छोटी सी बात
-मालिनी मिश्र
रोज वही सुबह और रात होती हे जिन्दगी कभी खुशनुमा कभी बेजार होती है । एक दिन सुबह से पूछा मैंने तुम हर रोज जाती क्यों हो ? और ऐ रात तुम आती क्यों हो ? सुबह ने मुस्कुरा कर कहा, मैं कहीं नहीं जाती बस रात आ जाती है, पर देखो न ! वही रात, फिर हार कर चली जाती है । रात ने कहा, आना चाहती हूँ अपना बसेरा जमाना चाहती हूँ । पर सुबह की स्वर्णिम आस से रोज हार जाती हूँ, और हारकर वापस चली जाती हूँ । ऐसी ही तो है, हमारी आपकी जिन्दगी ।
-डा. अहिल्या मिश्र
यह वह सीना है जिसमें धँस कर कोई खँजर टूट तो सकता है किन्तु घायल करने की तमन्ना तो केवल सपने सजाने सी बात होगी । फौलाद जब बना पहले खँजर नहीं काटने और तराशने की औजारें तथा मशीनें बनाई गई । जिससे सभ्यता व संस्कृति के विकास की कहानी लिखी गई । मानवता के नए कीर्तिमान स्थापित किए गए । आज उसी सीने को छलनी करने के लिए हमारे हाथ में खंजर की मूठ मजबूती से पकड़ाए जाने की साजिश चल रही है । हमारी अपनी समझदारी को घुन लगता जा रहा है । पुराने घाव के पीप की तरह हम बुरबकई की भीड़ में बहते चले जा रहे हैं । शांति को तलहथी में बाल उगाने के समान बनाने में पहल हम ही तो कर रहे हैं फिर खँजर या हंसियों की जरूरत हमें अवश्य होगी अपनी बोई फसल काटने को । वह भी तो लोहे की टुकड़ों का ही बना होगा । लोहा लोहे को काटेगा और बौने मनुष्य इसमें अपने सीने की मजबूती के ढोल का पोल बजाएगा । यही होगा वह स्वप्न ।
का भूचाल
-नरेश झा
भूकम्प के भूचाल से नेपाल में खलबल मची
वेदना की पीड़ा से दर्द फैला गली गली ।
विपत्ति की विडम्बना को कैसे हम सह पायेंगे
मासूम जो चले गए क्या वो लौट कर आयेंगे ।
करुणा के सागर वेग से जगह को सुनसान की
खिलने से पहले फूल को नोचकर पूरा अरमान की ।
काश हम समृद्ध होते तो शान से जीते सभी
आता जव बाधा अर्चन डरते न हम कभी ।
नीति के निर्माणकर्ता फाड़ डालो जाल को
नरेश सच्चा है बना तो मिटा कंगाल को ।


