछूते नहीं है । विश्वविद्यालयों में शिक्षा की जगह राजनीति का प्रभाव बढ़ता जा रहा है, जिसके कारण इनकी मूल भावना और उद्देश्य कमजोर होते जा रहे हैं । राजनीतिक दलों ने विश्वविद्यालयों को अपने प्रभाव का क्षेत्र बना लिया है । छात्र संगठन अलग–अलग दलों के प्रवक्ता बन गए हैं । उनका उद्देश्य अब शिक्षा या छात्र कल्याण नहीं बल्कि सत्ता प्राप्ति की तैयारी बन गया है । चुनाव, धरना, हड़ताल और नारेबाजी विश्वविद्यालय की दिनचर्या का हिस्सा बन चुके हैं । इस वातावरण में अध्ययन और शोध की भावना समाप्त होती जा रही है । शिक्षक वर्ग और प्रशासन भी राजनीति के इस दायरे से बच नहीं पाए हैं । नियुक्तियाँ, पदोन्नतियाँ और नीतियाँ कई बार योग्यता के बजाय राजनीतिक पक्षधरता पर आधारित होती है । परिणामस्वरुप शिक्षा की गुणवत्ता गिर रही है और विश्वविद्यालयों की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिन्ह लग गए हैं । इस राजनीतिक हस्तक्षेप के दुष्परिणाम दूरगामी हैं । जहाँ विश्वविद्यालयों को विचारों की स्वतन्त्रता, सहिष्णुता और तर्कशीलता का केन्द्र होना चाहिए था, वहीं अब असहिष्णुता और गुटबाजी का बोलबाला है । विद्यार्थी अपने बौद्धिक विकास के बजाय राजनीतिक झंडे उठाने में व्यस्त है । यहाँ तक कि विश्वविद्यालय के शिक्षक और कर्मचारी भी नेताओं का झोला उठाने से नहीं थकते । यह प्रवृति न केवल शिक्षा को नुकसान पहुँचा रही है, बल्कि राष्ट्र के भविष्य को भी कमजोर बना रही है । रोजगार से विद्यार्थियों को विमुख किया जा रहा है । विश्वविद्यालय राजनीति के दल–दल में फँस जाने के कारण न तो समय पर परीक्षा होती है और न ही समय पर परिणामम घोषित होते हैं । बस यही कारण है कि विश्वविद्यालयों में विद्यार्थियों की संख्या कम होती जा रही है ।
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग, २०२३ के अनुसार, देशभर करीब एक हजार सात सौ से अधिक सम्बन्धन प्राप्त कालेज हैं । पर विद्यार्थियों की संख्या कम हो गई है । गुणस्तर भी बहुत नीचे गिर गया है । इससे समावेशिता नहीं असमानता का जन्म हो गया है । सरकारी अनुदान सीमित होने के बाद विश्वविद्यालयों के लिए सम्बन्धन आमदानी का मुख्य स्रोत बन गया है । सम्बन्धन शुल्क, परीक्षा शुल्क, दर्ता राजस्व और आन्तरिक आय कई विश्वविद्यालयों का ६० प्रतिशत बजट ढो रहा है । इस प्रक्रिया से शिक्षा को सेवा नहीं दी जा रही बल्कि एक बाजार में रुपान्तरण कर दिया गया है । कालेजों के बीच में शुल्क घटाने का कम्पिटीशन चल रहा है, यहाँ तक की कई कालेज इन्जिनियरिंग पढ़ाई के लिए वर्ष में सिर्फ एक लाख रुपैया ही ले रहे हैं जिससे पढाई का गुणस्तर घटता जा रहा है । इतने ही मूल्य में कालेज कहाँ से अच्छा शिक्षक, प्रयोगशाला और अनुसन्धान का व्यवस्था करेगा । विज्ञों ने इसे शैक्षिक पुँजीवाद कहा है, जहाँ शिक्षा का मिसन बाजार के मुनाफों में खो जाता है । अमेरिकन फिलोसफर जोन डेवे ने शिक्षा को लोकतान्त्रिक जीवन का आधार माना था पर यहाँ शिक्षा जीविकोपार्जन का माध्यम बन गया है । हमारे देश में एक ही लगानीकर्ता भिन्न–भिन्न विश्वविद्यालयों से सम्बन्धन लेता है । उनका मानना है कि यदि एक विश्वविद्यालय असफल हुआ तो दूसरा तो सफल रहेगा । यह प्रवृति उच्चशिक्षा का नया रोग है और यही व्यवस्था शिक्षा को राजनीतिक तथा व्यापारिक क्षेत्र बना रहा है । कान्ट के अनुसार विद्यार्थी और शिक्षक दोनों को साधन के रूप में नहीं बल्कि उद्देश्य के रूप में देखा जाना चाहिए । । युजीसी के अनुसार ७० प्रतिशत से अधिक शिक्षक अस्थायी करार में हैं । वे एक दिन में तीन चार कालेजों में पढ़ाते हैं जिससे सिर्जनात्मक शिक्षण सम्भव नहीं है । विद्यार्थियों को घाटा हो रहा है । जिस शिक्षा में सीप और अनुसन्धान का अभाव हो वह डिग्री बेरोजगारी को जन्म देगा । फिलहाल अधिकांश विश्वविद्यालयों का स्नातक दर २० प्रतिशत से भी नीचे आ गया है । इसमें सिर्फ विद्यार्थियों की गलती नहीं है । यहाँ का प्रणाली ही गलत है । योग्य शिक्षक, पुराना पाठ्यक्रम और प्रयोगात्मक शिक्षण के अभाव से शिक्षण का गुणस्तर गिर रहा है । नीति, संस्था, लगानीकर्ता, शिक्षक, विद्यार्थी और राष्ट्र, सभी में उत्तरदायित्व का बोध जैसे समाप्त सा हो गया है । युजिसी गुणस्तर नापता है परन्तु शिक्षा का दर्शन परिभाषित नहीं करता है । सभी विश्वविद्यालय राजस्व और राजनीतिक भागबन्डा में फँसा हुआ है । शिक्षक असुरक्षित है । विद्यार्थी प्रमाणपत्र में सीमित है इसका मुख्य कारण है चेतना का पतन । जब शिक्षा सेवा नहीं, व्यवसाय बन जाता है तब विश्वविद्यालय अपनी आत्मा को खो देता है ।
अब सोचने वाली बात यह है कि इतने वर्षो के जटिल प्रणाली को अभी के शिक्षामन्त्री सम्माननीय पुन महोदय सहज बना पायेंगे ? जनता को उनसे बहुत ही अपेक्षा है । जेनजी आन्दोलन के बाद अभी देश को एक कर्मठ शिक्षा मन्त्री मिलने का एहसास हो रहा है । समय समय पर वे शिक्षा के महत्व के विषय में अपनी राय दे रहे हैं । विश्वविद्यालयों से राजनीति हँटाने की बात कर रहे हैं । शिक्षक और कर्मचारी दोनों को राजनीति से दूर रहने के लिए अगाह कर रहे हैं । यह कहीं न कहीं विश्वविद्यालयों में विभिन्न क्षेत्रों में सुधारात्मक पहल हो रहा है । कुछ दिन पहले युवापुस्ताओं की इच्छा और आकांक्षा अनुरूप त्रिभुवन विश्वविद्यालय के कुछ शिक्षक तथा कर्मचारियों ने शिक्षा, विज्ञान तथा प्रविधि मंत्री को १८ बूँदों का एक पत्र प्रदान किया है जिसमें त्रिभुवन विश्वविद्यालय के हित की बात है । अब आशा है कि शिक्षा मंत्री पुन जी इस पर कितना अमल करते हैं । कुछ ही दिन पहले मंत्री पुन त्रिभुवन विश्वविद्यालय के उद्यान जो कि जंगल में परिणत हो गया था, उसे स्वयं आकर सफाई अभियान के तहत सभी स्थानीय वासियों तथा विद्यार्थियों से एक दिन का श्रमदान माँगा और उद्यान को एक नया रूप दिया । उनके इस प्रकार के छोटे छोटे कदम से जनमानस में उत्साह और अपेक्षाएँ बढ़ रही है ।
समग्र में हम कह सकते हैं कि विश्वविद्यालय देश के विकास का केन्द्र है इसलिए यहाँ पर सिर्फ शिक्षा की बातें होनी चाहिए । शिक्षा का मूल्यांकन शिक्षा से ही करना चाहिए न कि फायदा का जरिया बनाना चाहिए । अमेरिकन चिन्तक मार्था नुसबुम ने लिखा है, ‘जब शिक्षा फायदा के लिए होने लगता, तब समाज सोचने वाला नहीं बस चलने वाला व्यक्ति उत्पादन करता है । हमारे देश का यही हाल हो गया है । राजनीतिक हस्तक्षेप और आर्थिक व्यापारीकरण से शिक्षा जब तक मुक्त नहीं होगी तब तक संविधान से मिला अधिकार शब्द में ही सीमित रहेगा । इसलिए सभी को शिक्षा में सुधार के तरफ अग्रसर होना चाहिए । ताकी बच्चे अपने देश में गर्व से पढ सके और अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर कहीं भी जाकर उस पढाई का सदुपयोग कर सके । क्योंकि शिक्षा सिर्फ प्रमाण पत्र ही नहीं जागरुकता का भी अभिन्न अंग है ।



