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‘बालेन इफ़ेक्ट’ अभी से उड़ने लगे हवा में, अभी तो शोहरत नई–नई है

 

जनकपुरधाम, हिमालिनी विश्लेषण, १८ जानवरी

मधेश की सियासत में ‘बालेन इफ़ेक्ट’: आकर्षण है, भरोसा अभी बाकी

अभी से उड़ने लगे हवा में, अभी तो शोहरत नई–नई है” —
यह शेर इन दिनों मधेश की राजनीति में बालेन्द्र शाह उर्फ़ बालेन पर सटीक बैठता है।

जैसे–जैसे 21 फागुन को तय प्रतिनिधि सभा चुनाव के लिए नामांकन की तारीख़ नज़दीक आ रही है, मधेश का राजनीतिक तापमान अचानक बढ़ गया है। इसकी सबसे बड़ी वजह हैं—काठमांडू महानगर के मेयर रहे बालेन शाह, जिन्हें राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (रास्वपा) ने भावी प्रधानमंत्री के उम्मीदवार के रूप में आगे बढ़ाया है।

रवि लामिछाने और बालेन शाह ने जनकपुरधाम से चुनावी अभियान की शुरुआत करने का फैसला किया है। संघीयता की जन्मभूमि माने जाने वाले मधेश से इस “परिवर्तन उद्घोष यात्रा” की शुरुआत को रास्वपा संघीयता के प्रति अपनी प्रतिबद्धता के संदेश के रूप में पेश कर रही है।

धोती–कुर्ता, जानकी मंदिर और राजनीतिक संकेत

जनकपुरधाम की तिरहुतिया गाछी में होने वाली सभा को पार्टी ने “परिवर्तन उद्घोष सभा” नाम दिया है। बालेन मधेशी पोशाक (धोती–कुर्ता) में मंच साझा करेंगे। जानकी मंदिर में दर्शन, मधेश आंदोलन के शहीद रमेश महतो की प्रतिमा पर माल्यार्पण और बलिदानी दिवस के अवसर पर कार्यक्रम—सब कुछ राजनीतिक संदेश से भरा हुआ है।

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रास्वपा नेताओं का दावा है कि यह अब तक की सबसे बड़ी सभा होगी, लेकिन सवाल यह है कि क्या यह भीड़ वोट में तब्दील हो पाएगी?

विश्लेषक क्या कहते हैं ?

चंद्रकिशोर

राजनीतिक विश्लेषक चंद्रकिशोर मानते हैं कि बालेन का किसी राजनीतिक दल से औपचारिक जुड़ाव सकारात्मक है।
उनके शब्दों में,

“बहुदलीय लोकतंत्र में पार्टी का अनुशासन, संरचना और जवाबदेही मायने रखती है। रास्वपा बालेन को मधेशी चेहरे के रूप में पेश कर मधेश को आकर्षित करना चाहती है।”

वहीं राजनीतिक विश्लेषक राकेश मिश्र थोड़ा अधिक सतर्क नजर आते हैं।

राकेश मिश्रा

उनका कहना है,

“मधेश के चुनाव में जाति, धर्म, संगठन, पैसा और नेटवर्क—सबका असर होता है। रास्वपा का संगठन मधेश में कमजोर है, प्रभावशाली स्थानीय नेताओं की कमी है। मधेश नए राजनीतिक प्रयोगों को आसानी से स्वीकार नहीं करता।”

युवाओं में उत्सुकता, लेकिन वोट की गारंटी नहीं

079 के चुनाव में काठमांडू के मेयर बने बालेन को मधेश के युवा “जानना और समझना” चाहते हैं। खासकर इसलिए क्योंकि वे खुद महोत्तरी के एकडारा गांव से जुड़े हैं। लेकिन दिलचस्प यह है कि उनके अपने गांव में भी लोग उनकी राजनीतिक यात्रा से पूरी तरह परिचित नहीं हैं।

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राकेश मिश्र कहते हैं,

“सोशल मीडिया पर जो युवा बालेन को पसंद कर रहे हैं, उनमें से कई अभी मतदाता ही नहीं हैं। और जो मतदाता हैं, वे पहले से किसी न किसी दल से जुड़े हुए हैं।”

यानी आकर्षण है, लेकिन ठोस राजनीतिक आधार अभी कमजोर है।

079 से 082 तक: ज़मीनी हकीकत

079 के चुनाव में रास्वपा को मधेश प्रदेश में करीब 1.07 लाख वोट मिले थे, लेकिन 32 में से एक भी सीट नहीं।
082 तक आते–आते न तो संगठन मजबूत हुआ, न ही नए बड़े चेहरे जुड़े। ग्रामीण मधेश में न रवि लामिछाने की पकड़ मजबूत है, न ही बालेन शाह की।

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क्या केवल बालेन से बदलेगा समीकरण?

विश्लेषकों का साफ कहना है—प्रधानमंत्री बनने की प्रक्रिया लंबी है।
पहले चुनाव जीतना होगा, फिर बहुमत या गठबंधन बनाना होगा और अंत में सभी सहयोगियों की सहमति लेनी होगी।

चंद्रकिशोर कहते हैं,

“मधेश किसी का मोहीखेत नहीं है। सिर्फ चेहरे से नहीं, मुद्दों से वोट मिलता है—समावेशिता, संघीयता, धर्मनिरपेक्षता और रोज़गार।”

निष्कर्ष: नई शोहरत, पुरानी ज़मीन

बालेन शाह

रास्वपा ने संघीयता विरोधी छवि तोड़ने के लिए मधेश को चुना है। बालेन को प्रधानमंत्री उम्मीदवार बनाकर सहानुभूति बटोरने की कोशिश है। लेकिन मधेश की राजनीति भावनाओं से ज्यादा संगठन और निरंतरता मांगती है।

अभी हालात वही कहते हैं—

“अभी से उड़ने लगे हवा में
अभी तो शोहरत नई–नई है।”

आकर्षण है, उत्सुकता है, भीड़ भी है—
लेकिन क्या यह सब मतपेटी तक पहुंचेगा?
इसका जवाब चुनाव ही देगा।

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