Thu. Jul 9th, 2026
English मे देखने के लिए क्लिक करें

“क्या कभी किसी मुसलमान को हिंदू की हत्या के लिए सजा मिली है?” : तसलीमा नसरीन

 

 

बांग्‍लादेश की मशहूर लेखिका तसलीमा नसरीन ने अपने देश की अंतरिम सरकार और मुख्य सलाहकार मोहम्मद यूनुस पर तीखा हमला बोला है. उन्होंने बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों की स्थिति और सरकार के दोहरे चरित्र को बेनकाब करते हुए कहा कि वहां न्याय केवल चेहरा देखकर तय होता है. तसलीमा ने आरोप लगाया कि एक तरफ जिहादी हादी की मौत पर पूरा देश और स्वयं यूनुस मातम मना रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ गरीब हिंदू युवक दीपू चंद्र दास की बर्बर हत्या पर सन्नाटा पसरा हुआ है. दीपू को भीड़ ने पीट-पीटकर जला दिया लेकिन उसके परिवार की चीखें सत्ता के गलियारों तक नहीं पहुंचीं.
तसलीमा नसरीन ने तंज कसते हुए कहा कि यूनुस सिर पर टोपी पहनकर जिहादी के जनाजे में शामिल हुए और आंसू बहाए लेकिन दीपू की नृशंस हत्या पर उनके मुंह से एक शब्द भी नहीं निकला. उन्होंने दावा किया कि जब विदेशी मीडिया में हिंदुओं के नरसंहार की खबरें उछलीं तब दबाव में आकर यूनुस ने महज दिखावे के लिए दस लोगों की गिरफ्तारी का आदेश दिया. नसरीन का मानना है कि यह गिरफ्तारी महज एक नाटक है और अंतरराष्ट्रीय समुदाय की आंखों में धूल झोंकने की कोशिश है क्योंकि इन आरोपियों को बाद में चुपचाप रिहा कर दिया जाएगा.

यह भी पढें   बाल मंदिर गबन प्रकरण... तीन लोग हिरासत में

तुष्टिकरण की राजनीति
तसलीमा नसरीन का यह बयान बांग्लादेश में चल रहे पावर शिफ्ट के बाद की उस कड़वी सच्चाई को उजागर करता है जहां मानवाधिकार केवल एक वर्ग विशेष तक सीमित नजर आ रहे हैं. इस स्थिति का विश्लेषण करें तो तीन प्रमुख बिंदु उभरकर सामने आते हैं:

1. ‘दिखावे की गिरफ्तारी’ बनाम वास्तविक न्याय: बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा का एक पुराना पैटर्न रहा है. अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ने पर प्रशासन कुछ संदिग्धों को हिरासत में लेता है लेकिन मुकदमे की प्रक्रिया इतनी कमजोर रखी जाती है कि आरोपी जल्द ही बाहर आ जाते हैं. नसरीन का सवाल— “क्या कभी किसी मुसलमान को हिंदू की हत्या के लिए सजा मिली है?” वहां की न्याय व्यवस्था की गहरी जड़ें जमा चुकी सांप्रदायिक सोच पर सीधा प्रहार है.
2. सत्ता का झुकाव और कट्टरपंथ को ऑक्सीजन: मोहम्मद यूनुस का एक जिहादी के जनाजे में जाना और एक निर्दोष हिंदू की हत्या पर मौन रहना राज्य की प्राथमिकताओं को दर्शाता है. जब सरकार का मुखिया किसी कट्टरपंथी विचारधारा वाले व्यक्ति को सार्वजनिक सम्मान देता है तो इससे जमीनी स्तर पर सक्रिय हिंसक तत्वों को यह संदेश जाता है कि वे कानून से ऊपर हैं. यह सेलेक्टिव जस्टिस समाज में डर और असुरक्षा का माहौल पैदा कर रहा है.
3. ग्लोबल इमेज मैनेजमेंट: बांग्लादेश की वर्तमान सरकार इस समय दो मोर्चों पर लड़ रही है. एक तरफ उसे घरेलू स्तर पर कट्टरपंथियों को खुश रखना है और दूसरी तरफ पश्चिम को यह दिखाना है कि वहां सब कुछ सामान्य है. दिखावे की गिरफ्तारियां’ इसी इमेज मैनेजमेंट का हिस्सा हैं. तसलीमा का विश्लेषण यह चेतावनी देता है कि यदि न्याय के पैमाने धर्म के आधार पर तय होते रहे तो बांग्लादेश में लोकतंत्र की बहाली केवल एक छलावा साबित होगी.

About Author

आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *